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दास ढुङ्गा के 28 वर्ष : क्या फ़ाइल बंद ही कर दी गई?

person access_timeMay 18, 2021 chat_bubble_outline0

उषा न्यौपाने

आज जेठ 3 गते नेकपा एमाले के तत्कालीन महासचिव मदन भंडारी तथा स्थायी समिति सदस्य तथा संगठन विभाग प्रमुख मेरे पिता जीवराज आश्रित के हृदय विदारक अवसान का दिन। दास ढुङ्गा कांड हुए 28 वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन ये घटना एक दुर्घटना थी कि कोई षडयंत्र ? इसका अभी तक कोई फैसला नहीं हुआ है। हमारे लिए ये सबसे बड़ी बिडम्वना है।

सम्भवत दास ढुङ्गा कांड तथा दरबार हत्याकांड यदि न हुआ होता तो देश इसी स्थिति में होता या इसका सारा परिदृश्य ही अलग होता। जो हो एक बात तो पक्की है कि अगर आज मदन-आश्रित यदि जीवित होते तो एमाले के अंदर हो रहा अभी का नंगानाच अभी के अनुपात में न होता।

दास ढुङ्गा कांड के कारण मदन आश्रित के नेतृत्व क्षमता और योग्यता का सम्पूर्ण लाभ इस देश को न मिल सका। 2050 साल जेठ 3 गते पोखरा से चितवन के पार्टी के कार्यक्रम में जाते हुए दासढुङ्गा में रहस्यमय अवसान हुआ था। 2050 साल के बाद जन्म लेने वाले तो कितनों को ही मदन और आश्रित आखिर कौन थे भी शायद मालूम न होगा। इतना ही नहीं दास ढुङ्गा कांड बहुतों की स्मृति से धुल चुका है ऐसी अनुभूति होती है।

मदन आश्रित के अलाबा नेपाल के इतिहास में बड़े राजनीतिक दल के नेता रहस्यमय सड़क दुर्घटना में मृत्यु के घाट नहीं उतरे हैं। इस कारण दासढुङ्गा कांड एक रहस्यमय घटना मात्र न होकर अपवाद ही बना है।

पिछले साल जेठ 3 गते के स्मृति दिवस पर भी मैंने मेरे पिता तथा मदन भंडारी की मृत्यु के सम्बन्ध में न्यायिक जांच की जाये के विषय को लेकर लेख लिखा था। मदन आश्रित जैसे नेताओं के कठोर योगदान से निर्मित पार्टी के सत्ता में होने पर भी अगर दासढुङ्गा कांड की जांच नहीं की जाती है तो दास ढुङ्गा कांड की जांच कभी नहीं हो सकेगी की विषयवस्तु को समाहित करके मैंने प्रधानमंत्री केपी ओली तथा मदन अंकल की धर्मपत्नी महामहिम राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी आंटी का ध्यानाकर्षण कराया था।

राजसत्ता की सम्पूर्ण बागडोर अभी उन लोगों के हाथों में होने के वक्त यथार्थ खोज करके सत्य तथ्य को बाहर लाया जाए ये अभिलाषा मात्र परिवार जनों की न होकर सम्पूर्ण देश की ही अभिलाषा है। परन्तु इस विषय पर कोई ठोस प्रगति होने की बात अभी तक पता न चली है। अगर अंदर ही अंदर कुछ हुआ होगा तो एक न एक दिन बहार आएगा ही। परन्तु हम अभी भी आशान्वित है। एमाले की पार्टी पंक्त, प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति तथा सरकार के मंत्रियों की भी रूचि का विषय बने। दास ढुङ्गा कांड एक दुखद स्मृति में सीमित होकर न रह जाए। सत्ता की सीढ़ियों को चढ़ने लिए मात्र मदन आश्रित का नाम जपना तथा उसकी चर्चा करना दासढुङ्गा कांड में जीवन गँवानेवाले दोनों ही नेताओं के साथ हुआ अन्याय है।

आज की अवस्था में हमारे जैसे देश के ऐसे कांडों की अगर सरकार को रूचि हो तो जांच नहीं हो सकती, परिणाम नहीं पाया जा सकता ये कहना गलत है। उस कांड के एक मात्र चश्मदीद गावह अमर लामा की भी हत्या होना इस प्रकरण को और भी अधिक रहस्यमई बनाता है। परन्तु उसकी फ़ाइल ही खोली न जा सके ऐसा तो नहीं ही हुआ होगा। इस कारन दास ढुङ्गा कांड की फ़ाइल खोली जाय।

दासढुङ्गा कांड एमाले और सरकार के लिए हमेशा के लिए स्मृति में सीमित नहीं होना चाहिए। हरेक वर्ष जेठ 3 गते आने पर हमारा ध्यान बल्खु के स्मृति सभा की और मात्र जाता है। स्व. नेता की तस्बीरों पर माल्यार्पण करना उन लोगों के सम्बन्ध में कुछ शब्दों को खर्च करना जैसी औपचारिकताओं में सीमित हो गई है ये तिथि।

मात्र औपचारिक स्मृति से दिवंगत आत्माओं को शांति नहीं मिल सकती। मदन भंडारी की जनता के बहुदलीय जनवाद के प्रणेता के रूप में चर्चा करना तथा मेरे पिता जीवराज आश्रित की कुशल संगठक कहकर प्रसंशा करना उनके प्रति सच्ची श्रृद्धांजलि नहीं हो सकती। ये हत्या थी अथवा दुर्घटना जिस दिन से बात का सत्य-तथ्य बहार आएगा उसी दिन इन दोनों नेताओं के प्रति सच्ची श्रृद्धांजलि होगी तथा उनकी आत्मा को शांति मिलेगी।

