हिंदी संस्करण

परिवर्तन

हास्य व्यंग्य

person access_timeJul 09, 2020 chat_bubble_outline0

रात्रि के भोजन के पश्चात सभी टी.वी. देख रहे थे। एकाएक रोशनी गुल हो गयी। बहुत दिनों के बाद इस तरह बिजली चली गयी थी। मैने पत्नी से कहा- ‘देखो तो आलमारी में एक कोने में मोमबत्ती होगी। ले आओ।’ पोता कहने लगा- ‘मैं ले आऊँ दादू?’

मैने कहा- ‘ले आओ राजा बेटा।’ 8-10 साल का वह लड़का दौड़ते हुए गया। मैं सोचने लगा- ‘क्या जमाना आ गया। हम अपने दादा को दादा जी कहकर पुकारते थे। पर आज के बच्चों के लिए हम दादू हो गये। पिता डैड, तो मम्मी माँम हो गयीं, मानों किसी मोम की गुडि़या हों। पता नही नाम परिवर्तन का यह सिलसिला आगे चलकर क्या रूप ले ले?

इतने मे पोता आ गया। कहने लगा- ‘कहाँ है दादू? मुझे तो मिली नही।’

मैने हँसते हुए कहा- ‘अँधेरे में तुम क्या ढूँढ पाते। चलो मैं ही चलता हूँ। कहीँ मेरे हाथ लग जाय।’

इधर उधर टटोलने पर मोमबत्ती का पैकेट हाथ लगा। उसमें से दो बत्ती निकालकर पत्नी को देते हुए कहा- ‘लो इसे जला लाओ।’

पत्नी मोमबत्ती जलाने गयीं। मेरा चिंतनशील मस्तिष्क फिर सक्रिय हो उठा। ‘क्या दिन थे वे भी। खाना खाने के बाद सभी अँगीठी के चारों ओर बैठ जाते, लालटेन की धीमी रोशनी में भी पूरा कमरा उजाला दिखता था और अँगीठी से निकलती ताप को सेकते हुए हम बतियाते रहते। लोडसेडिंग शब्द से सभी अपरिचित थे।’

पत्नी जलती हुई मोमबत्ती ले आयीं। उनका आना था कि बिजली भी आ गयी। मानो कोई प्रतिस्पर्धा हो दोनों में। बिजली का आना था कि सभी का चेहरा खिल उठा और शोर मचा- ‘लो आ गई बिजली।’

यह प्रसन्नता इसलिए नही थी कि बिजली आ गयी, वरन् इसका कारण था कि अब वे लोग अपने पसंदीदा धारावाहिक टी.वी.पर देख पाएँगे।

मैने कहा- ‘देखो जमाना कहाँ से कहाँ आ पहुँचा। कितना परिवर्तन हो रहा है हर ओर।’

इ्रस पर पोता कहने लगा- ‘किस परिवर्तन की बात कर रहे हैं दादू? मैं तो कोई परिवर्तन नही देख पाता हुँ। रोज सुबह होती है और फिर शाम। सुबह होने पर रोज सूर्य निकलता है और शाम होने पर सूर्य गायब और हर ओर अँधेरा।’

उसकी बात पर मैं हँस पड़ा। इस पर वह कहने लगा- ‘हँसने की क्या बात हो गयी? दादू मैने कुछ गलत कहा क्या?

उसकी पीठ थपथपाते हुए मैने कहा- ‘नही राजा बेटा। तुम्हारी बातो में पूरी सचाई है। यही तो प्रकृति के नियम हैं। सृष्टिकर्ता की यही तो विशेषता है। हमारी दिनचर्या भी इसी पर निर्भर है। अगर यह सब नही होता तो हमारे जीवन और सारे काम-धंधे अस्तव्यस्त हो जाते। पर मैं जिस परिवर्तन की बात कर रहा था वह प्रकृति के नियमों की नही, वरन् हमारे जीवन से जुड़े मामलों से हैं। हमारी जीवन शैली से है। सामाजिक नियम-कानून से हैं। रहन सहन और खानपान से हैं। एक समय था, जब हमारे जीवन के कुछ आदर्श थे, मूल्य थे, मान्यताएँ थी। पर अब सब धीरे-ध्रीरे गायब हो रहे हैं। हमारे नेपाली समाज में तो तुम देख ही रहे हो, आजकल प्रणाम और दण्डवत का स्थान ‘दर्शन’ शब्द का संबोंधन लेने लगा है, जबकि दर्शन का अर्थ होता है आँखों से प्रत्यक्ष देखना, या देख पाने हेतु प्रकट होने के लिए किया जाने वाला अनुरोध, साक्षात्कार के लिए किया जाने वाला आग्रह, अनुनय-विनय। पर आजकल अपनों से बड़ों के अभिवादन के लिए इस शब्द का जिस प्रकार प्रयोग किया जा रहा है, इसमें अभिवादन के वे भाव तो नदारद हैं हीं सम्मान के वे भाव भी गायब हैं जो दण्डवत या प्रणाम करने पर प्रकट होते हैं। स्थिति तो यहाँ तक विकृत हो गयी है कि लोग बाग टेलिफोन पर भी अभिवादन करने हेतु ‘दर्शन’ कहने लग गये है। बहुओं के घूँघट मात्र गायब नही हुए, उनके पहनावों में भी परिवर्तन दिखने लगे हैं। खाने-पीने की शैली और तौर-तरीके मे भी परिवर्तन होने लगे हैं, पराठें का स्थान पिज्जा लेने लगा तो शिकंजी का स्थान काले-पीले रंग के शीतल पेय।’

‘दादू यही तो आधुनिकता है, समय की माग है।’

‘हाँ, और परिवर्तन का प्रतीक। इसलिए तो राजा बेटा मैं कह रहा था-जमाना कहाँ से आ गया। हर ओर परिवर्तन है। मै दादा से दादू बन गया और तुम्हारे पिता डैड और माँ मॉम बन गयीं और तुम राजेश से राजा। अब बोलो यह परिवर्तन के लक्षण हैं कि नही?’

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