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कोरोना का मचा तांडव मनुज हुआ लाचार

जीने के साधन ख़तम मौत बना हथियार

person access_timeJul 04, 2021 chat_bubble_outline0

कोई दो साल से समाज में फैले कोरोना ने यूँ तो सीधे सीधे देखते हुए भी तांडव मचा रखा है। इकाई दही सैकड़ा की संख्या को पार करके इससे मरनेवालों की संख्या लाख नहीं लाखों में पहुँच चुकी है। ये ऐसी रणचंडी बनी संसार के चौराहे पर खड़ी है जो मानों की सदियों सदियों की भूख की ज्वाला में तड़प रही है, मानों जिसके अब धैर्य का बांध टूट गया है, जो मानों अब किसी की भी सुनने को तैयार नहीं है अपने काली के रूप में सबको निगल जाना चाहती है, ऐसा लगता है कि इसकी ये क्षुधा इसकी ये तृषा दुनिया के अंतिम व्यक्ति तक का भक्षण करने के बाद ही मिट पायेगी। विवाद बड़े हैं कोई कहता है कि ये प्राकृतिक किस्म से ही उत्पन्न विषाणु (वायरस) है तो किसी का कहना है कि ये चीन के वुहान प्रान्त कि किसी लैब से बनाकर फैलाया गया है। वैसे चीन भी शांत रहनेवालों में से कहा है वो इसका इल्जाम अमेरिका पर लगा रहा है। इस सब बातों का कोई तात्पर्य तब नहीं रह जाता जब ऐसी घातक चीजों से दुनिया भर के तमाम काम काज बंद हो गए हों, जब आदमी आदमी को देखकर ऐसे डर रहा हो कि मानों वो कोई ऐसी अशुभ बाला है कि उसके संपर्क में आने से व्यक्ति दूषित हो जायेगा। मतलब मनुष्य को मनुष्य से दूर करने का एक बहुत सोचा समझा गया षडयंत्र। वैसे भी विज्ञान के तथा कथित चमत्कारों ने, अविष्कारों ने मनुष्य को मनुष्य छोड़ा ही कहा है ? उसके अंदर कि मानवीय भावनाये तो पहले ही कुचल कर समाप्त कर दी गई हैं। परन्तु फिर भी बाहिरी दिखावे के तौर पर ही सही एक इंसान दूसरे से मिल लेता था, उसके सुख-दुःख में सहभागी बन जाता था परन्तु शायद इंसान से ही इंसान का ये सुख भी सहन न हुआ कि उसने मानों अपने ही घर में (मानवीय समाज में) आग लगा ली और अब वह खुद ही त्राहि त्राहि कर रहा है।

जितनी खबरें पढ़िए उतने ही इसके सम्बन्ध में विचार...एक और दुनिया भर के चिकित्सक, वैज्ञानिक इस विषाणु को देश दुनिया से भागने के लिए दिन रात अथक परिश्रम करके इससे सम्बंधित औषधियां, टीके बनाने में जुटे हैं, तो दुसरी और इनका एक दूसरा वर्ग है जो कहता है कि ये विषाणु अब हमारा पीछा छोड़ने से तो रहा, अतः हमें इसके साथ ही जीने का अभ्यास करना होगा। वह तो जो होगा सो होगा, कई बार कहते हैं न कि जीवन जीना इतना दुसह्य हो जाता है कि आदमी के लिए जीवन का बलिदान करना सहज हो जाता है। बात में दम तो है..किसी समस्या के चलते अगर बीमारी हो, दुर्घटना हो या अन्य कोई प्राकृतिक आपदा हमारे जैसे साधन स्रोत के अभावों वाले देशों में जीवन इतना कष्टकर हो जाता है कि मौत सरल उपाय लगने लगती है। ये कहने, लिखने से मेरा अभिप्राय ये कतई नहीं है कि इंसान के आत्मबल को कमजोर किया जाय या फिर उसके महत्व उसकी शक्ति का मजाक बनाया जाय। परन्तु कई बार सामाजिक परिस्थितियां, आस पास घटनेवाली घटनाएं इंसान की सोच पर ऐसे गहरे असर डालती हैं कि वह आमतौर पर हेय, निंदनीय कामों का ही सहारा ले लेता है और अधिक भूमिका न बनाते हुए आपको ले चलते हैं। भारत ओडिशा में हुई आज की हृदय बिदारक घटना की ओर...।

