हिंदी संस्करण

साहित्य

मुक्ति का उपाय (हास्य व्यंग्य) access_timeभदौ ९, २०७७

नहा-धोकर पूजा पाठ करने बैठा तो मन बेचैन था। शांत हो भी तो कैसे? कोरोना कहर पर कहर ढाता जा रहा है। जैसे जैसे संक्रमण की संख्या बढ़ती जा रही है, वैसे वैसे ही मृत्यु की संख्या भी इकाई, दहाई की संख्या को लाँघते हुए सैकड़ा पर पहुँच गई है। इस हालात की गंभीरता को सम...

"अभीप्सा की दलदल" access_timeसाउन २६, २०७७

पृथ्वी पर परमात्मा की एक ही तो श्रेष्ठ, सुन्दरतम उर्ध्वमुखी, विकासमुखी, जिज्ञासु राग-अनुराग से ओतप्रोत रचना है मानव- श्रेष्ठ मानव व्याप्त हैं जिसमें अनंत अनन्त संभावनाएं सृष्टि रुपी बगीचे की ऐसी कली जो जब आ जाती है   अपनी सकारात्मक, सृज...

आचरण access_timeसाउन ४, २०७७

सार्वजनिक बसों कें सड़क पर उतरने का समाचार प्रसारित होने पर उत्साहित होते हुए, या कहें, जोश में होश खोते हुए मैं भी लगभग चार महीने के बाद घर से बाहर निकल पड़ा, पिंजड़े के पंक्षी के समान। यद्यपि लॉकडाउन हटाने की घोषणा नही हुई थी और कोरोना के कहर का त्रास भी नही ...

परिवर्तन access_timeअसार २६, २०७७

रात्रि के भोजन के पश्चात सभी टी.वी. देख रहे थे। एकाएक रोशनी गुल हो गयी। बहुत दिनों के बाद इस तरह बिजली चली गयी थी। मैने पत्नी से कहा- ‘देखो तो आलमारी में एक कोने में मोमबत्ती होगी। ले आओ।’ पोता कहने लगा- ‘मैं ले आऊँ दादू?’ मैने क...

उपदेश access_timeअसार १७, २०७७

सड़क पर सूनापन छाया हुआ था। किसी वाहन की प्रतीक्षा में मैं बस स्टॉप पर खड़ा था। एकाएक एक मोटर साइकिल आकर रुकी और मोटर साइकिल चालक पूछ बैठा- ‘कैसे खड़े हो भैया?’ सिर पर हेलमेट, आँखों के ऊपर काला चश्मा और नाक और होठों को ढकती हुई कपड़े की काली पट्ट...

मैं और मेरी शायरी access_timeअसार ५, २०७७

लॉकडाउन में ढील दिए जाने के बावजूद मैं घर से बाहर निकलने की हिम्मत जुटा नही पाया था। अतः अध्ययन कक्ष मैं बैठकर एक लेख की तैयारी कर रहा था। तभी दरवाजे पर दस्तक देते हुए नौकर आया और कहने लगा-‘साहब, नीचे पुलिस आई है, आपको पूछ रही है।’ ‘मु...

नक्शा औंर स्वाभिमान access_timeजेठ १३, २०७७

नक्शा तुम्हारा भी है नक्शा हमारा भी है आपका बड़ा नक्शा हमारा छोटा सा नक्शा अंतर नक्शे के आकार में है मानचित्र का आत्म-सम्मान समान है। आपके देश के मानचित्र पर अरबों लोग हैं हमारे देश के मानचित्र पर करोडों लोग हैं फर्क सिर्फ देश और संख्या का है मनुष्य का स्वाभ...

फिकुरी की बर्फ में अशोक सिलवाल की पुस्तक का विमोचन access_timeफागुन १९, २०७६

काठमांडू। लाङटाङ सद्भावना दूत रहे पत्रकार अशोक सिलवाल की नवीनतम पुस्तक 'श्रीलंका स्मृति’ को उनके गाँव नुवाकोट के फिकुरी में विमोचित किया गया है। फिकुरी ट्रेल एक्सप्लोरेशन ट्रिप के सहभागी पदयात्री समूह के द्वारा किस्पांग गांवपालिका के फिकुरी ...

प्रेमगीत access_timeफागुन २, २०७६

  तुम स्वयं को सजाती रहो रात-दिन रात-दिन मैं स्वयं को जलाता रहूँ तुम मुझे देख कर मुड़ के चलती रहो मैं विरह में मधुर गीत गाता रहूँ   मैं ज़माने की ठोकर ही खाता रहूँ तुम ज़माने को ठोकर लगाती रहो जि़ंदगी के कमल पर गिरूँ ओस-सा ...

प्रेमगीत access_timeफागुन २, २०७६

                           प्रीत की तुम परीक्षा न लेना प्रिये प्रेमियों से मै आगे  निकल जाऊँगा , दीप की लौ सी तुम टिमटिमाती रहो मैं पतिंगे के मानिंद जल जाऊँगा । इतना संताप मे...

प्रेम रहस्य - विज्ञान की दृष्टि में access_timeफागुन २, २०७६

१९८२ में आयी फ़िल्म शक्ति  में सदी के महानायक नायिका से फरमा रहे थे।।। "जाने कैसे कब  कहां इकरार हो गया हम सोचते ही रह गए और प्यार हो गया"।।। ऐसा ही होता है जब किसी के मिलने पर हमारे ब्रेन के 'प्लेज़र सेंटर्स'' सक्रिय ...

कविता - बंग सुन्दरी access_timeफागुन २, २०७६

पहली मुलाकात के बाद उसनें 'भैलेन्टाइन डे' पर कार्ड भेज मुलाकात की स्मृतिया ताजी करा दी। एक कवि प्रत्युत्तर मे कविता लिखने के अतिरिक्त और कर ही क्या सकता था ? 22-23 वर्ष पूर्व लिखी गई यह कविता अप्रकाशित थी। अब जब काठमाडूं से हिन्दी मे रातोपाटी ने अपना संस्कर...

जिसके पीठ पर (कविता) access_timeमाघ २२, २०७६

–सीताराम अग्रहरी जिसके पीठ पर चाबुक हो तैयार हर घुड़सबार आदमी को घोड़ा समझे और कहे आओ प्यारे मान जाओ ! स्वतंत्रता, समानता और न्याय विश्वास करो हम तुम्हारें हैं मान जाओ ! कुछ घोड़े भी हरे हरे घास देख देखे ललचायी नजरों से मालिक हेलिकप्टर से मर्निङ वा...