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अन्तर्वार्ता

सरकार द्वारा राष्ट्रघाती काम हुआ है : पूर्व राष्ट्रपति डॉ यादव

'मैं आश्चर्यचकित हुआ हूँ, सभी आश्चर्यचकित हैं'

person access_timeJun 04, 2021 chat_bubble_outline0

रातोपाटी संवाददाता
काठमांडू। नेपाल के प्रथम राष्ट्रपति डॉ रामवरण यादव चूरे संरक्षण अभियान के सर्जक हैं। उनके राष्ट्रपतित्व काल में ही चूरे संरक्षण अभियान शुरू हुआ था जिस कार्यक्रम को सरकार द्वारा बाद तक भी निरंतरता दी जा रही थी।

राष्ट्रपति विद्यादेवी भंडारी ने पिछले शनिवार जारी किये विनियोजन अध्यादेश में पत्थर, गिट्टी, बालू आदि का निर्यात करके व्यापर घाटा को कम करने का उल्लेख हुआ देखकर पूर्व राष्ट्रपति यादव चूरे के संरक्षण को लेकर चिंतित हुए हैं।

अर्थ मंत्री विष्णु पौडेल द्वारा सार्वजनिक किये गए बजट के 199 नंबर के बिंदु में पत्थर, गिट्टी तथा बालू का निर्यात करके व्यापर घाटा कम करने का उल्लेख है।

सरकार की इस नीति को राष्ट्रघात की संज्ञा देते हुए पूर्व राष्ट्रपति डॉ रामवरण यादव ने रातोपाटी से कहा- 'सरकार द्वारा चूरे की बालू, गिट्टी, पत्थर तथा अन्य खनिजजन्य वस्तुओं के निर्यात की जो बात की है ये अत्यंत आपत्तिजनक बात है। मैं तो कहता हूँ की ये राष्ट्रघाती बात है इस निर्णय ने राष्ट्र को दूरगामी घात दिया है।'

रातोपाटी के लिए 'द व्यू' कार्यक्रम में डॉ यादव ने कहा- 'विद्वान, भूगोलविद्, वातावरणविद्, कृषिविद् सभी आश्चर्य चकित है, साथ ही मैं भी आश्चर्यचकित हूँ।'

सरकार द्वारा संविधान को नजर अंदाज करते हुए अध्यादेश के माध्यम से बजट लाये जाने की बात करते हुए पूर्व राष्ट्रपति यादव ने इस तरह अध्यादेश के माध्यम से बजट लाया जाना गैर कानूनी एवं गैर संवैधानिक है, बताया।

'संविधान में प्रतिनिधि सभा द्वारा बजट लाये जाने का प्रावधान है। उसे पीछे ही छोड़कर जनता के सर्वोच्च निकाय पर सरकार द्वारा तथा राष्ट्रपति की संस्था द्वारा प्रहार किया गया है' पूर्व राष्ट्रपति यादव ने कहा। 'सार्वभौम संस्था प्रतिनिधि सभा को संविधान पर आघात करते हुए दो दो बार भंग किया गया है।'

देश के प्राकृतिक स्रोतों का किस तरह व्यवस्थापन किया जाय जैसे गंभीर विषय पर जनप्रतिनिधि मूलक संस्था प्रतिनिधि सभा में गहन मंथन करके कोई भी निर्णय लिया जाना चाहिए डॉ यादव का सुझाव है। यादव कहते हैं कि 'ऐसे समय में अध्यादेश के द्वारा, जो कि खुद गैरकानूनी है, गैर संवैधानिक काम करके लाया गया है।'

नेपाल के चूरे संरक्षण अभियान एवं सम सामायिक राजनीतिक विषयवस्तु पर आधारित होकर रातोपाटी द्वारा पूर्व राष्ट्रपति से की गई बातचीत का अंश यहाँ प्रस्तुत है-

अभी अभी आये बजट के 199 नंबर के बिंदु में 'वातावरणीय प्रभाव मूल्याङ्कन के आधार पर खानीजन्य पत्थर, गिट्टी, बालू का निर्यात करके व्यापार घटा को कम किया जायेगा कहा गया है ये सुनकर आपको कैसा लगा ?

