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ओली देश और जनता के साथ खतरनाक खेल खेल रहे हैं

person access_timeMay 05, 2021 chat_bubble_outline0

कोविड- 19 के कारण देश में गंभीर महामारी की स्थिति बनने की अवस्था है। अभी से ही देश के अस्पतालों में ऑक्सीजन, वेंटिलेटर, शैया तथा आवश्यक औषधियों का अभाव आरम्भ हो गया है। ये प्रारंभिक अवस्था है। अगर ये स्थिति बढ़ती गई तो कितनी ही भयानक अवस्था होगी ? इसे सोच पाना भी मुश्किल है। ऐसी अवस्था में देश को कोरोना वायरस के नियंत्रण हेतु सभी संभव उपायों को अपनाना आवश्यक है ये बिलकुल ही स्पष्ट तथ्य है। अगर ऐसा न हुआ तो देश और जनता को इसका बहुत बड़ा खमियाजा भुगतना पड़ेगा जिसके साथ ही इससे भविष्य में भी व्यापक क्षति होने की बात भी स्पष्ट ही है।

ये बताते रहने कि आवश्यकता भी नहीं है कि इस किस्म की बिकराल स्थिति में समस्या समाधान के लिए देश में स्वास्थ्य सम्बन्धी संयंत्र तथा साधनों की बहुत ही कमी है। अतः इस किस्म की व्यवस्था के लिए सरकार को सभी किस्म के स्रोतों तथा साधनों का प्रयोग करने की जरुरत है। परन्तु मजे की बात तो ये है कि इस और ध्यान देने की बजाय देश की सरकार का ध्यान मध्यावधि चुनाव की और केंद्रित हो रहा है। अभी सरकार की सारी गतिविधियां मध्यावधि चुनाव की और आकर्षित तथा केन्दित हुई दिखाई पड़ रही हैं। जिस चुनाव के लिए अरबों रुपये खर्च करने होंगे।

हमारा जोर इस बात पर है  कि अभी की देश की आवश्यकता मध्यावधि चुनाव न होकर देश को कोरोना महामारी के कारण उत्पन्न हुए संकट से बचाना है। सरकार द्वारा मध्यावधि चुनाव के लिए कहकर जो खर्च अलग किया गया है तथा राज्य यंत्र को प्रयोग करने की योजना है उन सभी को कोरोना वायरस के विरुद्ध तथा वायरस से आ सकनेवाले खतरे के नियंत्रण पर प्रयोग कराने की आवश्यकता पर ही नेकपा (मशाल) गंभीरतापूर्वक जोर देती है। स्थिति की गंभीरता के अनुरूप उससे भी अधिक बजट, स्रोत तथा साधनों को जुटाने पर बल देने की जरुरत है।

इस प्रकार की पृष्ठभूमि में सरकार को विश्वाश का मत प्राप्त करने के लिए इसी वैशाख 27 गते बुलाये गए संसद के विशेष अधिवेशन की तरफ हमारी पार्टी का ध्यान गया है।

सामान्यतः नीतिगत रूप में सरकार द्वारा विश्वास का मत प्राप्त करने के लिए की गई पहलकदमी को हम गलत नहीं मानते हैं ये प्रक्रिया प्रजातांत्रिक प्रणाली अनुरूप तथा संविधान सांगत है। परन्तु प्रश्न है कि इसके माध्यम से ओली सरकार किस प्रकार का उद्देश्य पूरा करना चाहती है ? इस प्रश्न का भी विशेष महत्व है। कहीं उसका उद्देश्य संसद को संवैधानिक तथा प्रजातान्त्रिक पद्धति से आगे बढ़ाना न होकर संसदीय प्रणाली पर ही प्रहार करना अथवा पुनः मध्यावधि चुनाव के लिए पृष्ठभूमि तैयार करना तो नहीं है ? इसमें भी शंका करने का यथेष्ठ स्थान है।

