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वातावरण और मानव अधिकार

person access_timeJun 06, 2021 chat_bubble_outline0

किरण कुमार बराम

हमारे चारों और की सभी प्राकृतिक तथा मानव द्वारा सृजित परिवेश ही वातावरण है। ये विषय सभी की रूचि तथा सरोकार का विषय है। विश्व व्यापी रूप में विश्व वातावरण दिवस मनाये जा रहे होने के कारण वातावरण क्षेत्र में क्रियाशील व्यक्ति तथा संस्थाओं को विद्यमान वातावरणीय अवस्था के सम्बन्ध में राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय ध्यानाकर्षण करने का सबसे बड़ा अवसर भी है ये।

अगर नेपाल की और देखा जाय तो साल 2077 वातावरणीय दृष्टि से चर्चा में रहा। नेपाल संसार में ही सबसे प्रदूषित देश की सूची में अंकित होने को बाध्य हुआ। नेपाल में पहली बार वायु प्रदूषण के कारण शैक्षिक संस्थाओं को ही बंद करने की जरुरत आ गई थी। इधर वर्ष 2078 आरम्भ में ही वातावरणीय प्रश्न को लेकर चर्चा में है। सरकार द्वारा सार्वजनिक बजट के माध्यम से नदी जन्य वस्तुओं का निर्यात व्यापार करने की घोषणा से वातावरणकर्मी आक्रोशित हुए हैं।

प्राकृतिक-सांस्कृतिक तथा सामाजिक प्रणाली आर्थिक तथा मानवीय क्रिया कलाप तथा इनके अवयवों के बीच की अंतर्क्रिया तथा अंतर सम्बन्ध के ही वातावरण होने के कारण नेपाल द्वारा वतावरण क्षयीकरण के कारण इस देश को इसके बहु क्षेत्रीय प्रभाव का सामना करना पड़ रहा है। वायु प्रदूषन, ध्वनि प्रदूषण, पानी प्रदूषण, मिट्टी प्रदूषण, पानी के मूल स्रोतों का सूखना, उष्णता, दावाग्नि, वन विनाश, बढ़ता हुआ औद्योगीकरण, अव्यवस्थित शहरीकरण, अव्यवस्थित विकास निर्माण, बाढ़, भूस्खलन, प्राकृतिक विपत्तियां, खानी उत्खनन, मरुभूमिकरण, प्राकृतिक स्रोतों का अत्यधिक दोहन अंतर्देशीय वायु प्रदूषण जैसी समस्याओं का नेपाल जैसा अति कम विकसित देश सामना कर रहा है। वातावरण को प्रभावित करनेवाली इन समस्याओं के कारण नागरिकों के जीवन, मर्यादा तथा सम्मान में भी जोखीम दिखाई पड़ रहा है।

प्रयास
नेपाल के द्वारा वातावरणीय क्षयीकरण को कम करने के लिए कानून, संरचना, योजना और विभिन्न कार्यक्रमों के प्रयास जारी रखा है। देश के संविधान में वातावरण के संरक्षण के लिए स्पष्ट नीति का अबलंवन किया गया है। वातावरणीय संतुलन के आधार पर नियमन और व्यवस्थापन करते हुए उसका समुचित उपयोग करने की नीति भी ली गई है। प्राकृतिक स्रोत-साधन का संरक्षण, संवर्धन तथा अनुकूल वातावरण का दीर्घकालीन रूप में उपयोग किये जाने की भी व्यवस्था की गई है। नवीकरणीय ऊर्जा का उत्पादन तथा विकास करना, जल उत्पन्न प्रकोप नियंत्रण तथा नदियों का व्यवस्थापन करते हुए इनके लिए मजबूत व्यवस्था करना, औद्योगिक एवं भौतिक विकास के द्वारा वातावरण में पड़ सकने वाले जोखिम को न्यून करने की बात भी कही गई है। इसी तरह वन तथा वंय जंतु, वनस्पति तथा जैविक विविधता का संरक्षण, सम्बर्धन तथा दीर्घकालीन उपयोग करना, पर्यावरणीय दीर्घकालीन विकास के सिद्धांत का अबलंवन करना, प्राकृतिक प्रकोप से होनेवाले जोखिम का न्यूनीकरण करने के लिए पूर्व सूचना, तैयारी, उद्धार, राहत तथा पुनर्स्थापना करने का उल्लेख है।

