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सम्पादकीय

शिक्षा मंत्री का नश्लवाद : कम्युनिस्ट के नाम पर कलंक

person access_timeJun 30, 2021 chat_bubble_outline0

रातोपाटी
अमेरिक के हारवर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर हेनरी लुइस काली जाती के हैं। घटना सं 2009 की है। वे कुछेक दिनों के लिए अपने घर से बहार कहीं गए हुए थे। घर वापस आने पर उनके घर का ताला नहीं खुला। उन्होंने घर के ताले को तोड़कर घर के अंदर घुसने का प्रयास किया। इस सबके दरमियान उनके पडोसी के घर पर भी ढक ढक की आवाज जाना लाजमी ही था। अमेरिका न है ! किसी ने इस सब की पुलिस को खबर कर दी। अब क्या था लुइस के घर गोरी जाति के पुलिस जवान जेम्स करोली की टोली आ पहुंची।
जब तक पुलिस आई प्रोफ़ेसर अपने घर के अंदर प्रवेश कर चुके थे। अब पुलिस का नंबर था, पुलिस ने उनसे स्वभाविक रूप से पूछताछ की। लुइस ने सामान्य रूप से बताया कि घर का ताला न खुलने के कारण मैंने उसे तोडा और घर में आया। ये मेरा ही घर है। इतनी सामान्य बात और जानकारी के बाद भी पुलिस उन्हें पुलिस स्टेशन ले गई और कुछ देर के बाद उन्हें घर वापस भेज दिया।

प्रोफ़ेसर लुइस ने इस घटना के सम्बन्ध में भरे मन से मीडिया में प्रतिक्रिया दी- 'यदि मैं गोरी जाति का होता तो सामान्य पूछताछ के बाद पुलिस मुझे छोड़ देती यूँ गिरफ्तार न करती। काली जाति का होने के कारण ही पुलिस ने मेरे साथ इस किस्म का व्यवहार किया।’

अब क्या था इस घटना को लेकर अमेरिकी समाज में दो पक्ष बन गए और इसके पक्ष और विपक्ष में बहस होने लगी। देश के अंदर जातीय तनाव ही बन गया। इसी क्रम में तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भी पुलिस ने ''मूर्खतापूर्ण काम किया'' की सार्वजनिक प्रतिक्रिया दे दी। ओबामा की इस प्रतिक्रिया ने मानों आग में घी डालने का काम किया। पुलिस अधिकारी जेम्स ने काली जाति का होने के कारण लुइस को गिरफ्तार नहीं किया है परन्तु अपने कर्तव्य का पालन करने पर ओबामा द्वारा खुद पर गलत आरोप लगाए जाने की शिकायत की। अब क्या था इस छोटी सी घटना ने अमेरिका में उग्र रूप धारण कर लिया।



अंततः सं 2009 जुलाई 30 की शाम को राष्ट्रपति ओबामा ने प्रोफ़ेसर हेनरी लुइश तथा पुलिस अधिकारी जेम्स क्रौली को वाइट हाउस में बुलाकर दोनों के साथ बैठकर वियर पी। दोनों पक्षों के बीच बातचीत हुई। असमझदारी ख़त्म हुई तथा समस्या का समाधान हुआ।

रूपा सुनार प्रकरण

इस प्रकरण में दोनों महिलाओं के अपने अपने तर्क है। एक तरफ रूपा का कहना है कि दलित होने के कारण ही मुझे कमरा नहीं दिया जबकि सरस्वती का कहना है कि मेरे घर में वृद्धा माता के रहने के कारण कमरा किराये पर नहीं दे पाई। मैंने तो रूपा से सॉरी बहिनी भी कहा था। सरस्वती का कहना है कि मैंने जातीय विषय पर किसी प्रकार का कोई मसला नहीं उठाया था।

