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अन्तर्वार्ता

संसद विघटन की समीक्षा होगी, हस्ताक्षर वापस नहीं होंगे : युवराज ज्ञवाली

person access_timeJul 04, 2021 chat_bubble_outline0

रातोपाटी संवाददाता

काठमांडू। एमाले उपाध्यक्ष युवराज ज्ञवाली कहते हैं कि भले ही ओली ने (शुक्रवार) 'जेठ 2 की केंद्रीय कमेटी' बैठक बुलाना सकारात्मक दिख रहा हो परन्तु उसके अंतरतम में भी ठगी बेईमानी की महक छिपी है। यदि हम लोग उस मीटिंग में गए तो भी सर्वोच्च में पेश किये गए हमारे हस्ताक्षर वापस नहीं होंगे, युवराज ज्ञवाली की प्रतिज्ञा है।

'ओली जी लोगों की आतंरिक बात क्या समझ में आती है के अभी जेठ 2 गते में जाने की बात कर दो ऐसा कहने पर माधव समूह के नेताओं में विभाजन भी हो सकता है, उसके बाद जो भी होगा, होगा,' ज्ञवाली ने रातोपाटी से कहा। वास्तव में एकता ही करने की मानसिकता उन लोगों में नहीं दिख रही है। परन्तु फिर भी जेठ 2 गते की कमेटी में जाएँ ये विषय पहले से ही हमारे द्वारा उठाया गया विषय है, ये हमारी जीत ही है।'

शेर बहादुर देउवा को प्रधानमंत्री बनाने के लिए मांग करते हुए माधव नेपाल पक्ष ने सर्वोच्च अदालत में पेश किये गए हस्ताक्षरों को वापस नहीं लिया जा सकता युवराज ज्ञवाली ने बताया है। उन्होंने कहा- '' हमारे द्वारा ही रिट दायर किये जाने पर अब उसके पीछे नहीं हटा जा सकता। हस्ताक्षर वापस होने की तो बात ही नहीं हो सकती अब ये हमारे हाथ में है भी नहीं अब ये अदालत का मामला बन चुका है।'

एमाले में विकसित पिछले घटनाक्रम के सम्बन्ध में उपाध्यक्ष ज्ञवाली के साथ हुई बातचीत का संक्षिप्त अंश...

अध्यक्ष केपी शर्मा ओली 2075 साल जेठ 2 गते की केंद्रीय कमेटी की बैठक में लौटने के लिए राजी हुए दिख रहे हैं। शुक्रवार केंद्रीय कमेटी की बैठक का भी आवाह्न किया गया है। नेकपा एमाले की केंद्रीय समिति की वास्तविक संख्या है क्या ? 203 अथवा 241?

इसमें कुछ थोड़ा सा विवाद है। जेठ 2 गते की कमेटी 203 लोगों की मान लें। अभी जो 241 लोग कहकर मामला आया है वह माओवादियों के साथ एकता होने पर किसे किसे रखने की बात का औपचारिक एकीकृत पार्टी (नेकपा) द्वारा किया गया है। अगर बड़े सीधे शब्दों में  समझने के लिए कहा जाय तो जोड़ी गई संख्या प्रस्तावित संख्या मात्र है। उसे औपचारिकता तथा वैधानिकता देने का काम एकीकृत पार्टी (नेकपा) ने किया। समझ गए न बिलकुल ठीक ठाक ?

तात्पर्य, उस बढ़ाई गई नामावली का एमाले द्वारा अनुमोदन करना बांकी ही है ?

माओवादियों के साथ मिल चुकने पर उन लोगों का नेकपा ने अनुमोदन किया। एमाले और माओवादी के मिल चुकने के बाद जोड़े गए लोगों का अनुमोदन किया गया है।

परन्तु उसमें माधव नेपाल की भी सहमति होने के कारण वे लोग एमाले के ही केंद्रीय सदस्य है का भी तो तर्क दिया जा रहा है ?

