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विचार

सत्ता में बने रहने के लिए बेईमानी पर बेईमानी

person access_timeJul 23, 2021 chat_bubble_outline0

रामनारायण बिडारी
नेपाल के संविधान 2072 के अंतर्गत की धारा 76 की उपधारा (5) अपवाद धारा है। ये संसद विघटन से बचाने वाली धारा है। ये धारा संसदीय व्यवस्था वाले देशों में सीधे की नहीं लिखी है। ब्रिटेन में भी संसद विघटन के सम्बन्ध में प्रधानमंत्री को अन्तर्निहित अधिकारों से पीछे हटाया गया है। ये धारा सामान्यतः प्रयोग की जाने वाली धारा नहीं है। यदि प्रधानमंत्री ने संसद विघटन के उद्देश्य के साथ राष्ट्रपति को भी गफलत में डालकर विघटन करने के कार्य में अग्रसर न किया होता तो इसका प्रयोग ही नहीं होता। क्योंकि उपधारा 2 की गठबंधन सरकार से दूसरे दल के समर्थन वापस लिए जाने पर विश्वास का मत लेना आवश्यक है। विश्वास का मत प्राप्त न होने पर प्रधानमंत्री के स्वतः ही पद मुक्त होने की संवैधानिक व्यवस्था है। पदमुक्त प्रधान मंत्री पुनः उसी पद पर बैठकर इसी प्रक्रिया के उसी सदन में, उसी अधिवेशन में प्रधानमंत्री नियुक्त हो ही नहीं सकता। पद मुक्त प्रधानमंत्री के अलावा तीसरे बड़े दल का नेता के ही प्रधानमंत्री होने की संवैधानिक व्यवस्था है। यदि ऐसा किया गया होता तो एमाले का दूसरा नेता प्रधानमंत्री बनता। इसके परिणामतः वामपंथियों की ही सरकार बनी रहती। ऐसे में जनमत की कदर भी होती। वर्तमान में बना गठबंधन भी नहीं बनता। ऐसा विध्वंश भी नहीं होता। परन्तु ओली जी ने एक जिद क्या पकड़ रखी थी कि मेरे अलावा और कोई प्रधानमंत्री नहीं हो सकता, जनता ने ऐसा ही कहा है।

उनके समर्थकों ने उस जिद की आग में घी डालने का काम किया। जो नेपाली जनता नहीं पचा सकती थी। यहाँ तक कि संविधान में भी इस किस्म की व्यवस्था नहीं है। उपधारा 5 की तरफ जाना भी नहीं पड़ता। उपधारा 5 का हमेशा सामान्य अवस्था में प्रयोग नहीं होता। इसका तो अगर उपधारा 1, 2 और 3 के माध्यम से सरकार का गठन न हो सकने की स्थिति में बाध्यात्मक रूप में, अपवाद के रूप में उपचार के रूप में प्रयोग होती है। इसमें मतदान करनेवाले सांसद सब भी मतदान के पश्चात् सभी कार्य अपने अपने दल नियमानुसार ही करते हैं। इसमें किये गए मतदान के कारण दल नहीं बदलता। जिस तरह विधेयक पर संशोधन करने से सत्ता के सांसद के दल में कोई प्रभाव नहीं होता उसी तरह उपधारा 5 में मत डालनेवाले सांसद की दलीय स्थिति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। इससे निर्दलीयता की बात नहीं हो सकती। ये भी संसदीय अभ्यास की ही बात है।

