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विचार

रवींद्र मिश्र को खुला पत्र : संघीयता विभेद अंत के लिए लाई गई है

person access_timeAug 05, 2021 chat_bubble_outline0

रवींद्र मिश्र जी,
गणतंत्र, संघीयता और धर्मनिरपेक्षता देश का विदेशीकरण करेंगे, देश को खंड करेंगे, संस्कृति को नष्ट करेंगे जैसी काल्पनिक बात  अगर निरंतर करने लगेंगे तो वह होते होते एक धारना ही बन जाएगी। और फिर धारणा धीरे धीरे दस्तावेज बन जाएगी। आपका दस्तावेज शायद इसी मनोकल्पित भ्रम पर आधारित है जैसा मुझे लगता है। ऐसी धारना कल्पना को सत्य मानते हुए घबराने का मनोरोग है कृपया पहले आप शांत मन से सोचने का प्रयास करें।

उम्र से आप 55 वर्ष के हो चुके हैं। इस उम्र तक  आते  आते बहुत कुछ करूँगा की मानसिकता में जी चुके साठ की उम्र तक आते आते भी किसी भी प्रकार से अपनी महत्वाकांक्षा का एक छोर भी न पाने पर,'शायद अब मुझसे कुछ भी नहीं हो पायेगा क्या ? इस किस्म की गहरी आशंका के द्वारा नोचने लगने पर अक्सर लोग अपने प्राकृतिक मार्ग से भटकने लगते हैं। आज भी उनमें से कितने ही 'भटकी हुई आत्माएं' जिस तरह से समाज के इर्द गिर्द घूमती हुई देखता हूँ। वे सब राजनीतिक मनोकल्पित भ्रम से ग्रस्त हैं।  
संघीयता के सम्बन्ध में
आपकी बात अर्ध सत्य अवश्य है। अभी नागरिकों द्वारा देखे गए सपने पर बादल छाये हैं। हम राजनीतिक लोगों द्वारा दिखाए गए सपनों के ढेर को दीमक खा रही है। ये सत्य है। परन्तु आपके जैसे बुज्रुक उद्घोषक को संघीयता के विषय पर बोलने से पहले 2072 में संविधान के लिखने के बाद 2075 का पहला चुनाव होने पर दुर्भाग्य बस संघीयता विरोधी शासक के हाथ में 3 वर्षों तक देश रहा। सैकड़ों वर्ष तक राज्य का दोहन करनेवाले राजा तथा राजतन्त्र से इस बालक संघीयता की तुलना करके सफलता-असफलता का निष्कर्ष निकाल लिया। ये आपका कतई गलत तर्क है।

नेपाल की संघीयता अभी सगरमाथा की यात्रा में है। राजतंत्रीय और बहुदलीय प्रजातंत्र की यात्रा का प्रयोग पहले ही हो चुका है तथा असफल भी हो चुका है। उसे सफल मानना आपकी भूल है। इन सभी यात्राओं को पार करते हुए देश अभी संघीय गणतांत्रिक सगरमाथा की यात्रा में तीसरे कम्प अर्थात सात हजार मीटर की ऊंचाई पार आ पहुंचा है। शेष रहे 18 सौ 47 मीटर की ऊंचाई अभी पार ही करनी है।

अवसान हो चुके राजतन्त्र तथा 2047 साल के संविधान को सफल बताते हैं आप। अब हमारा मरे हुए सामंतों के पुतलों को उठाकर उनके चरणों का चुम्बन करना ठीक नहीं है। आपकी इन बातों से बहन होता है की आप थकित यात्री है, कायर योद्धा हैं।

अभी का नेपाल का निर्माण मात्र किसी शासक की देन नहीं है इतिहास हरेक बार उस देश के परिवेश और सम्बंधित क्षेत्र अथवा समुदाय के अंदर में साधारण व्यक्तियों के द्वारा निर्माण किये जानेवाला सामूहिक प्रयास है।

