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प्रेम रहस्य - विज्ञान की दृष्टि में

person access_timeFeb 14, 2020 chat_bubble_outline0

१९८२ में आयी फ़िल्म शक्ति  में सदी के महानायक नायिका से फरमा रहे थे।।।

"जाने कैसे कब  कहां इकरार हो गया
हम सोचते ही रह गए और प्यार हो गया"।।।



ऐसा ही होता है जब किसी के मिलने पर हमारे ब्रेन के 'प्लेज़र सेंटर्स'' सक्रिय हो  उठते है और उनमें से कुछ रसायनों जैसे 'डोपामाइन', ''एड्रेनलिन', 'नोरएपिनेफरीन', 'फिरामोन्स' और 'सेरोटोनिन' का स्राव होने लगता है। हम सोचते ही रह जाते है और हमें प्यार हो जाता है। जब ये रसायन  'रिलीज' होते हैं तो।।।।

"मुझे दर्द रहता है, दिल में दर्द रहता है
मुझे भूख नहीं लगती, मुझे प्यास नहीं लगती
सारा दिन तड़पती हूँ, सारी रात जगती हूँ
जाने क्या हुआ मुझको, कोई दे दवा मुझको"।।।।। (दस नम्बरी, 1976)

यह सब तो गीतों के मशहूर डॉक्टर  मजरूह सुल्तानपुरी जी ने  बहुत पहले ही बता दिया था । हाँ ऐसी अवस्था में  गाल भी गुलाबी हो जाते हैं, उत्तेजना आती है, हथेलियों में पसीना आता है, दिल के धड़कने की रफ़्तार बढ़ जाती है और भी ना जाने क्या-क्या होने लगता है ?

इस अवस्था का वर्णन करते हुए साहिर लुधियानवी जी ने बताया था ।।।

"चेहरे पे खुशी छा जाती है, आंखों में सुरूर आ जाता है
जब तुम मुझे अपना कहते हो, अपने पे गुरुर आ जाता है"।।। (वक्त, 1965)



वैसे  इसके लिए जिम्मेदार है 'डोपामाइन'  नामक रसायन । उस विशेष खुशी के लिए जो किसी को देखकर तुरंत छा जाती है ।

समीर साहब ने कुछ यूँ फ़रमाया  था ।।।

"धक धक करने लगा
हो मेरा जियरा डरने लगा"।।।(बेटा, 1992)

तो साहेबाने  इस धक धक के लिए जिम्मेदार है 'एड्रेनलिन' और 'नोरएपिनेफरीन'।

अंजान साहब ने अपने अंदाज में इसे यूँ बयां किया था ।।।।

"जिधर देखूँ तेरी तस्वीर नज़र आती है
तेरी सूरत मेरी तकदीर नज़र आती है"।।।। (महान, 1983)।

विज्ञान  इसके लिए 'सेरोटोनिन' महाशय को जिम्मेदार कहता है । इनके कारण ही  दिल बार-बार बस एक ही चीज मांगता है। वैसे इसी को 'ऑब्सेसिव कंपल्सिव डिसऑर्डर'  भी कहते हैं । पागलों के डॉक्टर बोले तो 'साइकेट्रिस्ट'। अब इसका  वर्णन लक्ष्मीकांत प्यारेलाल जी ने कुछ इस तरह  किया था।।।

''मैं तेरे प्यार में पागल ऐसे घूमता हूँ
जैसे मैं कोई प्यासा बादल बरखा को ढूंढता हूँ'  (प्रेम बंधन, 1979)

'प्यारो तो ये है प्यार की बायोकेमिस्ट्री। ।


अब लगे हाथो  'भेलेन्टाइन डे' का पोस्टमार्टम भी कर  दें

आंनद बख्शी साहब ने लिखा था।।।

"हम तुमसे मिले फिर जुदा हो गए
देखो फिर मिल गए
अब हो के जुदा, फिर मिलें ना मिलें
क्यों ना ऐसा करें
मिल जाएं चलो हम सदा के लिए"।।।।(रॉकी, 1981)

बस कुछ-कुछ इससे मिलता जुलता ही है 'प्यार का प्रोटोकॉल'।

इसकी कुल तीन प्रारंभिक अवस्थाएं होती हैं :-

1। कामेच्छा (लस्ट)
2। आकर्षण  ( अट्रैक्शन ) और
3। आसक्ति ( इंट्रेस्ट )

