हिंदी संस्करण

मैं और मेरी शायरी

person access_timeJun 18, 2020 chat_bubble_outline0

लॉकडाउन में ढील दिए जाने के बावजूद मैं घर से बाहर निकलने की हिम्मत जुटा नही पाया था। अतः अध्ययन कक्ष मैं बैठकर एक लेख की तैयारी कर रहा था। तभी दरवाजे पर दस्तक देते हुए नौकर आया और कहने लगा-‘साहब, नीचे पुलिस आई है, आपको पूछ रही है।’

‘मुझे?’ ‘क्यों?’

‘पता नहीं साहब। एक बार देख लीजिए।’

‘चलो मैं आ रहा हूँ’- कहते हुए मैं पैंट बदलकर नीचे उतरा।

‘क्या, बात हो गयी जनाब? अंदर तशरीफ लाइए, बैठकर बातें करते हैं।’

‘नहीं मैं ड्यूटी में हूँ। यहीं ठीक है, पर आपको पुलिस स्टेशन चलनी होगी। एक शिकायत है आपके नाम।’

‘मेरे नाम शिकायत? किसने दर्ज की है?’

‘पहले गाड़ी में बैठिए, सब पता चल जायगा। हजरत आवारा साहब आप ही हैं न?’

‘जी, मैं ही हूँ।’

‘ क्या करते हैं?’

‘ मैं शायर हूँ जनाब, शायरी आदि करता हूँ, मुशायरे आदि में जाता रहता हूँ।’

‘ ठीक है। अभी तो हमारे साथ पुलिस स्टेशन चलिए।’

मैंने पुलिस अधिकारी की बात मानने मे ही अपनी भलाई समझी और उनकी गाड़ी में बैठ गया। साइरन बजाते हुए गाड़ी ने गति पकड़ी। साइरन की आवाज से मुहल्ले के लोगों के कान पहले ही खड़े हो चुके थे। अब तो हैरत अंदाज से देखने और घर से बाहर निकल कर यह जानने की कोशिश भी करने लगे कि बात क्या हो गई जो शायर साहब पुलिस की नजरों में चढ़ते हुए जीप पर चढ़ गए। इस तरह गाड़ी में बैठने के बाद तो मैं इन पड़ोसियों की नजरों में गुनाहगार ही मुकर्रर नही हुआ उन लोगों में खुसरफुसर भी होने लगी।

साइरन की आवाज के बीच अधिकारी कहने लगे- ‘जनाब, बात यह है कि एक मोहतरमा ने आपके नाम यह शिकायत दर्ज की है कि आपने उनसे छेड़खानी की है?’

उनकी बातों को सुनकर मैं हँस पड़ा और पूछ बैठा- ‘सर, यह कब की बात है?’

’कुछ घंटे पहले की।’

’पर सर मैं तो घर से निकला भी नही हूँ।’

‘पर महिला की शिकायत है। इसलिए हमें तुरत कार्रवाही करनी पड़ी। उन्होंने ही हमें आपका टेलिफोन नंबर दिया और टेलिफोन महकमे से आपका पता लेकर हम आपके पास आ पहुँचे।’

‘सर, मेरी उम्र को देखते हुए क्या आपको लगता है कि मैं किसी भद्र मोहतरमा से भद्दी मजाक करने की जुर्रत करुँगा?’

‘मेरे ना कहने से क्या हो सकता है आवारा साहब? जब कम्प्लेन महिला से छेड़खानी की हो तो तहकिकात करना हमारा फर्ज बनता है और हम यही कर रहे हैं। अब जो कुछ कहना है, ऑफिस में डीएसपी साहब के सामने ही कहिएगा’- पुलिस अधिकारी रुखे स्वर में कहने लगे।

‘ठीक है जनाब, पर जब तक गाड़ी चल रही है, तब तक मेरी बात तो सुन सकते हैं न?’