नेपाल के संविधान की धारा 30 में स्वच्छ वातावरण का हक़ नागरिक का मौलिक अधिकार होने ही व्यवस्था है। संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों में प्रत्येक नागरिक को स्वच्छ वातावरण में जीवित रहने का अधिकार दिया गया है। वातावरणीय प्रदूषण अथवा ह्रास से होनेवाली क्षति के पीड़ित को प्रदूषण कानून के अनुसार क्षति पूर्ती पाने का अधिकार है। विकास सम्बन्धी कार्य में वातावरण विकास के बीच समुचित संतुलन के लिए आवश्यक कानूनी व्यवस्था किये जाने की व्यवस्था है। संविधान की अनुसूची में ही वातावरण से सम्बद्ध सरोकार को संघ, प्रदेश तथा स्थानीय श्रेणियों के अधिकार क्षेत्र में रखा गया है।

वातावरण संरक्षण ऐन 2076, विपद जोखिम न्यूनीकरण तथा व्यवस्थापन ऐन 2074, स्थानीय सरकार संचालन ऐन 2074, फोहोर-मैला (कूड़ाकर्कट), ऐन 2068 आदि वातावरण व्यवस्थापन के साथ प्रत्यक्ष सम्बन्ध रखनेवाले ऐन (कानून) हैं। इनके साथ ही वातावरण के विषय में उल्लेख करनेवाले दर्जनों नियम तथा कानून हैं। इन नियमों पर आधारित कानूनी संरचना भी क्रियाशील है। हरित प्रवर्धन, विद्युतीय सवारी आदि में सरकार का प्रोत्साहन कार्यक्रम कार्यान्वयन में हैं।

मानव अधिकार पांचवी राष्ट्रीय कार्ययोजना वातावरण तथा दीर्घकालीन विकास के सम्बन्ध में 5 उद्देश्यों पर केंद्रित होकर क्रियाकलाप तथा जिम्मेदार निकाय की पहचान की गई है। वातावरण शिक्षा के सम्बन्ध में उद्देश्य 4 का स्वच्छ और स्वस्थ वातावरण में जीवित रह पाने के अधिकार का संरक्षण तथा संवर्धन करने का उद्देश्य रखा गया है। दीर्घ विकास के लक्ष्य का राष्ट्रीयकरण आदि उल्लेखनीय काम नेपाल सरकार द्वारा वातावरणीय सवाल को सम्बोधन करके मानव अधिकार की प्रत्याभूति, सम्मान, संरक्षण तथा प्रवर्धन का प्रयास किया जाना दिखाई देता है।

वातावरण तथा मानव अधिकार

विश्व स्वास्थ्य संगठन के तथ्यांक के अनुसार संसार में प्रत्येक वर्ष 42 लाख लोगों की मौत वातावरणीय प्रदूषण के कारण होती है। यही तथ्य नेपाल में प्रत्येक वर्ष 35 हजार नेपालियों द्वारा वायु प्रदूषण के कारण जीवन से वंचित हुआ जाता है। सर्दी के मौसम में नेपाल का वायु गुणस्तर सूचक (2.5 पीएम) विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा निर्धारित किये गए गुणस्तर से 15 गुनी ख़राब स्थिति होने का तथ्यांक रिकॉर्ड हुआ है। तथ्यांक के अनुसार प्रति 10 नेपालियों में 1 व्यक्ति में वायु प्रदूषण के कारण स्वास्थ्य समस्या हो रही है।

