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'श्रावण 3 गते कोई बड़ा षडयंत्र ही होनेवाला था, 22 लोगों को सलाम है'

श्री 5 महाराज ने आम माफ़ी दी, हम गदगद है !

person access_timeJul 26, 2021 chat_bubble_outline0

माधव कुमार नेपाल
आज के कार्यक्रम में खड़े होकर बोलते हुए मुझे एक वर्ष पहले का स्मरण हो रहा है। पुष्पलाल स्मृति दिवस के उपलक्ष्य में इसी भवन (तुलसी लाल स्मृति भवन) के निचले माले पर पुष्पलाल मिलन केंद्र ने इसी तरह कार्यक्रम किया था। उस समय नेपाल कम्युनिष्ट पार्टी नेकपा के अंदर बड़ा संकट आया था। पार्टी में संकट का प्रभाव नेतृत्व स्तर पर दिखाई पड़ा था। जिसके सृजनकर्ता थे कामरेड केपी शर्मा ओली। उन्होंने पार्टी के निर्णय का,  व्यवस्था का, पार्टी की विधि पद्धति का उलंघन करते हुए अपने हिसाब से आगे बढ़ते जाने का काम किया था। आज मैं उस अवस्था का भी स्मरण कर रहा हूँ।

संकटों ही संकटों से गुजर रहा ये कम्युनिष्ट आंदोलन फिर से नई नई चुनौतियों का सामना करते हुए आगे बढ़ रहा है। मनुष्य ने जीवन में चुनौतियों के आने की किस्म से आंदोलन के जीवन में, पार्टी के जीवन में भी चौनौतियाँ आती हैं। चुनौती, संकट आए कहकर घबराना नहीं चाहिए। एक गाना है- जीवन संघर्ष है संघर्ष से भागकर मरूंगा, मत कह। उसका डटकर मुकाबला करने का साहस करो। ये बात यूँ ही नहीं कही गई है। मैदान छोड़कर भागा नहीं जा सकता।

सिद्धांत कभी भी गतिहीन नहीं होता है। इसी कारण जीवन भी गतिहीन नहीं होता। सिद्धांत भी परिवर्तनशील होते है। जीवन के आधार पर सिद्धांत को भी परिवर्तित करना पड़ता है। मार्क्सवादी लोग कहा करते हैं सिद्धांत का रंग भूरा होता है परन्तु व्यवहार का रंग हरा होता है।

लेकिन, समझने जैसी बात क्या है कि जनता हमारे द्वारा कही गई बात को समझती है कि नहीं? जनता हमारे सिद्धांतों पर विश्वास करती है कि नहीं? जनता हमारे पीछे चलती है कि नहीं चलती है? हम पर भरोसा करती है कि नहीं? जनता हमारे द्वारा आह्वान किये गए आंदोलन में मरने को तैयार होती है कि नहीं? मदन भंडारी ने इस कड़ी को पकड़ा था। जनता ही इतिहास के निर्माता हैं।

सत्ता ऐसी चीज है जो दम्भ पैदा करती है। ये मात्र सत्ता नहीं है, म्यांमार का कम्युनिस्ट आंदोलन क्यों समाप्त हुआ? किस कारण से थाईलैंड में समाप्त हुआ? इतने ज्यादा हथियार होने वाले सशस्त्र आंदोलन करनेवाली कम्युनिष्ट पार्टियां कहाँ गई? मालूम है? भ्रष्टीकरण से समाप्त हो गई।

सत्ता के बाहर बन्दुक भी भ्रष्टीकरण लती है। आंदोलन करना पड़ा तो भी पैसा सशस्त्र आंदोलन करना पड़ा तो भी पैसा। पैसे के पीछे अगर लगे तो सत्ता में रहकर राजनीति करो या जंगल में रहकर कोई फरक नहीं पड़ता। जंगल में रहने से भी कम्युनिष्ट पैदा नहीं होता उसके अंदर से भ्रष्टीकरण पैदा होता है। वहां अंदर भी शुद्धिकरण करने की जरूरत होती है। जो सत्ता के मद में आनंदित होने लगता है वह कांग्रेस और कम्युनिस्ट को नहीं पहचानता।

मैं कहता हूँ स्कूल कॉलेज में पढ़नेवाले विद्यार्थियों अच्छी संगत करो एक नेक इंसान बनो। गलत लोगों की संगती मत करो अगर ऐसा होगा तो परिवार का बोझ समाज और देश का बोझ बनोगे। इस कारन ये स्पष्ट समझो कि तुम बनना क्या चाहते हो ?

मैं आदर्श निष्ठावान बनना चाहता हूँ। मैं एक नेक इंसान बनना चाहता हूँ। मैं कम्युनिष्ट, पुष्पलाल होना चाहता हूँ, जिसका सारा जीवन संघर्ष में ही बीता। मैं खुद भी पुष्पलाल की स्कूलिंग से आया हूँ।

धर्मेंद्र बस्तौला जी (विप्लव समूह के नेता) में अभी भी उग्र बामपंथी धड़कन बांकी है। बन्दुक उठाकर सब कुछ किया जा सकता है ऐसा सोचते हैं। नेपाली समाज में उसकी उपादेयता क्या है? जनता के मन को जीतने का काम करो। हमारा दायित्व क्या है? जनता। अभी जनता की हालत क्या है? महिलाएं बलात्कृत हो रही हैं, महिलाओं पर हिंसा हत्या हो रही है। अपहरण हो रहे हैं, उन पर बोक्सी (डायन) के आरोप लगाए जा रहे हैं, दलित कहकर भेदभाव किया जा रहा है।