ओली सरकार का संसद का विघटन करने का काम असंवैधानिक, अप्रजातांत्रिक, अधिनायकवादी तथा प्रतिगामी था। सर्वोच्च के द्वारा भी उसे असंवैधानिक घोषित किया गया है। ऐसी अवस्था में नैतिकता के आधार पर ओली को प्रधानमंत्री के पद से इस्तीफ़ा देना तथा संसद को सुचारु रूप से चलने के लिए मार्ग प्रशस्त करना ही सही होता। परन्तु सर्वोच्च के फैसले के बाद भी वे निरंतर संसद को असफल बनाने के लिए योजनाबद्ध तरीके से प्रयत्न करते आ रहे हैं। वे संसद को विजनेश नहीं दे रहे हैं तथा उसकी एक भी बैठक में वे उपस्थित नहीं हो रहे हैं।  

सर्वोच्च के फैसले के विपरीत अपनी पहले की संसद के विघटन के कार्य को लगातार संवैधानिक कदम बताते आ रहे ओली मध्यावधि चुनाव पर जोर देते आ रहे हैं। उनकी ये सारी कार्यविधि संविधान की स्पिरिट के विरुद्ध होने के साथ ही सर्वोच्च के फैसले की अवहेलना भी है।

 

ओली द्वारा अपनाई  जा रही समस्त कार्यविधियों से इस बात को समझाना मुश्किल नहीं है कि वे जनांदोलन की उपलब्धियों को देश तथा जनता के बृहत्तर हित पर ध्यान देकर नहीं बल्कि अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा तथा अपनी सत्ता की रक्षा को केंद्र में रखकर अपनी सभी नीतियों तथा गतिविधियों को संचालित करते हैं। उनकी इस प्रकार की ये गतिविधियां देश को कहाँ पहुंचाएगी इसका अनुमान भी लगाना मुश्किल है।

हम पहले से ही इस बात पर बार बार जोर देते आ रहे थे कि पूर्व नेकपा की फूट देश और जनता, गणतंत्र, राष्ट्रीयता, धर्म निरपेक्षता आदि के हित में नहीं होगी। नेकपा को हमने कम्युनिष्ट पार्टी नहीं माना था तथा उसके साथ हमारे गंभीर प्रकार के सैद्धांतिक और राजनीतिक मतभेद थे। फिर भी हम देश तथा जनता के व्यापक हित पर ही उसकी एकता के कायम रहने की आवश्यकता पर जोर देते आये थे। परन्तु अंत में उसमें फूट आई, विभाजन हुआ। नेकपा में इस प्रकार की फूट का सृजन करने में मुख्य रूप से ओली की व्यक्तिवादी तथा स्वेच्छाचारी कार्यशैली ही जिम्मेदार है।

ये बात भी अब स्पष्ट हो गई कि विभिन्न साम्राज्यवादी शक्तियां अमेरिकी तथा भारतीय साम्राज्यवादी शक्तियां अपने निहित स्वार्थ की पूर्ति हेतु पहले से ही नेकपा में फूट डालने का प्रयास कर रहे थे साथ ही देश की प्रतिगामी शक्तियां भी नेकपा में फूट देखना चाहते थे। अंततः नेकपा को तोड़ने के लिए ओली, विदेशी साम्राज्यवादी और नेपाल की प्रतिगामी शक्तियां इसका निमित्तिक कारण बनी।

सर्वोच्च के फैसले के कारण उनका संसद विघटन का काम सफल न हो सका परन्तु नेकपा में फूट डालकर जो गंभीर चोट की गई थी उससे संसद की पुनर्स्थापना के बाद भी वो चोट ठीक न हो सकी। अभी भी संसद में किसी भी एक दल की सरकार बनने की स्थिति नहीं है।
संसद की उस कमजोर स्थिति का फायदा उठाकर ओली खेल खेलने का मौका पा रहे है। संसद की इस कमजोर स्थिति का फायदा उठाते हुए उनके इस तरह की योजना बनाकर काम करने की संभावना को नकारा नहीं जा सकता। वे अगर विश्वाश का मत प्राप्त नहीं भी कर पाते हैं तो भी वैकल्पिक बहुमत की सरकार नहीं बन सकती है। ऐसी अवस्था में संसद के सबसे बड़े संगठन की हैसियत से पुनः वे ही प्रधानमंत्री बनेंगें तथा उनके नेतृत्व में ही मध्यावधि चुनाव होगा।