हाँ, दूसरी पार्टी क्या है कहने पर वो हम सबकी ही सहमति से जोड़ी गई थी।

इसका मतलब 241 सदस्यीय केंद्रीय कमेटी को ही मानकर आगे जाया जा सकता है, है न!

जेठ 2 गते की कमेटी कहने पर 41 लोगों के आलावा की संख्या है। वे 41 लोग जेठ 2 गते के बाद से 3 गते होते हुए बढ़ाये गए लोग हैं। जेठ 2 गते की खास कमेटी से मतलब 203 लोगों से है। इसमें भी पार्टी के भीतर कुछ विवाद हैं।

अध्यक्ष ओली द्वारा बालुवाटार में शुक्रवार जेठ 2 गते की ही केंद्रीय कमेटी की बैठक बुलाई ऐसा सुनने में आया। आप लोगों को मालूम है?

हम लोग पहले से ही यही कहते आ रहे हैं। इसी कारण ये जीत हमारी भी जीत है। परन्तु अभी तक भी स्थायी कमेटी की बैठक न करने, वहां बैठकर भलीभांति हरेक छोटी छोटी बात पर मंथन करना और भी विषय हैं जिसमें माधव नेपाल तथा केपी ओली के बीच में विचार करके बैठक को तय करने पर भी तो सलाह मशबिरा के अनुसार ही करनी चाहिए।

परन्तु सलाह मशबिरा न करके उनके द्वारा धोखाधड़ी के हिसाब से काम किया जाना दिखाई दे रहा है। जैसे जेठ 2 गते कह दें आएंगे तो बढ़िया नहीं आएंगे तो और भी बढ़िया के किस्म से काम हो रहा है। सच में एकता करने की मानसिकता से भी यहाँ बाध्यात्मक अवस्था है, इसमें आएंगे आएंगे नहीं आएंगे नहीं आएंगे जितने भी आएंगे आएंगे जैसा दिखाई पड़ रहा है।

ओली जी लोगों की आतंरिक भावना क्या दिखाई दे रही है कि जेठ 2 गते में जाने की बात किये जाने पर माधव नेपाल समूह के साथी आपस में विभाजित भी हो सकते हैं उसके बाद तो जो जो होगा हगा। इसी कारण बास्तव में एकता करने की मानसिकता उन लोगों में नहीं है। परन्तु फिर भी मुख्य एजेंडा की मुख्य विषय वस्तु तो जेठ 2 गते की अवस्था में जाना ही है।  जेठ 2 गते की अवस्था में जाये इस विषय को हम बहुत पहले से ही उठा रहे हैं।

आषाढ़ 18 गते के लिए बुलाई गई बैठक में भाग लेंगे कि नहीं ?

इस बारे में हम विश्लेषण के साथ साथ विचार विमर्श करेंगे। बैठक में जाना है कि नहीं जाना है तो कैसे जाना है। अभी हम इस सम्बन्ध में बातचीत भी नहीं कर पाए हैं। इस सम्बन्ध में माधव समूह की स्थायी कमेटी द्वारा बैठकर विचार विनिमय करके निर्णय किया जायेगा।

बालुवाटार में ओली पक्ष की बैठक है उसे भी देखेंगे ?

हाँ आज उन लोगों की बैठक में लिए गए निर्णय से हमें भी निर्णय लेने में सुविधा रहेगी। वैसे कल हुई मीटिंग को ही अनुमोदित किया जायेगा। उसी में कुछ कुछ जोड़ा घटाया जायेगा, परन्तु हमें इस निर्णय से अंतिम निष्कर्ष पर पहुँचने में सुविधा रहेगी।

आप लोगों ने शेर बहादुर देउवा को प्रधान मंत्री बनाने की मांग को लेकर सर्वोच्च में हस्ताक्षर पेश किये हैं। अब जबकि संस्थापन पक्ष जेठ 2 गते की अवस्था में लौटने को तैयार हो चुका है ऐसे में माधव समूह को हस्ताक्षर वापस लेने चाहिए ओली पक्ष का तर्क है। अब ये विषय किस तरह निष्कर्ष पर पहुंचेगा ?

