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संसद विघटन का मजाक : प्रतिगमन भाग- 2

प्रतिगमन के दूसरे एपिसोड की 6 विशेषताएं

person access_timeMay 23, 2021 chat_bubble_outline0

'नेपोलियन बोर्नापार्ट का अठारहवा ब्रूमेयर' में कम्युनिष्ट गुरु कार्ल मार्क्स ने कहा है- ''कभी कभी इतिहास दोहरता है : पहले त्रासदी के रूप में फिर मजाक के रूप में।''

कार्लमार्क्स के नेपाली शिष्य द्वय केपी शर्मा ओली तथा विद्या देवी भंडारी ने मध्यरात में प्रतिनिधि सभा को भंग करके इतिहास को दोहराया है। पौष 5 गते का पहला विघटन त्रासदी के रूप में आया था तो आज मध्यरात का दूसरा विघटन मजाक बनकर आया है। इतिहास भी कभी कभी मजाक करता है !

विगत पौष 5 में केपी शर्मा ओली तथा विद्यादेवी भंडारी द्वारा मिलकर किया गया संसद विघटन पहला प्रतिगमन था तो आज रात (1 बजे) किया गया संसद विघटन प्रतिगमन भाग- 2 है। पुनर्स्थापित जन प्रतिनिधि मूलक संस्था की बलात्कार के बाद की हत्या है। पहले संसद का बलात्कार किया गया तत्पश्चात उसकी हत्या की गई।

अभी देश में कोरोना की महामारी है। दिनानुदिन जनता ऑक्सीजन तथा अस्पताल में शैया न पाकर, इलाज न पाकर मर रही है। सरकार द्वारा वैक्सीन खरीदकर नहीं लायी जा पा रही है परन्तु राष्ट्रीय एकता के साथ जनता के उपचार पर ध्यान देने के समय ये सरकार बल जबरन देश को जनता को मध्यावधि चुनाव का तोहफा देने के लिए कमर कस कर बैठी है।

अरबों रुपये के खर्च वाला मध्यावधि चुनाव जन स्वास्थ्य की दृष्टि से तथा आर्थिक व्यवहार की दृष्टि से भी अभी उपयुक्त नजर नहीं आता। देश की अभी की प्राथमिकता किसी भी कीमत पर इस महामारी से लड़ना है। कोरोना की महामारी से ग्रस्त हुई जनता को आर्थिक राहत के कार्यक्रम देना है। जनता से मत मांगने से पहले उन्हें बचाना जरुरी होना चाहिए।

मजाक की भी कोई हद होती है

प्रधानमंत्री संसद का विघटन किस अवस्था में कर सकता है का तथ्य तो पौष 5 गते से लेकर 11 गते तक के समय में बिलकुल ही स्पष्ट हो गया था। इस सम्बन्ध में राष्ट्रीय बहसें भी हो चुकी हैं। सरकार निर्माण तथा संसद विघटन सम्बन्धी संविधान की धाराएं-उपधाराएँ मात्र नेताओं तथा वकीलों द्वारा ही नहीं वरन आम जनता को भी कंठस्थ हो चुकी हैं। इस सम्बन्ध में सर्वोच्च अदालत द्वारा भी दो महीने के लम्बे समय में लम्बी बहस के साथ ही खूब व्याख्या की जा चुकी है। प्रथम प्रतिगमन की लज्जास्पद पराजय के साथ ही संसद विघटन की बहस ख़त्म हुई थी। परन्तु इतिहास ने फिर खुद को दोहराया, मजाक के रूप में दोहराया।

फाल्गुन 11 गते संसद की पुनर्स्थापना हो चुकने के बाद प्रधानमंत्री ओली को नैतिकता के आधार पर त्यागपत्र देना चाहिए था। नहीं दिया, ठीक ही है। फाल्गुन 23 गते सर्वोच्च अदालत द्वारा बड़े अनूठे ढंग से एमाले और माओवादी को अलग कर देने के बाद प्रधानमंत्री ओली को उसके एक महीने के अंदर ही विश्वास का मत लेना चाहिए था, नहीं लिया, ये भी ठीक है। विपक्षी भी ओली के त्यागपत्र के प्रति उतनी अधिक जिद पर नहीं अड़े थे। ढाई महीने तक सरकार चली ही थी। इतना तक की नेकपा की एकता भांग हो सकने पर भी माओवादियों द्वारा सरकार को दिया गया समर्थन वापस नहीं लिया था। ठीक इसी समय कोरोना की दूसरी लहर शुरू हुई।

