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वर्तमान राजनीति में देउवा की भूमिका

person access_timeMay 16, 2021 chat_bubble_outline0

सुरेश पौडेल

अभी नेकपा एमाले का झगड़ा एक चक्कर लगाकर फिर जहाँ का वहीँ आकर आगे बढ़ा है। इस परिवेश में कांग्रेस सभापति देउवा की भूमिका कैसी होगी इस बात की फिर से पुष्टि हुई है। देउवा आरम्भ से ही कहते आये है कि नेकपा का ये झगड़ा पद के लिए है अतः इन लोगों के साथ सहकार्य निश्चिततापूर्ण नहीं हो सकता।

गुरुवार सहमति कि सरकार गठन होने के अंतिम दिन अचानक एमाले नेता माधव कुमार नेपाल अपने सांसदों के इस्तीफ़ा देने के अपने ही बयान से पीछे हट गए। उनके इस कदम ने एक बार फिर देउवा के अनुभव उनके कथन को पुष्ट कर दिया है।

तत्कालीन नेकपा के अंदर जब घोर विवाद चल रहा था उस वक्त नेपाली कांग्रेस के कुछेक नेताओं ने माधव नेपाल के साथ सहयोग करने के हिसाब से ओली के इस्तीफे के विरुद्ध आवाज उठाई थी परन्तु उसी समय देउवा ने माधव नेपाल समूह का विश्वास न होने की तथा कांग्रेस के पास संसद में बहुमत की संख्या न होने के कारण अविश्वास का प्रस्ताव पंजीकृत करने को तैयार नहीं हुए थे। अन्ततः काफी पहले से ही देउवा द्वारा दिया गया विचार ही गुरुवार की संसद में विपक्षी द्वारा बहुमत को हासिल न कर सकने पर पुष्ट हुआ है।

चार चार बार प्रधानमंत्री बने देउवा समकालीन राजनीतिज्ञों में सबसे अनुभवी तथा परिपक्व नेता हैं। जब से सत्ता परिवर्तन के लिए कसरत शुरू की गई तभी से देउवा ये कहते आ रहे थे कि विपक्षी के पास पूर्ण बहुमत नहीं है। उनकी इस धारना पर कांग्रेस पार्टी के अंदर के ही कुछ नेताओं द्वारा देउवा की ओली के साथ निकटता का गलत आरोप लगाया था। परन्तु शायद अब उन नेताओं की समझ में देउवा का पॉइंट ऑफ़ व्यू समझ में आया होगा कि देउवा में वास्तव में वास्तविकता को बहुत नजदीक से समझने, परखने की क्षमता है।

पिछले रानीतिक घटनाक्रम में एक बार फिर से देउवा ने खुद को परिपक्व तथा दूरदर्शी नेता के रूप में स्थापित किया है।

बार बार सार्वजनिक होनेवाले देउवा के विचारों के पीछे माओवादी केंद्र तथा नेकपा एमाले के माधव नेपाल पक्ष के द्वारा किसी भी समय धोखा दिए जा सकने का मुख्य भाव था। ये लोग व्यक्तिगत स्वार्थ तथा पद प्राप्ति के लिए कुछ भी कर सकते हैं। उनके अपने अनुभव तथा इनके चरित्र के कारण ही देउवा इन लोगों पर कभी भी पूर्ण विश्वास नहीं कर सके हैं। गुरुवार खुद माधव नेपाल ने इस बात की जोर शोर से पुष्टि कर दी।

चार बार तक देश के प्रधानमंत्री बन चुके तथा देश की सबसे पुरानी और बड़ी पार्टी के सभापति देउवा ने कुर्सी के प्रति मोह नहीं दिखाया। उनका मोह तो महाधिवेशन कराकर आगामी चुनाव में बहुमत हासिल करके लोकतंत्र को और अधिक मजबूत करने में दिखा। तीन चार दलों के मिलाने से बनी सरकार में प्रधानमंत्री बनने की इच्छा भी देउवा में नहीं दिखी। इससे व्यक्त होता है कि उनके विचार में संयुक्त सरकार के जोड़-घटाव में उलझना ठीक नहीं। देउवा का अभी का निर्णय सत्ता से पार्टी को मजबूत बनाने का उनका ध्येय कल इतिहास के पन्नों पर अवश्य ही प्रशंसा प्राप्त करेगा। इस बार की देउवा की राजनीतिक टेक के कारण कांग्रेस पार्टी के प्रति आम जनता का भरोसा तथा आस्था मजबूत होगी।

