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देउवा की चुनौतियाँ- माधव का धोखा तथा ओली का पतन

person access_timeJul 16, 2021 chat_bubble_outline0

पुरंजन आचार्य
नेपाली कांग्रेस को जनता से 5 वर्षो तक प्रतिपक्ष में रहने का जनादेश मिला है। परन्तु परिस्थितियों ने शेर बहादुर को प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचा दिया है। अब देउवा के सामने बड़ी चुनौती है।

तीन-चार ब्लॉक को लेकर उन्होंने गठबंधन बनाया है। प्रचंड नेतृत्व का माओवादी एक ब्लॉक, उपेंद्र यादें का मधेश वादी दूसरा ब्लॉक, एमाले के ही अंदर के झलनाथ खनाल माधव नेपाल समूह एक दूसरा ब्लॉक अपनी ही पार्टी के अंदर के दो तीन ब्लॉक। इन सभी ब्लॉकों तथा इनसे उत्पन्न होनेवाली परिस्थिति के अनुसार वे आज शपथ लेने जा रहे हैं।

परन्तु उन्हें इन सभी ब्लॉकों के बीच व्यवस्थापन करके जाना होगा। इन सबका संयोजन करके इनका नेतृत्व करना आसान काम नहीं है। 2052 साल की तरफ देउवा जी के प्रधानमंत्री होने के वक्त वे जिस तरह के दिखते थे उसकी तुलना में अभी शारीरिक रूप से थकित तथा सुस्त दिखाई देते हैं।

कल के दिन में आनेवाली पहली चुनौती विश्वास का मत लेना है। संविधान की धारा 76 (5) के अनुसार उन्हें एक महीने के अंदर विश्वास का मत लेना होगा और उसके लिए सबसे बड़ी चुनौती एमाले के अंदर के झलनाथ-माधव नेपाल समूह से है। वैसे भी माधव समूह द्वारा अब इस गठबंधन में न रहने का संकेत कल ही किया जा चुका है।

अब कैसे लेंगे विश्वास का मत ? विश्वास का मत न मिलने पर क्या करेंगे ? विश्वास का मत प्राप्त न होने पर उनके पास मात्र दो रास्ते रह जाते हैं : या तो इस्तीफ़ा देकर रास्ता खोल देना या फिर धारा 76 की उपधारा 5 के अनुसार निर्वाचन में जाना।

उनकी पार्टी का महधिवेशन न होने के साढ़े 5 वर्ष हो चुके हैं। पार्टी के अंदर की आतंरिक समस्याओं को वे किस तरह व्यवस्थित करेंगे ? ये भी प्रश्न तो है ही इस समय जनता एक तरफ तो कोरोना से पीड़ित है दूसरी तरफ बेरोजगारी है। भ्रष्टाचार अपने पंख फैला रहा है। सेवा क्षेत्र सब ध्वस्त हो रहे हैं। अगर भूराजनीति की ही बात की जाय तो दुनिया भर के लोग हमसे नाराज है। दया-प्रेम के चलते थोड़ी बहुत कोरोना के टीके आ रहे हैं।

विश्वास का मत पाने पर भी देउवा के लिए सरकार का संचालन उतना आसान तो नहीं ही होगा। एमसीसी के सम्बन्ध में वे क्या करेंगे ? एमसीसी पास करने के सवाल में झलनाथ-माधव समूह के कुछ व्यक्ति तथा प्रचंड का बड़ा विरोध है। ये गठबंधन कच्चा कमजोर दिखाई पड़ा है।

क्योंकि संसद की पुनः स्थापना होगी ये बात मालूम थी सरकार बनाने का अवसर भी आएगा ये भी सबको मालूम था। वैकल्पिक सरकार के लिए 136 सीटों की जरुरत है ये भी सबको मालूम था। ये बात प्रचंड, माधव नेपाल, उपेंद्र यादव और जनमोर्चा सबको मालूम था। 136 मत एकत्रित करने की जिम्मेदारी मात्र देउवा की ही तो नहीं है न। अब इस समय अगर कोई गठबंधन से अलग होने की कोशिश कर रहा है तो वो संविधान तथा देश दोनों के लिए ही विचित्र की विडम्बना होगी।

