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अन्तर्वार्ता

20 मंत्रियों के पद को अपने तर्क से 'चट' करनेवाले अधिवक्ता दिनेश त्रिपाठी कहते हैं- 'संविधान अक्षरों का संग्रह मात्र नहीं है।'

'प्रधानमंत्री ओली में 'आई एम द स्टेट' नामक मनोरोग है'

person access_timeJun 27, 2021 chat_bubble_outline0

प्रतिनिधि सभा का विघटन करके चुनाव की भी घोषणा कर चुके प्रधानमंत्री ओली द्वारा मंत्रिपरिषद का विस्तार किया जाना 'असंवैधानिक' कहते हुए  वरिष्ठ अधिवक्ता दिनेश त्रिपाठी जैसे अधिवक्ताओं द्वारा सर्वोच्च में रिट निवेदन पेश किये थे। उसी रिट पर सुनवाई होने के बाद सर्वोच्च अदालत द्वारा दिए गए आदेश से 20 मंत्रियों के पद रद्द हो गए।

कामचलाऊ हो चुके प्रधानमंत्री द्वारा मंत्रिपरिषद का विस्तार नहीं किया जा सकता के दावे के साथ रिट निवेदन दायर करनेवाले वकीलों में से त्रिपाठी के साथ रातोपाटी द्वारा की गई संक्षिप्त बातचीत यहाँ प्रस्तुत की गई है।

आप ही के कारण 20 मंत्रियों के पद रद्द हो गए है न !
मेरे कारण उन लोगों के पद रद्द नहीं हुए हैं। मेरी नीयत उन लोगों के पदों को रद्द करना कदाचित नहीं है। हाँ ये जरूर कहा जा सकता है कि उन लोगों के पदों को संविधान द्वारा गया है। क्योंकि सविधानतः उन लोगों की नियुक्ति नहीं हुई थी।

परन्तु रिट निवेदन दायर करके उन लोगों के पदों को रद्द करनेवाले माध्यम तो आप ही बने न !

हाँ, संविधान विपरीत नियुक्ति होने के कारण इसे ठीक करना होगा कहने का माध्यम मैं जरूर बना और मैंने संविधान के प्रावधान को क्रियाशील करने में भूमिका का निर्वहन किया। इसलिए ये कहना कि मैंने उन लोगों को पदच्युत कराया से भी ज्यादा ठीक ये होगा कि वे लोग संविधान को नजरअंदाज करके नियुक्त किये गये थे, कानून उसे इजाजत नहीं दे सकता था, नहीं देनी चाहिए थी मैं मात्र उसका माध्यम बना।

सरकार के निर्णयों को लेकर आप बार बार रिट दायर करने पहुँच जाते हैं कहीं ये सब मात्र चर्चा लेने के लिए ही तो नहीं है ?

मैं मात्र चर्चित होने के लिए ही अदालत नहीं गया हूँ। सरकार के द्वारा एक के बाद दूसरा करतब करते हुए संविधान की अवमानना हो रही है। संविधान को मृतप्राय बनाने लगने तथा अंग भंग किया जाने लगा था। ऐसे समय में मैं एक कानून का व्यवसायी तथा सचेत नेपाली नागरिक भी होने के नाते मौन होकर बैठना मेरे कर्तव्य की परिधि में नहीं आता, ये ही मेरे अंतःकरण का समझना है।

एक कहावत भी तो है कि अन्याय हो रहे समय में मौन होकर बैठना भी अपराध के समान ही है। इसी लिए राज्य संचालकों द्वारा किये गए आपराधिक क्रिया कलापों को मौन होकर देखते रहना उसका साक्षी बनाना मैं उचित नहीं मानता। एक सचेत नागरिक के नाते आवाज उठानी चाहिए उसी के अनुसार मैं आगे बढ़ा हूँ।

ऐसे कदम कदम पर रिट लेकर अदालत जाने पर आखिर सरकार भी काम कैसे करे? क्या इसी तरह सरकार को ट्रैप में रखना है ?

संविधानतः सरकार हरेक काम करने का स्वतंत्र है। संविधानतः काम करनेवाले को कोई भी रोक नहीं सकता। संविधान के चार किले के अंदर रहकर सरकार को काम करना चाहिए के विषय में किसी का दोमत नहीं है और हो भी नहीं सकता। पर बात सिर्फ इतनी सी है कि अनेक बहानेवाजियों में संविधान को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता। संविधान की सर्वोच्चता को सभी को स्वीकार करना ही होगा।

फिर प्रधान मंत्री ओली तो संविधान निर्माण प्रक्रिया की ही पीढ़ी के व्यक्ति हैं, राजनीतिज्ञ भी हैं। संविधान सभा के साथ साथ अन्य निर्माणगत संवैधानिक प्रक्रियाओं में खुद प्रधानमंत्री सहभागी हुए है। अब के 50 वर्षों के बाद कैसे राजनीतिज्ञ आएंगे, वे क्या करंगे ये दूसरी बात है। परन्तु जहाँ तक सवाल है ओली जी का वे तो स्वयं ही संविधान निर्माण में सहभागी हुए व्यक्ति हैं। खुद ही सहभागी होकर आरम्भ किये गए संविधान, इतनी कठिनाइयों के बाद मिला संविधान का मतलब ही न करते हुए, इस देश में संविधान नामक भी कोई चीज हैं इस बात का ध्यान भी उन्होंने नहीं रखा, इस देश में अदालत नाम की भी कोई चीज हैं, इस बात का ध्यान भी उन्होंने नहीं रखा। बेलगाम घोड़ों की तरह चलने पर हम नागरिको को इसे चेक करना होगा। संविधान का पालन करना इस देश के सभी नागरिकों का कर्तव्य भी हैं उनका दायित्व भी। इसलिए एक नागरिक के नाते तो संविधान का पालन करना मेरा कर्तव्य हैं ही परन्तु एक कानून व्यवसायी होने के नाते इसका पालन करना कराना मेरी और भी अधिक जिम्मेदारी बन जाता हैं।

