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विचार

केपी ओली में 'दुर्योधन प्रवृत्ति'

person access_timeJun 23, 2021 chat_bubble_outline0

कमल रिजाल

महाभारत में एक प्रसंग है। किसी ने उनकी गलती को इंगित करते हुए दुर्योधन से प्रश्न किया- 'क्यों आवश्यक काम न करके अनावश्यक उपक्रम करते रहते हो ?' उत्तर में उन्होंने मुस्कराते हुए कहा- 'क्या काम करना चाहिए ये भी मालूम है क्या काम नहीं करना चाहिए ये भी मालूम है परन्तु फिर भी न जाने क्यों अनावश्यक काम ही करते रहने का मन करता है।'

हमारी सत्ता में होनेवाले, सत्ताधारी दल तथा उनके इर्द गिर्द होनेवालों की गति-मति, बुद्धि व्यवहार भी ऐसा ही है। महाभारत की इस एक कहावत ने ही उन सभी की समस्त गतिविधियों को व्यक्त किया है- कराया है।

अनजाने में अथवा पता ही न चल सकने के कारण ऐसा किया है, ऐसा नहीं कहा जा सकता। प्रधानमंत्री स्वयं ही सर्वज्ञाता हैं,ज्ञान विशारद हैं, उनसे मिलने के लिए शायद चतुर्मुख व्रह्मा को भी मुश्किल होगी। और विषयों की तो बात ही छोड़ दें उन्होंने तो वर्षों की तपस्या के परिणामस्वरूप प्राप्त होनेवाले योग शास्त्र पर भी लम्बा-भारी भरकम प्रवचन देकर संसार को ही आश्चर्य चकित कर दिया है। कथा वाचन करके अपनी जीविका चलाने वाले पंडित जी लोगों की तरह अपनी मनमर्जी से अब योग शास्त्र की उत्पत्ति नेपाल से हुई है, की घोषणा करना भी बांकी नहीं रखा है।

ये ख़ुशी की बात है कि हमारे प्रधानमंत्री में अथाह ज्ञान है। योग की उत्पत्ति नेपाल से हुई ये मालूम कर लिया। अफसोस की बात तो क्या है कि प्रधानमंत्री द्वारा कही गई बातें 'धतूरे गफ' (शराबियों की गपशप) तक सीमित होती है जैसा लगता है। ऐसी बातों को विज्ञों द्वारा कहलवाना चाहिए था। खुद को ही बोलने की इच्छा हुई, ये भी ठीक ही है, परन्तु बोलने से पहले विज्ञों द्वारा अनुसंधान करवाकर उन लोगों द्वारा दी गई राय सुझाव के आधार पर बोला जाना चाहिए था। अगर ऐसा किया गया होता तो इसका महत्व ही कुछ और होता। क्या इस बात का भय मन में नहीं होना चाहिए था कि प्रधानमंत्री जैसे व्यक्तित्व की बातें सुनकर दुनिया हँसेगी।

जब प्रधानमंत्री स्वयं ही सर्वज्ञाता हैं तो उनके इर्द गिर्द रहनेवालों पर उसकी हवा तो पड़ेगी ही। कुछेक दिन पहले एक चेला कह रहे थे- अपने पास जो है वही तो बेचा जायेगा। अपने पास होने से ही सारी वस्तुएं क्या बेचीं जा सकती है, ऐसा किया जा सकता है ये बातें औरों को मालूम नहीं थीं। उनमें है चलो ख़ुशी की बात है। जो बातें औरों को मालूम न हों उनका ज्ञान रखना अच्छी बात है। परन्तु जहाँ तक काम का सवाल है सभी के द्वारा इसी तरह के अनावश्यक कामों के अलाबा कुछ नहीं किया गया है।

सरकार के द्वारा किये गए काम एक एक करके अदालत द्वारा उलटाये जा रहे हैं। नागरिकता विधेयक उलटा दिया गया। गिट्टी बालू निर्यात का निर्णय उलटाया गया है, राजदूत नियुक्ति मापदंड उलटाया गया है। देखते चलों भैया अभी ऐसे और कौन कौन से काम उलटाये जायेंगे। सुना गया है कि ऐसे कामों की सूची बड़ी लम्बी है। ऐसी अवस्था में नैतिकता के आधार पर त्यागपत्र देकर अब तक चल चुकना चाहिये था। यदि और कोई होता तो शायद ऐसा ही करता। परन्तु मालूम ही नहीं है कि कौन सी नैतिकता के आधार पर वर्तमान सरकार अब तक टिकी हुई है। इसकी जबावदेहिता होनी चाहिए। अनैतिक बल के अलाबा बांकी किसी में भी ऐसी ताकत का मिलना दुर्लभ है।

देश में कोरोना का कहर ज्यों का त्यों है। हां, भले ही प्राकृतिक रूप से स्वयं ही नीचे की ओर अग्रसर होकर इसने हमें कुछ राहत की सांस लेने का मौका दिया हो। शर्म को पचाने के लिए पीसीआर परीक्षण को ही कम करके संक्रमितों की संख्या कम दिखने का काम हुआ हो तो बात अलग है। सरकार के रवैये को देखते हुए ये भी असंभव नहीं लगता। उधर विज्ञों की चेतावनी है कि आगामी अक्टूबर महीने तक कोरोना की तीसरी लहर का आक्रमण हो सकता है। अब ऐसी अवस्था में अब तक उसकी रोकथाम की व्यवस्था की तैयारी कर चुकानी चाहिए। बाहर के देशों में ये काम शुरू भी हो चुका है। परन्तु एक हमारी सरकार है जिसे अनावश्यक उपक्रम से ही फुर्सत नहीं है।

अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए जल्द बाजी में पशुपति में सोने का गुम्बज बनाने के लिए तत्पर होने से पहले कोरोना रोकथाम की तरफ आग्र ध्यान दिया होता तो कुछ न कुछ राहत अवश्य मिलती। यहाँ तो जल्दबाजी में चितवन के माड़ी में राम मंदिर का निर्माण राम सीता की मूर्ती स्थापना सम्बन्धी झांकी के बजाय कोरोना कहर की रोकथाम को प्रश्रय मिला होता तो शायद इससे भी झीनी ही सही पर मदद तो मिलती। अभी फिर पशुपति में बेमौसम का बाजा बजने की खबर भी आई है। अच्छी बात है अब यहाँ एक दूसरा ही राम मंदिर बनने जा रहा है। शीघ्र ही बन चुकेगा। सम्बंधित मंत्री द्वारा शिलान्यास भी किया जा चुका है। देश में महामारी है, जनता त्राहि माम त्राहि माम कर रही है। ऐसे समय में सरकार का सारा ध्यान जनता की मदद के लिए होना चाहिए कि मठ मंदिर के शिलान्यास पर केंद्रित? प्रश्न गंभीर है, प्रश्न अनुत्तरित।

धीरे धीरे ये रोग प्रदेशों की तरफ भी प्रवाहित हो रहा है। प्रदेश 1 सरकार का ध्यान पार्क और प्रतिष्ठानों की तरफ ढल रहा है। शायद अन्य प्रदेश भी ऐसी ही किसी प्रतीक्षा में होंगे। आखिर इंजिन द्वारा पकड़े गए रास्ते को ही तो डब्बों के द्वारा पकड़ा जाता है। इसका तात्पर्य ये नहीं की ये सारे काम बेकार के है इनका कोई अर्थ नहीं है ऐसा कहने का मेरा कोई मंसूबा नहीं है। उनके भी महत्व होंगे अपने ही स्थान पर परन्तु चिंता की बात तो ये है कि कौन सा काम किस समय पर प्राथमिक होना चाहिए कौन सा नहीं। बात सिर्फ इतनी सी है।

सरकार का असंवैधानिक तरीके से किया गया संसद विघटन का मामला महीनों तक खिंचता रहा। न्याय मूर्तियों के लिए अन्य कामों को छोड़कर इस तरफ ही सारा ध्यान केंद्रित करने की अवस्था आई। क्या, कितने और कैसे कैसे शर्त साधन तथा समय का अपव्यय हुआ उस बात को तो छोड़ ही दें। सरकार का ध्यान एक मात्र बात पर पूरे मनोयोग से केंद्रित रहा दुनिया जाये भाड़ में पर हां चुनाव कराकर अपनी मनमर्जी का करेंगे। लबे अंतराल के बाद न्यायायलय को कहानां पड़ा कि 'तुम्हारा काम वैधानिक नहीं है, अगली बार इसका ध्यान रहे।'

हे भगवान कौन सा काम वैधानिक है कौन सा नहीं ये छोटी सी बात भी सरकार को मालूम नहीं होनी चाहिए। अब अगर मालूम नहीं भी है तो जिन्हें मालूम है उनसे मशवरा नहीं करना चाहिए। अब अगर इतना भी ध्यान नहीं दिया जा सकता तो ऐसों को सरकार में ही क्यों रहना चाहिए ? कम से कम अगर इतनी सामान्य सी बात पर ध्यान दिया होता तो उसके कारण खर्च होने वाला समय, साधन स्रोत ऊर्जा सबकी बचत होती न ! न्यायालय भी अन्य संवेदनशील मामलों पर अपनी शक्ति का खर्च कर पाता।

सरकार का काम शक्ति का दुरुपयोग करना नहीं है यदि किसी के द्वारा ऐसा होता भी है तो उसे रोकना है। इसी के लिए तो इतने सारे संगठन आदि की व्यवस्था की जाती है। उन पर करोड़ों रुपये का खर्च किया जाता है। देश की आम जनता द्वारा अदा किये गए कर से देश का व्यय भार होता है। इस तरफ हर किसी को सचेत करने की जगह यहाँ तो सरकार ही एक कदम आगे होकर संपत्ति के अपव्यय की ओर उन्मुख है ऐसी अवस्था में कहा ही क्या जा सकता है ? कहते हैं न कि अगर छोटे गलती करते है तो उसका सुधार घर के बड़े बुजुर्गों द्वारा किया जाता है लेकिन जब घर का बड़ा ही बिगड़ैल हो तो सब कुछ भगवान भरोसे। वैसे भी कहते ही है कि ये देश तो पशुपति के द्वारा चलाया जा रहा है।

कार्यकारी अधिकार विहीन राजकुमार दुर्योधन द्वारा अनावश्यक उपक्रम करने के कारण महाभारत का युद्ध सर्जित हुआ था। अब यहाँ भी कार्यकारी अधिकारों में होनेवालों के द्वारा स्वयं ही ऐसे कामों की होड़बाजी में लगा जायेगा तो उसका परिणाम क्या होगा कहने की जरुरत नहीं है। मिथक यूँ ही नहीं लिखे जाते। नहीं लिखे होते। कोई न कोई उद्देश्य होता है तर्क होता है, सिद्धांत होता है। अब भी अगर दुर्योधन प्रवृत्ति को दोहराकर कुरुक्षेत्र की तरफ उन्मुख होना है तो हमारा कहना कुछ भी नहीं है। अन्यथा सरकार को थोड़ा सा ही सही देश और जनता के प्रति जिम्मेदार होना ही चाहिए।

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