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माधव कुमार नेपाल समूह के कारण ही अभी चुनाव में जाने की जरुरत पड़ी है : मंत्री पार्वत गुरुंग

person access_timeMay 29, 2021 chat_bubble_outline0

रातोपाटी संवाददाता
  
अभी जबकि पूरा देश कोरोना की भयंकर बीमारी महामारी से जस तस मुकावला कर रहा है। प्रत्येक दिन मरनेवालों की संख्या नेपाल जैसे छोटे से देश के लिए बहुत अधिक है। होने को तो शायद सरकार का ध्यान जनता की ओर होगा या नहीं भी होगा परन्तु अभी समय है जब देश की सारी पार्टियां एक ही छाते के नीचे खड़ी होकर अपने देश और जनमानस के सुस्वास्थ्य के लिए एकजुट हो। परन्तु यहाँ सबके अपने अपने निजी स्वार्थ है राजनीतिक उठापटक अपने चरम पर है।

वर्तमान की राजनीतिक उठापटक, देश का भयंकर बीमारी से जूझना ऐसे में देश के प्रधानमंत्री द्वारा संसद को भंग करके चुनाव का ऐलान करना इन सभी वाकयों ने देश के सभी चेतनशील नागरिकों का ध्यान आकृष्ट किया है। गणतंत्र दिवस 2078 के अवसर पर नेपाल सरकार के प्रवक्ता तथा संचार तथा सूचना प्रविधि मंत्री पर्वत गुरुंग के साथ राष्ट्रीय समाचार समिति के संवाददाता अशोक घिमिरे द्वारा ली गई एक विशेष अन्तर्वार्ता :


देश के संघीय लोकतान्त्रिक गणतांत्रिक प्रणाली में जाने की मुख्य उपलब्धियां क्या क्या हैं ?

संघीय लोकतान्त्रिक गणतंत्र में प्रवेश करने के अलप समय में ही हम तीन श्रेणियों की सरकारों के निर्वाचन करने में सफल हुए हैं। संविधान द्वार निर्दिष्ट कानून का निर्माण किया गया है। संविधान निर्माण के बाद दो तिहाई का मत प्राप्त हुआ है। इस जनमत से स्थायी सरकार निर्माण करने का आधार तय हुआ है। समृद्ध नेपाल सुखी नेपाली की राष्ट्रीय आकांक्षा को मूर्त रूप देने का काम हुआ है। संघीय लोकतान्त्रिक गणतंत्र की स्थापना के लिए योगदान देनेवाले दल, नेता, सामाजिक व्यक्तित्व तथा नेपाली जनता प्रति गणतंत्र दिवस के अवसर पर हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ।  

जबकि अभी मुल्क महामारी की अवस्था से गुजर रहा है ऐसे में देश की सारी राजनीतिक शक्तियों को एकजुट होकर इस परिस्थिति का मुकावला करना चाहिए यहाँ और भी अधिक बेमेल विग्रह दिखाई दे रहा है क्यों ?

प्रतिपक्षी दल तथा अन्य कुछ मित्रों द्वारा जिस किस्म का आचरण दिखाया जा रहा है वह सही राजनीतिक दिशा नहीं है। देश के द्वारा स्वीकार की गई संघीय लोकतान्त्रिक गणतंत्र की भी दिशा ये नहीं है। अभी के संकट से देश को पार लगाने की भी राह ये नहीं है। वे लोग दिशाविहीन बन रहे हैं।

अभी की अवस्था में एकतावद्ध होकर आगे बढ़ने के समय में सरकार का नेतृत्व कौन लेगा, प्रधानमंत्री कौन होगा की दौड़ के कारन ये राजनीतिक संकट शुरू हुआ है। इसे हमें समय में ही सम्पन्न करना होगा। सभी प्रकार के संकटों का समाधान करने के लिए हमें एक होकर जाना होगा।

राष्ट्रपति तथा प्रधानमंत्री द्वारा हुए कार्य संपादन को लेकर अस्वस्थ बहस तथा टिप्पणियां होने लगी हैं क्यों ?

विशेष रूप से मैं सम्माननीय सर्वोच्च अदालत में हो रही बहस के सम्बन्ध में कोई भी टिप्पणी नहीं करना चाहता। हमें सर्वोच्च अदालत के फैसले का अक्षरशः पालन करना चाहिए। जहाँ तक आरोप-प्रत्यारोप का सवाल है विरोधी राजनीतिक दलों द्वारा उठाये गए विषयों पर एक नेपाली नागरिक की हैसियत से अगर कहना पड़े तो मैं कहूंगा कि हमें नेपाल के संविधान में मंत्री परिषद् गठन के विषय के लिए धारा 76 को देखना चाहिए। धरा 76 की सभी उपधाराएँ क्रियान्वित हुई हैं। कोई भी धारा निष्क्रिय नहीं हुई है।

