हिंदी संस्करण

एक बूँद ऑक्सीजन का चीत्कार : यदि मैं स्वास्थ्य मंत्री होता…

ऑक्सीजन प्लांट बनाने के लिए दिए गए सुझाव पर सरकार की दृष्टि ही नहीं गई, अब क्या करेंगे ?

person access_timeMay 13, 2021 chat_bubble_outline0

कोरोना की महामारी वीभत्स रूप में बढ़ रही है अब तो हरेक दिन सौ से भी ऊपर लोग अकाल में मृत्यु का वरन करने को लाचार हो रहे हैं। ऑक्सीजन की कमी बताकर अस्पताल उपचार सेवा से हाथ उठा रहे हैं। पूरे देश में ऑक्सीजन का हाहाकार है, जनता में त्राहिमाम है, सरकार मूक दर्शक बनकर तमाशा देख रही है, सात गाँव डूब गए, नाब का इंतजाम ही नहीं।
आरम्भ में कहा गया कि ऑक्सीजन हमारे पास पर्याप्त मात्रा में है बस सिलिंडरों का आभाव है। पर अब जाकर ये पता चला की न तो हमारे पास ऑक्सीजन ही है और न ही उसकी सही व्यवस्था। पहले तो सिलिंडरों का भी आभाव ही है पर जो सिलिंडर हैं भी उन्हें भी भरने के लिए हमारे पास ऑक्सीजन नहीं है। ऑक्सीजन की आपूर्ति चरम रूप से अभावग्रस्त होने पर सरकार ने अस्पतालों के लिए कोटा तय कर दिया, जो और भी अधिक लज्जास्पद है तथा जिसने और भी अधिक समस्या को जन्म दिया है।

वर्तमान स्थिति के जन्म के लिए स्वास्थ्य मंत्रालय, सीसीएमसी तथा पूरी सरकार ही दोषी है- पूर्व दो स्वास्थ्य मंत्रियों ने कहा। बताया गया है कि पिछले साल ही मंत्रालय द्वारा इस स्थिति का आंकलन किया जा चुका था परन्तु मंत्रिपरिषद के कार्रवाही ही नहीं की गई।



प्रश्न उठता है कि आखिर सरकार क्यों ऑक्सीजन का प्रबंध नहीं कर पा रही है? इस के लिए ऑक्सीजन उत्पादक उद्योग अथवा सरकार कौन ज्यादा जिम्मेदार है ? सबसे अहम् बात कि अभी फैले ऑक्सीजन के हाहाकार को मिटने का उपाय क्या ? इन गंभीर विषयों पर दो पूर्व स्वास्थ्य मंत्रियों के साथ की बातचीत....

इस स्थिति का आंकलन एक वर्ष पूर्व ही किया जा चुका था- पोखरेल

पूर्व स्वास्थ्यमंत्री गिरिराज मणि पोखरेल ने बताया कि एक वर्ष पूर्व ही कैबिनेट में ऑक्सीजन प्लांट को बढ़ने के सम्बन्ध में चर्चा हुई थी। मंत्री परिषद में ही चर्चा होने पर भी इसे गंभीर रूप में नहीं लिया गया जिसके कारन अभी कि समस्या सिर उठा रही है। ऑक्सीजन के अभाव तथा अब उठाये जानेवाले कदमों के प्रति पूर्व मंत्री पोखरेल का कहना कुछ इस तरह है...


