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अन्तर्वार्ता

रबीन्द्र जी के प्रस्ताव से हम जैसे युवाओं पर कुठाराघात हुआ है : रंजू दर्शना

person access_timeJul 29, 2021 chat_bubble_outline0

रातोपाटी
विवेकशील साझा पार्टी के संयोजक रबीन्द्र मिश्र ने संघीयता को ख़ारिज करने का पस्ताव दिया है। उन्होंने स्थानीय श्रेणियों की पुनर्रसंचना तथा उन्हें सुदृढ करते हुए संघीयता को रद्द करने तथा धर्म निरपेक्षता के सम्बन्ध में जनमत संग्रह करने का प्रस्ताव भी दिया है। विप्लव समूह के द्वारा संघीयता अथवा समाजवाद को चुनने के सम्बन्ध में जनमत संग्रह का प्रस्ताव आगे लाये जाने के समय विवेकशील साझा पार्टी के संयोजक तथा नेता रबीन्द्र मिश्र ने धर्म निरपेक्षता पर प्रश्न उठाते हुए जनमत संग्रह की मांग को आगे बढ़ाया है।

मिश्र के प्रस्ताव ने नेपाली राजनीति की चाय के कप में नए तूफ़ान को खड़ा कर दिया है। उनके इस वक्तव्य से उनकी ही पॉर्टी में भी नई बहस का सृजन हुआ है। उनके इस वक्तव्य तथा नए सवालों के सम्बन्ध में इस पार्टी की युवा नेतृ रंजू दर्शना के साथ रातोपाटी द्वारा की गई संक्षिप्त बातचीत...।  


आप लोगों की पार्टी का एकीकरण होने के बाद रवीन्द्र मिश्र ने दस्तावेज के रूप में प्रस्ताव पेश किया है। जिसमें संघीयता को ख़ारिज करने तथा धर्म निरपेक्षता को जनमत संग्रह में ले जाना चाहिए का उल्लेख है। इस बात को आप किस तरह से देखती हैं ?

पार्टी के संयोजक होने पर भी रवींद्र जी लोकतंत्र में स्वतंत्र रूप से बोल सकते हैं। उनके पार्टी संयोजक  होने के कारण इस किस्म के विषय महाधिवेशन अथवा पार्टी के अन्य संस्थाओं के साथ विचार विमर्श के बाद आनी चाहिए। जहाँ तक धर्मनिरपेक्षता तथा संघीयता को नहीं रहना चाहिए के सम्बन्ध में उनके विचार का सवाल है मैं उसके विरुद्ध में हूँ। हम सबके बहुत दुःख करने के बाद हमने संघीयता को पाया है। हाँ इसमें कमियां कमजोरियां होंगी परन्तु अगर यहाँ कमियां-कमजोरियां है तो भी इसे पूर्ण रूप से हटाना उचित नहीं। इस पर अध्ययन करके इसे सदृढ और सबल बनाया जा सकता है।।

धर्मनिरपेक्षता होनी चाहिए। राज्य का कोई धर्म नहीं होता। किसी धर्म के प्रति अधिक झुकाव और किसी के प्रति अवहेलना नहीं की है। संविधान को मानने की बात पहले से ही स्पष्ट है। संयोजक जैसे व्यक्ति द्वारा इस किस्म का वक्तव्य लाया गया। परन्तु फिर भी ये वक्तव्य व्यक्ति द्वारा लाया गया है पार्टी द्वारा नहीं। संयोजक के प्रस्ताव ने मतिभ्रम उत्पन्न किया है। इस प्रस्ताव से हम जैसे युवाओं पर कुठाराघात हुआ है। क्योंकि हम युवाओं ने अपना उर्वर समय राजनीति को दिया है।

अब रबीन्द्र जी द्वारा प्रस्ताव लाया ही जा चुका है परन्तु इसके सम्बन्ध में पार्टी में भी विचार विमर्श होगा तथा उसके बाद ही कोई निश्चय होगा। अभी भी हमारी पार्टी की लाइन उनके लिखे अनुसार नहीं है। हमारी पार्टी के एकीकरण के समय भी संवाद समिति में भी क्या जाने ऐसी भी बातें आएगी के सम्बन्ध में बातचीत हुई थी। संवाद समिति में मैं भी थी। उस समय संविधान को मानेंगे। पार्टी का एकीकरण बड़ी बात है बांकी की बातें बाद में मिलते रहेंगे ऐसा उन्होंने कहा था। पार्टी की लाइन ये नहीं है।

इसमें आप लोगों की रणनीति क्या है ?

इस बात को पार्टी की निम्न इकाई तक ले जाना तथा उस पर विचार विमर्श करना। इस बात की अभी देश को जरूरत नहीं है। चित्र तो बहुत से बदले परन्तु चरित्र नहीं बदले हैं। अच्छे चरित्र का नेतृत्व ही अभी देश की सबसे आबादी आवश्यकता है कहते हुए हम लोग बात को आगे बढ़ाएंगे। अभी हम उनके इस प्रस्ताव को पार्टी के सिस्टम में लेकर क्या करेंगे की सोच में भी हैं।

आपको एकता होना गलत तो नहीं लग रहा है ?