मैं आश्चर्यचकित हुआ हूँ। संविधान को नजरअंदाज करते हुए अध्यादेश के माध्यम से बजट लाया गया है। संवैधानिक व्यवस्था प्रतिनिधि सभा द्वारा बजट लाया जाना उसे दर किनार कर दिया गया है। हम सब जानते है कि सरकार तथा राष्ट्रपति की संस्था द्वारा विगत पांच महीनों में दो-दो बार जनता की सर्वोच्च संस्था प्रतिनिधि सभा पर प्रहार हुआ है। संविधान पर आघात करके सार्वभौम सत्ता प्रतिनिधि सभा को भंग किया गया है।

देश के विद्वान, वातावरणविद, कृषिविद सब के सब आश्चर्यचकित हैं मैं खुद भी आश्चर्य में हूँ। प्राकृतिक स्रोतों का व्यवस्थापन कैसे करना है ? इसके लिए फूल हाउस में महीनों तक की बहस के बाद कोई भी निष्कर्ष पारित होने की व्यवस्था पहले के संविधान में थी। निश्चय ही इस संविधान में भी होगी। देश के प्राकृतिक स्रोत का राष्ट्र किस तरह व्यवस्थापन करता है- सम्पूर्ण जनता के प्रतिनिधियों के उपस्थित होने के स्थान में मंथन करके राष्ट्र के सर्वोत्तम हित के लिए किस तरह व्यवस्थापन करके आगे बढ़ा जाय की राष्ट्र मांग करता है।

अभी आपने जो चूरे से सम्बंधित प्रश्न रखा है जिसमे इस क्षेत्र के खानीजन्य पदार्थ पत्थर, गिट्टी, बालू आदि का निर्यात करने की जो छूट की है ये अत्यंत ही आपत्तिजनक है। ये एक किस्म का राष्ट्रघात है। इससे देश को दूरगामी घात पहुंचेगा।

हम सब जानते हैं कि 17 प्रतिशत भूमि तराई की है तथा 13 प्रतिशत चुरे क्षेत्र की है। इन दोनों जगहों पर लगभग 60% जनसंख्या है। इस जल जमीन तथा जंगल पर हम नेपाली आश्रित हैं। तराई की कृषि योग्य भूमि अन्न का भंडार है। इसका अगर हम ठीक से व्यवस्थापन करते हैं तो इससे देश भर को अन्न मिल सकता है। जिस तरह से हम 2040 साल तक अनाज का निर्यात करते थे हम उस अवस्था में फिर से पहुँच सकते हैं।

मैं 2065 में राष्ट्रपति हुआ था। 2067 से मैंने इस बात को उठाया था। सात वर्षों तक मेरे पद में रहते हुए उस वक्त सभी सरकारों द्वारा भी चुरे क्षेत्र के संरक्षण पर काफी बातचीत चर्चा-परिचर्चा के बाद इसे राष्ट्रीय गौरव के रूप में स्वीकार किया गया था। 2067 से मुझे लगता है हम लोगों ने इसे आगे बढ़ाया, विज्ञ लोगों को आमंत्रित करके कमेटी बनाई।

लगभग 4 वर्षों पहले सरकार द्वारा इसे स्वीकार करके, विस्तृत अध्ययन करके, 20 वर्षों में कैसे आगे बढ़ा जाय का मास्टर प्लान भी बनाया। राष्ट्रपति चुरे तराई मधेश संरक्षण नाम देकर समिति बनाकर काम आगे बढ़ता गया। 20 वर्षों का जो मास्टर प्लान आया था उसने प्रतिनिधि सभा से कानून बने की सिफारिश भी की है उसी लाईन पर मैंने काम किया था।

मेरे कार्यकाल तथा इस समिति के द्वारा अच्छे काम को आगे बढ़ाया जा रहा था ऐसी अवस्था में मानूँ न बनाकर इस सरकार के आने के तुरंत बाद ही चुरे होते हुए पूर्व से पश्चिम तक एक राजमार्ग बनाने (मदन भंडारी राजमार्ग) की घोषणा की। जिसके तहत अभी सारा जंगल ख़त्म हो रहा है।