मंत्री परिषद् व्यवस्थापन के लिए संविधान में जो व्यवस्था की गई है उसकी सभी धाराएं प्रयोग होने की ये ऐतिहासिक घटना है। जहाँ तक प्रधानमंत्री के द्वारा संविधान को कुचलने की बात है, प्रतिनिधि सभा विघटन का हल्ला सड़क पर सुनाई दे रहा है, प्रधानमंत्री द्वारा विश्वास का मत लेने की बात हो, सरकार गठन की बात हो या फिर पुनर्गठन की बात संविधा की सभी धाराओं का क्रियान्वन में सभी राजनीतिक दल सहभागी हुए हैं।

जब तक खुद सहभागी हैं वह संवैधानिक है और जब अपना स्वार्थ पूरा नहीं हुआ, तो उसे असंवैधानिक तथा प्रतिगमन की संज्ञा दी गई है। संविधान की धरा 76 की सभी 1 से लेकर 7 तक उपधाराओं की सभी प्रक्रियाओं में सहभागी होने तक विरोध का न होना उसमें प्रतिगमन का दिखाई न देना परन्तु स्वयं की असफलता के बाद उसे असंवैधानिक कहना ?

आज सांसद होने की जरुरत नहीं, कानून का विद्यार्थी होने की भी जरुरत नहीं, सामान्य नेपाली जनता संविधान की धारा 76 की उपधाराएँ 1 से 7 तक समझ चुके हैं। बस केवल नेता ही नहीं समझ पा रहे हैं न जाने क्यों या फिर जान जान कर भी अनजान बन रहे हैं।

धरा 76 (3) के अनुसार प्रधानमंत्री को उपधारा 4 के मुताबिक संसद में विश्वास का मत लेना चाहिए प्रतिपक्षियों का ऐसा कहना है इसे किस तरह लिया जाय ?

प्रधानमंत्री के द्वारा विश्वास के मत के लिए प्रस्ताव किया गया जिसे अस्वीकृत किया गया। अस्वीकृत होने के बाद धारा 76 (2) के अनुसार वैकल्पिक सरकार भी नहीं बन सकी। इस कारण सविधानतः 76 (3) के अनुसार सरकार को बनना ही था।

संसद पुनर्स्थापना के लगभग ढाई महीने तक उनके द्वारा अविश्वास का प्रस्ताव भी नहीं लाया जा सका। समर्थन भी वापस नहीं लिया गया,  ये परिस्थिति क्या दिखाती है कि संविधान की धारा 76 की उपधारा (5) के अनुसार सरकार का गठन होगा उसे भी विश्वास का मत मिलने की अवस्था नहीं दिखाई दे रही है। संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार देश मध्यावधि चुनाव में जायेगा ये स्पष्ट ही था।

बुरी तरह फैली कोरोना महामारी के समय ही चुनाव की घोषणा की गई है। एक तरफ जनता को संक्रमण की वैक्सीन नहीं दी जा पा रही है ऐसेमें देश को किस तरह चुनाव में ले जाया जा सकेगा ?

प्रतिनिधि सभा का विघटन करके देश को मध्यावधि चुनाव में ले जाना ऐसी वर्तमान सरकार की कोई सोच नहीं थी। प्रधानमंत्री को संसद से अगर विश्वास का मत दिया गया होता, अपनी ही पार्टी के 121 सांसदों में से 26 सांसदों का प्रमुख प्रतिपक्षी दल के नेता शेर बहादुर देउवा की प्रधानमंत्री के लिए सिफारिश न की गई होती तो क्या आज संसद विघटन होता ? देश मध्यावधि निर्वाचन के रास्ते पर जाता ? इन परिस्थितियों का निर्माण किसने किया ?

वर्तमान राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने जिस रास्ते को अख्तियार किया है वो संवैधानिक, कानून सम्मत, नेपाल और नेपाली जनता के पक्ष में है संविधान की धारा 76 के अनुसार की गई व्यवस्था के मुताबिक ही प्रतिनिधि सभा का विघटन किया गया है। प्रतिनिधि सभा की पुनर्स्थापना होगी जैसा मुझे नहीं लगता। इसकी संभावना ही नहीं है। मान लें कि पुनर्स्थापना हुई फिर भी एमाले संसदीय दल के नेता केपी शर्मा ओली ही प्रधानमंत्री होंगे क्योंकि उस समय भी और किसी के पास बहुमत पेश करने की अवस्था नहीं है। वैसी अस्थिरता की ओर देश अब नहीं जायेगा।

राष्ट्रपति द्वारा प्रतिनिधि सभा विघटन करके नयी चुनावी घोषणा के विषय को लेकर विवाद का सृजन हुआ है उसके पीछे कैसे कारण और क्या आधार था ?