यूनिसेफ के अनुसार नेपाल के ग्रामीण क्षेत्र में प्रति 10 लोगों में 8 नागरिकों को पीने का स्वच्छ जल उपलब्ध नहीं है। नेपाल में 25 प्रतिशत नागरिकों को ही स्वच्छ तथा स्वस्थ पीने का जल उपलब्ध है। नेपाल में बाढ़ तथा  
भूस्खलन ने 2.241% जमीन को बर्बाद कर दिया है तो अगर कुल में मिलाकर देखा जाय तो प्रतिदिन 2 नागरिकों की बाढ़ जन्य प्रकोप में मौत हो रही है। दूसरी तरफ जलवायु परिवर्तन के प्रभाव की दृष्टि से भी नेपाल अत्यंत जोखिम में होनेवाला देश है। विश्व में जलवायु परिवर्तन जोखिम के चौथे स्थान पर है। नेपाल के 20 हिमताल विस्फोट के उच्च जोखिम में हैं। इसके निचले तटीय क्षेत्र के नागरिक हर वक्त तन और धन के तरस में जीने को बाध्य हैं। वातावरण संरक्षणकर्मी की हत्या होने का उदहारण हमारे पास अभी ताजा ही है।

इन उल्लखित तथ्यों तथा तथ्यांकों से नेपाली मानव अधिकार की न तो प्रत्याभूति ही हो रही है और न ही उनका सम्मान ही कायम हो पा रहा है। इसके द्वारा नेपाल ने मानव अधिकार सम्बन्धी अनतर्राष्ट्रीय रूप में स्वीकार किये गए दायित्व की जबावदेहिता लुंजपुंज सी दिखाई देती है। मानव अधिकार सम्बन्धी विश्वव्यापी घोषणापत्र की धारा 25 में उच्च स्तरीय एवं स्वस्स्थ जीवन का अधिकार का विश्वास दिलाना राज्य के दायित्व पर प्रश्न करने का स्वाभाविक स्थान मिलता है।

सं 2018 मानव अधिकार समिति ने नागरिक तथा राजनीतिक अधिकार सम्बन्धी अंतर्राष्ट्रीय प्रतिज्ञापत्र 1966 की धारणा 6 के सम्बन्ध में संयुक्त राष्ट्र संघ की साधारण टिप्पणी में राज्य द्वारा वातावरणीय जोखिम से नागरिकों को बचाने का उल्लेख किया गया है। वातावरणीय क्षयीकरण, जलवायु परिवर्तन तथा अनुपयुक्त विकास की गतिविधियों के कारण अभी की पीढ़ी तथा आगे आनेवाली पीढ़ी के जीवन के अधिकार को जोखिम में डालने का काम हो रहा है।

अब का रास्ता
जीवन की उत्पत्ति विकास अस्तित्व आदि ये ही संतुलित वातावरण संभव हैं। मनुष्य की चाह इसी वातावरण में मात्र पूरी होती है। परिस्थितिजन्य प्रणाली का संतुलन होने पर ही वातावरण को सुरक्षत किया जा सकता है। वातावरण तथा जन स्वास्थ्य वास्तव में एक दूसरे के पूरक हैं। मनुष्य पूर्ण रूप से वातावरण पर निर्भर करता है। इसलिए वातावरण और मानव के अंतर सम्बन्ध का उदाहरण ही संतुलित वातारवरण है।

सरकारी प्रयास को औपचारिकता की वजाय परिणाम मुखी होना चाहिए। अनुगमनकारी कार्यक्षेत्र से वातावरण विभाग नियमनकारी में और अधिक परिभाषित तथा इसका रूपांतरण जरुरी है। वातावरण में नियमन तथा प्रवर्धन करने के लिए संघ, प्रदेश तथा स्थानीय श्रेणियों तक कार्यक्षेत्र होने की स्वायत्त संरचना तीब्र हो रही है। वातावरण के अंतर्देशीय समाधान के लिए वातावरण कूटनीति आवश्यक है। 

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