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हिन्दू सेंटीमेंट को खींचते हुए प्रधानमंत्री केपी ओली, राप्रपा से खुलते एजेंडे

person access_timeApr 25, 2021 chat_bubble_outline0

रातोपाटी

काठमांडू। राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी द्वारा जबरजस्त रूप में आगे बढ़ाया हुआ हिन्दुत्व का एजेंडा खिसकने की जैसी अनुभूति होने लगी है। राप्रपा के एजेंडे को एमाले अध्यक्ष कामरेड केपी ओली के द्वारा छीनने की चेष्टा किये जाने की बात करते हुए राप्रपा के नेता चिंता व्यक्त करने लगे हैं।

प्रधानमंत्री केपी ओली एक के बाद दूसरा कार्यक्रम करते हुए हिन्दू जनमत को अपनी और आकर्षित करने में जुटे हैं। पिछले समय में जिसके कारण राप्रपा मात्र सशंकित ही नहीं हुई है बल्कि उस पार्टी के जिम्मेदार नेता सार्वजनिक रूप में कटाक्ष ही करने लगे हैं। 

इसी सप्ताह केपे ओली द्वारा बालुवाटार में राम लक्ष्मण सीता तथा हनुमान की मूर्तियों का पूजा बगैरा किये जाने के दिन ही राप्रपा अध्यक्ष कमल थापा द्वारा किये गए ट्वीट में भी राप्रपा नेताओं की चिंता अभिव्यक्त होती है। अध्यक्ष थापा ने लिखा था-

''हिन्दू राष्ट्र की पहचान को ख़त्म करके धर्म परिवर्तन के विदेशी एजेंडे का कार्यान्वयन करनेवाले, धर्म को अफीम कहनेवाले, ईश्वर के अस्तित्व को नकरनेवाले, संस्कृति तथा परम्पराओं का विनाश करनेवाले कम्युनिष्ट / मार्क्सवादियों को मठ मंदिरों के प्रति कृत्रिम चुनावी मोह मात्र नहीं बल्कि देश में पुनः हिन्दू राष्ट्र स्थापना का साहस दिखाने का आग्रह करता हूँ।'

राप्रपा अध्यक्ष डॉ प्रकाश चंद्र लोहिनी ने मार्क्स और माओ की मूर्तियों के साथ राम और हनुमान के मंदिर भी ओली ही बनवाना चाहते हैं कहते हुए कटाक्ष किया है। उन्होंने कवितात्मक शैली में व्यंग्य किया है।

लोहिनी की ये अभिव्यक्ति कह रही है की जैसे राप्रपा दबाव में आ रही है। होने को भी तो हिन्दू राज्य के एजंडे को लेकर ही 2070 में दूसरी संविधान सभा निर्वाचन से इस पार्टी ने 25 सीटों पर विजय पाई थी। परन्तु सत्ता राजनीति में फसने पर इस एजेंडे को भलीभांति आगे बढ़ा न सकने के कारण पार्टी को 2074 साल के चुनाव में 1 सीट पर सिमटकर रह जाना पड़ा था। पिछले समय हिंदुत्व के एजेंडे को आगेबढ़ने के लिए कोई भी उल्लेखनीय अभियान संचालन न करने के कारण राप्रपा रक्षात्मक अवस्था में पहुँच गई है।

हिन्दू सेंटीमेंट बटोरते ओली

पिछले पौष 5 गते संसद को भंग करके केपी ओली ने देश भर में अपने विरुद्ध परिस्थितियों को उत्पन्न कर लिया था परन्तु बड़ी सतर्कता से इस अवस्था को नियंत्रण में लेने के लिए उन्होंने, हिन्दू सेंटीमेंट को खींचने के लिए धर्म के पासे को फेका, उन्होंने धार्मिक गतिविधियों का संचालन आरम्भ किया। भले ही वे अभी तक हिन्दू राष्ट्र के पक्ष में मुंह न खोल चुके हों परन्तु उनकी गतिविधियां चीख चीखकर इसका प्रमाण दे रही हैं। 