माधव नेपाल द्वारा दिया गया धोखा

झलनाथ-माधव द्वारा पुनः  ओली की ही शरण में जाना देखकर ओली की निरंकुशता के विरुध्द लड़ने लिए साथ देनेवाली नागरिक समाज, अदालत के बहस करनेवाले वकील, वे डॉक्टर्स  युवा क्या कहेंगे ये भी एक बार को सोचना होगा।

इस सरकार के बनाने के क्रम में ही गठबंधन नहीं है। माधव जी का ऐसा इतिहास पिछले समय में भी है। इसी प्रकार उन्होंने अपना इतिहास विगत में भी धूमिल किया है। उन्हें परेशानी में डालकर ख़त्म करने की ओली की कोशिस का कारण भी यही है।

पिछले समय राजदरबार हत्याकांड की कगज तलाश के क्रम में भी वे तारानाथ रानाभाट चीफ जस्टिस होनेवाली कमेटी में शामिल हुए थे। उस कमेटी में रहकर अपने घर जाने से पहले ही उसे छोड़ दिया था। राजा ज्ञानेंद्र के उस समय के 'कू' के बाद प्रतिगमन सुधर गया कहते निकले थे। माधव नेपाल अपने उसी इतिहास की निरंतरता दे रहे हैं जहाँ की वे बदनाम है।

माधव नेपाल के साथ विगत 35 सालों से संगत करनेवाले उनके मित्र ही समय समय पर कहते हैं- वे नेता नहीं हो सकते हाँ एक बैंक मैनेजर की तरह के व्यवस्थापक हो सकते है। राजनीतिक निर्णय लेने सम्बन्धी क्षमता उनमें नहीं है। उनके मित्रों द्वारा की गई टिप्पणी अभी सच साबित हो गई। संसद की पुन: स्थापना होने के ही दिन मैं इस गठबंधन में नहीं हूँ कहने की हिम्मत उनमें आखिर आई कहाँ से ? इससे अधिक अनैतिक बात मैं कुछ भी नहीं देखता हूँ। कल एक संसद पुनर्स्थापना हो चुकी है। वे जिस बात के लिए लड़े थे उस बात को सार्थकता मिल चुकी है नई सरकार में शेर बहादुर जी को विश्वास का मत देना बांकी ही है और वे कल ही मैं गठबंधन में शामिल नहीं हूँ कहने पर उनके पक्ष में बहस करनेवाले वकीलों का क्या ? उनके पक्ष में हस्ताक्षर करनेवाले उन 27 सदस्यों को कैसे कन्विंस करेंगे ?

शेर बहादुर की इच्छा के विपरीत ''आप आगे बढे हम आपको सहयोग करेंगे कहकर शेर बहादुर जी को आगे बढ़ने का काम माधव जी ने किया था शेर बहादुर जी को मालूम था की मेरे पास शक्ति तथा संख्या नहीं है। मैं प्रधानमंत्री पद का इच्छुक नहीं हूँ कहनेवाले शेर बहादुर को माधव ने आप को संविधान की रक्षा के लिए भी आगे आना होगा कहा।

प्रधानमंत्री होने के लिए कुछ भी करने को तैयार रहने का आरोप लगने वाले शेर बहादुर इस बात माधव नेपाल के ही समर्थन के पीछे मन न होते हुए भी आगे बढे हैं। अगर आज कांग्रेस के साथ माधव का ऐसा व्यवहार होगा तो कल माधव जी पर कौन विश्वास करेगा ?ओली द्वारा माधव जी पर लगाए गए आरोप सत्य साबित होंगे।

