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कहर कोरोना का (हास्यव्यंग्य)

person access_timeMar 28, 2020 chat_bubble_outline0

आज सारा विश्व कोरोना के भय से काँप रहा है। हर ओर त्रास, मौत और शोक का साया छाया हुआ है। अणु और परमाणु के विनाशकारी प्रभावों से वाकिफ मानव जाति, विशेषतः वैज्ञानिक वर्ग भी शायद इस बात से परिचित नही थे कि कोविड–19 नामका यह क्षुद्रतम जीव (वायरस) कभी प्रकट होकर संक्रमण का इतना विकराल रूप लेगा और संसार पर कहर ढा देगा। अन्यथा वे इस पिद्दी का भी टीका निकालकर बैठे होते। पर इस वायरस ने सभी को चकमा देते हुए अपना शिर उठाया और संसार को यह बताने लगा कि तुम आज तक जिसे एक क्षुद्रतम जीव समझ रहे थे हम वह नही हैं। उनमें से नही हैं। देखा न, कोरोना ने दुनिया के सबसे ताकतवर देश और संगठन तक को झकझोर कर रख देने में कोई कसर नही छोड़ी है। सभी त्राहि त्राहि कर रहे हैं।

भय और त्रास के इस माहौल में मैं भी हालातों क्री नाजुकता को देखते हुए अपने प्राण की रक्षा हेतु घर के एक कोने में उसी तरह दुबककर बैठ गया जिस प्रकार एक चूहा संभावित खतरे को भाँप कर अपने प्राण बचाने हेतु दुबक जाता है। हसबैंड होने का मेरा अभिमान अब हाउस–बन्द है। खिड़की से झाँक रहा था तो बेगम चिल्ला उठी– ‘क्या यह तमाशा देखने का समय है। अगर अभी कोरोना की नजर पड़ गयी तो नाक ही नही फेफड़े भी काम करने लायक नही रहेंगे। बंद करो यह खिड़की। चलो देखते है टी.वी.। तुम्हें देश–विदेश के चैनलों से समाचारों को सुनने और हर ओर के नजारों को देखने का मौका मिल जायगा।’

 

एक आज्ञाकारी शिष्य की तरह खिड़की बंद की और चल पड़ा उनके पीछे। टी. वी. ऑन की तो वह एक कोने में कुर्सी लगाकर बैठ गईं। मैने पूछा– ‘यह क्या है?’

 

कहने लगीं– ‘सोशल डिसटैंसिंग।’

 

उनका यह परिहास अच्छा लगा। फिर भी कह बैठा–‘पति पत्नी में भी क्या सोशल डिसटैंसिंग! जरा पास आओ।’

 

‘क्यों?’

 

रोमांटिक होते हुए मैं कहने लगा– ‘पास बैठो तबियत बहल जायगी, मौत भी आयेगी तो टल जायगी।’ इतना कहना था कि उबल पड़ी– ‘हाय राम। तुम मेरी मौत की सोच रहे हो।’ उनकी इन बातों से मेरा रोमांटिक मूड उड़नछू ही नही हुआ उन्हें समझाने की नौबत आ पड़ी। कहना पड़ा कि मैडम यह एक फिल्म के गीत का मुखड़ा है। क्या तुमने यह गीत नही सुनी है।’

 