वो तो अभी अदालत का विषय है। हस्ताक्षर की वापसी का तो अभी विषय ही नहीं हो सकता। हस्ताक्षर वापस होना संभव ही नहीं है। वैसे भी अब वो हमारा विषय नहीं रहा अदालत का विषय बन चुका है।

लेकिन अगर प्रधानमंत्री ओली सार्वजनिक रूप से ही ''संसद विघटन एक गलती थी'' कहकर 'रियलाइज़' करते हैं तो ?

उन्होंने गलती थी कहकर मान लिया तो ये तो सबसे अच्छा होगा। ऐसा होनेपर तो समस्या का हल वहीं से निकल आएगा। इससे टो एकता का वातावरण भी बनेगा। परन्तु अभी ये विषय संसद में मात्र विचाराधीन न होकर अदालत में अत्यंत संवेदनशील विचार का विषय बन चुका है। ये ऐसा समय है कि अभी हम इसके बीच में कुछ भी बोल नहीं सकते।

क्या हस्ताक्षर वापस नहीं लिए जा सकते ?

हमारे द्वारा ही रिट दायर किये जाने के कारण अब हम पीछे नहीं हट सकते। अब अदालत जो जैसा निर्णय करेगी उसे ही मानकर आगे जाना होगा। अगर पार्टी एकता हो गई तो एक किस्म की अवस्था होगी और अगर नहीं हुई तो एक अलग किस्म की अवस्था होगी।

परन्तु ऐसी अवस्था में ओली जी लोगों द्वारा प्रश्न करने का स्थान तो बन जायेगा- हम जेठ 2 गते में लौटने को तैयार हो चुके हैं तो आप लोग कांग्रेस के प्रधान मंत्री बनाने के लिए दिए गए हस्ताक्षरों से वापस क्यों नहीं हो सकते ?

वो तो संसद विघटन का परिणाम है। पहले पौष 5 गते विघटन किया। फिर दुबारा विघटन किया। वार्ता कमेटी कार्यदल द्वारा काम हो ही रहा था। संसद विघटन के कारण समस्त नेकपा में एमाले लोकतंत्र विरोधी हो गया, एमाले द्वारा संविधान को पद दलित करने की कोशिश की गई, लोकतंत्र पर ही आघात देने की जैसी स्थिति आ गई। प्रश्न तो उठा ही ! इसी लिए एमाले नहीं, केपी जी ने ऐसा किया है कहने की तरफ हम इसे ले जाना चाहते हैं। सच बात भी यही है, एक ही पार्टी है कहकर भी क्या करें ?

केपी ओली बार बार इतनी गलतियां कर चुके हैं आखिर अब एमाले में एकता का आधार क्या है ? गंभीर गलतियां करने के कारण ओली को पद से अलग होना होगा या सभी गलतियां माफ़ ? ओली को इस्तीफ़ा देना होगा अथवा सार्वजनिक आत्मालोचना करना आपकी मांग होगी या आप सब ऐसे ही मिल जायेंगे।

बहुत सी बातें हैं बहुत सी। केवल संसद विघटन नहीं है अध्यादेश लेकर- अनेक हैं। भ्रष्टाचार की बातों को लेकर और भी उनकी मनमर्जी की बातें हैं। इसी लिए वहां हमारे जाने पर हम लोगों द्वारा उठाये गए एजेंडा तो वैसे ही जीवित ही रह जायेंगे, हम मनुष्य तो चलो जायेंगे परन्तु विषय तो रह ही जायेंगे।

संसद विघटन करना ठीक था अथवा नहीं ? से लेकर शेर बहादुर को समर्थन करना ठीक था की नहीं- आदि इत्यादि विषयों पर ऐतिहासिक समीक्षा की बात तो आती है न !

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