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क्यों न लगे राष्ट्रपति पर महाभियोग ???

person access_timeJul 08, 2021 chat_bubble_outline0

रमण श्रेष्ठ

नेपाल के इतिहास में ही पहली बार एक ही कार्यकाल में दो-दो बार संसद विघटन करके बदनामी के पात्र बनने के जितने जिम्मेवार प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली हैं उतनी ही अहम् भूमिका राष्ट्रपति की भी हैं। इन लोगों द्वारा किये गए असंवैधानिक कामों से सम्बंधित मुक़दमा अदालत में विचाराधीन हैं। जिसका फैसाका शीघ्र ही आएगा। संविधान द्वारा की गई व्यवस्था तथा प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति द्वारा किये गए कामों को देखते हुए प्रतिनिधि सभा की पुनर्स्थापना होने की काफी हद तक संभावना हैं।

राष्ट्रपति द्वारा संविधान विपरीत अपनी मन मर्जी से ही काम करते जाने की प्रक्रिया पर अब विराम लगाना जरूरी है। राष्ट्रपति पर महाभियोग लगाए जाने पर भी उनके निलंबित न होने की व्यवस्था है। परन्तु फिर भी महाभियोग की जरुरत क्यों है कि 5 महीनों के बीच में 2 बार प्रतिनिधि सभा का विघटन हुआ। मात्र विघटन न होकर पिछली बार तो राष्ट्रपति द्वारा सरकार बनाने में भी अवरोध उत्पन्न किया गया। इस कारण से भी राष्ट्रपति पर महाभियोग लगाना जरूरी है।

अभी कुछ समय पहले ही हुए अमेरिका के उदाहरण को अगर देखा जाए तो तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प पर महाभियोग क्यों लगाया गया ? उसके पास न होने की जानकारी तो सबको थी। पास नहीं होगा की जानकारी होने के कारण ही नहीं निर्वाचन में पराजित होने से उनका कार्यकाल समाप्त हुए अभी 15-20 दिन मात्र हुए थे।

अमेरिका के राजनीतिक इतिहास में ऐसा राष्ट्रपति, जिसने इस काम में ऐसी ऐसी बदनामी की, इस इस कारण से उस पर महाभियोग लगाया गया इस बात का रिकॉर्ड रखने के लिए भी ये काम किया गया था। जो आगामी राष्ट्रपतियों के लिए एक सबक बन सकेंगे। अगर इस तरह के कदम उठाये गए तो ऐसा हो सकता है का सबक सीखने के लिए अमेरिका ने वैसा किया। अंततः ट्रम्प कलंकित होकर अपने पद से पृथक हुए।

अभी नेपाल की अवस्था  भी   कम ज्यादा वैसी ही है। संविधान, विधि, प्रक्रिया और कानून एक तरफ हैं और राष्ट्रपति की भूमिका दूसरी तरफ। अब तो होते होते यहाँ तक बात आ गई की राष्ट्रपति द्वारा अदालत में जवाब में राष्ट्रपति ने संविधान की धारा 76 के अनुसार खुद को प्रधानमंत्री बनाने का हक़ है का दावा भी किया है।

धारा 76 में सरकार बनाने की बातें भी हैं। मंत्री परिषद के लिए बहुमत सांसद होने की जरूरत की बात भी है, संसद के प्रति उत्तरदायी होने की बात भी है। प्रधानमंत्री को संसद के प्रति उत्तरदायी होना चाहिए भी कहा गया है।

अदालत में राष्ट्रपति द्वारा भेजे गए जवाब पर उनके काम को लेकर प्रश्न नहीं उठाया जा सकता कहा गया है। धारा 76 के अनुसार राष्ट्रपति द्वारा किया गया काम अदालत में नहीं उठाया जा सकता कहने के बाद अब प्रधानमंत्री किसके प्रति उत्तरदायी ? इस किस्म के राष्ट्रपति पर यदि महाभियोग नहीं लगाया गया तो कल फिर से दूसरा वितंडा शुरू होगा।