‘क्यों नही। तो बताइए’- पुलिस अधिकारी नरम होते हुए कहने लगें।

‘सर, मुझे एक मित्र ने किसी शंकर शर्मा से बात करने के लिए एक नंबर दिया था। अतः मैने शिष्टाचारवश उनसे बातें करने के लिए फोन लगाई। उधर से एक मोहतरमा की आवाज आई तो मैनै शंकर शर्मा जी से बात करने की इच्छा जाहिर की। वह कहने लगी- सर तो अभी सीट पर नही हैं, कोई मेसेज हो तो दे दीजिए, आने पर दे दूँगी।’

 

मैने कहा- ‘मेसेज तो खाश कुछ नही है। हाँ, मैं अपना परिचय दे सकता हूँ। लोग मुझे हजरत आवारा कहते है, एक शायर हूँ। वह आएँ तो कह दीजिएगा। मैने फोन किया था।’

मेरे शायर कहते ही उन्होंने कहा- ‘आदाब जनाब। मैं आपकी शायरी की प्रशंसक हूँ क्यूँकि जनाब, मुझे शायरी बहुत पसंद है। समय हो तो एक-दो सुना दीजिए न प्लीज। आपकी आवाज में शायरी सुनने का तो मजा ही कुछ और होगा।’

मैने पूछा- ‘अच्छा तो आप भी शायरी का शौक रखती हैं?’

उन्होंने कहा- ‘जी, मैं भी थोड़ी बहुत तुकबंदी कर लेती हूँ। एक-दो किताब भी निकाल चूकी हूँ।’

बस, उनकी इन बातों से मेरे भीतर का शायर भावुक हो उठा। उनकी नाजुक आवाज और मेरी तारीफ के शब्दों से दिल झूमने लगा। पर मैने टरकाने के लहजे में कहा- ‘अभी मेरे पास डायरी नही है, फिर कभी मुलाकात होने पर सुनने-सुनाने की मजलिस होगी।’

‘नही जनाब, कुछ न कुछ तो याद होगा। अभी सर भी ऑफिस में नही हैं, तो समय मजे से कट जायगी, जरा एक-दो तो हो जाय जनाब।’

उनके इस आग्रह पर मैने उन्हें मिर्जा गालिब की गजल सुनायी। इस पर कहने लगीं- ‘यह तो सुनी हुई गजलें हैं सर, कुछ आपकी अपनी हो जाय।’

तब मैने एक फिल्मी गीत का सहारा लिया और कहा- ‘तुझे क्या सुनाऊँ मैं दिलरुबा, तेरे सामने मेरा हाल है।’

मेरे इतना कहते ही वह खिलखिलाकर हँस पड़ी और कहने लगीं- ‘जनाब, आप अच्छी मजाक भी कर लेते हो। फोन के उस पार आप हो और मैं इस पार। अब मै कैसे जानूँ आपका हाल?’

इस पर मैने एक दूसरे गीत का मुखड़ा सुनाते हुए कहा- ‘न तुम मुझे जानो, न मैं तुझे जानूँ, मगर लगता है कुछ ऐसा कि मेरा हमदम मिल गया।’ सर, मेरा इतना कहना था कि वह भड़क उठीं। कुछ देर पहले खिलखिलाकर हँसने वाली मोहतरमा अब अनाप-शनाप बोलने लगीं। मैने भी हालात की नजाकत को समझते हुए कोई बात किए बिना फोन का चोंगा रख दिया। बस इतनी सी बात है।

मेरी बातों को सुनकर पुलिस अधिकारी हँसते हुए कहने लगे- ‘आप भी कमाल करते हैं जनाब। जान न पहचान, चल पड़े हमदम बनाने। अब हम पुलिस स्टेशन पहुँचने ही वाले हैं। हम कोशिश करेंगे कि आप दोनों हमदम बन जाय।’

साइरन बजाकर दौड़ती हुई गाड़ी से साइरन बजनी बंद होते ही अधिकारी महोदय ने कहा- ‘लीजिए, हम पहुँच गये अपने मुकाम पर। अब उतरिए।’ एक अर्दली के सलाम के उत्तर में वह उसे कहने लगे- ‘इन्हें अंदर के कमरे में बिठाओ और चाय-काँफी से इनकी सेवा करो।’

चाय–कॉफी शब्द से मेरे शरीर में एक सिहरन उत्पन्न हुई, क्योंकि सुना था कि पुलिस महकमें में ऐसे कई कोड-वर्ड हैं अपराधियों को लाईन में लाने के लिए। उसके साथ चलते हुए अब मुझे हर वक्त और हर किसी को शायरी सुनाने और मजाक करने की अपनी आदत पर गुस्सा आ रहा था।

उतरते ही अर्दली मुझे ले गया एक बड़े कमरे तक और एक कुर्सी की ओर इशारा करते और बैठने के लिए कहते हुए पूछने लगा- ‘सर, चाय–कॉफी क्या पसंद करेंगे?’ मेरी दिल की घबराहट बढ़ती जा रही थी। मैने कहा- ‘एक ग्लास पानी मिल सकती है क्या?’ 

