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अन्तर्वार्ता

भारत के साथ संबंधों को बिगाड़कर चीन नेपाल को अपनायेगा ये सोचना भी गलत- पूर्व राजदूत योगेंद्र ढकाल

चीन की गतिविधियों, नेपाल की सरकार तथा सत्तारूढ़ पार्टी को अमेरिकी-भारतीय रणनीति के प्रभाव से रोकने की दिशा में केंद्रित

person access_timeDec 01, 2020 chat_bubble_outline0

काठमांडू।


पिछले कुछ समय से नेपाल में निरंतर हो रहे मित्र राष्ट्रों के विशिष्ट लोगों के भ्रमण से एक तरफ आशा तो दूसरी तरफ आशंका भी पैदा हो रही है। एक तरफ सरकार इसको बड़ी उपलब्धियां बता रही है तो दूसरी ओर बौद्धिक वर्ग का सुझाव सयंमित और सतर्क रहने का है। इस पर आपकी टिप्पणी क्या है? 

वास्तव में मित्र राष्ट्रों के अतिथियों का औपचारिक आना-जाना स्वाभाविक प्रकिया है। परन्तु इस समय इस स्वाभाविक प्रक्रिया में भी कुछ सवाल पैदा होना भी स्वाभाविक ही हो रहा है- जैसे कालापानी विवाद के बाद काफी लम्बे अरसे तक भारत ने नेपाल के साथ वार्ता करने में भी रूचि नहीं दिखाई तो फिर अभी आकर भारत एकाएक इतनी सक्रियता क्यों दिखा रहा है? ये भ्रमण नेपाल के साथ सम्बन्ध सुधारने के अंतर्गत होनेवाली सामान्य प्रक्रिया के तहत हैं अथवा आतंरिक रूप में सरकार पर कोई दबाव दिए जाने का काम हो रहा है। अभी का ये ज्वलंत सवाल है। फिर इसी समय मित्र राष्ट्र चीन से भी रक्षा मंत्री का आगमन,  वह भी ऐसे समय में जबकि सत्तारूढ़ पार्टी स्वयं में ही अंतर कलह तीब्र हुआ है। देश की राजनीतिक अस्थिरता की अवस्था में विदेशी भ्रमणों को गंभीर रूप में देखा जाना स्वाभाविक ही है।  

अगर इतिहास को पलटकर देखा जाये तो नेपाल के राजनीतिक वृत्त में जब जब उतार चढाव आये तब-तब विदेशी खास करके दक्षिणी पडोसी राष्ट्र भारत द्वारा सहयोग के नाम पर देश में हस्तक्षेप हुआ है। इस क्रम में भारत द्वारा विभिन्न नेताओं को प्रलोभन देकर अथवा दबाव में लेकर विभिन्न प्रतिबद्धताएं करवाए जाने का इतिहास भी है।



वर्त्तमान में शक्तिशाली सरकार के सत्तासीन होते हुए भी क्या ये सब संभव है?

सरकार का नेतृत्व कर रहे प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली अभी अपनी ही पार्टी के सचिवालय में अल्पमत में हैं। इसी कारण केपी ओली और भारत बीच सांठ-गाँठ होकर इस तरह के भ्रमणों का आदान-प्रदान तो नहीं हो रहा है, इस विषय पर देश के बुद्धिजीवी तथा सामान्य लोग भी सशंकित हैं। विगत में जब नेपाल में पंचायत विरोधी आंदोलन चल रहे थे तब भारत द्वारा एक और तो आंदोलन में सहयोग किया जा रहा था तो दूसरी और तत्कालीन प्रधानमंत्री मरिचमान सिंह तथा राजा वीरेंद्र के साथ भी सम्बन्ध सुधार के गोप्य प्रस्ताव अपने दूत के माध्यम से भेजे गए थे। सम्बन्ध सुधार के उन प्रस्तावों को अगर राजा वीरेंद्र ने मान लिया होता तो आंदोलन को सहयोग-समर्थन न करने की भारत की योजना थी परन्तु राजा वीरेंद्र के द्वारा प्रस्ताव न मने जाने के कारण पंचायत व्यवस्था जाती रही। ऐसे ही आधारों से ये शंका होती है कि कहीं अभी भी भारत की वही सांठ-गाँठ योजना तो नहीं चल रही है? अगर इन लोगों के बीच कोई भी मिलीभगत नहीं है तो प्रधानमंत्री के द्वारा नेपाल का नक्शा, नागरिकता, नेपाल के हित के विषय में लिए गए निर्णयों तथा भारतीय शासकों की नेपाल प्रति के उपनिवेशवादी नीति के अंतर्विरोध को वर्तमान सरकार कैसे हल करेगी? उसकी योजना क्या है? इस सम्बन्ध में नेपाली जनता को जानकारी होनी चाहिए।    

