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विचार

वर्तमान संकट का निवारण

person access_timeMay 30, 2021 chat_bubble_outline0

डॉ डिला संग्रौला (पंत)
 

वर्तमान में नेपाल मानवीय स्वास्थ्य तथ अराजनीतिक संकट से ग्रस्त है। कोरोना की दूसरी लहर और भी अधिक घातक होकर आई है। दिनानुदिन संक्रमितों की संख्या बढ़ रही है तो मृतकों की संख्या ने भी तीन अंकों को छू लिया है। इधर सरकार कोरोना संक्रमण के नियंत्रण, बीमारों के उपचार और आम जनता की रक्षा करने में पूर्णतः असफल हो चुकी है।

यदि जनस्वास्थ्य विज्ञों के सुजाझावों पर मनन किया जाये तो संक्रमण के प्रसारण की दर को कम करने के लिए एक ही उपाय लॉकडाउन तथा निषेधाज्ञा है। परन्तु इसका एक दूसरा पक्ष भी है जिसका असर नेपाल जैसे देशों पर बहुत ज्यादा पड़ता है वो क्या कि लॉकडाउन के नकारात्मक प्रभाव स्वरुप गरीब और असहाय वर्ग इसकी चपेट में बुरी तरह आ जाता है। नेपाल में भी प्रत्यक्ष देखा जा सकता है कि पिछले साल भी लॉकडाउन के समय गरीब, मजदूर इससे प्रत्यक्ष प्रभावित हुए थे तो इस बार भी नेपाल का श्रमजीवी वर्ग अत्यधिक प्रभावित हुआ है।

सरकार द्वारा निषेधाज्ञा तो लगा दी गई परन्तु इस श्रमजीवी वर्ग के प्रति कोई ध्यान नहीं दिया गया। इसे देख ऐसा लगता है कि जैसे सरकार ने इस भूखे मजदूरों के पेट पर लात मारी है। देश का ये वर्ग रोग के साथ साथ भूख से भी आक्रांत है। संविधान द्वारा दिए गए प्रत्येक नागरिक के स्वास्थ्य उपचार, भोजन और जीवन का मौलिक अधिकार से आज देश का एक बहुत बड़ा वर्ग वंचित सा हो गया है।

अभी संसार में कोरोना नियंत्रण के लिए आई कोरोना की वैक्सीन कोरोना की संजीवनी बन चुकी है। परन्तु दुर्भाग्य यहाँ इस देश में अभी तक अधिकांश लोगों को वैक्सीन का पहला डोज भी नहीं दिया जा सका है।
इसके विपरीत यहाँ तो अनियमितता की दुर्गन्ध का संकेत मिल रहा है। तत्काल ही गाँव, नगर तथा वार्ड तक की श्रेणियों में निःशुल्क पीसीआर परीक्षण, स्वास्थ्य सामग्री की व्यवस्था, सभी अस्पतालों में आईसीयू शैया की व्यवस्था, वेंटिलेटर, ऑक्सीजन, कोविड विरुद्ध के टीकों की आपूर्ति, निम्न आयवालों का निःशुल्क उपचार तथा राहत की व्यवस्था आज सरकार का सबसे पहला दायित्व है। होम आइसोलेशन में रह रहे व्यक्तियों के लिए स्वस्थ्य कर्मियों का परिचालन, सभी सरकारी अस्पतालों में स्वास्थ्य कर्मियों की तुरंत व्यवस्था आदि करना अत्यंत जरुरी है।

नेपाली जनता के त्याग और बलिदान के फलस्वरूप आए लोकतंत्र और संविधान को राष्ट्रपति तथा प्रधानमंत्री के छल तथा प्रपंच ने क्षत-विक्षत करके मृत्यु शैया तक पहुंचा दिया है। संसद का विश्वास गँवा चुकी ओली सरकार को संसदीय प्रजातान्त्रिक परिपाटी में एक मिनट भी सत्ता में रहने का अधिकार यहीं है। अपने स्वार्थ के लिए अनेक झूठ-फरेब करते हुए जनता को धमकाकर, डराकर, प्रजातान्त्रिक हक-अधिकार की बातों को कुंठित करके सत्ता को लम्बा करने के खेल में लगना भष्मासुरी प्रवृत्ति की परिचायक है।

इस प्रवृत्ति से कुछ भी सुखदायक तो नहीं हो सकता हाँ ये सभी का विनाश करने में जरूर प्रवृत्त होगी। ओली तथा राष्ट्रपति दोनों ही अभी इसी राह का अवलम्बन कर रहे हैं। इसी लिए लोकतान्त्रिक अधिकारों के लिए अभी की स्थिति में चौकन्ना होने की जरुरत है। ऐसे विकट के समय में सभी की आशा के केंद्र संविधान के अंतिम व्याख्याता सर्वोच्च अदालत की ओर मुड़ा है। महामारी से आया संकट, संविधान तथा लोकतंत्र के ही त्रिशंकु हुए समय में सभी नेपालियों के एकजुट होकर असंवैधानिक सरकार को नंगा करके महामारी से बचने का उपाय करने की अवस्था है।

प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के बदनीयतपूर्ण षड्यंत्र से संविधान को फाड़ने का काम पहली बार पूष 5 गते और दूसरी बार जेठ 7 गते मध्यरात में हुआ है। इस तरह सत्ता और शक्ति का दो-दो बार सार्वभौम सत्ता संपन्न प्रतिनिधि सभा विघटन करके संविधान और नेपाली जनता के जनादेश को लतियाने का दुष्प्रयास किया गया है। संसदीय व्यवस्था में संसद का विश्वास मत गँवा चुकने के बाद एक मिनट भी नहीं बैठना चाहिए। परन्तु संविधान की धरा 76 की उपधारा 3 के अनुसार अल्पमत में परिणत हुए प्रधानमंत्री ओली ने न तो इस्तीफ़ा देकर रस्ते को साफ़ किया और न ही संविधान की धारा 76 की उपधारा 4 के अनुसार विश्वास का मत ही लिया।