गोरखा राज्य के निर्माण में पृथ्वी नारायण शाह का हाथ है। ये बात केबल इसी तथ्य के साथ नेपाली जनता के सम्मुख एकदम स्पष्ट है। नेपाल कहलानेवाला क्षेत्र हर एक कोना-गुफा कंदरा, पहाड़ पर्वत नदी-नाला, हिमालय पहाड़ और तराई-मधेश को अपने अपने समुदायों की संस्कृति धर्म परंपरा शिल्प, कला, कौशल तथा भिन्न भिन्न जीवन पद्धति के साथ आम जन समुदाय को अपने रक्त, पसीने और आंसुओं के निरंतर बलिदान का परिणाम है। ये ही हमारा इतिहास है।

इतिहास का जनता की नजर से भी अध्ययन करें। क्या पहाड़ी-हिमाली गांवों का निर्माण आपके राजा के बहुत ने जाकर किया था ? ये पूरा देश इसी प्रकार के हजारों लाखों गांवों हजारों कला कौशल सैकड़ों जातियों और भाषाओं का संगम है। ये ही नेपाल है। नेपाली नागरिकों को अन्य देशो में जहाँ राजतन्त्र है वहां भी विकास हुआ है ऐसी बासी कथाएं मत सुनाइए।

बल्कि आपको जरूरत तो ये खोज करने की है जब भारत जैसे देश भी पराधीन होकर बसर कर रहे थे उस समय ही नेपाल एक विशाल देश का आकार ग्रहण कर चुका था। क्यों नहीं बन सका नेपाल इस बात की खोज कीजिये। 250 वर्षों तक तो राजा का ही शासन था।

आपने कहा- राज्य संघीयता के इस विशाल खर्च को नहीं उठा सकता। इस सम्बन्ध में- खर्च को घटने-बढ़ने का निर्णय आम जनता कर सकती है। ये कोई तर्क ही नहीं है। हाँ भ्रष्टाचार को नियंत्रण करने के लिए 7 नहीं 15 प्रदेश भी बन सकते हैं। 1500 पालिकाएं बनाई जा सकती हैं। उस खर्च को उठाया जा सकता है। इसी अवस्था में भी विकास का नया कदम उठाया जा सकता है।

समस्या संघीय संरचना में खर्च हुई पगार नहीं है। भ्रष्ट संस्कृति की डरावनी संरचना है। व्यवस्था तो परिवर्तित हुई परन्तु सोच नहीं बदली है। अभी के समय में नई पीढ़ी के लिए हरेक पार्टी में पुरानी पीढ़ी के साथ संघर्ष करने का निर्मम कर्म बांकी ही है।

संघीयता को मजबूत बनाने के लिए तथा संविधान द्वारा की गई व्यवस्था के अनुसार समाजवादी व्यवस्था के निर्माण हेतु हमें जनस्तर पर राजनीतिक सत्ताओं का अभ्यास करने के लिए आम जनता को प्रेरित करने का काम करना होगा।

मिश्र जी आप शहरिया बुद्धिजीवी होने के कारण मेरा ग्रामीण समाजवाद का उदाहरण आपको मधुर न भी लग सकता है।

मेरी धारणा है कि गाँव तथा गाँव के आम लोगों के जीवन का विकास करके ही परिवर्तन किया जा सकता है। आप भी जानते हैं कि हर एक पालिका में पिछड़ी जातियां, अल्पसंख्यक और गरीबोब के मोहल्ले हैं। हमें लगता है कि उन सबकी प्रगति के लिए हम सहायक हों हस्तक्षेपकारी नहीं। आप काठमांडू में जन्मे लेकर बड़े होकर, ब्रिटेन में उद्घोषण करके वर्तमान में काठमांडू में रहकर'' जातीय बाते बहुत हो रही हैं परन्तु नेपाली पन ख़त्म हो गया' की बात करते हुए उछल रहे हैं, आपके लिए आसान है।