दूसरी बात इस क्षेत्र में क्षेत्रीय ओर वैश्विक टकराव किस अवस्था तक पहुँच रहा है इस विषय पर भी हमारे ध्यान देने की जरुरत है। चीन के उदय को कमजोर करने तथा उसे घेरे में समेटने के लिए इस क्षेत्र में इंडो प्यासिफ़िक रणनीति (आईपीएस) के माध्यम से अमेरिका अपनी आक्रामक उपस्थिति व्यक्त कर रहा है। एमसीसी के माध्यम से इस क्षेत्र के कितने ही राष्ट्रों में प्रविष्ट होने की उसकी कोशिस जारी है। सामान्य रूप से देखने पर आईपीएस को समर्थन करते हुए चीन के घेराव करने की अमेरिकी रणनीति में भारत भी उसका सहयोगी है। होने को तो भारत अभी तक आईपीएस का सदस्य नहीं बन चुका है। जहाँ तक नेपाल की बात है यहाँ तो प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली स्वयं ही एमसीसी के पक्ष में है ऐसे में अमेरिका और भारत की आपसी रणनीति के अंतर्गत भारतीय नेपाल आकर ओली को सत्ता में टिकाने के खेल में तो नहीं लगे हैं? उन्हें पार्टी के दबाव से मुक्त करके सत्ता में टिकाये रखने के लिए अमेरिकी-भरतीय प्रभाव नेपाल में बढ़ाने की रणनीति तो ये नहीं है? सोचने के आधार बहुत से हैं।  

चीनी रक्षामंत्री के भ्रमण के सम्बन्ध में आपका मूल्याङ्कन क्या है?

ये उच्चस्तरीय भ्रमण भी भारतीय प्रतिनिधियों के भ्रमण के तुरंत बाद ही हुआ है। खुद को घेरा में डालने की अमेरिका की नीति चीन को अच्छी तरह विदित है। चीन की बीआरआई परियोजना को प्रभावहीन बनाने के लिए अमेरिका द्वारा एमसीसी का इस क्षेत्र में लाया जाना भी चीन को भलीभांति पता है। ऐसी अवस्था में चीन का उद्देश्य नेपाल की सरकार और सत्तारूढ़ पार्टी को अमेरिकी-भारतीय रणनीति के प्रभाव से रोकने की दिशा की ओर केंद्रित होना, मुझे लगता है। नेपाल में अमेरिकी और भारतीय गतिविधियां किस भांति चल रही है इसका निरीक्षण-परीक्षण करने के लिए भी ये भ्रमण कराया गया हो सकता है। साथ ही जहाँ अमेरिका और भारत अपनी गतिविधियां तीब्र कर रहे हैं वहां उसके लिए अपनी उपस्थिति को दर्ज कराना भी महत्वपूर्ण है।  

नेपाल में अस्थिरता के समय दबाव देने के लिए भारत द्वारा भ्रमण किये जाने का इतिहास है, आपने कहा। सामान्यतः नेपाल की आतंरिक गतिविधियों में तटस्थ रहनेवाला चीन भी अभी आक्रामक रूप में आगे आ रहा है। पिछले समय जब नेपाल में आंतरिक विवाद बढ़ा था तब चीनी राजदूत की सक्रियता भी बढ़ी हुई देखी गई थी। इस पर आपका क्या विचार है?