प्रधानमंत्री ओली ने महामारी के नियंत्रण में सरकार द्वारा हो रही कमजोरी पर पर्दा डालकर वैशाख 27 गते संसद में विश्वाश का मत लेने की घोषणा की। संविधानतः ये काम चैत्र के अंत तक ही हो जाना चाहिए था। परन्तु उन्होंने बेमौसम की बरसात की तरह विशेष अधिवेशन बुलाया और विश्वास का मत माँगा।

विश्वास का मत न पाने के बाद वे स्वतः ही पद मुक्त हो गए। परन्तु विश्वास का मत न पा सकनेवाले ओली को ही राष्ट्रपति द्वारा बड़ा दल मानकर संविधान की धारा 76 की उपधारा 3 के अनुसार पुनः प्रधानमंत्री बना दिया। संविधानतः ये ठीक ही था विपक्षियों द्वारा भी इस सम्बन्ध में कोई दखलंदाजी नहीं की थी। देश में कोरोना की महामारी का भीषण रूप फैलने पर महामारी के विरुद्ध एकजुट होकर लगे, आगे बढे कहकर कांग्रेस ने भी कहा था। तब से एक महीने महामारी के विरुद्ध जुटने के लिए सरकार को कोई भी बाधा अड़चन नहीं थी।

लेकिन ये क्या अचानक ओली ने नई सरकार बनाने के लिए कैबिनेट से ही निर्णय किया तथा इस सम्बन्ध में राष्ट्रपति से सिफारिश की। फिर से वही प्रक्रिया.. राष्ट्रपति ने भी आव देखा न ताव उन्होंने भी छोटे से समय में दलों से सरकार के लिए दावा अपेक्ष करने का आग्रह किया। जेठ 30 तक के लिए सरकार का नेतृत्व करने के लिए तथा महामारी के विरुद्ध जनता की सेवा करने का मौका पानेवाले प्रधानमंत्री ओली ने यहाँ से फिर एक षडयंत्र, फिर एक नाटक शुरू किया।

प्रधानमंत्री द्वारा इस्तीफ़ा ही दिए बिना नई सरकार का गठन करने की मंत्री परिषद् से हांस्यात्मक सिफारिश का होना, उसी पर चढ़कर राष्ट्रपति द्वारा धरा 76 की उपधारा (5) की सरकार गठन के लिए आवाह्न करना। इस दावे को संविधान में न होने का अधिकार का प्रयोग करके रातोरात रद्द करना और 76 (3) में ही लौटकर ओली के पद का कायम ही रहना-मानना तथा धारा 76 (3) के ही प्रधानमंत्री द्वारा संसद विघटन करके मध्यावधि चुनाव की घोषणा करना और कुछ नहीं मात्र एक भद्दा राजनीतिक प्रहसन है।

संविधान की लिखावट, सर्वोच्च की नजीर और संविधान विदों के विश्लेषण को आधार मानने पर धारा 76 (5) के अंतर्गत बना प्रधानमंत्री ही संसद का विघटन कर सकता है। 76 (5) सरकार गठन में राष्ट्रपति द्वारा सांसदों की व्यक्तिगत संख्या देखकर निर्णय देना पड़ता है, दल की व्हिप नहीं। इस आधार पर शेरबहादुर देउवा द्वारा किया गया दावा जायज दिखाई देता है जिसे राष्ट्रपति द्वार रद्द किया जाना स्पष्ट ही संविधान की अवहेलना है। परन्तु संविधानविद् भीमार्जुन आचार्य के द्वारा कहे गए अनुसार राष्ट्रपति तथा प्रधानमंत्री ने संविधान को अपनी पॉकेट डायरी जैसा बनाया है। संविधान के साथ किया गया ये मजाक किसी भी तर्क से ढका नहीं जा सकता।