अभी ऑक्सीजन की कमी की समस्या ने भयानक रूप ले लिए है। ये कितना ही अधिक पीड़ादायक तथा लज्जास्पद नहीं है कि बीमारों के स्वजनों से कहा जाय की अपने मरीज के लिए ऑक्सीजन का इंतजाम आप खुद करें ??
पिछले वर्ष ही स्वास्थ्य क्षेत्र कि अनेक बातों-चीजों का अध्ययन करके ये निष्कर्ष निकला गया था कि स्वास्थ्य क्षेत्र में ऑक्सीजन की कमी हो सकती है, उस समय स्वास्थ्यकर्मियों द्वारा ये बात उठायी गई थी।
मेरे शिक्षा तथा स्वास्थ्य समिति दोनों को देखे जाने के कारण समन्वयात्मक ढंग के काम करने के उद्देश्य से मैंने पहल की थी। गणेश शाह के संयोजकत्व में टोली बनाकर रिपोर्ट बनाई गई तथा उस रिपोर्ट के आधार पर ऑक्सीजन प्लांट बनाने तथा सिलिंडर कि व्यवस्था करने को कहा गया। ये उस वक्त का ही ईसू है। परन्तु उस वक्त इसको गंभीर रूप में नहीं लिया गया तो अब जाकर ऐसी भयावह स्थिति का सृजन हुआ है। इस समय इसके उत्पादन, व्यवस्थापन तथा वितरण सभी में समस्या दिखाई दे रही है।
जाने को तो ये किसी मंत्री के द्वारा मात्र कि जा सकनेवाली अवस्था नहीं है परन्तु फिर भी देश के अंदर के सभी प्लांटों से गम्भीरतापूर्वक उत्पादन करना और देश के बहार से भी मदद मांगने का वक्त है। संभावनाओं को पकड़कर काम करने का समय था ये। अभी कितने ही सिलिंडरों के तो घर घर में पहुँच चुकने की अवस्था है। घरों से ही ऑक्सीजन कि व्यवथा करे ये कहने लगे हैं। अभी कि भयावह स्थिति में सभी को मिलकर काम करने की जरुरत है।
सरकार की तैयारी अपर्याप्त है ये मैं पहले ही कह चुका हूँ। ऑक्सीजन का अभाव हो सकता है ये बात तो एक वर्ष पहले ही कैबिनेट में पहुँच चुकी थी। उसी समय ऑक्सीजन प्लांट का निर्माण करना चाहिए था। उस समय जो बात आई थी कि ऑक्सीजन प्लांट लगाए जाय, ऑक्सीजन सिलिंडरों का बंदोवस्त किया जाय पर सरकार ने कहाँ कहाँ ऑक्सीजन के प्लांट्स का निर्माण किया ? एक वर्ष का समय कोई छोटा समय नहीं होता इतने समय में तो कितने ही स्थानों पर ऑक्सीजन प्लांट लगाए जा सकते थे। इस आधार पर कहा जा सकता है कि सरकार की पूर्व तैयारी अपर्याप्त ही है।
परन्तु अब भी तत्काल की इस समस्या के समाधान के लिए उपयुक्त व्यवस्थापन तथा पूर्ण क्षमता में उत्पादन ही है। अभी सरकारी और प्राइवेट प्लांट की चर्चा करने का समय नहीं है। देश के अंदर होनेवाले सभी ऑक्सीजन प्लांट्स से पूर्ण क्षमता का उत्पादन करना चाहिए। अगर जनशक्ति का अभाव है तो उसका उचित व्यवस्थापन करना चाहिए। हाँ अगर कुछ और सेवा सुविधाओं में वृद्धि करने की जरुरत है तो करें। सभी प्लांट्स को पूर्ण क्षमता से संचालित किया जाय। अगर मैं स्वास्थ्य मंत्री होता तो यही करता।

सीसीएमसी द्वारा विज्ञ जनों की बात न सुनने के कारण ऐसी अवस्था का सृजन हुआ है- गगन थापा

अभी ऑक्सीजन को लेकर मचे हाहाकार तथा क्या है उसका समाधान बिषय पर पूर्व स्वास्थ्य मंत्री गगन थापा का विचार कुछ इस तरह से है...