राजा ज्ञानेंद्र को छोड़कर यदि राजा बीरेंद्र के समय में देखा जाय तो उन्होंने संवैधानिक राजा की भूमिका बहुत अच्छी तरह निभाई थी। उन्होंने मंत्री परिषद् की सिफारिश के अनुसार काम किया था। संसद विघटन के विपक्ष में यदि बहुमत है तो राजा ने भी उसे नहीं माना था। सूर्य बहादुर थापा के विघटन को नहीं माना था, गिरिजा प्रसाद कोइराला का भी विघटन नहीं माना था। उनके द्वारा संविधान की धारा 42 की उपधारा 1 के अनुसार सरकार गठन के लिए आवाह्न करने के बाद 135 सांसदों वाले गिरिजा कोइराला को समर्थन मिलने के बाद सरकार का गठन हुआ था। उस समय प्रतिनिधि सभा में बहुमत प्राप्त प्रधान मंत्री द्वारा मात्र संसद का विघटन किया जा सकता था। पहले का अभ्यास इस तरह का था। परन्तु दुःख की बात अभी का काल वैसा भी नहीं रह गया।

महाभियोग पास होगा या नहीं ये अलग किस्म की बात है परन्तु राष्ट्रपति पर महाभियोग लगा चुकने के बाद किस किस विषय पर महाभियोग लगाया गया है उन उन विषयों पर पैरवी होगी। जिसके कारण आगामी दिनों में आनेवाले राष्ट्रपतियों को इस बात का इल्म रह सकेगा कि क्या करणीय है क्या क्या नहीं अथवा ऐसा किये जाने पर तो महाभियोग लगाया जा सकता है, का ज्ञान होगा। संवैधानिक क्षेत्र के विद्यार्थियों के लिए भी ये अध्ययन का विषय हो सकता है।

अमेरिका में भी तो सत्ता से हट चुके राष्ट्रपति पर महाभियोग लगाने की आवश्यकता तो नहीं थी परन्तु क्यों लगाया गया होगा ? वहां के सांसदों को महाभियोग पास कराने के लिए दो तिहाई मतों की आवश्यकता है ऐसा नहीं कि मालूम नहीं था मालूम था। महाभियोग के पक्ष में ऊपरी सदन में 57 मत तो मिल चुके थे। राष्ट्रपति पर लगाए जानेवाले महाभियोग के पास अथवा फेल होने से सरोकार होने की बात ही नहीं है महाभियोग का चार्ज लगाना ही बड़ी बात है।

सं 2013 में श्रीलंका में वहां के प्रधान न्यायाधीश पर महाभियोग लगा। परन्तु पास नहीं हुआ। महाभियोग लगने के बाद उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया। यदि व्यक्ति में नैतिकता है तो महाभियोग लगने के बाद पद से इस्तीफ़ा दे देना चाहिए।

प्रजातान्त्रिक मूल्य तथा मर्यादा के हिसाब से चलना है तो, निष्ठा की राजनीति करनी है तो, इस्तीफ़ा देने का संसार भर का ही प्रचलन है। 2065 साल में प्रधान मंत्री होने के समय प्रचंड ने क्यों इस्तीफ़ा दिया ? यदि इन सब बातों को देखा जाय तो अभी प्रधान मंत्री खड्ग ओली को कितनी बार इस्तीफ़ा दे चुकना चाहिए था ???

कीर्तिनिधि बिष्ट ने सिंहदरबार जलने पर इस्तीफ़ा नहीं दिया था ? उन्होंने तो नहीं जलाया था। भारत में रेलों के टकराने से हुई दुर्घटना के कारण लालू यादव ने इस्तीफा नहीं दिया था ? लालू जैसे बदनाम इंसान ने भी नैतिकता के आधार पर इस्तीफ़ा दिया हमारे यहाँ तो लालू की जितनी भी नैतिकता बांकी नहीं है !!!