अभी प्रतिपक्ष के दलों में नेका तथा मधेशवादियों के भी कितने ही पक्षों को अपने पक्ष में मिलाने में सफल होने के कारण भी उनके द्वारा इस किस्म की योजना बनाकर काम किया गया हो सकता है। ये बताये जाने की आवश्यकता ही नहीं है कि अगर उनकी ये योजना सफल हो जाती है तो देश को बहुत बड़ी तथा दूरगामी क्षति होगी।

हमारा ये स्पष्ट विचार है कि नेकपा की फूट के कारण ही अभी की अस्थिर राजनीतिक स्थिति उत्पन्न हुई है। जिससे देश में विदेशी साम्राज्यवादी शक्तियां तथा देश के अंदर की प्रतिगामी शक्तियों को खेलने का मौका मिल रहा है। इसीलिए अभी की स्थिति में समाधान के लिए नेकपा का एकीकरण अथवा अगर इसकी संभावना नहीं है तो उसके विभाजित अलग अलग समूहों के बीच कार्यगत एकता अथवा संयुक्त मोर्चा निर्माण होने की आवश्यकता पर बल देते आये हैं अभी भी देंगे।

परन्तु उसके लिए ओली का बहिर्गमन निर्णयात्मक बात है इस तरह बनानेवाली बामपंथी सरकार ही अभी का सबसे बड़ा सही समाधान है। परन्तु ये भी स्पष्ट है कि ओली इस तरह के बामपंथियों के एकीकरण अथवा संयुक्त मोर्चे को सफल नहीं होने देंगे। ऐसी अवस्था में पूर्व नेकपा के विभाजित सभी पक्षों में दृढ तथा उच्च चेतना व मनोबल के आधार पर ही अभी की स्थिति में ओली को हटाकर वामपंथी सरकार का निर्माण किया जा सकता है। 
हमारी पार्टी ओली के प्रतिगामी कदम के विरुद्ध होनेवाली राजनीतिक शक्तियां माओवादी, नेका तथा मधेशवादी आदि के सहकार्य पर जोर देती आई है। ये लोग आपस में कार्यगत एकता करके ओली सरकार को अपदस्थ कर सके तथा उस स्थान पर वैकल्पिक सरकार का निर्माण कर सके तो तत्कालिक रूप में ये भी एक वैकल्पिक समाधान हो सकता है। निश्चय ही इन विभिन्न राजनीतिक शक्तियों के साथ हमारा पहले से ही गंभीर राजनीतिक मतभेद है। हम उनके साथ अपने मतभेदों को आवश्यकतानुसार संचालन करने की नीति को सुरक्षित रखकर ओली सरकार के विरुद्ध सहकार्य में समर्थन करने की हमारी नीति होगी।

उन लोगों के सहकार्य में बनने वाली सरकार से देश समस्याओं का वास्तविक समाधान होगा ऐसा हमारा सोचना नहीं है परन्तु फिर भी तात्कालिक रूप में उससे ओली के प्रतिगामी कदम को आंशिक रूप में ही सही रोका जा सकेगा, ये सोचकर हम उनका साथ सहकार्य करने पर जोर दे रहे हैं। हमारी ये नीति मतभेद अथवा संघर्ष के बीच भी एकता की नीति है।

अंत में हम जनता के वृहत्तर हित, गणतंत्र, राष्ट्रीयता और धर्म निरपेक्षता आदि के पक्ष में उच्च प्रकार की सतर्कता अपनाने के लिए साथ ही व्यापक ऐक्यबद्धता कायम करने के लिए सभी राजनीतिक शक्तियां, संघ-संस्था, अथवा सम्पूर्ण जनता का गंभीर ध्यानाकर्षण कराना चाहते हैं।

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