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सम्पदा नंबर 1 : व्यक्ति कि धरहरा ?

person access_timeMay 09, 2021 chat_bubble_outline0

'हमने साझा संकल्प किया तो धुल झाड़ता हुआ धरहरा फिर से उठ खड़ा होगा। '(11 जेठ 2072, नया पत्रिका)

शायद इस विचार का लाक्षणिक अर्थ होगा। भग्न धरहरा को यहाँ एक प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिस की गई है। इसी कारण धूल झाड़ते हुए धरहरा के उठने का प्रसंग भग्नावशेषों से जीवन के उठने का संकेत भी हो सकता है।

नया पत्रिका के पहले ही पेज पर इस विचार के पास ही धरहरा की सुन्दर विशाल तस्वीर है। तो फिर कल का धरहरा? कल का धरहरा नया पत्रिका की 'कल्पना की' तो भी ये अनिश्चय बोध की 'कल्पना' के गर्भ में है। इस अनिश्चय के गर्भ से धरहरा का जन्म हो भी सकता है नहीं भी हो सकता।

बलशाली भूकंप ने वृद्ध मठ, मंदिर तथा स्मारकों को ढहाने के बाद अभी खुसुर पुसुर रूप में दिवंगत धरहरा की चर्चा सुनाई पड़ रही है। वह धरहरा जो बना था इंजीनियर, कारीगर, श्रमिक तथा कुली लोगों के संयुक्त संयंत्र से तथा जिसकी छाती पर छपी थी भीमसेन थापा के नाम की नकली की छाप।

चारों और इस चर्चा को सुनने पर ऐसा आभास हुआ है की शायद धरहरा भग्न एवं प्राचीन सांस्कृतिक सम्पदाओं का प्रतिनिधि पात्र है। मनों कि उन सभी का नाभि स्थल, मनु सभी का हंस, मानों उन सभी की प्राण वायु। इसी लिए ऐसा शायद धरहरा का उठना इन सभी प्राचीन सांस्कृतिक सम्पदाओं के भग्नावशेषों का उठना है। मानों की धरहरा का उठान विनाशकारी भूकंप के द्वारा धुल धूसरित किये गए मानव जीवन का भी इसके साथ साथ उठना है। माना कि धरहरा उठेगा और उसके उठने से अभिप्रेरित होकर उसका अनुशरण करते हुए गिरे पड़े और सभी समृद्धि के प्रतीक स्थल, वस्तुएं फटाफट उठने लगेंगी।

धरहरा के सम्बन्ध में मेरी (लेखक की) कुछ स्मृतियाँ हैं। बहुत पुरानी तथा अविस्मरणीय स्मृतियाँ।

24 साल में 24 रुपये का ही टिकट लेकर विराटनगर से 'फलामचरी' (हवाईजहाज) में फुर्र से उड़कर मैं काठमांडू आया। नेपाल गड्ढे के आकाश से नीचे देखने पर मेरी आँखों के नीचे आनेवाली पहली चीज थी- धरहरा ! वाऊऊऊ ,वह गगनचुम्बी इमारत कितनी ऊँची !!

कुछेक दिनों के बाद जमीन पर खड़े होकर अपनी गर्दन को उठाकर धरहरा को देखा। ऊऊऊऊओ ये गगनचुम्बीमृत कितनी ऊँची ! और उसकी ऊंचाई के सम्मुख मेरा छोटापन कितना बौना ! थोड़ी को उठाकर देखता हूँ वह कितना दूर है- वास्तव में ही गगनचुम्बी ! और मैं, मैं तो धरती की धूल से सत्ता लिलिपुट मानव ! उसके बाद उसे नीव से ही देखने का मुझे न जाने कैसे साहस आया। लगा कहीं इसकी ऊंचाई मुझे 'उड़ा' तो नहीं रही।

उस समय धरहरा आरोहण बंद था। उस पर चढ़कर उसके उच्च शिखर पर पहुंचकर नीचे की अपने खड़े होनेवाली धुल को देखने की मुझे बहुत ही बड़ी अभिलाषा थी, परन्तु मौका नहीं मिल सका।

बाद में बहुत बाद में चढ़कर उसके बुर्ज पर पहुँचने के लिए धरहरा का द्वार खुला। अपनी बनावट तथा आयु के हिसाब से ये गगनचुम्बी इमारत जीर्ण हो चुकी थी। अब गिरूं की तब गिरूं जैसा। उस वृद्ध जराजीर्ण इमारत पर चढने में मुझे न जाने क्यों डर सा लगा। वास्तव में आरोहण के लिए इसको खोलना बिलकुल ही अनुचित तथा अनैतिक कर्म था। ये असंवेदनशील तथा अमानवीय कृत्य भी था।

परन्तु, क्या हो सकता है इस धरती के लोभी शासकों के लिए मनुष्य के जीवन से पैसे की कीमत कितनी अधिक कितनी अधिक !! उनके लिए लोकहित की अपेक्षा अपना निजी स्वार्थ कितना प्रिय कितना प्रिय !! इन लोगों द्वारा अपने लोभ की प्यास को मिटाने के लिए धरहरा आरोहण पर टिकट का व्यापार शुरू किया। और, अभी भूकंप की मार से धराशायी हुए धरहरा में शासकों की प्रलोभन की बलिवेदी पर कितने ही लोगों की जान चली गई।

लोभी लोगों के द्वारा जीर्ण धरहरा पर आरोहण का व्यापार शुरू किये जाने पर संवेदनशील तथा करुणामय सजग नागरिक अपने कानों में तेल डालकर मौन अवश्य भी नहीं बैठे थे इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण गौतम दंगल की संघर्ष कथा है।