एक रिपोर्ट के मुताबिक महामारी के कारण भारत में 23 करोड़ लोग गरीबी के चंगुल में फंस गए हैं। ऐसे में गरीबी के कारण लोग अपनी जान लेने लगे हैं। ओडिशा के जगतपुर जिले में ऐसा ही एक दिल दहला देने वाली घटना सामने आई है। रिपोर्ट के मुताबिक तटीय इलाके जोटा चांदपटाना के रहने वाले 55 साल के शख्स ने अपनी पत्नी और बेटी पर हमला बोल दिया।  एक घंटे के अंदर ही दोनों की मौत हो गई। यह करने के बाद उस शख्स ने खुद को भी फांसी लगा ली। मरने वालों की पहचान इस तरह हुई- एक खुद लोकनाथ पाल है, दूसरी उसकी पत्नी कल्पना और तीसरी उसकी बेटी 20 साल की मधुस्मिता है।

पुलिस के मुताबिक स्थानीय लोगों का कहना है कि लोकनाथ पाल राजमिस्त्री का काम करता था। पिछले साल से जब से महामारी आई है लोकनाथ को काम नहीं मिल रहा था। इसके बाद परिवार को भारी आर्थिक संकट का सामना करना पडा। कल्पना लकवाग्रस्त थी और मधुस्मिता इसी साल कॉलेज में नाम लिखाया था। पुलिस को प्रारंभिक जांच में पता चला है कि पत्नी का इलाज कराने के लिए लोकनाथ को हर दिन पैसे का इंतजाम करना पड़ता था। उसके पास आय को कोई स्रोत नहीं था। वह बिना किसी काम के इसका इंतजाम करता था। इससे वह भारी संकट में फंस गया था।

पुलिस का कहना है कि शनिवार सुबह पति-पत्नी के बीच पैसे को लेकर विवाद हो गया। इसी समय लोकनाथ पाल ने पत्नी और बेटी पर तेजधार हथियार से हमला कर दिया। इसके बाद लोकनाथ ने गांव वालों से इन दोनों को अस्पताल ले जाने को कहा। जगतसिंहपुर जिला अस्पताल में इलाज के दौरान मधुस्मिता की मौत हो गई जबकि पत्नी कल्पना की मौत कटक अस्पताल ले जाते समय चोट लगने से हो गई। यह बात जब लोकनाथ को पता चली तो उसने अपने घर पर छत के पंखे से खुद को फांसी लगा ली। 

ये कोई एक घटना नहीं है दिनानुदिन न जाने कितनी घटनाएं होती है कुछ जो लोगों की आँखों के सामने आ जाती है तो न जाने कितनी यूँ ही वक्त की चढ़ा के नीचे दबकर ऐसे दफ़न होती हैं की उनका कोई पता नहीं चलता।

बड़ी मजे की बात ये है कि सरकार कहती है कि वो लोगों की मदद कर रही है। समाचारपत्र और समाचारों के कितने ही माध्यम ऐसी खबरों का पुलिंदा उठाये लोगों को अजब गजब के दृश्य दिखा रहे हैं। कितनी हंसी नहीं आती जब लोग एक किलो चावल एक किलो दाल, एक दर्जन केले, दो चार जंक फ़ूड के पैकेट गरीब असहायों को देते हुए तस्वीर उतरवाकर सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हैं। शायद भ्रम होता होगा कि आखिर कहीं न कहीं हम दानवीर कर्ण के वंशज ही है।

मन दुखता है, आत्मा बेचैन होती है, पीड़ा की लम्बी सांसे निकलती हैं परन्तु लाचारी कुछ नहीं कर सकते है। प्रकृति अगर ये तेरी उपज है तो ये माँ इसे अपने गर्भ में छिपा ले और अगर ये मानव कृत है तो सिर्फ इतना की जब तक किसी बात का निदान मालूम न हो उसका संधान नहीं करना चाहिए।

हमारे धार्मिक ग्रन्थ महाभारत के पात्र अश्वत्थामा अभी भी उस अपराध को भोग रहे हैं (जैसी की मान्यता है) की उन्हें ब्रह्मास्त्र का संधान तो करना आता था पर उसे वापस लेना नहीं। जिसका उन्होंने गर्भस्थ शिशु पर संधान तो किया पर वापस न ले सका और फिर उसके परिणामस्वरूप बना कृष्ण में श्राप का भाजन।

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