प्रथम तो यदि इस वक्त मैं स्वास्थ्यमंत्री होता तो..सबसे पहले देश के अंदर उत्पादन हो सकनेवाली क्षमता की मैपिंग करता। काठमांडू तथा काठमंडू से बाहर उत्पादन होनेवाली क्षमता के सम्बन्ध में जानकारी लेकर सभी क्षेत्रों में शत प्रतिशत क्षमता में ही उत्पादन करने कि किस्म से काम करवाता। उसके लिए जनशक्ति, पूर्वाधार तथा यदि कोई व्यवस्था की जरुरत होती तो करवाता।


दूसरा ऑक्सीजन कि आवश्यकता होनेवाले क्षेत्रों को प्राथमिकता के आधार पर रखकर काम करता। इसका तात्पर्य क्या है? शुरू में हमने आवश्यकता पड़ सकती है कहकर आइसोलेशन बनाये तथा वहां लेजाकर ऑक्सीजन को रखा मैं उसे रोकता।
तीसरा- इसके उपभोग के समबन्ध में भी कुछ समस्या है जैसा मुख्य लग रहा है। मुझे पता चला है कि कई अस्पतालों में ऑक्सीजन कि आवश्यकता न होने पर भी उसका प्रयोग किया जा रहा है, कितने ही स्थानों पर घर पर ही आवश्यकता न होने पर भी ऑक्सीजन का प्रयोग किया जा रहा है। उसका समुचित प्रयोग अगर किया जा सकता तो समस्या समाधान में सहयोग होता।
परन्तु दुर्भाग्य कि बात तो क्या है कि अभी सरकार को ये ही पता नहीं है कि आवश्यकता कितनी है तथा उसकी आपूर्ति कितनी हो रही है। अपने उत्पादन से समस्या का समाधान नहीं हो पायेगा आपूर्ति नहीं कि जा साकती ये पता चलने पर मैं पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट्स के साथ बैठकर इस तारिख तक मुझे इतनी ऑक्सीजन चाहिए, कब तक इसका उत्पादन बढ़ता जायेगा आदि विषयों का कैलकुलेशन करके पूरा न सकने की अवस्था में बाहर से लेकर भी आवश्यकता को पूरा करता।
अगली बात मैं अगर इस वक्त स्वास्थ्य मंत्री होता तो पहले ही इस समबन्ध में रिपोर्टिंग लेता। ऑक्सीजन प्लांट्स को बढ़ाने कि किस्म से काम कर चुकता। अभी शुरू करके भी 12 से 15 दिनों के अंदर ऑक्सीजन प्लांट का निर्माण कर चुकने की अवस्था है अभी। मैं होता तो अभी ही कम से कम 10 प्लांट्स का निर्माण आरम्भ करता। इसका तात्पर्य कि अगर मैंने वैशाख के दूसरे सप्ताह में ऑक्सीजन प्लांट की शुरुवात की होती तो अब तक कम से कम 10 नए ऑक्सीजन प्लांट्स बना चुका होता।
अभी के ऐसे समय में जहाँ जहाँ भी ऑक्सीजन प्लांट हैं उन्हें अपनी पूरी क्षमता का उत्पादन करना ही होगा।
पर यहाँ तो समस्या ये है कि सरकार को ये ही नहीं मालूम है कि मांग कितनी है और उसकी आपूर्ति कितनी है। अभी भी जिस तरीके से कोटा निश्चित किया जा रहा है उससे साफ जाहिर है कि इनकी पूर्व तैयारी पर्याप्त नहीं है, मांग और आपूर्ति का कितना क्या हिसाब है ये मालूम ही नहीं है।
मैंने अभी कल ही सीसीएमसी के ऑक्सीजन सेक्शन की देखभाल करनेवाले व्यक्ति की अन्तर्वार्ता पढ़ी थी जिसमें उल्लेख है कि अस्पतालों को जीतनी आवश्यक है उतनी ऑक्सीजन हम उपलब्ध कराएँगे। इसका तात्पर्य तो यही है की अभी तक भी हमारी मांग कितनी है तथा हमारा उत्पादन कितना है ये मालूम ही नहीं है। इसकी जानकारी होनेपर ही तो रिक्तता का ज्ञान होगा और उस रिक्ततात हो हटाने के किस्म से योजना बनेगी अब अगर उसकी जानकारी ही नहीं है तो कैसे किया जा सकेगा व्यवस्थापन ?