अभी राष्ट्रपति द्वारा अदालत में भेजा गया जवाब भी आश्चर्यजनक है। धारा 76 का अधिकार प्रयोग करने का मुझे हक़ है, उस पर कोई भी व्यक्ति प्रश्न खड़ा नहीं कर सकता। ऐसा कहने के लिए तो 2019 साल का संविधान ढूंढना होगा। कही कुछ थोड़ा बहुत 2047 साल के संविधान में भी है। परन्तु  सिस्टम क्या है कि मंत्री परिषद की सिफारिश के अलावा और कुछ भी किये न जा सकने के सम्बन्ध में है। मंत्री परिषद की सिफारिश के बगैर काम करने के लिए तो 2019 साल के ही संविधान पर दृष्टिपात करना होगा। अन्यथा क्या 2047 साल के संविधान में राजा जो भी कहेगा उसे पाने का अधिकार था क्या ?  नहीं था। राजा को भी संसद तथा मंत्री- परिषद के प्रति उत्तरदायी होने की व्यवस्था थी।

धारा 29 की 'बाधा अडकाऊ-फुकाऊ' (धारा को अटकाओ-खोलो) का प्रयोग करने पर भी संसद में ही पेश करने का नियम है। 2019 साल के संविधान में जाया जाए तो वहां अवशिष्ट अधिकार राजा में, सार्वभौम सत्ता का अधिकार राजा में, कार्यपालिका सम्बन्धी सभी अधिकार राजा में निहित बाधा अटकाओ-खोलो के प्रयोग करने पर भी वह संविधान का ही हिस्सा होना, ऐसा तो मात्र 2019 साल के संविधान में है।

2047 साल के संविधान में भी ऐसा नहीं है। धारा 127 के अनुसार बाधा अटकाओ-खोलो को भी संसद में ही जारी करने तथा संसद द्वारा ही उसे पास करना होता था। वहां राजा के काम के विरोध में अदालत में प्रश्न करने का अधिकार न होने की बात होने पर भी अगर संविधान से बाहर होकर काम किया गया है तो उस पर प्रश्न उठाना एक हक़ था। जिस तरह शाही आयोग का गठन किया गया था, सर्वोच्च अदालत ने उसे रद्द कर दिया था।

राजा को भी न मिलने वाले अधिकार राष्ट्रपति द्वारा प्रयोग करने के कारण परसो बहस करते हुए हम लोगों ने क्या राष्ट्रपति श्री 7 बनना चाहती है, कहा था। 2063 साल जेठ 3 गते पुनर्स्थापना हुई प्रतिनिधि सभा की बैठक ने राजा के सभी अधिकारों की कटौती करने, राजा का कोई भी अधिकार न होने, राजा के सम्बन्ध में अदालत में संसद में प्रश्न उठाये जा सकने की घोषणा की गई थी।

2063 साल में अंतरिम संविधान के आने पर राजतन्त्र के रहने अथवा न रहने की बात पर संविधान सभा की पहली बैठक ने निर्णय किया। 2065 साल जेठ 15 गते तो राजा के न रहने का निर्णय किया गया। ऐसी पृष्ठभूमि होनेवाले देश में राष्ट्रपति द्वारा सभी अधिकार हैं कहने पर क्या होगा ??? ये तो राजा से भी ऊपर की बात नहीं हो गई ? पंचायत के जैसे संविधान की बात नहीं हुई ? अभी ऐसी ही झलकियां मिल रही हैं।

अभी राष्ट्रपति द्वारा राष्ट्रीय सभा में बोलने के लिए राजनीतिक दलों का विचार समझने के लिए राष्ट्रीय सभा अध्यक्ष के माध्यम से मौखिक सूचना के प्रवाहित होने की बातें भी निकल रही हैं। सभा में राजनीतिक दलों का विरोध होने पर वे वहां नहीं आएंगी। मानों की राष्ट्रपति सदन में आई तो भी खड्ग ओली के पक्ष के अलावा के सांसदों द्वारा सदन का बहिष्कार हुआ तो राष्ट्रपति की गरिमा क्या होगी ? यदि वे राष्ट्रीय सभा में आई तो प्रतिपक्षी दल को सभा का बहिष्कार करना चाहिए।
(बातचीत पर आधारित)

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