हम लोगों के टूटकर अलग होने से एक साथ होकर आगे बढ़ना ही ठीक होगा इस सोच के साथ एकता को बनाया गया है। एकता करने के कारन किसी तरह का शिकवा नहीं है। ये पार्टी सभी की है। अब आज कोई फर्क किस्म का विचार आ गया तो इसका मतलब कि पार्टी ही टूट जाएगी ऐसा नहीं है।

साथिओं के द्वारा ये बात गलत है कहकर बात को आगे बढ़ाया जा रहा है। विवेक शील साझा पार्टी द्वारा चुनाव को जीतकर किसी पोजीशन में पहुँचने के बाद अगर रबीन्द्र जी द्वारा ये बात कही गई होती तो हम सब पर एक किस्म का घात होता। उन्होंने इस बात को जल्द ही स्पष्ट कर दिया इस कारन इस बात पर मुझे ख़ुशी भी है। उनके लिए भी अब रास्ता तय करना आसान हो गया।

आपकी पार्टी अभी क्या कर रही है ?

पार्टी के एकीकरण के बाद विधान बनाने से लेकर जिलों के समायोजन तक के काम में व्यस्त हूँ। पार्टी के बागमती प्रदेश को मैं लीड कर रही हूँ। इसके साथ ही बागमती प्रदेश के 12ओ जिलों में काम करने कि हमारी कोशिश जारी है। कोरोना काल में हम लोगों ने राहत खाद्यान्न वितरण तथा समाजसेवा के कार्यक्रमों में सहभागिता दी है। हम वैकल्पिक राजनीतिक शक्ति और शिक्षित व्यक्ति भी होने के कारण कोरोना काल में गोष्ठियों तथा सभाओं पर रोक लगा रहे हैं। मैं राजनीति में ही हूँ जरा भी दाएं बाएं नहीं हुई हूँ।

ओली के बहिर्गमन तथा देउवा के पुनः उदय को किस तरह देख रही हैं?

ओली जी का पद से हटाना लोकतंत्र की सुखद घटना मानी जा सकती है। मैं संविधान से ऊपर हूँ। देश के सभी अंगों को मैं कठपुतली की तरह चला सकता हूँ इस किस्म का अहम् उनके अंदर प्रस्फुटित हो गया था जो हम सभी को एक गहन गर्त की तरफ ले जा रहा था। हम सर्वोच्च के निर्णय का स्वागत करते हैं। परतु ये भी एक किस्म की विडंबना ही है कि बार बार प्रधानमंत्री बनने के बाद भी शेर बहादुर जी ने अच्छा काम आखिर क्या किया है ? हम लोगों ने तो कुछ भी नहीं देखा। हाँ मुझे लगता है कि शेर बहादुर जी के कार्यकाल को सफल बनाने के लिए उनकी ही पार्टी के नेताओं को मेहनत करनी होगी।

भ्रष्टाचार बढ़ने के कारण देश अब संघीयता के बोझ को नहीं उठा पायेगा ऐसा लोगों को लग रहा है। रबीन्द्र जी को देश तथा विदेशों से भी कुछेक अच्छी अच्छी टिप्पणीयां भी मिल रही हैं। इस बात को आप कैसे देख रही हैं ?

भ्रष्टाचार और संघीयता का कितना सम्बन्ध है ? ये क्यों बढ़ रहा है के विषय पर अच्छी तरह से अध्ययन किया गया है जैसा मुझे नहीं लगता। एक बार बहस का विषय ये भी हो कि संघीयता से पहले भ्रष्टाचार था या नहीं। क्या भ्रष्टाचार संघीयता की ही उपज है ? ये प्रश्न भी करें। पहले काठमांडू (केंद्र) में मात्र सरकार थी परन्तु अभी संघीयता के कारण सभी व्यक्ति सरकार को महसूस कर पा रहे हैं। यद्यपि प्रदेश सरकार की भूमिका को और अधिक मजबूत बनाने के लिए आवश्यक कानूनों को संसद से शीघ्रातिशीघ्र पास होना चाहिए। जिसने भी संघीयता के विरुद्ध बातें की हैं वास्तव में ये लोग निराशा के कारण कुछ भी नहीं हुआ कहकर संघीयता के विरोध में उतर पड़े हैं। अच्छे से तर्क को पेश करते हुए ये बात नहीं कही गई है। जिस तरह इस प्रकार की बातें आ रही हैं इसे देखते हुए तो यही लगता है कि सभी जगहों पर सामान रूप से विकास होना चाहिए की मान्यता के विपरीत है। इसी लिए मुझे तो लगता है कि किस तरह से संघीयता को सुदृढ़ तथा सबल बनाया जा सकता है पर अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिए।

जहाँ तक धर्म का सवाल है मैं हिन्दू हूँ तथा हिन्दू धर्म ही मानती हूँ और उस पर विश्वास करती हूँ। परन्तु एक धर्म अच्छा और दूसरा ख़राब की मान्यता पर मेरा विश्वास नहीं है। मुझे लगता है कि अधिकांश युवा इस पर विश्वास नहीं करते हैं। हमारे युवाओं के सवाल हैं कि हमारे विश्व विद्यालय कब अच्छे होंगे ?हम अपनी पहचान को मजबूत बनाकर कब आगे बढ़ सकेंगे। सभी धर्मों को समान रूप से अधिकार देना चाहिए के सम्बन्ध में किसी कि भी असहमति होगी जैसा मुझे नहीं लगता।

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