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विचार

साम्राज्यवादियों के इशारे पर चल रही नेपाल की शिक्षा प्रणाली

person access_timeJun 14, 2021 chat_bubble_outline0

भऱत खत्री
विश्व समुदाय इस समय वैज्ञानिक आविष्कारों से चमक रहा है। उत्पादन के क्षेत्र में हो या कि युद्ध के क्षेत्र में विकसित राष्ट्र में विज्ञान और प्रविधि का उच्चतम प्रयोग करते हुए हरेक दिन नए नए अविष्कार हो रहे हैं। ये लोग मानव जीवन को किस तरह सरल, सहज और सभ्य बनाना है कि उधेड़बुन में लगे हैं। वर्तमान समय तक आते आते परिवर्तन द्वारा युगांतकारी छलांग लगाई गई है। इस सबका मूल है शिक्षा जो नई ज्योति का उदय कराती है।

शिक्षा मानव जीवन का मस्तिष्क है। शिक्षा कि अमृतधार से वंचित व्यक्ति का जीवन मरुभूमि कि ही तरह होता है। संसार की राजनीतिक, आर्थिक तथा सामाजिक पक्ष की तरफ नजर दौड़ाने पर मिलता है कि संसार भर में कुछ देश विकसित हैं तो कुछ विकासशील तथा कुछ के अविकसित देशों की परिधि में सिमटे होने का एक मात्र कारण शिक्षा का अभाव ही है।

आज के संसार में जिन देशों में शिक्षा उन देशों की परिस्थितियों, वातावरण तथा देश काल अनुरूप है वे शक्तिशाली बने हैं। उनके द्वारा संसार में एक किस्म की तरंग को फैलाते हुए तहलका के रूप में वर्चस्व ही कायम किया है। इन देशों ने अपने यहाँ उपलब्ध स्रोत और साधनों के अनुरूप आवश्यकता को मध्य नजर रखते हुए शिक्षा को भी उसी ढांचे में बदलने के कारण आज वे राष्ट्र शक्ति की पंक्ति में खड़े हुए हैं।

देश अनुसार का वेश वाली कहावत के अनुसार अपने की देश की मिट्टी को सुहानेवाली शिक्षा प्रणाली को कायम न करके बाह्य शक्ति के निर्देशन में ही कदम रखे होते तो आज के विकसित देशों की हालात भी बहुत कुछ नेपाल जैसी ही होती। चीन, अमेरिका, जापान जैसे विकसित देशों की शिक्षा प्रणालियों को देखें, इन देशों ने शैक्षिक साम्राज्यवादियों की किसी भी बात को नहीं माना है।

पूरे संसार में दो किस्म की शिक्षा है। पहली साम्राज्यवाद द्वारा निर्देशित शिक्षा प्रणाली जो अभी प्रायः सभी विकासशील तथा अविकसित राष्ट्रों में है। दूसरी शिक्षा प्रणाली अर्थात वैज्ञानिक, प्राविधिक तथा व्यावसायिक शिक्षा प्रणाली। इस किस्म की शिक्षा का विकसित राष्ट्रों द्वारा अवलंबन किया गया है। जिसने वैज्ञानिक क्षेत्र में इन देशों की काया ही पलट दी है।

नेपाल में चल रही शिक्षा प्रणाली नेपाली देश के वातावरण के अनुकूल नहीं है। ये शिक्षा प्रणाली शैक्षिक साम्राज्यवादी के इशारे पर चल रही है। विडम्बना के साथ कहना पड़ता है, नेपाल जैसे स्रोत साधन से संपन्न राष्ट्र द्वारा शिक्षा के माध्यम से उन चीजों का ही सदुपयोग करने योग्य बनाया नहीं जा सका है। इसका प्रमुख कारण क्या है कि यहाँ शिक्षा में बाह्य शक्ति की पहुँच बहुत मजबूत है। ये शिक्षा प्रणाली नेपाल में विद्वान नहीं कामदारों का उत्पादन करना चाहती है।

जो शिक्षा हम ले रहे हैं उसे देखने से ही स्पष्ट होता है कि क्या ये व्यावहारिक शिक्षा है ? वैज्ञानिक है ? क्या ये प्राविधिक शिक्षा है ? हमारी शिक्षा का एक दूसरा अत्यंत भौंडा रूप है शिक्षा में व्यापारीकरण।

आम नेपाली के जीवन स्तर को परिवर्तित करने के नाम पर अनेक युद्ध हुए। कितने ही आंदोलनों में बलि हुए परन्तु कोई भी यहाँ की शिक्षा प्रणाली को देश के मुताविक न कर सका। जबकि संविधान की प्रस्तावना में ही लोकतान्त्रिक मूल्य, मान्यता समाविष्ट समाजवादी चरित्र के राष्ट्र निर्माण करने जैसी महत्वपूर्ण विशेषताओं को अंगीकार किया गया है परन्तु इन बातों के प्रभावशाली कार्यान्वयन की और किसी का भी ध्यान नहीं गया है, क्योंकि नेतृत्व अपने मस्तिष्क की पकड़ में ही नहीं है। संविधान द्वारा समाजवाद उन्मुख समृद्ध राष्ट्र निर्माण की परिकल्पना की है लेकिन ये परिकल्पना तब तक कागजों की सेज तक ही सीमित रहेगी जब तक इसे मजबूती से कार्यान्वयन में नहीं उतारा जाता। अभी की हमारी जो शिक्षा है वह किसी भी हालत में देश को समृद्धि नहीं दे सकती।
अतः यदि समृद्ध तथा वैज्ञानिक समाज को विकसित करना है तो सबसे पहले यहाँ कि शिक्षा प्रणाली में सुधार लाना होगा। नेपाल के स्रोत साधनों का उपयोग कर सकनेवाली प्राविधिक, व्यावसायिक तथा जनवादी शिक्षा चाहिए होगी। जो क्रमश बेरोजगारी को समाप्त करती ले जाये।

कागज पर लिख देने से समृद्धि नहीं आ जाती, समृद्धि तो किसी भी योजना के सुन्दर कार्यान्वयन से आती है। हमारी अभी कि शिक्षा ने अगर कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाये तो मात्र भिक्षा माँगना ही सिखाया है। इसने
बेरोजगारी कि शक्ति को खाद और जल देकर संभाला हैं। ऐसी शिक्षा प्रणाली द्वारा समाज न तो समृद्ध ही हो सकता है और न ही उसका विकास हो सकता है।

सबसे पहले शिक्षा में आमूल परिवर्तन करके इसे उत्पादन के साथ जोड़ा जाना चाहिए। देश में उपलब्ध स्रोत तथा साधनों से किस तरह लाभ लिया जा सके, विश्व बाजार में बिक्री होनेवाली वस्तुओं का उत्पादन किस तरह से करके उनसे लाभ लिया जा सके, इस किस्म की शिक्षा का विकास करना होगा। विश्व बाजार में प्रतिस्पर्धा कर सकने वाली, परिवर्तित समाज में खड़ी हो सकनेवाली जन शक्ति को तैयार करनेवाली शिक्षा न होने तक समृद्धि की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

विदेशी शक्तियों के प्रश्रय में नहीं,  स्वदेशी शक्ति के अनुसार विश्व वातावरण में ग्राह्य शिक्षा बनानी पड़ेगी। तब ही जाकर कहीं समृद्ध देश तथा वैज्ञानिक समाज का विकास होगा।

लेखक कानून के विद्यार्थी है।

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