आरम्भ में ब्रिटेन में अथवा अन्य संसदीय प्रणाली वाले देशों में बजट संशोधन होने पर सरकार को इस्तीफ़ा देने की व्यवस्था थी। अब ऐसा करने की परिस्थिति उन देशों में भी नहीं है। सरकार द्वारा उसे स्वीकार करने की अवस्था में सरकार द्वारा लाया गया बजट संसद में विचार विमर्श के बाद संशोधित हो सकता है। उपधारा 5 को बनाते समय संविधान सभा में हुआ विचार विमर्श तथा निर्णय क्या है कि संसद के पूर्ण कार्यकाल को कायम रखने के लिए सरकार के स्थायित्व को कायम रखने के लिए ये ही करने का निर्णय हुआ था। इस बात की व्याख्यात्मक टिप्पणी और टेप रिकॉर्ड संविधान सभा के अभिलेखालय में होना चाहिए। इसमें संलग्न संविधान सभा के अध्यक्ष, मसौदा कार्यदल के सदस्य, मसौदा समिति के सभापति कृष्ण प्रसाद सिटौला और उनके द्वारा गठित विज्ञ टीम के संविधान सभा सदस्य 5 लोग, राजनीतिक संवाद तथा सहमति समिति के सभापति बाबूराम भट्टराई आज भी राजनीति में सक्रिय ही हैं। इतनी जल्दी इन्ही लोगों के सामने उपधारा 5 से निर्दलीय में ले जाने की व्यवस्था का सूत्रपात कहकर कोलाहल करना राजनीतिक बेईमानी है।  
स्पष्ट रूप से समझने की बात क्या है कि संविधान ने संसद विघटन को निरुत्साहित किया है। इसके बदले में उपधारा 5 लिखी गई है। इस बात की सर्वोच्च अदालत द्वारा स्पष्ट व्याख्या किये जा चुकने के बाद भी इसमें छल-चाल की बात करना बेईमानी है। संविधान के निर्माण के समय इस धारा में किसी भी व्यक्ति की विमती नहीं थी। सर्वोच्च अदालत को संविधान की व्याख्या करने का अधिकार देकर सर्वोच्च द्वारा की गई व्याख्या सबको मान्य होने की बात भी संविधान में लिखी है। इसमें भी किसी का विरोध नहीं है। सर्व सम्मत बात है परन्तु फिर भी संसद के अंदर बोलने का विशेषाधिकार है कहते हुए कुछेक सांसदों द्वारा इस फैसले का भंडाफोड़ किये जाने की बात भी फिर दूसरी बेईमानी है।

इस तरह बेईमानी पर बेईमानी करके क्यों इस तरह राजनीति को गन्दा करने का काम किया जा रहा है ? ये वाकई चिंता का विषय है। राष्ट्रपति को विवाद में लेने का काम अच्छी बात नहीं है परन्तु उन्हें विवाद में लेने का काम भी विगत सरकार द्वारा ही किया गया है। अब वर्तमान सरकार को इस किस्म के काम न करने के प्रति सचेत होना होगा। राष्ट्रपति द्वारा भी स्वविवेक से किया जानेवाला कोई भी काम संविधान में नहीं है। निर्णय करना, आदेश देना, न्यायिक कार्य करना किसी तरह का कोई प्रावधान नहीं है। उपधारा 5 का काम भी राष्ट्रपति द्वारा नियुक्ति करके प्रतिनिधि सभा में भेजना है। ये राष्ट्रपति का संवैधानिक कर्तव्य है।
स्वविवेकी भूमिका नहीं। संसदीय व्यवस्था वाले अन्य देश विशेष कर ब्रिटेन, भारत,
कनाडा ऑस्ट्रेलिया में प्रधान मंत्री नियुक्त करने के लिए सैद्धांतिक रूप में राष्ट्रप्रमुख को स्वविवेकी तथा विशेषाधिकार होने की बात को माना जाता है। इन देशों में प्रधान मंत्री की नियुक्ति के सम्बन्ध में हमारे संविधान की तरह विभिन्न अवस्थाएं संविधान में अथवा अन्य किसी कानून में उल्लेख्य नहीं है। राष्ट्रपति द्वारा कुछ स्थापित परम्पराओं के अनुसार प्रधानमंत्री की नियुक्ति करने का प्रचलन है। प्रतिनिधि सभा में बहुमत प्राप्त दल के नेता को ही प्रधानमंत्री बनाने की बात भी वहां के संविधान में नहीं लिखी है। ये विषय परम्परा से निर्देशित है। संसार के ही एक लम्बे लिखित संविधान वाले भारत में संविधान की धारा 75 में राष्ट्रपति द्वारा प्रधानमंत्री की नियुक्ति किये जाने के अलावा और कोई भी बात संविधान में नहीं लिखी है। राष्ट्रपति द्वारा संवैधानिक परंपरा के आधार पर प्रधानमंत्री की नियुक्ति करने का प्रचलन है।