महंथ, ओली तथा शक्ति केंद्रों की चहलकदमी

हमारे देश की छोटी से छोटी राजनीतिक घटनाओं पर भी हमारे दोनों पडोसी मुल्कों की नजर रहती है। कुछ महीनों पहले भारीतय ख़ुफ़िया एजेंसी के प्रमुख सामंत कुमार गोयल का नेपाल आना, बालुवाटार में प्रधानमंत्री ओली से भेट करना इस घटना के बाद भी अनेकों इसी किस्म की घटनायेम होने से साबित करता है इस किस्म की दृश्य व अदृश्य घटनायें शक्ति केंद्र के प्रभाव का स्पष्ट ही दिखलाती है। इस भेंट के पीछे ओली द्वारा एक के बाद दूसरा निर्णय ये दिखता है की किस कदर नेपाली राजनीति पर भारत का प्रभाव तथा रुचि है।

चुनाव से पूर्व राष्ट्रवादी की नकली छवि बनानेवाले ओली सत्ता में आने के बाद किये अपने व्यवहार से ये दिखाया है कि वे देश को केंद्र में रखकर काम करने से भी अधिक विदेशी शक्तियों को केंद्र में रखकर काम करते हैं। देखा गया है कि अपनी सत्ता को कायम रखने के लिए ओली जिसके साथ भी जो भी समझौता करने को तत्पर रहते हैं। पहले भारत का खूब विरोध करके चर्चा में आये ओली ने सत्ता में आने के बाद ओली के भारतपरस्त होने की बात भारतीय पत्र-पत्रिकाओं में तथा भारतीय जनता पार्टी के सांसद सुब्रमण्यम स्वामी द्वारा की गई ट्वीट से स्पष्ट होता है। अभी ओली में दिखाई देनेवाला सत्ता उन्माद भी इसी किस्म के शक्ति केंद्रों की पक्षधारिता के भरोसे की उपज है। 

ओली को सत्ता पर टिकाने के लिए भारतीय पक्ष सक्रिय है का विषय पिछले सप्ताह के सत्ता समीकरण द्वारा भी पुष्ट होता है। जनता समाजवादी पार्टी के महंथ ठाकुर द्वारा की गई ओली पक्षधरता भी इस बात का सबूत है। राजनीतिक तथा वैचारिक रूप में दोनों के बीच कहीं किसी किस्म की समानता नहीं है। पिछले चुनाव में कांग्रेस द्वारा अपनी उम्मीदवारी को ही न देकर महंथ ठाकुर को चुनाव जिताया गया था।

महंथ और उनकी पार्टी द्वारा उठाये जाते रहे मधेश के मामलों के प्रति सबसे अनुदार प्रधानमंत्री ओली ही है। जबकि कांग्रेस और विषेश करके सभापाति देउवा मधेश के मामलों को सम्बोधित किये जाने की धारणा आरम्भ से ही रखते आये हैं। कांग्रेस द्वारा तो मधेश में मामले को और भलीभांति सम्बोधन करने के लिए सांसद में प्रस्ताव ही पंजीकृत किया था। ओली संघीयता और क्षेत्रीयता के मामले के विरोधी हैं जबकि ठाकुर की राजनीति इन्हीं दो मामलों पर टिकी है। इस हिसाब से ये स्पष्ट होता है कि इन दोनों का मिलना शक्ति केंद्र का जोर-बल जबरदस्ती है। सांसद में ओली के विपक्ष में मतदान न करना, ओली के बहिर्गमन के लिए विपक्षियों के समीकरण में सहभागी न होना महंथ की व्यक्तिगत इच्छा न होकर शक्रिकेन्द्र का निहित स्वार्थ है साफ साफ दिखाई देता है। पिछले घटनाक्रमों से ओली और महंथ दोनों के नकाब उतर गए हैं।

खूब उछलकर चुप हुआ माधव समूह

अभी दिखाई दे रही सत्ता परिवर्तन की व्यथा, राजनीतिक उतार-चढाव के जो घटनाक्रम है वे सब नेपाल द्वारा पार्टी के अंदर किये गए विद्रोह की उपज हैं। नेपाल ने ओली के नेतृत्व में सरकार और पार्टी दोनों के ही चल न सकने के निष्कर्ष के साथ पार्टी के अंदर एक किस्म का विद्रोह पैदा किया था। वे बार बार कहते आए है कि ओली के बहिर्गमन के बिना पार्टी और देश दोनों ही नहीं चल सकते। परन्तु मजे की बात खुद ही इल्जाम लगाते रहे और मौका मिलते ही अपनी बातों से खुद ही फिरकर वे ओली के साथ समझौता करने पहुँच गए।