जो राष्ट्रवाद आपके लिए बड़ा आसान हो रहा है वही राष्ट्रवाद नेपाल के गाँवों में निवास करनेवाली जनता पर क्यों नहीं उतर सका है कारण- अभी भी ग्रामीण क्षेत्रों में दलितों के साथ सामाजिक विभेद कायम ही है। मधेशी जनता के प्रति तो ये लोग विश्वसनीय नेपाली जनता नहीं है का भाव तो आपके ही दस्तावेज में झलक रहा है। इन सब करने से ऐसी बाते आपके दिमाग में तो घुसने की बात ही नहीं है। आपके जैसा राष्ट्रवादी होने का सपना यहाँ हरेक नेपाली का है ये मात्र आपका स्वप्न नहीं है। केवल आप ही इस देश के राष्ट्रवादी नहीं है।

मिश्र जी आपकी तरह- अभिजात वर्ग में जन्म लेकर, उच्च स्तरीय विद्यालयों में शिक्षा पाकर यूरोप की तरफ डॉलर कमा के, नेपाल में रुपयों में समाजसेवा करने का अवसर पाने पर ऐसा कौन होगा जो समाजसेवी नहीं बनेगा, जो राष्ट्रवादी नहीं बनेगा? परन्तु आपकी जैसी मानसिकता के लोगों ने ही उन गरीबों को अपमान और घृणा के अलावा कुछ नहीं दिया है।

संघीयता में कम से कम वह अपमान और तिरस्कार करने की छूट बंद हुई है।

धर्मनिरपेक्षता के संबंध में-

धर्म और संस्कृति अलग अलग विषय हैं ये आपको अवश्य ही मालूम है, फिर भी आप बेईमानी कर रहे हैं। भले ही नेपाल की राष्ट्रीय पोशाक दौरा-सुरुवाल होगी परन्तु हरेक समुदाय की पोशाक उसकी राष्ट्रीय पोशाक है। देश में माध्यम भाषा खास भाषा है और उसे राष्ट्रीय भाषा की मान्यता दी गई है।

हरेक नेपाली द्वारा बोली जाने वाली मातृभाषा का सम्मान होना चाहिए। देश में हरेक समुदाय की अपनी अपनी मान्यताये रीति रिवाज  परम्पराये हैं। उन सबको सम्मान मिलना चाहिए कहने पर कहाँ किसी अपनी संस्कृति को गंवाया है ? अपने हिन्दू धर्म को मात्र अपनी ऐतिहासिक संस्कृति कहा। अपने धर्म को कल्चर का नाम दिया पहली बात और दूसरी बात नेपाल के कौन से इतिहास ने आपको बताया कि हिन्दू धर्म मात्र हमारी पहचान और परंपरा है। आपने तो धर्म निरपेक्षता का अर्थ ही गलत लगा लिया। जिसके सम्बन्ध में राज्य को तटस्थ रहना चाहिए। राज्य व्यक्ति न होकर संस्था है और संस्था किसी व्यक्ति या वर्ग विशेष की नहीं होती वो तो देश की सारी जनता का साझा केंद्र होता है।

मैं कहना चाहता हूँ कि नेपाल में हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा लागू होने के दिन से ही धार्मिक दमन के विरुद्ध यहाँ क्रिश्चियन होने वालों की संख्या हरेक दिन गुणनफल में होगी। इसलिए शैशव अवस्था की संघीयता को कपोल कल्पित भ्रम से दुष्प्रचार करने का प्रयास करनेवाले आप पर मैं भी क्यों शंका न करूँ ?

मैं बंदूक वाली हिंसा को मात्र हत्या नहीं मानता। राज्य द्वारा निर्माण की गई अव्यवस्था के कारण, स्वस्थ उपचार न पाकर, रोजगारी न पाकर, विदेश जाकर होनेवाली हरेक मृत्यु राज्य की तरफ से किये गए शांत युद्ध की हिंसात्मक परिणति है। जनयुद्ध हरेक साइलेंट किलर शासकों के विरुद्ध भी था मिश्र जी।

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