ऐसी अवस्था में संविधान का सीधा ही अपमान देखने पर मेरी नैतिकता मौन होकर नहीं रह सकती। अभी तक हमारे राजनीतिज्ञ अथवा राज्य संचालकों द्वारा नागरिकों की शक्ति को कम आँका जाता रहा हैं। परन्तु ये समझना भी जरुरी हैं कि यदि एक निहत्थे अथवा सामान्य व्यक्ति के द्वारा भी अपनी भमिका का सही इस्तेमाल किये जाने पर बड़े परिवर्तन आ सकते हैं इस बात को समझना भी जरुरी है। संविधान की शक्ति को महसूस करना जरूरी है। संविधान कोई अक्षरों का संग्रह मात्र नहीं है एक प्रयोजनमूलक दस्तावेज है। अगर इसे रौदोगे तो ये पकड़ेगा। अदालत भी एक जीवंत संस्था है इसकी शक्ति को भी कमतर नहीं आंकना चाहिए। इसी कारण मंगलवार 'लैंडमार्क आर्डर'  आया। ये अभी एक प्रधानमंत्री के लिए मात्र न होकर आगामी समय के देश वाहकों के लिए भी चेतावनी है। बुद्धिमान व्यक्ति इतिहास से शिक्षा लेते हैं जबकि मूर्ख व्यक्ति इतिहास को दोहराने के लिए अभिशप्त होते हैं।

अभी कि सरकार द्वारा इतने अधिक असंवैधानिक कदम उठाये जाने का क्या कारण लगता है आपको ?

संविधान नामक वस्तु कुछ भी नहीं है, प्रधानमंत्री को ऐसा लगते रहना ही इस प्रक्रिया की जड़ है। उन्हें लगता है कि मैं सर्वेसर्वा हूँ, उन्हें लगता है। 'आई एम द स्टेट' उनमें ये मनोरोग है। अक्सर व्यक्ति के पावर में पहुँच जाने पाए ये अहंकार व्याप्त हो जाता है, हुआ यही है।

अभी की अवस्था में शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत अनुसार संविधान का पालन करने वाला एकमात्र निकाय मात्र अदालत है ?

अदालत के भी एक ही किस्म के कीर्तिमान नहीं है। चूके हुए परिणाम भी हैं। परन्तु पिछले दिनों में अदालत द्वारा पैर मजबूती से जमाये जाने को देखा जा रहा है। अभी अदालत द्वारा अपने पावर को एसाल्ट किया देखा जा रहा है।

अभी तो लोग कार्यपालिका के अधिकार में हस्तक्षेप होने की बात लोग करने लगे हैं। कल के ही केस में भी प्रधानमंत्री की अभिव्यक्ति आई- अदालत में राजनीति हुई।

मैं कहता हूँ कि अदालत द्वारा राजनीति नहीं की जा रही है, केवल संविधान के बारे में सचेत कराया जा रहा है कि तुम्हारी शक्ति इतनी मात्र है। संविधान द्वारा राज्य के अंगों की सीमा को निश्चित किया गया है। इसे निश्चित न करने पर राज्य स्वेच्छाचारी और निरंकुश होगा। उसे नियंत्रित करने के लिए संविधान में विभिन्न व्यवस्थाएं की गई हैं। 'चेक एंड वैलेन्स' की व्यवस्था की गई है तथा दलित को 'वाच डॉग' के रूप में रखा गया है। अभी अदालत को जो करना चाहिए था वही किया गया है। अदालत के द्वारा आवश्यक काम न किये जाने पर जनता में व्यापक निराशा आ सकती है।

नेपाल की राजनीति में अदालत का प्रवेश ये टिप्पणी कैसी है ?

अदालत बहुमतीय निरंकुशता विरुद्ध का संवैधानिक बंदोवस्त है। बहुमत वाला व्यक्ति अथवा राज्य संचालक स्वेच्छाचारी न हो संवैधानिक अनुशासन के अंदर रहें की धारणा से अदालत का निर्माण हुआ है। इसलिए अदालत ने राजनीति में प्रवेश नहीं किया है। प्रधानमंत्री तथा राष्ट्रपति द्वारा किये गए हरेक काम राजनीतिक मात्र नहीं हैं जिसमें संवैधानिक तथा कानूनी प्रश्न भी जुड़े हैं। प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति द्वारा कोई भी निर्णय किये जाते ही वो राजनीतिक है ऐसा नहीं समझना चाहिए। इसीलिए ऐसे निर्णयों में संवैधानिक, कानूनी प्रश्न उठाने पर उसका निरूपण करना अदालत का कर्तव्य है। यहाँ गलत भ्रम बनाने की भी चेष्टा की गई है कि अदालत ने राजनीति में प्रवेश किया। ये सत्य नहीं है। अदालत ने संविधान  की सीमाओं के बारे में राज्य संचालकों को सचेत मात्र कराया है।

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