जिस वक्त ऑक्सीजन उत्पादक, स्वास्थ्य मंत्रालय के प्रतिनिधि तथा सीसीएमसी के मित्रों कि बैठक हुई उस समय स्वास्थ्य मंत्रालय के प्रतिनिधियों ने हमारा उत्पादन समुचित है हमें मात्र सिलिंडरों की जरुरत है कहा।
हम सबने महज खबर पढ़ी मगर वास्तविक बात से सभी अनजान ही बने रहे। अगर उसी समय तथ्य बात मालूम होती तो स्थिति अभी कुछ और ही होती।  
मैंने तो आरम्भ से ही कहा था कि कार्य योजना बनाते समय अभी कि अवस्था देखकर नहीं बनानी चाहिए यदि साकार ने जन स्वास्थ्य के जानकर व्यक्ति, संक्रामकरोग के जानकर व्यक्तियों से बातचीत कि होती तो हमें वैशाख के अंत तक कितने सिलिंडर चाहिए होंगे, और क्या क्या व्यवस्थापन करना होगा ये बाते पहले ही स्पष्ट हो चुकी होती। तब सारी बातें एक महीने पहले ही पता होती।
परन्तु यहाँ हुआ क्या ? एक महीने पहले जन स्वास्थ्यविदों से पूछना चाहिए पर ईश्वर पोखरेल जी ने ऑक्सीजन उत्पादक मित्रों को बुलाकर बात कि उन लोगों ने इतना उत्पादन है की जानकरी दी। तब मंत्री जी ने उद्योग धंधों को ऑक्सीजन मत बेचिये का फरमान मात्र सुनाया गया नए उत्पादन की ओर ध्यान ही नहीं गया।  
कोरोना का उपचार ही ऑक्सीजन है अब तो अस्पताल भी क्या कहने लगे है की आपका बीमार तो हम रख लेंगे परन्तु ऑक्सीजन की व्यवस्था आप खुद ही कीजिये। उसके पास बेड हैं परन्तु ऑक्सीजन वह नहीं दे सकता।
अभी ऑक्सीजन अभाव का एक मात्र कारण है हमने सीसीएमसी में ऑक्सीजन उत्पादक कंपनियों से मात्र बातचीत की। हमें ऑक्सीजन उत्पादन करने में सक्षम हैं की गलत ब्रीफिंग की गई। उस समय कुछ सिलिंडरों को और लाने से सब पर्याप्त होगा की गलत सलाह दी गई। इस वजह से ही ये समस्या आई है। ये संक्रमण अभी भी बढ़ सकता है इस कारण तत्कालीन तथा दीर्घकालीन योजना बनाकर ऑक्सीजन उत्पादन के लिए प्लांट निर्माण करना ही होगा।

अंत में कवि अर्जुन पराजुली की एक कविता
सरकार !
तेरो पानी जहाज लैजा (अपना पानी जहाज ले जाओ)
चुच्चे रेल लैजा (नुकीली रेल ले जा)
तेरो स्मार्ट सिटी लैजा (अपना स्मार्ट सिटी ले जाओ)
समृद्धिको भेल लैजा (समृद्धि कि बाढ़ ले जा)
तेरो उद्घाटन लैजा, शिलान्यास लैजा (अपना उद्घाटन ले जाओ, शिलान्यास ले जाओ)
पाइपबाट घर घरमा ल्याएको ग्यास लैजा (पाइप से घर घर में पहुंचाई गैस ले जा)
मेरो बाको औंठी लैजा, घड़ी लैजा (मेरे पिता की अंगूठी ले जा, घडी ले जा)
मेरी आमाको तिलहरी लैजा (मेरी माँ का मंगलसूत्र ले जा)
सरकार !
यी सबको बदलामा तैंले (इन सबके बदले में तू)
मलाई एक सिलिंडर ऑक्सीजन दे (मुझे एक सिलिंडर ऑक्सीजन दे)

कमेन्ट

Loading comments...