मजाक और जिद की भी एक हद होती है। संसद में विश्वास का मत लेने के वक्त प्रधानमंत्री के पास मात्र 93 मत थे। शुक्रवार दोपहर बालुवाटार में सम्पादकों के साथ भी प्रधानमंत्री दोहराकर, तेहराकर कह रहे थे मेरे पास मात्र 93 मत हैं, मैं बहुमत नहीं जुटा सका, मैंने हाथ खड़े कर दिए हैं। उधर गुरुवार रात में राष्ट्रपति द्वारा किये गए सरकार गठन के आवाह्न पर प्रधानममंत्री ओली द्वारा बहुमत न पा सकने की अवस्था में नई सरकार का आवाह्न किये जाने की बात लिखी थी। पर मध्य रात में ओली के पास अचानक 153 मत होना दिखाया गया। अगर 153 मत खुद के पास थे ही तो धारा 76 (5) के अनुसार नई सरकार का आवाहन क्यों ? प्रश्न अनुत्तरित है।

राष्ट्रपति द्वारा धारा 76 (5) की गैरदलीय सरकार के गठन का आवाह्न कर चुकने के बाद फिर से धारा 76 (3) में लौटा जा सकता है? इस प्रश्न का उत्तर संविधान ने दिया ही है। तथा सर्वोच्च अदालत ने भी संसद द्वारा सरकार देने की अवस्था रहने तक संसद विघटन नहीं किया जा सकता, कहा है।

प्रतिगमन भाग- 2 की विशेषताएं

दोनों बाद के संसद विघटन में बहुत सारी समानतायें होने पर भी कुछ भिन्नताएं भी हैं।
1. पहले प्रतिगमन में जनता द्वारा प्रधानमंत्री केपी ओली को मात्र दोष दिया था दूसरे में स्पष्टतः राष्ट्रपति की संलग्नता नजर आती है। राष्ट्रपति भी प्रतिगमन की समर्थक हैं।
2. पहले प्रतिगमन में जसपा के महंथ ठाकुर तथा राजेंद्र महतो इस बुरी तरह से नंगे नहीं हुए थे दूसरे में वे स्पष्ट रूप से ओली के समर्थक सावित हुए हैं। संसद का विघटन होने तथा देश को मध्यवधि की तरफ धकेलने में ये दोनों छबियाँ भी उतनी ही जिम्मेदार ठहर रही हैं। अब कौन प्रतिगमन का पक्षधर है तथा कौन संसद को बचाना चाहता है ये ध्रुबीकरण पूर्ण रूप से स्पष्ट हो गया है।
3. पहले प्रतिगमन के समय कोरोना की महामारी कुछ घटी थी तथा शीत ऋतू के कारण आंदोलन का मौसम भी था। अभी कोरोना अपने भयावह रूप पर है तथा वर्षायाम होने के कारण ये आंदोलन का समय भी नहीं है। देश भर में निषेधाज्ञा है। जनता अपने अपने घरों में कैद है।

अब क्या होगा ??

आखिर अब देश में होगा तो क्या होगा ??? चीनी नेता माओत्से तुंग ने कहा है- प्रतिगामी षड्यंत्र करते हैं, हारते है, फिर षड्यंत्र करते हैं फिर हारते हैं अंततः वे तब तक षड्यंत्र करते रहते हैं जब तक की वे पूर्ण रूप से हार नहीं जाते।

संसद का विघटन हो चूका है वर्षायाम तथा महामारी दोनों के ही कारन अभी सड़क आंदोलन का मौसम नहीं है। अब अदालत का भी भरोसा नहीं है, अंतर्राष्ट्रीय शक्तियां अपनी पक्षधरता दिखा ही चुकी है। कोरोना आदि के करानों से कार्तिक में चुनाव होना कठिन है। चुनाव नहीं हुआ तो ओली की सत्ता और भी लम्बी हो सकती है। अगर ओली के नेतृत्व में चुनाव होता है तो निर्वाचन आयोग की भूमिका और ओली सरकार के तौर तरीके को देखते हुए ये चुनाव बांग्लादेश के 'हसीना मॉडल' में होगा ऐसा लग रहा है।

ये सारे परिदृश्य प्रतिगमन दो के एपिसोड को प्रतिगमन-1 से स्पष्ट रूप में लम्बा देखा जा सकता है। इसे छोटा करने का फिर भी एक ही निकाय सर्वोच्च अदालत ही है। अथवा प्रतिनिधि सभा को खुद ही जगाना होगा जिसकी कोई सम्भावना नजर नहीं आती।

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