हमें समझना चाहिए की अभी चीन माओ त्से तुंग के समय का समाजवादी चीन नहीं है। ये साम्राज्यवादी चीन है। उसने देङ सियाओपिङ के नेतृत्व में दशकों पहले समाजवादी रंग को उतारकर पूंजीवादी रंग को ग्रहण कर लिया है। इक्कीसवी शताब्दी के आरम्भ से ही साम्राज्यवाद में वह स्वयं का सशक्त विकास कर रहा है। साथ ही 2010 से वह पूर्ण साम्राज्यवादी राष्ट्र के रूप में परिणत हो चुका है। किसी भी साम्राज्यवादी देश का उद्देश्य संसार भर में अपना प्रभाव विस्तार करने का होता है। इसी के अनुसार चीन संसार भर में अपनी उपस्थिति को फैलाता दिखाई दे रहा है जैसे अफ्रीका, लैटिन अमेरिका तथा नेपाल में उसकी उपस्थिति बढ़ी है। अभी तक उसकी उपस्थिति आर्थिक साम्राज्यवाद तक ही केंद्रित है। परन्तु कल के दिनों में उसकी इस उपस्थिति में परिवर्तन भी आएंगे। अर्थतंत्र, संस्कृति, सैन्य क्षेत्र, राजनीति के क्षेत्रों में भी आहिस्ता आहिस्ता वह अपना प्रभाव दिखाना शुरू करेगा।  

परन्तु अभी चीन को आक्रामक साम्राज्यवादी कहना जल्दबाजी होगी। अभी विश्व में आक्रामक साम्राज्यवाद अमेरिका तथा उसके सहयोगी यूरोपीय देश हैं।  

चीन हमारे देश में हस्तक्षेप नहीं करेगा चीन के साथ अच्छे सम्बन्ध रखने पर वह भारतीय हस्तक्षेप से मुक्त कराकर हमारे हितों की रक्षा करेगा ऐसा भी कितने ही लोगों का विचार है। ये सोच कितनी वस्तुनिष्ठ है?

सं 2015 में लिपुलेक के रस्ते पर नेपाल से बातचीत किये बिना ही चीन ने भारत के साथ मिलकर समझौता कर लिया। अगर इस बात को छोड़ दिया जाये तो नेपाल की सार्वभौम सत्ता पर असर होनेवाला कोई भी काम अभी तक चीन के द्वारा नहीं किया गया है। जबकि भारत सैकड़ों वर्ष पहले से ही नेपाल को अर्ध औपनिवेशिक बनाता आ रहा है। भारत हमेशा ही नेपाल का 'माइक्रोमैनेजमेंट' अपने हाथ में लेना चाहता है। इसके कारण कई बार लगता है कि 'भारत विदेश और रक्षा नीति को भूटान की तरह ही अपने हाथों में लेना चाहता है तथा यदि हम प्रो चाइनीज हुए तो इससे चीन हमें बचा लेगा और हम बिलकुल स्वतंत्र देश हो सकेंगे।'  परन्तु इस सम्बन्ध में मेरा विश्लेषण फर्क किस्म का है भारत चीन के विवाद को मात्र देखकर हमें इस सम्बन्ध में कोई धारणा नहीं बनानी चाहिए क्योंकि इन दो शक्तिशाली राष्ट्रों को एक दूसरे की कितनी आवश्यकता होगी हमें ये भी सोचना चाहिए।  

