हिंदी संस्करण

सड़क पर सूनापन छाया हुआ था। किसी वाहन की प्रतीक्षा में मैं बस स्टॉप पर खड़ा था। एकाएक एक मोटर साइकिल आकर रुकी और मोटर साइकिल चालक पूछ बैठा- ‘कैसे खड़े हो भैया?’

सिर पर हेलमेट, आँखों के ऊपर काला चश्मा और नाक और होठों को ढकती हुई कपड़े की काली पट्टी (‘मास्क’) ।’ मैं उसे पहचान पाता इससे पहले ही वह पूछ बैठा- कहाँ जान है भैया? कहो तो पहुँचा दूँ।’

लगा कहीं कोई अपहरणकर्ता तो नही है? मैने कहा- ‘किसी के इंतजार में हूँ।’

‘कोई गर्ल फ्रेंड तो नही?’ उसने हँसते हुए पूछा।

मैंने कहा– ‘आप कौन हो और यह कैसी मसखरी है?’

इस पर वह बोल पड़ा- ‘भैया, लगता है आपने मुझे पहचाना नही।’ इतना कहते हुए उसने काला चश्मा उतारा और कहने लगा- ‘मैं उपाध्याय हूँ।’

चार महीने की इस अवधि में जो दूरियाँ बन गई हैं लगता है उनके कारण स्मृतिपटल पर भी लॉकडाउन छाने लगा है। झेंप मिटाते हुए कहने लगा- ‘गर्लफ्रेंड की बात छोड़ो, आजकल तो सभी दूरियाँ बनाने क्री फिक्र में हैं। नौबत यहाँ तक आ गयी है कि अब तो अपने भी गाड़ी होने पर भी दूरियाँ कायम करने में ही आनंद ले रहे हैं। हाँ तो मेरे भाई। कैसे हो? इस माहौल में कहाँ जा रहे हो?’

‘क्या करें भैया, लॉकडाउन में कुछ राहत मिली है तो सोचा जरा सुनधारा तक हो आऊँ। जरा ऊधर का नजारा देख लूँ और कुछ खरीददारी भी कर आऊं।’

‘अरे भाई, लॉकडाउन में ढील दिये जाने का मतलब यह नही कि अकारण घूमते रहो। यह समय साहस दिखाने या नजारा देखने के लिए निकलने का नही है। देखते नही संक्रमण की संख्या किस तरह बढ़ती जा रही है। देखा नही टी.वी. में एक बॉडी बिलडर को। किस तरह करोना के चपेटे मे आ गया। गनीमत रही कि जान बच गयी। अब तो न उसकी वह बॉडी रही न ही बैंक बैलेंस। तुम्हारे घर के पास भी तो कई डिपार्टमेंटल स्टोर हैं, वहाँ से सामान न खरीदकर उतनी दूर तक जाना क्या ठीक है? जो कुछ खरीदना हो वहीं से खरीदो। लौट जाओ। बीबी-बच्चों के बारे में सोचो। अड़ोस-पड़ोस की सोचो। नजारे देखने के अवसर तो आते रहेंगे। लौट जाओ।’

‘भैया, ठीक कहा आपने पर आप तो मुझे सलाह दे रहो हो। लेकिन खुद बस स्टॉप पर खड़े हो। बस की यात्रा का मतलब है किसी के साथ एक ही सीट पर बैठना। बस वाले ने सोशल डिस्टेंशिंग का पालन न किया तो क्या आपको अपने कपड़ों में चिपके वाइरस का पता चलेगा? फिर बस में चढ़ने उतरने वाले ने धक्का दिया तो? इसलिए आप भी लौट जाओ। कहो तो पहुँचा दूँ?’

‘नही भाई। सोशल डिस्टेंशिंग का पालन तो करना है न? तुमने कहा, धन्यवाद! ठीक है मै भी लौटता हूँ। अब तुम भी लौट जाओ।’

वापस लौटते हुए मैं सोचने लगा- कितनी आसानी से मैं उसे सलाह दे रहा था पर खुद खतरा मोल लेते हुए बस स्टॉप पर वाहनों के  इंतजार में खड़ा था। शुकर है वाहनों के आने से पहले ही उपाध्याय आ पहुँचा। और खतरा टला।

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