इसके विपरीत उन्होंने संविधान की धरा 76 की उपधारा 5 में जाने की कूटनीतिक चाल चली। प्रधानमंत्री के अहंकार और ढिठाई के कारन संविधान की धारा अपने मन मुताबिक व्याख्या करते हुए राष्ट्रपति द्वारा धारा 76 की उपधारा 5 के अनुसार सरकार गठन का आवाह्न किया गया। जिसने संसदीय प्रजातंत्र का उपहास करने, संसद के प्रति उत्तरदायी न होने प्रवृत्ति से संविधान और लोकतंत्र का सीधा ही उलंघन हुआ। राष्ट्रपति जैसे पद पर आसीन व्यक्ति के द्वारा अपने पद तथा दायित्व को भुलाकर ओली गूट की मात्र संरक्षक की भूमिका में लिप्त होना नेपाली जनता द्वारा महसूस किया गया।  

राष्ट्रपति की भूमिका प्रधानमंत्री द्वारा स्वीकृति के लिए लाये गए किसी भी दस्तावेज आँख बंद करके अनुमोदन करना नहीं है, उनका दायित्व देश, जनता तथा संविधान की रक्षा भी है। राष्ट्रपति द्वारा केवल ओली के ही इशारों पर चले जाने के कारण आज की अवस्था का सृजन हुआ है। प्रतिपक्षी दल के नेता शेर बहादुर देउवा ने बहुमत सांसद के (149) हस्ताक्षर लेकर राष्ट्रपति के सम्मुख पेश किये जाने पर भी ये-वो का बहाना करके सांसद का विघटन करना महाअपराधपूर्ण कार्य है। सम्मानित सर्वोच्च अदालत का सांसद से प्रधानमंत्री बनने की अवस्था होने तक संसद का विघटन नहीं किया जा सकता के आदेश को भी लतिया दिया। पद पर आसीन दोनों व्यक्तियों द्वारा पदानुरूप आचरण न किये जाने के कारण अभी नेपाली जनता को संकट का सामना करना पड़ रहा है।

कोरोना महामारी की त्रासमय स्थिति एक तरफ है ही तो दूसरी तरफ असंवैधानिक तरीके से प्रतिनिधि सभा का विघटन करके कपटपूर्ण तरीके से देश को आम निर्वाचन की दहलीज की तरफ ढकेला गया है।
संविधान तथा प्रजातन्त्र को ख़त्म करने का काम किया गया है। अध्यादेश के माध्यम से अपनी मन मर्जी के मुताबिक शासन करने की निरंकुश प्रवृत्ति ने जन्म लिया है। इसके विरुद्ध सर्वोच्च्च अदालत द्वारा प्रतिनिधि सभा को पुनर्जीवित किया जाय कहकर संघीय लोकतान्त्रिक गणतंत्र की रक्षा करने हेतु कॉग्रेस, माओवादी, नेकपा एमाले (माधव खनाल समूह), जसपा (उपेंद्र समूह) और जन मोर्चा के साथ 5 पार्टियों का बहुमत (146) प्रतिनिधि सभा सदस्यों ने परमादेश के लिए सर्वोच्च अदालत में रिट दायर की है। सम्मानित अदालत संविधान, लोकतंत्र तथा नेपाली जनता की भावना को अवश्य भी ठेस नहीं पहुंचाएगी।

अंत में देश की अवस्था को देखते हुए मन को ही नियंत्रण में रखना कठिन हो गया है एक तरफ दिन प्रतिदिन कोरोना की महामारी से घर-परिवार, अड़ोस-पड़ोस, गांव, बस्ती, शहर, हिमाल, पहाड़, तराई सभी ओर से मात्र मृत्यु की खबरों को सुनते सुनते जीवित व्यक्तियों के लिए भी ये समय मृत्यु से भी अधिक पीड़ादायक हो चुका है। जनता की अभिभावक हुई सरकार साम दाम दंड भेद कोई भी नीति अख्तियार करके कुर्सी पर बनी रहना चाहती है। उसका तो उद्देश्य ही हो गया है कि या तो खुद कुर्सी पर नहीं तो सभी को समाप्त ही करके छोड़ेंगे। महामारी के नाम पर भी ब्रह्म लूट चल रही है। संविधान और कानून की धज्जियाँ उड़ाते हुए सरकार तानाशाही के रस्ते का अवलम्बन कर रही है।

'हम तो डूबेंगे सनम तुमको भी ले डूबेंगे' की प्रवृत्ति घर में ही आग लगाने का काम कर रही है। कोरोना की महामारी ने ओली की सरकार को सत्ता पर टिकाये रखने में बढ़िया मदद की है। ऐसा करने से जनता सड़क पर नहीं निकल सकेगी की मानसिकता से इस ओर ध्यान न दिए जाने को भी भली भांति समझा जा सकता है।

ऐसी विषम परिस्थिति में हमारे सम्मुख इस सरकार को विस्थापित करके नई सरकार लाकर कोरोना नियंत्रण करना और जनता को बचना पहला कर्तव्य है। साथ ही साथ संघीय लोकतान्त्रिक गणतंत्र की रक्षा करना सभी राजनीतिक दलों, बुद्धिजीवियों, व्यापारियों द्वारा एकजुट होकर असंवैधानिक, अधिनायकवादी सरकार के गलत क्रियाकलापों को नंगा करना है। राजनीतिक संकट का निवारण सम्माननीय सर्वोच्च्च अदालत द्वारा किया ही जायेगा।

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