नेपाल के संविधान द्वारा प्रधानमंत्री की नियुक्ति के सम्बन्ध में संविधान में स्पष्ट रूप से एक के बाद दूसरे के क्रम में विभिन्न बाध्यात्मक विकल्प दिए गए हैं। प्रधानमंत्री की नियुक्ति के सम्बन्ध में राष्ट्रपति को कोई भी स्वविवेकी विशेषाधिकार नहीं दिया गया है।

नेपाल के संविधान की धारा 76 (5) के प्रधानमंत्री की नियुक्ति के संबंध में प्रतिनिधि सभा में विश्वास का मत प्राप्त कर सकने का आधार प्रस्तुत करने पर जैसी पदावली का प्रयोग होने के कारण इसका अर्थ धारा 76 (5) अनुसार आये दावे के आधार का यकीन करने की प्रक्रिया अथवा कार्यविधि तय करने का विषय राष्ट्रपति द्वारा तैयार किये जाना चाहिए पर वैसा नहीं किया गया। होने को तो ये पहली बात प्रयोग में आने के कारण भी कार्य विधि की तरफ होश न जाने की बात को भी माना जा सकता है।

बहुत से दावे पेश किये जाने की जगह जहाँ केबल एक ही दावा पेश हुआ हो और उस दावे पर बहुमत सदस्यों का समर्थन सहित के हस्ताक्षर होने की अगर अवस्था है तो राष्ट्रपति की कोई खास भूमिका नहीं होती है।

धारा 76 (5) के अंतर्गत दावा पेश करनेवाले को 30 दिनों के अंदर प्रतिनिधि सभा से विश्वास का मत ले सकूंगा का आधार पेश करने की जरुरत होती है। राष्ट्रपति के समक्ष बहुमत ही प्रमाणित करने की जरुरत नहीं होती है। दावा करनेवाले के पक्ष में बहुमत पूरा होगा या नहीं इसे देखनेवाली संस्था प्रतिनिधि सभा है राष्ट्रपति नहीं। परन्तु राष्ट्रपति के समक्ष दावा पेश करने पर बहुमत सदस्यों के समर्थन सहित हस्ताक्षर पेश किये जाने की व्यवस्था है तो राष्ट्रपति के सम्मुख उस दावे को स्वीकार करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं होता। इस तरह बहुमत सदस्य के हस्ताक्षर के साथ पेश हुए दावे को अस्वीकार करने का अधिकार राष्ट्रपति को धारा 76 (5) अथवा अन्य किसी भी धारा के द्वारा नहीं दिया गया है।

धारा 76 (4) से भाग चुके भगौड़ा प्रधानमंत्री धारा 76 (5) के अनुसार दावा ही पेश नहीं कर सकता। मैं विश्वास का मत नहीं ले सकता कहकर देश, जनता तथा राष्ट्र के सम्मुख घोषणा कर चुकने पर आत्मसमर्पण करके मैदान से खुद ही उस कथित दावे को धारा 76 (5) के अनुसार पेश वैध दावे के साथ तुलना करने, मिस्मास करके तथा दोनों को सामान हैसियत देने के कारण राष्ट्रपति विवाद में पड़ी हैं। अब गणतंत्र के प्रतीक के रूप में रहनेवाले राष्ट्रपति को सरकार और राष्ट्रपति के सलाहकार और एमाले दल द्वारा विवाद में न लाया जाय। राष्ट्रपति को भी सजग होकर विवाद से अलग रहने के लिए सक्रिय रहना चाहिए ये आम जनता की कामना है। 

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