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सार्वजनिक बसों कें सड़क पर उतरने का समाचार प्रसारित होने पर उत्साहित होते हुए, या कहें, जोश में होश खोते हुए मैं भी लगभग चार महीने के बाद घर से बाहर निकल पड़ा, पिंजड़े के पंक्षी के समान। यद्यपि लॉकडाउन हटाने की घोषणा नही हुई थी और कोरोना के कहर का त्रास भी नही मिटा था। फिर भी सोचा, जब सरकार ने जनता और व्यवसायियों के लिए इतनी सुविधा मुहैया कराई है तो जरा बाहर का नजारा देख लूँ और बस मिल गयी तो न्यू रोड तक की तफरी भी कर आऊँ। आखिर कब तक कमरे के अंदर दुबककर बैठा जाय।

तो जनाब, बन सबरकर गीत गुनगुनाते हुए ज्योंही निकलने लगा पत्नी टोक बैठी- ‘इस माहौल में कहाँ जा रहे हो बनठन कर?’

मैने कहा- बसें चलने लग गयी हैं, जरा बाहर का नजारा देख आऊँ।’

‘क्यों, अब तक नही देख रखी है क्या?’

‘नही, यह देखना चाह रहा हूँ कि लोगों की क्या प्रतिक्रिया है। बस कुछ ही देर में वापस आ जाऊँगा।’

इतना कहते हुए मैं निकल पड़ा और तेज गति से चलते हुए पहुँच गया बस स्टॉप पर। एक दो बसें आईं, खचाखच भरी हुई। लगा कोरोना के नाम पर मैं जितना डर रहा था उतना डर लोगों में नही है। मुझे कोई जल्दी तो थी नही, सो इंतजार करने लगा।

इसी बीच एक मोटरसाइकिल सबार आ रुका और पूछ बैठा- किधर जा रहे हैं दाजू (भैया)?’ शिर पर हेलमेट, नाक और मुँह काले मास्क से ढका हुआ और आखों पर काला चश्मा। मैं पहचान नही पाया। लगा- कोई अपहरणकर्ता अपहरण की नियत से तो नही आया?

‘किसी की इंतजार में हूँ।’

‘गर्ल फ्रेंड तो नही?’ हँसते हुए कहने लगा।

‘यह क्या मसखरी है? आपको क्या वास्ता?’

‘अरे दाजू, आपने मुझे पहचाना नहीं।’ कहते हुए उसने ऐनक उतारी और एक कोने से मास्क को ढिला करते हुए कहने लगा- ‘मैं उपाध्याय हूँ।’

‘अरे उपाध्याय भाई, क्या हाल है। लंबे अरसे के बाद मुलाकात हो पायी। इस हुलिया में पहचान नही पाया। मेरी बात का बुरा मत मानना। कहाँ जा रहे हो इस माहौल में?’

‘क्या करें दाजु, कमरे में बैठे-बैठे मन उकता रहा था, तो सोचा, अब तो बसें भी चलने लग गयीं है तो जरा सुनधारा तक हो आऊँ और कुछ सामान भी ले आऊँ।’

‘अरे भाई, लॉकडाउन में ढील और बसों के संचालन की अनुमति दिए जाने का मतलब यह नही है कि हालात में सुधार हो गया है। टी.वी. देखते नही संक्रमण बढ़ता ही जा रहा है। यह जमाना साहस दिखाने का नही है। देखा नही टी.वी. में एक बडी बिल्डर को, किस तरह दबोचा गया कोरोना के द्वारा। अब न तो उसकी वह बडी रही न ही बैंक बैलेंस। सुकर है बच गयी जान। इसलिए प्यारे, लौट जाओ घर, जो कुछ भी खरीदनी हो, पड़ोस के डिपार्टमेंटल स्टोर्स से खरीदो। जाओ, अपने बीबी-बच्चों के हित की सोचो। अड़ोसी-पड़ोसी की सुरक्षा के बारे मे सोचो। नजारे देखने के अवसर तो आते रहेंगे। लौट जाओ।’

‘धन्यवाद दाजू इस नेक सलाह के लिए। पर क्या आप ने अपने और अपने परिवार के हित के संबंध में भी सोची है? बस स्टॉप पर इस तरह खड़ा रहना और बस में यात्रा करना क्या आपके, भाभीजी और बच्चों के लिए हितकारी है? आप भी लौट जाओ। कहो तो घर तक पहुँचा देता हूँ। बैठ जाओ पीछे।’

‘अरे भाई, सोशल डिस्टेंसिंग (दूरियाँ बनाकर रहना, बैठना, चलना आदि) के इस माहौल में तुम्हारे पीछे बैठकर चलना क्या हितकारी होगा?’

‘आपका कहना तो ठीक है दाजू। पर बस में चढ़ते हुए क्या आप सोशल डिस्टेशिंग के निमयों का पालन कर पाओगे। धक्के से बच पाओगे? माना, आपने चढ़ने में धीरज दिखायी भी, तो क्या आपको लगता है कि अगला वह धीरज दिखा पाएगा। आजकल जब अपने ही दूरियाँ बनाकर रहने लग गये हैं तब आप सोशल डिस्टेंशिंग के नाम को भूलकर भीड़ में घुसते हुए बस में चढ़ने जा रहे हो? बहुत जरूरी काम नही है तो कहता हूँ लौट जाओ। भीड़भाड़ से बचो।’

उसकी बातों में दम था। लौटते हुए सोचने लगा पता नही मेरी नादानी के कारण मुझे और परिवार वालों को क्या-क्या भोगना पड़ता। सुकर है भगवान् का जो बस के आने से पहले ही वह आ पहुँचा, नही तो पता नही क्या हो जाता? पर हँसी भी आ रही थी इस बात पर कि मैं उसे उपदेश दे रहा था और वह मुझे। लेकिन आचरण दोनों के एकसमान।

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