जैसा की नेपाल कहते आ रहे थे यदि वैसा ही होता तो गुरुवार बहुमत की सरकार का गठन होता। जिसके द्वारा नेपाल के कथनानुसार ओली का बहिर्गमन संभव था। परन्तु नेपाल के अपने ही शब्दों से पीछे हट जाने के कारण, ओली के जाल में पुनः एक बार फस जाने के कारण राजनीतिक गलियारा फिर 'बैक टू पबेलियन' थोड़ी बहुत यात्रा करके, घूमघाम कर अपने ही स्थान पर आ गया। अब कुछ बांकी नहीं रहता सब स्पष्ट हो जाता है कि माधव समूह को कितनी अधिक सत्ता की लालसा है, ये कितना अधिक स्वार्थ परास्त है। ओली के आश्वासन में खुद बनाये हुए मार्ग को छोड़नेवाले नेपाल आगामी दिनों में राजनीतिक इतिहास में कितने ही अस्थिर तथा अविश्वासी नेता के रूप में जाने जायेंगे। स्पष्ट है कि माधव स्वयं का दाव ही माधव को राजनीतिक रसातल की ओर ले जायेगा।

महामारी नियंत्रण नहीं झूठी खबरें फैलाते ओली

भयंकर संक्रामक बीमारी कोरोना के उपचार, नियंत्रण तथा रोकथाम में ओली आरम्भ से ही एक गैर जिम्मेदार शासक के रूप में दिखाई पड़ते आ रहे हैं। आरम्भ में कोरोना कुछ है ही नहीं हल्दी पानी पीने से ठीक हो जायेगा कहते हुए गलत जानकारियां देते रहे। ओली अब एक महीने कोरोना की दूसरी लहर के आरम्भ हो चुकने पर भी देश के प्रधानमंत्री ओली अमरूद के पत्तों का रस पीने से ठीक हो जायेगा- कोरोना का भ्रामक सन्देश फैलाते आ रहे हैं।

हालात ये है कि काठमांडू घाटी के साथ साथ देश के अन्य शहरों के अस्पताल भी कोरोना संक्रमितों से खचाखच भरे हैं, उनकी चीख पुकार, उनकी गुहार सुननेवाला कोई नहीं, परन्तु देश का शासक प्रचार कर रहा है कि हमारे पास पर्याप्त मात्रा में बेड हैं जबकि यहाँ सडकों पर उपचार किया जा रहा है।

ऑक्सीजन के आभाव में बीमार अपनी जान गँवा रहे हैं परन्तु देश का प्रधानमंत्री प्रचार कर रहा है कि हमारे पास पर्याप्त ऑक्सीजन है। प्रधानमंत्री द्वारा ऐसे भ्रामक समाचारों को फैलाये जाने के कारण ऑक्सीजन और बेड के आभाव में मरनेवालों की मृत्यु के जिम्मेदार स्वयं प्रधानमंत्री हैं। उनके द्वारा बारम्बार गलत सूचना प्रेषित किये जाने के कारण जनता कोरोना की मार में पड़ी है।

अंत में

कोरोना महामारी के द्वारा देश को ही अपनी चपेट में लिए जाने के वक्त प्रधानमंत्री को सभी राजनीतिक दलों, नागरिक समाज आदि को एकसाथ मिलाकर खड़ा करना चाहिए था। सारे देश को मिलकर कोरोना विरुद्ध की लड़ाई में सहभागी होना चाहिए था। परुतु ओली महोदय कोरोना महामारी से जनता को बचाने की तरफ उन्मुख न होकर संकट की आढ़ में अपने शासन काल को लम्बा बनाने की फ़िराक में जुटे हैं। उनके द्वारा उठाये गए अभी के एक के बाद दूसरे कदम ने वे जनता और देश के प्रति कितने जिम्मेदार हैं इसे स्पष्ट कर दिया है।

एक तरफ राजनीतिक तिकड़म करके विधि-विधान और पद्धति ध्वस्त करने और दूसरी तरफ कोरोना वायरस की महामारी को नजर अंदाज करके जनता में मिथ्या सूचनाओं को सम्प्रेषित करनेवाला प्रधानंमत्री क्यों कार्रवाही का भागीदार नहीं हो सकता ???

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