सबसे पहले कामेच्छा जाग्रत होती है और इसके लिए जिम्मेदार हैं 'एस्ट्रोजन' और 'टेस्टोस्टिरोन' नामक ''हॉर्मोन्स''। ये  हमारे शरीर में ही बनते हैं । 'कूल ड्यूड' और 'कूल ड्यूडनी' दोनों में बनते हैं और जब ये 'रिलीज' होते हैं तो इलेक्ट्रॉन (लड़का) प्रोटॉन (लड़की) के चक्कर लगाने लगता है। और किन्ही विशेष परिस्थितियों में प्रोटॉन  भी इलेक्ट्रान के चक्कर लगा सकता है ।

इसके बाद आता है 'आकर्षण'। यह लम्हा जिंदगी का सबसे हसीन लम्हा होता है। सारी क़ायनात गुनगुनाती नज़र आती है। गधी भी हूर  नजर आने लगती है   बंदे को  !  और  सारी बंदियों  को लँगूर भी  अमित्ता बच्चन !!  और  शुरू होता है फ़साना या अफ़साना ।।।

"वो हसीन दर्द दे दो जिसे मैं गले लगा लूँ,
वो निगाह मुझ पे डालो कि मैं जिंदगी बना लूँ"।।।(हमसाया, 1968)

 और इस आकर्षण के लिए जिम्मेदार होते  हैं।।।।।

१- 'एड्रेनलिन'
२- 'डोपामाइन' और
३- 'सेरोटोनिन'


किसी के प्रति आकर्षित होने पर जिंदगी ही बदल जाती है और बदल जाता है  आदमी का पूरा व्यक्तित्व। जब आपका 'माशूक' या आपकी 'माशूका' सामने आते हैं तो 'सेंस' काम करना बंद कर देती है, दिल बेकाबू हो जाता है, हलक सूख जाता है और मुँह से आवाज नहीं निकलती और ऐसा लगता कि जीभ पर कांटे उग आए हों। इन सबके लिए जिम्मेदार है यही 'एड्रेनलिन'। भूख कम हो जाती है। आंखों से नींद उड़ जाती है क्योंकि 'डोपामाइन' अपना जलवा दिखा रहा होता है। 'डोपामाइन' एक किस्म का 'न्यूरोट्रांसमीटर' है। और फिर बारी आती है 'सेरोटोनिन' की। 'सेरोटोनिन' आपके 'माइंड' को 'डाइवर्ट' कर देता है। उस समय आपको बस हर जगह अपना  प्यार  ही ,प्यारा ही दिखाई देता है और आप गुनगुनाने लगते हैं।।।।

"तेरे ख्यालों में हम तेरी ही बाहों में हम
अपने हैं दोनों जहां हो जाएं बेखुद यहां" ।।।(गीत गाया पत्थरों ने, 1964)।

इन दोनों 'स्टेज' के बाद बारी आती है तीसरी' स्टेज' की ।  इसे आसक्ति कहते हैं।

इसके लिए भी दो ''हॉर्मोन्स'' जिम्मेदार हैं । 'ऑक्सीटोसिन' और 'वैसोप्रेसिन' ।

मजरूह सुल्तानपुरी साहब ने एक बार आसक्ति का वर्णन इस प्रकार किया था ।

"घड़ी मिलन की आई आई तू छुट्टी लेकर आजा
प्यार की बीन बजे न अकेले तू जरा साथ निभा जा"। (एक बाप छह बेटे, 1968)।

प्यार की बीन एक साथ मिलकर बजाने से 'रिलीज' होता है 'ऑक्सिटोसिन'। प्यार को गहरा और बहुत गहरा करने के लिए 'ऑक्सिटोसिन' बेहद जरूरी है और प्यार को 'लॉन्ग लास्टिंग' बनाने के लिए 'वैसोप्रेसिन'।


प्यार का प्रोटोकॉल जारी रखेंगे मूड़ होने पर और भी बहुत कुछ लिखते रहेंगे । आज के लिए इतनी ही 'डोज' काफी रहेंगी । वैसे इरादा क्या है आपका ? सिर्फ पढ़ते ही रहेंगे या इन ''हार्मोन्स'' के निर्माण के लिए कुछ प्रयास भी करेंगे ?

लेखक परिचय - सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक अन्वेषक, शाम 5 बजे से सुबह 10 बजे तक विचारक । मर्यादा क्रम में भारत के  २७वें  नागरिक।

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