संसद भंग करके दो चरणों में चुनाव की घोषणा करनेवाले ओली तथा ओली सरकर के विरुद्ध जनमानस में गहरी विरोधात्मक स्थिति पैदा हुई ऐसे समय में उन्होंने जनता के ध्यान को विकेन्द्रित करने के लिए पशुपति में जलहरी रखने के लिए आर्थिक सहयोग की घोषणा करते हुए नारायणहिटी के आँगन में शक्ति का प्रदर्शन कराया। ओली की ही पार्टी के नेताओं के अनुसार ओली के वहां से हिन्दू राष्ट्र के बारे में बोलने की अभिव्यक्ति दी गई परन्तु ओली ने वैसा तक तो नहीं किया परन्तु हिन्दू जनमत बटोरने का अपना प्रयास जारी रखा। उसी के सिलसिले में उन्होंने कभी राम का जन्म ठौरी में होने का भाषण दिया तो कभी उस स्थान पर राम सीता के मंदिर प्रतिस्थापन का निर्णय लिया। इतना ही नहीं आजकल तो कामरेड ओली हिन्दू दर्शन और मूल्य मान्यताओं के लम्बे लम्बे प्रवचनों को देने के काम को भी निरंतरता दे रहे हैं। 

पशुपतिनाथ मंदिर को 30 करोड़

देश जबकि राजनीतिक अस्थिरता, राजनीतिक संकट के दौर से गूजर रहा है ऐसे में देश के प्रधानमंत्री मंदिर दर्शन को जाते हैं वहां पूजा अभ्यर्थना के बाद मंदिर में सोने की जलहरी रखने के लिए 30 करोड़ का आर्थिक सहयोग सरकार की और से देने का एलान करते हैं।

ओली की अगुवाई में मंदिर में 141 किलो सोने की जलहरी राखी जाती है अनेक विवादों के बीच ओली अपनी इच्छा को पूर्ण करते है। धार्मिक अनुष्ठानों के क्रम में आरम्भ में ही वे 51 हजार रुपये खर्च करके लाख बत्ती जलाने का कार्यक्रम रुद्राभिषेक आदि कराते हैं। 

ओली के पशुपति दर्शन को राजनीति से जोड़कर उस समय भारतीय अखबारों ने लिखा भी था अपने सम्पादकीय में- ''सत्ता को बचाने के लिए ओली ने खेला हिन्दू कार्ड।'

पचास वर्ष से भी अधिक के अपने राजनीतिक (कम्युनिस्ट) जीवन में स्वयं को नास्तिक बताते आनेवाले ओली द्वारा धर्म की तुलना अफीम से किये जाने का भी उल्लेख किया है।

कुर्सी के डांवाडोल होने के संकेत को पाते ही ओली ने कट्टर कम्युनिस्ट के चोले पर धार्मिकता (हिंदुत्व) का रंग भरना शुरू कर दिया। 

नारायणहिंटी के सामने सभा

ओली ने माघ 23 गते नारायणहिटी के सामने आमसभा की थी जहाँ से उन्होंने जनता को सम्बोधित किया था।  तत्कालीन नेकपा के नेता सुरेंद्र पाण्डे ने उस समय कहा भी था कि ओली सार्वजनिक रूप में ही हिन्दू राष्ट्र की घोषणा करने जा रहे हैं। परन्तु ओली ने खुद के गणतंत्र समर्थक होने कि बात कहकर उस अभिव्यक्ति को रद्द कर दिया था। ओली जो कहें इससे फर्क नहीं पड़ता परन्तु वर्तमान में उनके काम उनकी क्रियाये तथा गतिविधियां हिन्दू जनाधार को अपने पक्ष में खींचने की ओर अभिमुख हैं।

एक ओर देश भर में कोरोना महामारी की मार है दूसरी ओर बालुवाटार से सीताराम की शोभायात्रा का समारोह किया जाता है। चितवन के माडी में विशेष समारोह के बीच मंदिर में मूर्ति स्थापना कार्यक्रम होता है।