राष्ट्रपति द्वारा संविधान का पालन नहीं हुआ इस तरह की टिप्पणी सुनकर मुझे दुःख होता है। सम्मानित संस्था प्रति टिप्पणी करने से पहले मैं उक्त प्रस्ताव पेश करनेवाले नेता से संविधान की धारा 76 की उपधारा के आधार पर दावा किस कारण से पेश किया है पूछना चाहता हूँ। उनके प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करनेवाले एमाले के माधव कुमार नेपाल जिन्होंने आजीवन विधि तथा पद्धति की बातें की हैं प्रतिपक्ष दल के नेता को प्रधानमंत्री के रूप में हस्ताक्षरित करना उनकी विधि और पद्धति के अनुसार था या नहीं ?
संसदीय प्रणाली में अपने दल के प्रधानमंत्री पर अविश्वास करके प्रमुख प्रतिपक्षी दल के नेता के लिए प्रधानमंत्री में समर्थन करना कौन सा राजनीतिक मिशन था ? या तो उनको राजनीतिक दल सम्बन्धी ऐन के अनुसार संसदीय दल और केंद्रीय कमेटी में 40 प्रतिशत संख्या पूरी करके पार्टी विभाजन करके समर्थन करना चाहिए था।  

राष्ट्रपति द्वारा उन लोगों के प्रस्ताव को अस्वीकार करने के और कारण भी थे। नेपाल के संविधान के संसदीय प्रणाली पर आधारित होने पर यहाँ निर्दलीयता का अभ्यास करने कि छूट हो सकती है ? संसद को पार्टी के विपरीत जाकर व्यक्तिगत रूप में हस्ताक्षर करने की अनुमति नहीं है। कुछ सांसदों द्वारा सामाजिक संजाल के माध्यम से तो कुछेक ने राष्ट्रपति को पत्र ही लिखकर हमारे हस्ताक्षर का दुरूपयोग हुआ, कहा है। शेर बहादुर देउवा के प्रधानमंत्री के दावे के लिए पेश किया गया प्रस्ताव ही प्रदूषित दिखा।

सरकार द्वारा संविधान के मर्म तथा धारा के अनुसार ही ऐन और कानून लाये जाने पर क्यों जनता को दिग्भ्रमित करने का काम हो रहा है ? इस बात को सरकार द्वारा किस रूप में लिया गया है ?

कहते हैं कि 'राजनीति गन्दा खेल है,' मुझे ऐसा नहीं लगता था किन्तु अभी की अवस्था में इसे गन्दा बनाया गया है। आज आगे आनेवाली पीढ़ी इस सोच में है कि राजनीति में जाया जाय या नहीं। वर्तमान सरकार द्वारा कि गई सभी चीजों को असंवैधानिक देखना, सरकार ने गलत किया कहते हुए आरोप प्रत्यारोप लगाना और फिर खुद के सत्ता में होने पर जनता के पक्ष में कुछ भी न करना ?

थोड़ा सा पीछे जाकर देखें न सांसद खरीद-फरोख्त, पजेरो कांड के साथ अन्य विकृतियां, विसंगति किसके समय में हुए ? प्रतिपक्षी दल के नेता की राजनीतिक पृष्ठभूमि और उनके प्रधानमंत्रित्व काल को अगर एक बार पलटकर देखा जाय तो हम उनके प्रति क्योंकर विश्वास करें? उनके प्रधानमंत्री होने पर किये गए निर्णयों ने देश को किस और ले जाने की कोशिस की थी ?

इससे पहले के अन्य प्रधानमंत्री तथा केपी शर्मा ओली के कार्यकाल की तुलना करें। पुष्प कमल ढाल 'प्रचंड' तथा माधव कुमार नेपाल के कार्यकाल पर भी दृष्टिपात करें। संविधान निर्माण के बाद का नौ महीने का कार्यकाल और अभी के तीन वर्षों के कार्यकाल को देखें।

किसके कार्यकाल में राष्ट्रीय हित, स्वाधीनता, विकास निर्माण, सुशासन के पक्ष में कितना काम हुआ विश्लेषण करें। प्रधानमंत्री ओली के कार्यकाल में देश और जनता के हित विरुद्ध के काम होने को प्रमाणित करें तो वर्तमान सरकार के प्रवक्ता के रूप में मैं प्रधानमंत्री द्वारा किया गया ये काम गलत है मैं कह सकता हूँ। अभी का राजनीतिक संकट और स्वास्थ्य संकट के समय उन्होंने देश का जिस तरह नेतृत्व किया है वह संविधान सम्मत और राजनीतिक रूप में उठाये गए कदम तथा निर्णय ठीक हैं।

संविधान का सम्मान तथा सर्वोच्च के फैसले को स्वीकार करते हुए वे आगे बढ़ रहे हैं। मधेशी जनता की युगों युग से चली आ रही मांग को सम्बोधन मिला है। मधेशी जनता तथा मधेश पक्षधर राजनीतिक दलों ने मधेश का मुक़दमा उठाना ही न पड़े सोचकर समृद्ध मधेश के दृष्टिकोण को लेकर प्रधानमंत्री आगे बढे हैं।

इस अभियान से त्रसित होने पर भी यदि पुनः केपी शर्मा ओली के नेतृत्व में चुनाव हुआ तो मधेश में भी उनका प्रभाव बढ़ रहा है सोचकर किसी को चिंता हो रही है।

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