पूर्व पश्चिम राजमार्ग है ही, उसे 6 लेन का बनाने, साथ ही पूर्व-पश्चिम रेलवे का भी काम हो ही रहा है। लगभग 25 किलोमीटर ऊपर मध्य पहाड़ी राजमार्ग बन रहा है। इस सब को देखते हुए इस तरह चुरे होते हुए राजमार्ग बनाने की कोई जरुरत ही न थी। हलकी राजमार्ग, पूर्व-पश्चिम राजमार्ग, साथ ही पूर्व पश्चिम रेलवे, और मध्य पहाड़ी राजमार्ग जब ये चार-चार राजमार्ग थे ही तो चुरे होते हुए राजमार्ग की जरुरत न थी। इसने चुरे के वन जंगल का पशु पक्षियों का, ख़ास तौर पर भूगोल का जो विनाश होगा वो अपूरणीय होगा।

हम चुरे कहते हैं, शिवालिक कहते हैं। हमारे महाभारत और तराई के बीच में एक बेल्ट है जो मिट्टी, पत्थर जैसे पदार्थों से भरी हुई भखारी है। 50% जनता तथा 30% जमीन की जो बात मैंने की है इसके लिए मिट्टी, पत्थर, बालू का ये जो पहाड़ है, ये वर्षा के पानी, ऊपर हिमाली क्षेत्र के बहकर आनेवाले पानी को संचय करके उसे रिचार्ज करता है। नीचे कृषि के लिए हो, अनाज की उपज के लिए हो अथवा पीने के पानी के लिए हो, उस बेल्ट को ये पानी देता है।  

उदाहरणार्थ- 2036 साल में मेरे द्वारा जनकपुर में डॉक्टरी शुरू करने से पहले मेरे आँगन में 50 फीट पर ही आँगन में पानी आता था। अभी 2078 साल आते आते आप जनकपुर जाये तथा पूछे कि जनकपुर में कितनी गहराई पर पानी मिलता है ? अभी 450 अथवा 500 फ़ीट कि गहराई पर पानी मिलता है। मेरे ही आंगन में 7 वर्ष पहले मेरी बेटी द्वारा ट्यूबेल रखने पर 350 फ़ीट पर पानी आता था अभी 450-500 फ़ीट की गहराई पर आता है। इस तरह सभी तालाब, कुएं, नदी-नाला, सिमसार (हमेशा पानी से भरे रहने वाले खेत) तथा सरोवर सुख रहे हैं। ये अवस्था क्यों आई का जबाव इतना ही है कि चुरे क्षेत्र का संरक्षण नहीं हुआ।

पंचायत काल से, विशेषतः जनमत संग्रह के समय में 50 प्रतिशत से खोल दिया गया और सब का सब 50 प्रतिशत नष्ट हो गया। बहुदल आने के बाद हम लोगों ने कुछ नियंत्रण किया था परन्तु 2056 से केलर 62 साल तक तथा 2062 से लेकर अब तक जो सारे के सरे आक्रमण जंगलों पर हो रहे हैं, जंगल समाप्त हो गए। तराई तथा चुरे के जंगल समाप्प्त हो रहे हैं।

2062 साल से लेकर 2078 साल तक अव्यवस्थित तथा अवैज्ञानिक ढंग से किसी अध्ययन के बिना ही सभी नदी नालों से बालू तथा पत्थर, मिट्टी को उठाने का काम हुआ है। चुरिया बेल्ट से किस तरह वैज्ञानिक ढंग से काम करना है का जो 20 वर्षों का मास्टर प्लान दिया गया था, राष्ट्रीय गौरव कि जिस आयोजना कि घोषणा कि गई, उन सबको दर किनार कर दिया गया, उन्हें कही बंद करके रख दिया गया।

071 साल में जब मैं राष्ट्रपति ही था उस समय की सरकार ने पत्थर, मिट्टी, बालू का बाहर निर्यात बंद किया तथा चुरिया बेल्ट में जितने भी अवैध क्रशर उद्योग थे उन्हें व्यवस्थित करने के लिए थोड़ा बहुत काम हुआ था। अवैधानिक क्रशर उद्योग, राजमार्ग की बेल्ट पर उस समय भी छुपते छुपाते अवैधानिक काम हो ही रहा था। परन्तु इसे खोल दिए जाने पर अब बाढ़ आएगी।

अब कुछ राजनीतिक विषय पर चर्चा करें। संविधान द्वारा परिकल्पित सबसे बड़ी संस्था राष्ट्रपति की भूमिका भी अभी विवादों के घेरे में है। प्रथम राष्ट्रपति के रूप में ये सब कुछ देखने पर आपको कैसा अनुभूत होता है?