ओली किसी भी स्थान के निर्माण शिलान्यास को नहीं छोड़ते हर जगह पंडित के साथ बैठकर पूजा पाठ करते हैं। इतना ही नहीं अब तो वे हिन्दू धर्म और संस्कृति पर आधारित लम्बे लम्बे भाषण भी देने लगे हैं।

सौ बातों की एक बात-

फाल्गुन 11 के सर्वोच्च अदालत के फैसले से एमाले बन जाने के बाद भी ओली अपने हिन्दू कार्ड की राजनीति को त्याग नहीं सके हैं, ऐसा दिखाई दे रहा है। उनकी बोली में भले ही परिवर्तन का आलाप हो परन्तु अंदर ही अंदर हिन्दू राष्ट्र को बल मिलने की किस्म से वे गतिविधियां कर रहे हैं- एमाले के एक नेता ने बताया। उनका आरोप है कि प्रतिनिधि सभा विघटन जैसी प्रतिगामी कदम उठानेवाले ओली की सोच भी प्रतिगामी ही है। ''ओली अपने पक्ष में जनमत एकत्रित करने के लिए अनेक हथकंडों को अपना रहे हैं वे अभी हिन्दू राष्ट्र और राजतन्त्र आदि के एजेंडें में खुल नहीं सके हैं परन्तु अंत में अपने राजनीतिक फायदे के लिए वे हिन्दू कार्ड को फेकने से भी पीछे नहीं हटेंगे।' भारतीय प्रधानमंत्री मोदी ने अपने फायदे के लिए हिंदुत्व के कार्ड का जिस तरह प्रयोग किया है ओली उसी रास्ते पर जाने का प्रयास कर रहे हैं।

कांग्रेस में भी हिंदूवादियों की काफी है धार

ओली के द्वारा हिंदूवादी गतिविधियों के करते रहते उधर कांग्रेस में भी हिन्दू राष्ट्र होना चाहिए कहनेवाले एक धार के लोग हैं। इस सम्बन्ध में कांग्रेस के महामंत्री शशांक कोइराला तो सार्वजनिक रूप से ही इस विचार को व्यक्त करते आये हैं। यद्यपि कांग्रेस ने खुलेआम इस किस्म की गतिविधियों को करना आरम्भ नहीं किया है। 

राप्रपा को एजेंडा बचाने की चिंता

राप्रपा के नेता अपनी अपर्ति के नेतृत्व में आया विचलन, सत्ता स्वार्थ तथा एजेंडे को सही रूप से 'क्यास' न कर सकने के कारण समस्या आने की बात स्वीकार की है। यद्यपि हिंदुत्व के एजेंडे के प्रति राजनीतिक स्तर पर सामूहिक सहमति होती गई तो ये बात पार्टी के लिए ख़ुशी का विषय होने की बात कहना नेता नहीं छोड़ते हैं।

राप्रपा के नेता दिलनाथ गिरी ने पार्टी ने हिंदुत्व अर्थात हिन्दू राष्ट्र के एजेंडे को सही रूप से 'क्यास' न कर सकने की कमी को स्वीकार करते हुए कहा कि इसका कारण नेतृत्व की कमी है। पार्टी को गतिशील बनाने के लिए स्पष्ट रणनीति और कार्यनीति बनाने की जरुरत बताते हुए विगत में हुई गलतियों से सबक लेते हुए उन्हें सुधारने तथा एजेंडे को बचाने पर जोर दिया। 

राप्रपा के नेता रामाराम बर्तौला ने कहा- हिंदुत्व के एजेंडे के प्रति साझा सहमति बनती गई तो ये पार्टी के लिए ख़ुशी की बात होगी। 'हिंदुत्व के एजेंडे के प्रति साझा समहति बनती गई तो ये हमारे लिए ख़ुशी की ही बात होगी,' परन्तु 'ये गतिविधि किसी के द्वारा भी मात्र दिखाबा न हो।'

उन्होंने राप्रपा के हिंदुत्व के एजेंडे के प्रति प्रतिबद्ध होने पर भी कुछेक लोगों द्वारा फैलाये गए भ्रम को चीर न सकने के कारण पार्टी के प्रति नकारात्मक सन्देश जाने का जिक्र किया।

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