‘जरूर सर’ कहते हुए वह कमरे से निकला और पानी लेकर आ पहुँचा। पानी का ग्लास पकड़ते और उनकी शराफत को देखते हुए मैं सोचने लगा- क्यूँ लोग पुलिस महकमें के बारे में गलत राय रखते हैं?

मैं पानी पी ही रहा था कि डीएसपी एक महिला के साथ कमरे मे दाखिल हुए। जोरों से धड़क रहा मेरा दिल लगा बेकाबू हो रहा है। अर्दली को 3 कप चाय लाने का आदेश देते हुए डीएसपी ने अपनी रोबिली आवाज में मोहतरमा से पूछा- ‘अब बताइए मैडम, आप क्या कहना चाहती हैं?’

‘मुझे कुछ नही कहना है साहब, इनकी बातों को सुनकर मुझे गुस्सा जरूर आया था, पर अब इनकी शक्ल और उम्र को देखकर मुझे इन पर तरस आ रही है’- मोहतरमा कहने लगीं।

मोहतरमा की इन बातों से मुझे राहत महसूस हुई। अंदर ही अंदर उन्हें शुक्रिया अदा करने लगा। पर डीएसपी महिला पर गरज पड़े- ‘अब मुझे आप पर गुस्सा आ रहा है पुलिस के कीमती समय बरबाद करने की आपकी दुस्साहस पर।’ फिर मेरी ओर मुखातिब होते हुए कहने लगे- ‘अब आप बताइए जनाब, क्या किया जाय? छोड़ दिया जाय या बंद किया जाय, बोल इनके साथ अब क्या सलूक किया जाय।’

डीएसपी साहब का मजाकिया अंदाज भी मुझे बहुत प्यारा लगा। मेरी धड़कन अब तक शांत हो चुकी थी। मैंने अपनी हँसी रोकते हुए कहा- ‘क्या कहूँ साहब, शिकायत इन्होंने दर्ज की थी। अब यही बताएँ।’

डीएसपी एक कागज अपने र्इंसपेक्टर को देते हुए कहने लगें- ‘चाय खतम हो जाने पर इनसे लिखवाइए कि यह अपनी शिकायत वापस लेती हैं। मैं जरा इन्हें अब यहाँ कि हवा खिलाता हूँ। चलिए आवारा साहब, बाहर चलते हैं। कुछ देर आवारागर्दी हो जाय।’

अब मेरे दिल की धड़कन ही नही, जो अब तक सामान्य हो चुकी थी, रक्तचाप भी बढ़ने लगा यह सोचकर कि हवा खिलाने के नाम पर अब यह जनाब क्या गुल खिलाएँ। डीएसपी आगे-आगे और मैं उनके पीछे-पीछे चलने लगा। एक कमरे के आगे कुछ अर्दली बैठे थे। ज्यूँही उन्होंने अपने साहब को आते देखा, वे खड़े हो गये, सभी ने सलाम से उनका स्वागत किया और एक ने दरवाजा खोला। मेरी नजर कमरे के बाहर लगी नाम की पट्टी पर पड़ी। लिखा था- शंकर शर्मा, डीएसपी। अंदर घुसते ही कहने लगे- ‘तुमने अब भी नही पहचाना मुझे आवारा? मैने ही राजेश से कहा था कि वह मेरे बारे मे कुछ न बताए और तुझे मेरा नंबर दे दे। अब बता, शायरी करने और सुनाने के अलावा और क्या-क्या खुराफात कर रहे हो?’

कॉलेज के अपने दोस्त को एक लंबे अरसे के बाद इस रूप में पाकर मैं हैरान हो उठा। पुलिस की वर्दी से सजा गठिला शरीर, भरा चेहरा, गुलदस्ते के समान मूँछों से सजे उसके होंठ और चमकते लाल गाल उसके व्यक्तित्व को निखार रहे थे। कॉलेज के दिनों के एक शर्मिले, दुबले-पतले लड़के को आज इस रोबीले अंदाज में पाकर मैं बोल उठा- ‘यार तेरी पर्सनेलिटी तो दमदार हो गयी है। पर यार तू ने तो मेरी जान ही ले ली थी।’

‘अब बैठ गाड़ी में। किसी रेष्टराँ में आराम से बैठकर बातें करेंगे, कुछ खाएँगे, पीएँगे। तब तक जान लौट जायगी? बहुत दिनों बाद मिले हैं।’

कमेन्ट

Loading comments...