मैं अत्यंत ही मर्माहत हूँ। पौष महीने में हुए प्रतिनिधि सभा के पहले विघटन के समय से ही मैं बोलता आ रहा हूँ। इस सरकार के आते ही धीरे धीरे सारे अधिकारों को अपने में समेटकर रखने, सभी संवैधानिक निकायों में तोड़ मरोड़ करने, अपने लोगों को रखकर भर्ती केंद्र बनाने के काम हुए।

होते होते सभामुख, उपसभामुख, ऊपरी सदन के अध्यक्ष, प्रधानमंत्री, प्रतिपक्षी दल के नेताओं के भी बैठनेवाली संवैधानिक परिषद में जिस तरह संविधान द्वारा अवधारणा दी गई थी, उसका 5 वर्षों तक बजी प्रयोग न किये जाकर, बारबार अध्यादेश के माधयम से परिवर्तन किया गया। इसके द्वारा अधिकारों को संकुचित करके सभी को भर्ती केंद्र बनाया गया।

खास तौर पर दो-दो बार प्रतिनिधि सभा का विघटन देखकर मैं आश्चर्यचकित हुआ हूँ सरकार ने इस तरह के काम को अंजाम दिया है। संविधान का पालन करबाने का तथा रक्षा करने का जो अधिकार संविधान द्वारा राष्ट्रपति को दिया गया है, राष्ट्रपति को भी संविधानविदों के साथ विचार-विमर्श करके उसे क्यों बार बार भंग करके लाती हैं ? संविधान का संकुचन करने के लिए संवैधानिक निकाय में बार बार अध्यादेश लाती हैं। एक वर्ष के अंतराल में 12 अध्यादेश आ चुके हैं। एक अध्यादेश लाया जाता है, उसे वापस किया जाता है और फिर लाया जाता है। इस तरह के वाकयों को राष्ट्रपति की संस्था को रोकना चाहिए था, परन्तु यहाँ पर महाभूल हो रही है।

अभी संविधान की धरा 76 के अनुसार बड़ी पार्टी होने के कारन सरकार बनाना न होने पर गठबंधन सरकार बनाना, दो पार्टियों अथवा तीन पार्टियों द्वारा मिलकर गठबंधन की सरकार बनाना, फिर उसके बाद बड़ी पार्टी के द्वारा अल्पमत की सरकार बनाना। उपधारा 4 के अनुसार संसद में विश्वास का मत मांगना, लेना, विश्वास का मत न मिलने पर सरकार को इस्तीफ़ा देना तथा राष्ट्रपति की संस्था द्वारा आवाह्न करके सरकार बनाने की विधि में जाना। परन्तु उपधारा 4 में गए बिना ही सरकार द्वारा खुद के सरकार में होते हुए ही दूसरी सरकार के लिए सिफारिश करता है। राष्ट्रपति की संस्था द्वारा 21 घंटों का समय दिया जाता है। उस संस्था की मर्यादा, गरिमा और परंपरा सविधान के अंदर रहकर संविधान की रक्षा करना है। वो काम सम्माननीय राष्ट्रपति का होता है। परंपरा है- विगत में मैंने भी वहां होने पर 7 दिन, 5 दिन, 3 दिनों से कम कभी भी नहीं देने की परंपरा नहीं है। उस पर भी राजनीतिक पार्टियों द्वारा यदि समय माँगा गया तो एकाध दिन का समय बढ़ाया जा सकता है।

कानून में व्यवस्था न होने पर लोकतंत्र में परंपरा को भी देखा जाता है। राष्ट्र पर संकट आ सकता की पूर्व चेतना के कारण ही शक्ति पृथक्कीकरण का सिद्धांत बना है। विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका तथा सम्पूर्ण राष्ट्र का राष्ट्राध्यक्ष होता है। अभी हम गणतांत्रिक व्यवस्था में हैं। प्रतिनिधि सभा से चुने जाकर जनता का राष्ट्रपति होता है। उसे अपनी जिम्मेदारी को संविधानतः एक एक कदम फूंक फूंककर रखनें चाहिए में अभी वैसा नहीं हो रहा है।

