हिंदी संस्करण

मुक्ति का उपाय (हास्य व्यंग्य)

person access_timeAug 24, 2020 chat_bubble_outline0

नहा-धोकर पूजा पाठ करने बैठा तो मन बेचैन था। शांत हो भी तो कैसे? कोरोना कहर पर कहर ढाता जा रहा है। जैसे जैसे संक्रमण की संख्या बढ़ती जा रही है, वैसे वैसे ही मृत्यु की संख्या भी इकाई, दहाई की संख्या को लाँघते हुए सैकड़ा पर पहुँच गई है। इस हालात की गंभीरता को समझ कर देवादिदेव महादेव एवं हमारे आराध्य देव श्रीपशुपतिनाथ से यह करबद्ध प्रार्थना करने लग गया कि हे प्रभु! इस संख्या को अब बढ़ने न दो। बहुत हो चुका मेरे शिवशंकर। देखो सारा विश्व त्राहिमाम-त्राहिमाम कर रहा है। इसका इलाज अब तक निकल नही पाया है। निकलेगा भी तो यह अमीरों के लिए ही होने की संभावना दिखती है। काले धन वाले तो काला धन का उपयोग कर प्राण बचा लेंगे, मंत्री आदि सरकारी खर्चे पर इलाज करा लेंगे,  पर वे निर्धन लोग क्या करें, जिन्हें दो जून की रोटी कमाने के लिए भी एँड़ी चोटी एक करनी पड़ती है? क्या वे तुम्हें अपने भक्त नही लगते? अब खोलो अपना तीसरा नेत्र और जला दो उन जीवाणुओं को, जो कहर पर कहर ढाहे जा रहा है। मुझे पता है कि विश्व भर नैतिक मूल्यों का ह्रास हो रहा है, भ्रष्टाचार का बोलबाला बढ़ रहा है, कालाबाजारी बढ़ रही है, ईमानदारी नाम की चीज कहीं रही नही। धर्म भी अब सिर्फ एक दिखावा भर रह गया है। पर यह भी तो देखो, ये बच्चे स्कूल न जा पाने के कारण कितने बेचैन हैं। हमें चैन से न सोने देते हैं न बैठने। एक सवाल पूरा हुआ नही कि दूसरा ठोक देते हैं। युवक-युवतियाँ आपस में मिल नही पा रहे हैं। हम बूढ़े भी अस्पताल नही जा पा रहे हैं। भय इतना है कि वहाँ जाने पर चिकित्सक या स्वास्थ्य कर्मचारी के हाथों हीं कहीँ जीवाणु चिपक न जाय। पाँच महीने हो गये, इसलिए अब हम सब को इस भय, त्रास और दहसत से बचाओ मेरे प्यारे भोलेबाबा! तुमने देखा नही, इस बार तीज के पर्व पर तुम्हारे अँगने में लालिमा का कितना अभाव था। मोटी दिखी तो पतली नही, श्याम वर्ण की मिली तो गौर वर्ण नदारद। इन सबसे मेरा दिल तो खट्टा हुआ तो तुम्हे कैसा लगा होगा, यह सोचकर भी परेशान हो उठता हूँ भगवन्। इसलिए विनती है, कुछ तो करो मेरे दयासागर!

मन की बेचैनी को इस प्रकार संक्षिप्त पूजा-पाठ से मिटाकर उठा। जलपान करने बैठा ही था कि तभी  हाथों मे किताब लिए पोता आ गया। पूछने लगा- “एक बात समझ में नही आ रही है दादू।”

“ऐसी क्या बात है बेटा, बोलो?”

“यह अँग्रेजी का उच्चारण भी अजीब होता है। अब देखो न, Do का उच्चारण “डू”होता है पर Go का उच्चारण “गो” क्यों होता है? उसी तरह Tiny को टायनी कहा जाता है पर Milk को मिल्क कहा जाता है। ऐसा क्यों दादू? क्या नियम है?”

उसके प्रश्नों को सुनकर मेरा बेचैन मन फिर अशांत हो उठा। क्योंकि मेरे पास उसे समझाने योग्य कोई उपयुक्त जवाब नही था। फिर भी उसकी जिज्ञासा को शांत करने और अँग्रेजी के अल्प ज्ञान को छिपाने हेतु कहने लगा- “अँग्रेजी भाषा की यही तो विशेषता है बेटा। इसी कारण तो यह अंतर्राष्ट्रीय भाषा बनने में सफल हुआ। तो बेटा, तुम्हे शिक्षक जिस तरह बताएँ या पढ़ाएँ, उसी तरह पढ़ा करो। क्योंकि अँग्रेजी पढ़कर ही तुम आगे बड़ा अफसर बन सकते हो। मैं तो ठहरा संस्कृत का शास्त्री। हमारे समय में इसे म्लेच्छ भाषा कहा जाता था और संस्कृत को देवभाषा। अतः हमें संस्कृत पढ़ाया जाता रहा और हम लोग भी संस्कृत ही पढ़ते रहे।”

“पर हमारे स्कूल में तो संस्कृत नही पढ़ाई जाती है। क्यों दादू?”

उसके प्रश्नों से मेरे परेशानी बढ़ रही थी। फिर भी अपने को सँभालते हुए कहने लगा- “शायद हमारे शासक संस्कृत के महत्व को समझ नही पाये और उन्होंने तुम सब पर अँग्रेजी इस तरह लाद दी। वे सोचते होंगे कि अँग्रेजी के सहारे ही देश को धनी बनाया और आगे बढ़ाया जा सकता है। बच्चे अँग्रेजी पढ़ेंगे तो अमरीका, बेलायत जाएँगे और वहाँ से हमारे लिए डॉलर, पौण्ड भेजते रहेंगे, जिससे देश धनी होगा। स्कूल वाले भी बच्चों में अँग्रेजी संस्कार डालने के लिए अपने लड़कों के लिए टाई,  कमीज और जूते और लडकियों के लिए स्कर्ट का पोशाक निर्धारित करने लगे।”

“आपके समय में युनिफर्म किस प्रकार का होता था दादू?”

“बेटा हम लोग या तो धोती-कुर्ते पहनकर स्कूल जाया करते थे या कमीज–पायजामा। अच्छा बेटा, अब तुम जाओ, अपना होम वर्क पूरा कर लो और जो समझ में नही आए वह अपने डैडी-मम्मी से पूछ लो। मै जरा नाश्ता कर लूँ और बाजार जाकर अपने लिए दवाई भी ले आऊँ।

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