भारत चीन के विवाद के बीच दो बातों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है- पहली तिब्बत्ती शरणार्थियों को भारत में शरण देना, दलाई लामा को आश्रय देना, स्वतंत्र तिब्बत के अभियान का संचालन करने जैसे कार्यों का वातावरण भारत से बना जो चीनियों द्वारा पचाने लायक नहीं था। अपनी सार्वभौमिकता के प्रति प्रहार को सह न सकने के कारण दोनों देशों के बीच स्वाभाविक रूप से द्वंद्व बढ़ा। दूसरी बात इन लोगों के बीच विद्यमान सीमा विवाद है। सीमा विवाद तो भारत और चीन के बीच मात्र न होकर एक वैश्विक समस्या भी है। सीमा जुड़े अनेक राष्ट्रों के बीच पडोसी राष्ट्रं के साथ विवाद होना एक सामान्य सी बात है। इसी लिए सीमा विवाद उन लोगों के बीच द्वंद्व का कारण नहीं बनेगा जैसा मुझे लगता है इस बात को वे हल कर सकते हैं।  

अभी भारत और चीन दोनों ही क्षेत्रीय शक्ति के रूप में उदित हुए हैं तथा कल की विश्व शक्तियां ये ही हैं। इस क्षेत्र में दो शक्तियों के एक साथ उदित होने पर भी क्षेत्रीय शक्ति तो एक ही होगी। वस्तुगत स्थिति ने ये स्पष्ट कर दिया है कि चीन ही वह शक्ति है। परन्तु भारत भी इसी बात का दावेदार है तथा उसने खुद को स्थापित करने के लिए अमेरिका का सहारा लिया है। इधर अमेरिका का लक्ष्य भारत को साथ में लेकर भारत और चीन के बीच विवाद कराना तथा भारत के सहयोग का बहाना बनाकर अत्याधुनिक हथियारों सहित इस क्षेत्र में अपनी मजबूत उपस्थिति को बनाना तथा चीन पर घेरा डालना है। अमेरिका द्वारा भारत को इंडो प्यासिफ़िक नीति के मुख्य खम्भे के रूप में लेने का कारण भी यही है। इसी कारण चीन के लिए अपने विरुद्ध अमेरिकी नेतृत्व की घेराबंद को असफल बनाने के लिए भारत को अमेरिकी खेमे में जाने से रोकने की आवश्यकता है। उसे ये बात अच्छी तरह पता है कि उसका प्रयास भले ही कुछ ऊपर नीचे हो परन्तु भारत को अमेरिकी खेमे में जाने न देने कि दिशा में वह केंद्रित है।  
हमारे दोनों ही पडोसी विकसित राष्ट्र हैं। इसीलिए हमें अपना राष्ट्रीय हित, जनता का स्वार्थं, पूंजीपति तथा राष्ट्रीय पूंजीवाद के विकास जैसे पक्षों को केंद्र में रखकर उन लोगों के साथ के सम्बन्ध को समदूरी के आधार पर निरंतरता देना ही वस्तुनिष्ठ होगा।  

ऐतिहासिक काल से ही भारत के साथ हमारी सांस्कृतिक, सामाजिक निकटता रही है, कूटनीतिक सम्बन्ध भी इससे अछूते नहीं रहे परन्तु अभी की अवस्था में चीन और अमेरिका दोनों ही नेपाल को उतना ही महत्व दे रहे हैं। इस अवस्था से नेपाल को जितना लाभ उठाना चाहिए वह उठाया जा पा रहा है कि नहीं?

निश्चय ही पहले हम एक रणनीतिक बिंदु पर थे परन्तु अभी आकर चीन का उदय तथा अमेरिका कि आवश्यकता ने हमारे महत्व को और भी बढ़ा दिया है। विदेश नीति विज्ञान और कला भी है। इसलिए हमारी राजनीति और सैन्य नेतृत्व अत्यधिक कलात्मक रूप में प्रस्तुत होना चाहिए, ऐसा मुझे लगता है। परन्तु अभी तक की उपलब्धियों को देखने से निराशाजनक अवस्था ही दिखाई दे रही है। फ़ायदा लेने की तो बात ही छोड़े बल्कि हम खुद ही चक्रव्यूह में फँसते जा रहे हैं। हम लोग अभी तक न तो इजरायल द्वारा अमेरिका को, भूटान द्वारा भारत को तथा उत्तर कोरिया की तरह चीन को खुश कर पाए हैं। जहाँ तक अभी की सरकार की बात है इसे तो इसके प्रतिपक्षी दल नेपाली कांग्रेस द्वारा भी चीन निकट की सरकार कहा जा रहा है। परन्तु इसी समय चीन की और का नका बंद है। मेरी सोच में ये कोरोना द्वारा निर्मित अवस्था नहीं है। नेपाल सरकार द्वारा चीन के विरुद्ध नेपाल की भूमिका प्रयोग होने न देने की प्रतिबद्धता किये जाने पर भी उस पर चीनी पक्ष के विश्वस्त न हो सकने के कारण ऐसी अवस्था आई है। इस बात को वर्तमान राजनीतिक नेतृत्व को गंभीर रूप से लेना चाहिए, मुझे लगता है।  