कथा कहती है- बात 2055 साल की है। नगरपालिका के अफसर हो चुके राष्ट्रीय गफाडी केशव स्थापित ने धरहरा आरोहण कराने की जिम्मेदारी साइड वकर्स को दी। इस जराजीर्ण इमारत का दक्षिणी-पश्चिमी हिस्सा नंगी आँखों से देखने पर भी बड़ी आसानी से देखा जा सकता हठा जो बुरी तरह चरका हुआ था। डंगोल महोदय ने आरोहण को रोकने के लिए पुरातत्व विभाग के सम्मुख निवेदन किया, अदालत से विनती की। परन्तु उनकी पुकार की कहीं भी सुनवाई नहीं हुई। इन हालातों से क्रुद्ध हुए डंगोल सड़क पर निकले और उन्होंने बहुत बुरी तरह से पुलिस की मार खाई। 'नरपीड़कों' की मासिक 2 लाख 50 हजार के लोभ की जीत हुई न्याय का संघर्ष हार गया। नतीजा जो हुआ उसकी विद्रूप कहानी धरहरा का भग्नावशेष चिल्ला चिल्लाकर जगत को सुना रहा है। 

इधर धरहरा के धूल धूसरित होने से 155 लोगों की एक ही बार में जान गई। उधर उनको मारने का प्रपंच रचनेवाले निडर होकर छाती फुलाकर सड़क पर घूम रहे हैं। आखिर जंगल के राज्य में न्याय सदैव ही पराजित न होता है !

अब विषय उठता है धूल में मिले धरहरा के पुनर्जीवन का।
दिन रात धरहरा की महिमा का गान गानेवाले एक किस्म के लोग आज भी धरहरा को आज ही बनाने, कल ही बनाने के लिए आतुर हैं। मानों कि इस देश की प्राणवायु ही धरहरा के भग्नावशेष में ही अटकी हुई है जिसका उद्धार जितना जल्द किया जाय उतना ही शीघ्र देश के आत्मिक स्वास्थ्य को लाभ पहुंचेगा। पुनर्निर्माण की सूची में इन लोगों की पहली और अनिवार्य प्राथमिकता धरहरा है मात्र धरहरा। कांच के पर्दों पर (टेलीविज़न) जरा जरा सी देर में काठमांडू घाटी के मन को ही द्रवित करनेवाले प्राचीन महत्व के भग्नावशेषों के दारुण दृश्यों को दिखाए जाने पर सबसे पहले गिरकर बांकी रहे धरहरा का ही विद्रूप ठूठ सामने आता है। दृश्य में धरहरा के इस ठूठ के साथ सेल्फी खींचनेवाले आत्ममुग्ध लोग भी दिखाई देते है। धरहरा के भग्नावशेष पर हाय हाय धरहरा ओये ओये धरहरा जैसे खिन्न स्वर तरंगित होते रहते हैं।

परन्तु आश्चर्य, उम्र मानों की पूरी कर चुका धरहरा जो ढलने को उन्मुख ही था उसके भग्नावशेषों में अकाल में ही अपना जीवन गँवानेवाले 155 लोगों की चर्चा कहीं भी जरा सी भी नहीं सुनाई पड़ती, मानों कि वे सब भग्नावशेष में दबकर मरने के लिए अभिशप्त धूल के कण हैं। मानों कि वे सब मूल्यहीन और अर्थहीन जीव हैं।

धरहरा में हृदय विदारक कोलाहल और चीत्कार के बीच जिसने जीवन गंवाया उनका भी कोई अपना तो होगा। वे भी किसी के भविष्य कि आशा रहे होंगे तो किसी के वर्तमान का भरोसा। वे किसी के अभिभावक होगों तो किसी के प्रेमी-प्रेमिका। अभी वे सब कहाँ रो रहे हैं ? उन्हें समझने वाला कोई भी नहीं है। उनका हिसाब किताब रखनेवाला कोई नहीं है। जो भी बोल रहे हैं उन सबकी रूचि में ख़ुशी में मात्र धरहरा है। उन सबकी चिंता में केवल धरहरा है। उन सभी के जिव्ह्याग्र पर हाय हाय धरहरा, ओये ओये धरहरा, ऐय्या ऐय्या धरहरा, मरें मरें धरहरा का अटूट राग रटन है।

हम लोगों के पास साधन सीमित है, श्रम सीमित है। इसीलिए मैं कहता हूँ- भग्न धरहरा के जग से अभी जल्दबाजी में धरहरा के पुराने रूप के समान ही ऊँचे गगनचुम्बी ईमारत को न उठायें। अतीत के स्मरण तथा सम्मान के लिए धरहरा का छोटा सा प्रतीक रूप बनाकर भी इसे सम्मानित किया जा सकता है। उस प्रतिरूप के आस-पास एक पुष्प बाटिका हो उसके ही समीप एक बड़े से स्तूप पर (शिलालेख पर) धरहरा के गिरते समय उस पर रहे उन 155 लोगों के नाम और तस्बीरों को खुदवाएं जिन्होंने धरहरा के साथ ही अपने भी प्राण त्यागे थे। आनेवाली पीढ़ियां अनुकूल और समृद्धि के समय पर इच्छा होने पर उतने ही बड़े धरहरा का निर्माण करवाएंगे, इच्छा न होनेपर उसी प्रतिरूप धरहरा से मन बहलायेंगे। धरहरा तो ऐसे भी कविता, गीत-गाना, और गजलों में तो जीवित रहेगा ही।

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