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गांव-गांव में कोरोना का त्रास, पत्तों को मास्कों की तरह प्रयोग करते गांववाले

person access_timeMar 26, 2020 chat_bubble_outline0

रायपुर। भारत के छत्तीसगढ राज्य के ग्रामीण क्षेत्र में भी कोरोना वायरस के संक्रमण फैलने के डर से सर्वसाधारण लोग घर में ही सीमित होकर आवश्यक सुरक्षा तथा सतर्कता के उपायों को अपना रहे हैं।

कोरोना वायरस के संक्रमण से बचने के लिए कोई तीन परतोंवाले मास्क को लगाने का सुझाव दे रहा है तो कोई ‘एन 95’ मास्क लगाने की बात कर रहा है। लेकिन भारत के गांवों में अभी भी इस किस्म के मास्कों के उपलब्ध ना होने के कारण स्थानीय लोगों ने साल के पत्तों को मास्क के रूप में प्रयोग करना शुरू कर दिया हैं।


काँकेर जिले के अंतागढ के पंचायत भवन में आयोजित की गई बैठक में अदिवासी परिवार के सदस्य पत्ते के मास्क लगाकर आए थे। भर्रीटोला गांव के एक युवक ने कहा, ‘हम लोगों के पास दूसरा मास्क नही है, इसीलिए घर से बाहर निकलते समय हम पत्तों का मास्क के रूप में प्रयोग करते हैं।


एक स्थानीय न्यूज बेवसाइट के लिए काम करनेवाले टोकेश्वर साहु के अनुसार पत्ते से बनाया गया मास्क ग्रामीण क्षेत्र में लोकप्रिय हो रहा है।


‘देखते ही देखते इस प्रकार के मास्कों का प्रचलन बहुत सारे गांवों मे हो चुका है, आदिवासी परिवार के सदस्य इस मास्क को दिनभर पहनते हैं तथा दूसरे दिन के लिए फिर नया बनाते हैं।’



रायपुर के चिकित्सक डॉ अभीजित तिवारी के अनुसार आदिवासी समाज अपनी वर्षों पुरानी परम्परा और ज्ञान से हम लोगों को समृद्ध बनाता आया है। डॉ तिवारी ने आदिवासी क्षेत्र में कपडें का मास्क निःशुल्क वितरण करने के लिए सरकार से माग भी की है।


बस्तर क्षेत्र के आदिवासी लोगों के जीवन में पत्ते का विशेष महत्त्व रहा है। वे लोग खाना खाने के लिए भी साल, सिउडी, पलास के पत्ते का प्रयोग करते हैं।

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