माहौल सँभला तो नजर टी.वी. के पर्दे पर टीकी। जो नजारे पर्दे पर आ रहे थे उससे मन में खिन्नता के भाव उभरने लगे। भीड़भाड़ वाली सड़कें सूनी सूनी। न कोई लड़का न कोई लड़की। कभी मोटर गाडि़यों और बसों से भरी रहने वाली सड़कों पर छाया यह सूनापन उन दिनों की याद दिलाने लगा जब वहाँ सुनायी पड़ने वाली भोपूँ की आवाजों से कान फटता हुआ सा अनुभव होता था। दो–चार सुरक्षाकर्मी हाथों में डंडे लिए हुए घूम रहे थे– नाकों पर पट्टियाँ बाँधे, पर आँखें खुली। उनकी उपस्थिति सड़क के इस सूनेपन को चीर रही थी। उन्हें और उनकी कर्तव्यपरायणता को देखकर उन पर गर्व होने लगा। मन ही मन उन्हें शुक्रिया अदा की। तो साथ ही उनके प्रति सहानुभूति के भाव भी उभरने लगे। यह सोच मन को विचलित भी करने लगा कि ये कर्तव्यपरायण राष्ट्रसेवक खुली आँखों से अपने कर्तव्यों का पालन कर रहे हैं, जबकि कोरोना तो आँखों से भी घुसकर फेफड़ों पर घर बसाते हुए कहर ढा देता हैं। फिर सोचने लगा – अगर ये बेचारे आँखों पर पट्टियाँ बाँध लें तो कैसे देख पायेंगे उन लोगों को, जो सरकारी नियमों का उल्लंघन कर सड़क पर अपनी धाक जमाने की धुन में होते हैं। (हालाँकि मास्क के साथ साथ काली ऐनक भी दी जाती तो इन राष्ट्रसेवकों को अपने कर्तव्यों के पालन में शायद कोई दिक्कत नही होती।)

इस सोच में डुबा ही था कि टेलिविजन पर एक दूसरा दृश्य प्रकट हुआ। इसे देखकर त्रास और खिन्नता से भरे इस माहौल में भी हँसी फूट पड़ी। हालाँकि यह प्रहसन का कोई कार्यक्रम (धारावाहिक) नही था। वरन् लॉकडाउन संबंधी सरकारी नियमों की धज्जियाँ उड़ाते हुए सड़क पर निकलने वाले उन मनचले युवकों और अधेड़ उम्र के लोगों को उठा–बैठी करते हुए सजा दिये जाने का दृश्य था, जो टी. वी. से देखने को मिल रहा था। मुझे हँसते हुए देखकर बेगम उठ पडीं। शायद उन्हें ऐसे त्रासदीपूर्ण वातावरण में मेरा हँसना अच्छा नही लगा। अब हँसी ही तो है। पूछकर तो हँसा नही जा सकता। हालाँकि मुझे गर्व हो रहा है अपने उन देशवासियों पर जो सरकारी नियमों का पूरी तरह पालन करते नजर आ रहे हैं। उन्हें उठा–बैठी नही करनी पड़ रही है। घुटने के बल बैठने की सजा भी नही मिल रही है। एकाएक कमरे में फैली मिठी खुशबु से मेरा ध्यान भंग हुआ। पूछने लगा – ‘क्या बन रहा है बेगम?’ 

कोई जबाव नही मिला। उठकर देखने की जुर्रत नही की। पर बेगम कुछ देर बाद तश्तरी पर चाय और पकौड़े ले आयीं। अच्छा लगा। इस तनावपूर्ण वातावरण में गरम–गरम पकौड़े और चाय। वैसे जब से हाउस–बंद हूँ कोई न कोई पकवान मिलता रहता है। कभी सूजी से बना हलवा तो कभी उपमा, कभी उत्तपम तो कभी मैदे से बने नमकीन के टुकड़े। खुश होकर उन्हें गले लगाने का दिल करने लगा। पर थैंक यू मैडम में ही सीमित होते हुए पकौड़े का स्वाद लेने लगा। क्योंकि इस माहौल में गले लगाना नही दूरी बनाये रखने की आवश्यकता बार–बार बताते हुए कहती रहती हैं– ‘गले मत लगा करो। दूर रहो– कम से कम एक मीटर दूर।’ अब बताइए जनाब, किराये के घर के एक छोटे से कमरे में भला इतनी जगह कहाँ होती है कि बीबी से भी एक मीटर की दूरी बनाकर रहा जाय?

 

मन मसोसकर रहना पड़ता है। यह कोरोना क्या आया, हर ओर तनाव है छाया। घर हो या बाहर, कहीँ छाई है बरबादी और कहीँ है उदासी। इस कहर को शीघ्र दूर करो श्रीपशुपतिनाथ, करबद्ध प्रार्थना है मेरी। जीवन को फिर खुशहाल बना दो।

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