आज मेरे घर में सामान्य मजदूर किसान महिला आई थी। उसने 2 लाख रुपये ऋण लिया था 14 लाख रुपये दे चुकी परन्तु 18 लाख की जमीन को सूदखोर कब्ज़ा करना चाहता है। वो महिला न्याय के लिए इधर उधर दौड़ रही है जहाँ भी जाती है न्याय नहीं पाती। कम्युनिष्ट पार्टी की सरकार है मगर फिर भी कोई बात नहीं सुनता।
सत्ता में कम्युनिस्ट है पर कोई नहीं सुनता। सत्ता में कम्युनिस्ट है कोई नहीं सुनता। गाँव में कम्युनिष्ट हैं कोई नहीं सुनता। आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? हम कम्युनिस्ट नेता कार्यकर्ता का कर्तव्य क्या है? क्या इस विषय को लेकर आंदोलन का ज्वालामुखी उठाया नहीं जा सकता? सबके द्वारा आत्म समीक्षा करने का समय आया है।

नेकपा एमाले के अंदर पिछला संकट क्यों आया? कल ही श्री 5 महाराजधिराज का वक्तव्य आया- माधव नेपाल जैसे माननीय सदस्यों पर जितने भी स्पष्टीकरण किये गए है उन सबको आम माफ़ी दी जाएगी। एमनेस्टी इज ग्रांटेड। हम बहुत ही हर्ष विभोर से गदगद हुए! महरजादिराज ने आम माफ़ी दी हम सब तो ख़ुशी से गदगद हो गए। हमको तो आम माफ़ी मिल गई। अब हमें तो ख़ुशी से उछलना चाहिए। यही प्रवृत्ति है? क्या इसी प्रवृत्ति को कम्युनिष्ट प्रवृत्ति कहा जाता है?

स्पष्टीकरण पूछना गलत हुआ, मैंने उसमें जल्दबाजी की, मैंने गलती की, स्पष्टीकरण को वापस ले लिया गया है ये कहने पर क्या ऊंचाई थोड़ी घट जाती? मर्यादा कम हो जाती? प्रवृत्ति वैसी ही है।

मैं तो सोचता हूँ कि इंसान सुधर जायेगा। आज सुधर जाएगा, कल सुधर जायेगा, कुछ भी न कहते हुए कल मैंने मधुर शब्दों का ही प्रयोग किया। कल चम्पादेवी में पुष्पलाल स्मृति दिवस के दिन भी कहीं जीभ फिसल न जाये सोचकर बाहर संतुलन में बोले। पार्टी एकता पर असर पड़ने वाली बात न आ जाये पास में बैठे मित्र इशारा कर रहे थे। कॉमरेड विचार पूर्वक बोलियेगा कहा है। ख्याल करके ही बोल रहा हूँ। बिन हड्डी की जीभ कहीं कुछ बुलबा न दे का कितना अधिक तरस था !!

अभी हमारी पार्टी के अंदर मौजूद अंतर्विरोध वैचारिक विषय के साथ जुड़ा है, नेतृत्व के आचरण से जुड़ा विषय है। इसे ठीक ढंग से हल करने का प्रयास करें। अविश्वास का बहुत बड़ा गड्ढा तय हुआ है। उसके 101 प्रमाण हैं। उन सबकी गहरी चीरफाड़ जरुरी है। समय बहुत बीत चुका है अब बहुत विलम्ब हो चुका है।  

परसो श्रावण 3 गते बहुत बड़ा षडयंत्र होने जा रहा था। इतनी अच्छी भली संसद का दो दो बार अनावश्यक विघटन किया गया। ये नेपाल का इतिहास तो अनुपम है ही संसार के इतिहास में भी विरल ही मिलेगा एक प्रधानमंत्री ने संसद को एक बार समाप्त किया पर उससे भी संतुष्टि नहीं हुई फिर दूसरी बार भी समाप्त किया। उसको पुनर्जीवन मिलने पर उसका नैतिक दायित्व भी नहीं उठाते है। 'पौष 5 गते मेरा संसद विघटन करना ठीक था को पुष्ट करने के लिए श्रावण 3 गते पुनः गंभीर षडयंत्र हुआ था। जैसे भी हो शेर बहादुर की सरकार को विश्वास का मत न मिले। विश्वास का मत न मिलने पर मेरे द्वारा किया गया विघटन का काम ठीक था। मैं ही तो दूरदर्शी नेता हूँ कहकर डंका बजाने वाली उनकी सोच को हम लोगों ने असफल कर दिया है। संसद को बचा लिया है। व्यवस्थापिका की रक्षा संविधान की रक्षा की है कार्यपालिका की रक्षा की है। न्यायपालिका की गरिमा की रक्षा की है।

हमने सभी जायज काम किये हैं। संविधान सम्मत काम किये हैं और ऐसे कामों में हमें गौरव का बोध है। मेरे साथ साथ मेरी पार्टी के साथ जुड़े हुए झलनाथ खनाल के साथ उन 22 सदस्यों को मैं सलाम करना चाहता हूँ। और बांकी के उन 11 लोगों को भी मैं सलाम करता हूँ जिन्होंने विपक्ष में मत नहीं किया।

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