निश्चय ही राजनीतिक पार्टियां बहुदलीय व्यवस्था के खम्भे हैं। जो सरकार में है, विपक्ष में है अथवा संसद में न होनेवाली पार्टियां भी हैं। उन सबकी जिम्मेदारी संविधान की रक्षा करना है। तक़रीबक 4 पीढ़ियों द्वारा रक्त बहकर पाया गया ये सिस्टम-संघीयता, लोकतान्त्रिक गणतंत्र समावेशिता तथा धर्म निरपेक्षता को व्यवहार में उतारते हुए संविधानता देश को व्यवस्थित करते जाने के समय में सरकार द्वारा, राष्ट्रपति की संस्था द्वारा गैर संवैधानिक और गैर प्रजातान्त्रिक काम हुआ है। जनता की सार्वभौम सत्ता संपन्न संस्था प्रतिनिधि सभा को भंग किया जाता है दो संस्थायें मिलकर तीसरी संस्था की हत्या कराती हैं संविधान के चीथड़े उड़ाती हैं।

इतिहास में राष्ट्र के जीवन में लोग परिवर्तित होते रहते हैं परन्तु बहुत थोड़े से लोग राष्ट्र हित के काम करके अपने फुट प्रिंट छोड़ जाते हैं। सरकार ने भूल की है। राष्ट्रपति का साथ लेकर प्रतिनिधि सभा पर निरंतर आक्रमण किया जा रहा है। मुझे लगता है कि न्यायमूर्तियों द्वारा इस सम्बन्ध में अवश्य भी न्याय किया जायेगा। मैं आशा करता हूँ कि ये सदियों तक के लिए हमारे यहाँ प्रणाली बनाएगा तथा नेपाली जनता के हित में होगा मैं ऐसी ऐश तथा विश्वास में हूँ। मुझे प्रतिनिधि सभा की स्थापना होगी का विश्वास तथा भरोसा है।

महामारी ने मास्क लगाकर अन्तरवार्ता करने के जटिल मोड़ पर हमें लाकर खड़ा किया है। इस संकटपूर्ण घडी में आप राजनीतिक दलों को क्या सन्देश देना चाहेंगे ? नेपाली जनता से क्या कहना चाहेंगे ?

उ--पूरे संसार में ही महामारी का माहौल है। दक्षिण एशिया में भी हमारे पडोसी राष्ट्र तथा हम नेपाली भी इसकी दूसरी लहर से जूझ रहे हैं। दिनानुदिन नेपाली अपनी जान गँवा रहे हैं। ऐसे समय में जो चुनाव के नाटक की बात हो रही है वो बिलकुल ही जनता के हित में नहीं है। शोक, भूख, गरीबी तथा रोग से संत्रस्त जनता के लिए अस्पताल में ऑक्सीजन-शैया नहीं हैं। समय में रोग का डाइग्नोसिस-उपचार नहीं हो रहा है। देश अस्त व्यस्त अवस्था में है। गरीबी के कारण नेपाली विदेश जाने का क्रम द्रुत गति से जारी है। गरीब नेपाली जब भारत की सीमा से नेपाल वापस आता है वहां भी हम अभी तक परीक्षण को व्यवस्थित नहीं कर पाए हैं। सारा देश रोग की पीड़ा से छटपटा रहा है ऐसे में ये सरकार भूलकर भी न करनेवाले काम करने पर आमादा है।

फिर भी बात लोकतंत्र की ही आती है। हम बहुदलीय व्यवस्था में हैं। पार्टियों का जन संपर्क जनता से ऊपर से नीचे तक ही जुड़ा है। उसके बाद मीडिया है, नागरिक समाज है, बुद्धिजीवी चेतनशील हम नेपाली हैं। इस लोकतंत्र की रक्षा करना हमारा दायित्व है। इस कारण नेपाली जनता का भरोसा तथा आशा अदालत के सम्मुख है। बहुत अधिक परिश्रम तथा रक्त बहकर मिला प्रजातंत्र बचाना नेपाली जनता के ही कन्धों पर आ पड़ी जिम्मेदारी है।

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