जहाँ तक अमेरिका की बात है- दो वर्षों पहले अमेरिका से भी प्रतिनिधि मंडल नेपाल भ्रमण के लिए आया था। 18 वर्षों के बाद नेपाल के परराष्ट्रमंत्री ने अमेरिका का औपचारिक भ्रमण किया था। दो देशों के परराष्ट्रमंत्रियों के बीच टेलीफोन संवाद भी हुआ था। परन्तु नेपाल में इन सभी गतिविधियों से उठते ही अमेरिका विरुद्ध की भावना का जन्म हुआ था। एमसीसी पारित नहीं हो सका। उसके अब्द अभी अमेरिका कुछ पीछे हटा है। जिसका सीधा मतलब है कि नेपाल सरकार द्वारा अमेरिका को भी विश्वास में नहीं लिया जा सका है। जहाँ तक भारत का समबन्ध है वह तो नेपाल सरकार को चीन कि निकटस्थ कहता आ रहा है।  

2046 साल से ही अस्थिरता की स्थिति से गुजर रही नेपाल की राजनीति के कोर्स ने विगत 3 वर्षों इधर स्थिरता हासिल की है। इस स्थिर और शक्तिशाली सरकार द्वारा क्या क्या किया जा सकता था? इसने क्या किया? अथवा कल के दिनों में ये क्या कर सकेगी? आपको क्या लगता है?

पहली बात तो नाम नेकपा होने पर भी ये कम्युनिष्ट सरकार नहीं है और इसके द्वारा समाजवाद की तरफ ले जाया जा सकेगा इसकी अपेक्षा भी नहीं है। इतने बड़े मत से विजयी ये सरकार अस्थिरता के चक्र को तोड़कर स्थिरता और विकास के मार्ग की और ले जाएगी ये आम जन धारणा थी परन्तु सरकार द्वारा गंभीर तथा ईमानदार होकर देश और जनता के पक्ष में काम ही नहीं किया गया। बहुदलीय व्यवस्था के माध्यम से चुनकर आई सरकार को सबसे पहले जनता के समक्ष किये गए वादों का कार्यान्वयन करना सरकार का पहला रास्ता होना चाहिए था। परन्तु सरकार विपरीत रास्ते पर जा रही है। जनमुखी कामों को करने की वजाय सरकार को टिकने के लिए ही सरकार अपनी शक्ति और सामर्थ्य का अपव्यय कर रही है। सरकार के प्रति जनता का विश्वास उठ चुका है इससे न तो देश का हित और न ही जनहित की अपेक्षा की जा सकती है।  

हमारा ही नही,  नेकपा के ही कार्यकारी अध्यक्ष प्रचंड के साथ ही बहुमत सचिवालय सदस्यों का भी मूल्याङ्कन यही है। परन्तु फिर भी अपनी कमजोरियों को सुधारने का प्रयास भी प्रधानमंत्री द्वारा किया जायेगा ऐसा भी नहीं दिखता है। सरकार की असफलता मात्र ओली की असफलता न होकर पूरी नेकपा पार्टी की ही जिम्मेदारी होगी। इस सम्बन्ध में नेकपा को गंभीर होकर सोचने में अब और अधिक विलम्ब नहीं करना चाहिए।

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