जैसे अमेरिकी प्रोफ़ेसर लुइस को अपने साथ रंग भेद होने की बात ने पिंच किया था उसी तरह यहाँ इस बकाये में भी रूपा को खुद के दलित होने के कारण ऐसी ही भावनात्मक अनुभूति हुई है। भेदभाव को बाहिरि तर्कों से सिद्ध नहीं किया जा सकता ये तो भोगनेवाले को महसूस होनेवाली पीड़ा है। रूपा को महसूस हुआ है कि मेरे साथ जातीय विभेद हुआ है तो ऐसी स्थिति में सरस्वती प्रधान, समाज तथा राज्य सभी को संवेदनशील होना चाहिए था। 'तुम्हारे साथ विभेद नहीं हुआ है' कह देने से अथवा दलित के विरुद्ध जुलूस निकालने से समस्या का समाधान नहीं होगा।

सरस्वती द्वारा दूंगी कहने के बाद कमरा का न दिया जाना रूपा को अपमानित का बोध कराता है। तो क्या अब ऐसी अवस्था में सरस्वती रूपा  से मांफी मांग सकती है ?
क्या सरवस्ती रूपा के साथ बैठकर नाश्ता-खाना खाकर ये सिद्ध कर सकती हैं कि उनके अंदर जातीय भेदभाव नहीं है। और इस अवस्था में क्या रूपा द्वारा एक बार के लिए सरस्वती को माफ़ किया जा सकता है ? इस तरह सरस्वती और रूपा दोनों के द्वारा साथ ही बैठकर हुई गलत फहमी को हटाकर साथ ही सहभोज करके, अंकमाल करके विभेद विरुद्ध का सन्देश दिया जा सकता है ? क्या हम इस किस्म के प्रगतिशील समाज की कल्पना कर सकते हैं ?

अब तक इस विषय के कानूनी प्रक्रिया में जा चुकने के बाद तो विभेद महसूस करने वाले व्यक्ति के द्वारा ही माफ़ी देना चाहने की अवस्था में ही ऐसा संभव है। जातीय विभेद का मामला फौजदारी अपराध होने के कारण इस विषय पर मेल मिलाप हो ही नहीं सकता ये भी है। परन्तु अपराध की मात्रा को देखकर इस घटना में पीड़ित को एक बार के लिए पीड़क को माफ़ी देने और आइंदा कोई भी दलित समुदाय के साथ इस किस्म का अपमान तथा विभेद न करे के लिए इस घटना को मानक के रूप में स्थापित करके छोड़ दिया जाय तो इसमें पीड़ित पक्ष की महानता दिखाई देती है। परन्तु इसके लिए रूपा को नहीं अपितु सरस्वती को पहल करनी होगी। और समाज को भी रूपा के विरूद्ध जुलूस निकालने के बदले रूपा को न्याय दिलाने के रास्ते की ओर लगना चाहिए। परन्तु जब पीड़क की गलती महसूस नहीं कर रहा है और सड़क में दलित के विरुद्ध जुलूस निकालने के साथ ही पदासीन मंत्री का पावर प्रयोग करते है तो इसे सामान्य घटना नहीं माना जा सकता।  

हाँ सर्वविदित है कि नेपाली समाज बहुजातीय है। जातीय विविधता के अंदर विभेद भी है। पहाड़े, खस, आर्य समाज में ही न होकर, नेवरी समाज में तथा मधेशी समाज में भी दलित समुदायों पर छूत अछूत का भेदभाव हुआ करता है। इस किस्म के विभेद को ब्राह्मण, नेवार अतः मधेशी किसी को भी संरक्षण देना अथवा इसे छिपाना नहीं चाहिए। अगर अपने समुदाय में दलित के साथ भेदभाव हो रहा है तो उस समय दलित का साथ देना चाहिए। यदि किसी ब्राह्मण द्वारा दलित पर भेदभाव किया गया तो उस दलित के ही विरोध में अन्य ब्राह्मणों का उतरना आज के समाज में हास्यास्पद है। कोई भी सभ्य समाज को पीड़क का पक्ष नहीं ले सकता लेना भी नहीं चाहिए। अब जहाँ तक बात है राज्य कि तो राज्य को तो ऐसे मामले में पीड़क का पक्ष लेना ही नहीं चाहिए। राज्य द्वारा न्याय की अपेक्षा करनेवाले समाज में लोगों का विश्वास नहीं टूटना चाहिए। उस पर भी खुद को कम्युनिष्ट कहनेवाले, उत्पीड़ित, दलित जाति का पक्षपाती बतानेवाले सबसे बड़ी बात शिक्षा मंत्री जैसे पद पर आसीन व्यक्ति द्वारा नश्लीय काम किया जाना वास्तव में ही लज्जास्पद है। ये आपराधिक कार्य है।