न्यूनतम रूप में भी विश्वास का मत लेने तक तो इन सबको एक होकर रहना चाहिए। निरंकुशता के विरुद्ध लड़ना है तो लड़नेवालों को एक रोडमैप तो बनाना चाहिए। संसद की पुनः स्थापना हुई ठीक है, ओली की निरंकुशता का अंत होगा वह भी ठीक है परन्तु ये सब बातें उस समय ही सार्थक होंगी जब देश को दूसरा प्रधानमंत्री मिलेगा।

हाँ, ऐसा हो सकता है कि माधव जी ये कहें- कल मैंने शेर बहादुर जी को आगे बढ़ता था परन्तु आज पूरा एमाले का दल बल मेरे साथ है मुझे विश्वास का मत दें, मैं प्रधानमंत्री बनूँगा। पार्टी को मिलाकर अब मैं खुद ही नेतृत्व करूँगा कह सकते हैं। परन्तु अब मैं इस गठबंधन में ही नहीं रहूँगा ऐसी अराजनीतिक भाषा का प्रयोग नहीं करना चाहिए। इससे उन पर राजनीतिक नेता नहीं है का आरोप लगेगा। ओली के विकल्प में देश को नया नेतृत्व मिलना चाहिए, देश को ओली मुक्त होना चाहिए,  यही अभी की जनभावना तथा विपक्षी गठबंधन का लक्ष्य है।

केपी ओली द्वारा गंवाया गया अवसर
ओली का राजनीतिक भविष्य काफी ऊँचा उठ चुका था। उस सफलता को वे संभाल न सके। सफलता हासिल करने के बाद उनका इस तरह पतन हुआ कि अब उनका जीर्ण और रोगी शरीर पुनः ऊपर उठ सकेगा, मुझे नहीं लगता।

अबके राजनीतिक भविष्य में जनता उन्हें कम्युनिष्ट आंदोलन के खलनायक के रूप में ही स्मरण करेंगे। इतनी बड़ी कम्युनिष्ट एकता करने के बाद, दो तिहाई मत पाने के बाद महाशक्ति राष्ट्र चीन के द्वारा भी सहयोग करने को तत्पर होने के बाद भी, भारत द्वारा भी सहयोग की जा रही अवस्था में उनका पतन हुआ।

कम्युनिष्ट पार्टी को फोड़ने का काम किया। नेपाली जनता की आशा और भरोसे पर तुषारापात किया। गरीब, अभावों में जीवित रहनेवाले, दलित, मधेशी, जनजाति, आदिवासी उन सभी के द्वारा अब तो हमारी ही सरकार आई है, गरीबों की कम्युनिष्ट सरकार आई है, अब तो कुछ न कुछ होगा, सबने सोचा था परन्तु ओली ने सभी की आशाओं पर तुषारापात कर दिया।

बहुतों ने इतिहास का पुनर्लेखन किया है। गिरिजा बाबू ने उत्तरार्ध में आकर प्रचंड जी जैसे बंदूकधारी व्यक्ति को राजनीति में प्रवेश कराया। राजतन्त्र को हटाकर नया इतिहास लिखा। गणेशमान जी ने जीवन के उत्तरार्द्ध में कम्युनिस्ट के साथ मिलकर 2046 साल का जन आंदोलन सफल बनाया। उसके बाद राजा द्वारा प्रधानमंत्री का निमंत्रण पाने पर उसे अस्वीकार करके त्याग का नया इतिहास लिखा।

इस देश में विश्वेश्वर प्रसाद कोइराला, मनमोहन अधिकारी जैसे व्यक्ति भी थे जिन्हें जनता स्मरण करेगी। परन्तु अपना ही नया इतिहास रचने वाला, कम्युनिस्ट पार्टी का नया इतिहास बनाने वाले, जनता की आशा-भरोसे को टिकाने की बात में प्रधानमंत्री ओली असफल हुए हैं। उन्होंने राष्ट्रपति के साथ मिलकर विधि और विधान को कुचला, कम्युनिस्ट आंदोलन को विघटन तथा विखंडन की ओर ले गए।

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