अगर इसकी जांच पड़ताल ही नहीं की जा सकती तो दास ढुङ्गा की फ़ाइल को अब सदा के लिए बंद कर दिया गया, ये एक दुर्घटना ही थी ये कहने की हिम्मत करनी चाहिए, यदि ये किसी की भी सनक अथबा षडयंत्र नहीं है तो।

मदन भंडारी का राजनीतिक प्रताप देश के अंदर तथा बाहर भी शक्तियों के लिए बड़ा ही सिरदर्द रहा होगा। परन्तु मेरे पिता का क्या दोष था ? वे तो मदन अंकल की तरह लोकप्रिय भी नहीं थे। परन्तु उन्हें मदन भंडारी के साथ ही षड्यंत्र का शिकार बनना पड़ा। उंसकी कीमत हम परिवारवालों तथा नेपाली समाज को चुकानी पड़ रही है। इस लिए मैं फिर इस बार भी प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति सरकार तथा शीर्षस्थ नेताओं से अनुरोध करना चाहती हूँ कि दास ढुङ्गाकांड की खोजबीन किये जाय, इस घटना को पार लगाया जाय।

पिता की दासढुङ्गा कांड में असामयिक मृत्यु होने के बाद हमें माता की ममता मिली परन्तु हमारे जीवन में पिता के अभिभावकत्व का हमेशा अभाव रहा। उनके लम्बे भूमिगत जीवन के बाद कुछ समय से उनके साथ रहने लगने के कुछ ही समय बाद वे दासढुङ्गा कांड के शिकार हुए तो फिर से पिता के साथ का हमारा सानिंध्य टूट गया।

छोटी छोटी बातों में पिताजी का हमें समझाना, हमें आज की ही तरह लगता है। पिताजी मुझसे भी ज्यादा मेरे भाई डॉ सागर न्यौपाने की समझाया करते थे। शायद इसी कारन भाई पिताजी के करीब जाने से थोड़ा झिझकता था ऐसा मुझे लगता था। मेरे पिताजी खुद अनुशासन का पालन करते थे तथा सभी को अनुशाषित ओने के लिए अनुप्रेरित करते थे। अनुशासित पार्टी के लिए अनुशासित नेता तथा कार्यकर्त्ता की जरुरत हैं वे कहा करते थे।

आज के समय में पार्टी की अस्थिर अवस्था देखकर लगता है कि अगर मदन अंकल तथा मेरे पिताजी जीवित होते तो देश में ऐसी भयानक अवस्था नहीं आती, ऐसा मुझे लगता है। सभी को समझा बुझाकर समस्या का समाधान करने की कला उन लोगों को आती थी। आज वास्तव में ही एमाले में पिताजीका अभाव है।

पार्टी के संगठनात्मक कामों के अलाबा पिताजी की साहित्य तथा कला क्षेत्र में भी रूचि थी। उस झुकाव के कारण वे फुर्सत के समय में वे कविता तथा गीतों का सृजन करते थे। मोदनाथ पराश्रित और जीवराज आश्रित के बीच बनारस से ही बहुत घनिष्ठ सम्बन्ध था। भौगोलिक क्षेत्र भी एक ही होने के कारण दोनों के बीच आत्मीय सम्बन्ध था। शायद मेरे पिताजी को मोदनाथ अंकल की प्रेरणा ने भी गीत लिखने में मदद की होगी। उनके द्वारा लिखे गए कुछ गीत नेपाली समाज में अभी भी लोकप्रिय हैं। उनके द्वारा लिखा गया एक गीत है-

न उठी भएन नेपाल का दिदी बहिनी हो

के छ र बाच्ने आधार कम्मर न कसे

 अभी भी इस गीत के रेडियों में बजने पर मेरा मन तड़प उठता है क्योंकि पिता जी के बिना का हमारा जीवन अधूरा, उजाड़ और उदास है।

नेपाली समाज को अर्ध सामंती तथा अर्ध औपनिवेशवाद से मुक्त करने तथा पंचायती कालरात्रि से मुक्त करके लोकतंत्र में विचरण करने के लिए पिताजी द्वारा दिया गया योगदान सदैव स्मरण रहेगा। किसी भी नेता अथवा राजनेता का मूल्याङ्कन सत्ता पर पहुँचने के आधार पर न होकर सत्ता और शक्ति से बाहर रहकर उसके द्वारा किये गए कर्मों के आधार पर होना चाहिए।

नेपाल में ऐसे बहुत से नेता हैं जो सत्ता तथा सरकार से बाहर रहकर ही समाज के लिए महत्वपूर्ण योगदान देने में सफल हुए हैं। मेरे पिताजी स्व जीवराज आश्रित भी राज्य के किसी भी उच्च पद पर आसीन हुए बिना ही देश तथा जनता की मुक्ति के लिए अनवरत योगदान करनेवाले सच्चे योद्धा हैं। जेठ 3 का ये स्मृति दिवस स्व पिताजी आश्रित तथा मदन अंकल प्रति हार्दिक शृद्धा सुमन।

(उषा जीवराज आश्रित की पुत्री हैं)

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