कम्युनिष्ट में ब्राह्मण, नेवार, मधेशी आदि विभिन्न समुदाय के तथा कथित उच्चजाति के लोग भी आवद्ध हैं। वे बड़े नेता तथा मंत्री भी हुए हैं। कृष्ण गोपाल भी नेवार समुदाय से कम्युनिष्ट बने हुए नेता हैं। वे जातीयता का विरोध करते हुए वर्गीय गीत गानेवाले नेता हैं। ऐसे व्यक्ति द्वारा ये भूलकर की वह कम्युनिष्ट है, पुरखों की नश्ल को मात्र स्मरण करने पर समाज का प्रगतिशील रूपांतरण कैसे संभव हो सकता है ?
जो लोग सड़क पर रूपा के विरुद्ध नारेबाजी कर रहे थे उनसे मंत्री महोदय को ये कहना चाहिए था की हमें ऐसा नहीं करना चाहिए समाज में इस किस्म की चीजों से भेदभाव उत्पन्न होता है अतः इन्हें समाप्त कर एक श्रेष्ठ समाज का निर्माण करना हमारा कर्तव्य है। मंत्री को भी सरस्वती प्रधान के घर जाकर रूपा सुनार को वहीँ बुलाकर सपरिवार बैठकर सहभोज करके कमरे को किराये पर न देने से उत्पन्न हुई असमझदारी को दूर करना चाहिए था। यदि ऐसा किया होता तो ये मंत्री भी आज नेपाल में अमेरिका के बराक ओबामा के सामान चर्चित हो सकते थे।

इस प्रकरण में शिक्षा मंत्री प्रत्यक्ष रूप से ही फंस चुके हैं अब रूपा सुनार प्रकरण का समाधान कानूनी रूप से ढूंढना होगा। कानूनी प्रक्रिया में जा चुका विषय होने के कारण अब अनुसन्धान से जो पुष्टि होगी वही करना होगा। अगर इसे 'नेवार वर्सेज दलित' का जातीय रंग देने की कोशिश की गई तो समाज से न्याय ही मिटेगा। दलितों के विरुद्ध सांगठनिक रूप में सड़क पर आना अपने ही समुदाय की बदनामी करना भी है। नेवार समुदाय के समाज सुधारक जरूर ही इस विषय को गंभीरता पूर्वक ले रहे होंगे।

इस प्रकरण में जहाँ तक एमाले नेता तथा शिक्षा मंत्री कृष्ण गोपाल श्रेष्ठ की भूमिका का प्रश्न है, इसने समस्त एमाले की ही वर्गीय पक्षधरता पर प्रश्न उठाया है। क्या सत्तारूढ़ एमाले दलित विरोधी, दक्षिणपंथी पार्टी है? इसका जवाब मंत्री श्रेष्ठ तथा सम्पूर्ण सरकार तथा सत्तारूढ़ दल को देना ही होगा। अन्यतः आधुनिक समाज द्वारा अब से कृष्ण गोपाल श्रेष्ठ को एक कम्युनिष्ट के रूप में न देखकर घोर जातिवादी, नश्लवादी एवं उत्पीड़ित समुदाय विरोधी, असभ्य व्यक्ति के रूप में पहचानेगा।

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