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बन रहा है नया चन्द्रमा

मानवता का नया मक्का, काशी एवं जेरुसलम बनेगा चीनिया शहर चेंगदू

person access_timeFeb 08, 2020 chat_bubble_outline0

खगोल विज्ञान में रूचि रखने वाले अधिकांश मानवो को विदित ही है कि चन्द्रमा के मामले में प्रकृति ने पृथ्वी के साथ बड़ी नाइंसाफी की है ।वामन ग्रह यम अर्थात प्लूटो के पास ५ चन्द्रमा है । पृथ्वी के अतिरिक्त सौर्यमंडल के किसी भी ग्रह में जीवन नहीं है । जीवनधारिणी पृथ्वी के नसीब के सिर्फ एक ! और मजाक भी गजब- मंगल ग्रह के  ( मार्स )  पास २, अरुण ग्रह के  (युरेनस )  पास २७ ,वरुण ग्रह के  ( नेप्चून )  हिस्से में १३ चन्द्रमा मौजूद है ।

पिछले साल तक ६९ चन्द्रमा संख्या लेकर ब्रहस्पति ग्रह (जुपिटर) इस मामले में सबसे धनवान कहलाता था । शनि ग्रह ( सैटर्न ) ६२ चन्द्रमाओ के साथ सौर्यमंडल का दूसरे नंबर का धनपति हुआ करता था । बृहस्पति और शनि के बीच पृथ्वी के' बिल गेट्स' एवं 'जेफ़ बोजेस' जैसी (कौन बड़ा धनपति ) प्रतिष्पर्धा चली आ रही है जबसे मानवो ने टेलिस्कोप का आविष्कार किया है । कभी गेट्स तो कभी बोजेस विजयी होते है ।

कुछ दिन पहले, शनि ग्रह ने बाज़ी जीत ली है । अमेरिका की 'कार्नेगी इंस्टिट्यूट ऑफ़ साइन्स' के अंतरिक्ष वैज्ञानिक स्काट एस शेफर्ड की टीम ने हवाई द्वीप स्थित सुबारू टेलिस्कोप की सहायता से शनि के २० नए चन्द्रमा खोज निकाले  है । उनकी इस खोज से शनि के चन्द्रमाओ की संख्या ८२ जा पहुंची है।

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शनि ग्रह ने बाज़ी जीत ली है । अमेरिका की 'कार्नेगी इंस्टिट्यूट ऑफ़ साइन्स' के अंतरिक्ष वैज्ञानिक स्काट एस शेफर्ड की टीम ने हवाई द्वीप स्थित सुबारू टेलिस्कोप की सहायता से शनि के २० नए चन्द्रमा खोज निकाले  है । उनकी इस खोज से शनि के चन्द्रमाओ की संख्या ८२ जा पहुंची है।


स्काट ने जो नए २० चन्द्रमा पत्ता लगाए है उनमे से ३ चन्द्रमा शनि ग्रह की अक्षीय गति के मुताबिक (प्रोग्रेड ) एवं अन्य १७ चन्द्रमा अक्षीय गति के विपरीत ( रेट्रोग्रेड ) दिशा में शनि ग्रह की प्रदक्षिणा करते है । इनमें से २ चन्द्रमा अपने ग्रह की परिक्रमा २ साल में एवं अन्य बाकी १८  चन्द्रमा अपनी परिक्रमा तीन साल में पूरी करते है ।

पृथ्वी का प्राकृतिक चन्द्रमा अपने ग्रह यानी हमारी पृथ्वी की एक परिक्रमा २७ दशमलब ३ दिनों में पूरी करता है । 'यह हम मनुष्यो का नहीं वरन शस्य श्यामला पृथ्वी का ही दुर्भाग्य है कि उसके आकाश में महज एक चन्द्रमा प्रदान किया प्रकृति ने ! हमारी राते, रात होने की वजह से अंधेरी नहीं है वरन इसका मूल कारण पृथ्वी की नियति में फगत एक ही चन्द्रमा होना है ।'

कल्पना कर देखे ,पृथ्वी के आकाश में भी शनि के माफिक ७०-८० चन्द्रमा होते तो यहाँ का मंजर कैसा होता !? पर मित्रो ! ऐसा होने पर हमारे बिचारे कवियों की जान पे बन आती ।सोचते नहीं बनता प्रेमिका के मुहार की तुलना कौन से चन्द्रमा से की जाये ! प्रेयसी भी तुनकमिजाजी करती ," मै तुम्हे क्या 'फोबोस'( मंगल ग्रह का एक चाँद ) सी दिखती हूँ ? अरे 'टाइटन' लिखते, 'रिया' लिखते ,'टेथिस', 'डीओन', 'हिपेरायन', 'आयो', 'यूरोपा',' कैलिस्टो' ( सभी चन्द्रमाओ के नाम ) लिखते ! वैसे इतना जान लो, मेरी तुलना सिर्फ और सिर्फ गैनिमीड से हो सकती है ( गैनिमीड -ज्ञात सबसे बड़ा चन्द्रमा,जो ब्रहस्पति ग्रह के पास है ) ।

मानव उत्पत्ति काल से आधुनिक विकास तक प्रकृति के साथ हुए संघर्ष में अपना अस्तित्व बचाते आया है ।मै लिख रहा हूँ ,कुछ देर बाद आप पढ़ रहे होंगे । हमारे पूर्वज प्रकृति के साथ हुए संघर्ष में यदि विजित न हुए होते तो इतना निश्चय जानिये मेरी और आप की जगह कोई अन्य ही प्रजाति के सदस्य ऐसा निष्कर्ष निकाल रहे होते ," फ्यू मिलियन इयर्स बिफोर देयर वाज सम काइंड ऑफ़ एनीमल काल्ड होमो सेपियंस !"
आधुनिक मानव प्रकृति के साथ  किये गए अनवरत संघर्ष के सोपान   में नया आयाम रचने अग्रसर हो रहा है ।यह नया आयाम है पृथ्वी के लिए ढेरों नए चन्द्रमा बनाने का अभियान । इस संघर्ष में मिली विजय रात्रि शब्द को शब्दकोष में धकेल देगी ।

दिन और रात्रि में मूल अंतर प्रकाश की मात्रा का ही तो है ।कल्पना कीजिये ,आपके शहर के ऊपर ,३०० किलोमीटर की दुरी पर एक वर्ग किलोमीटर जितना  कोई पिंड यदि स्थिर रख दिया जाए तो आपकी राते समाप्त हो जाएंगी । आप लोंगो को विदित ही है हमारा प्राकृतिक चन्द्रमा भी यही काम करता है । चंद्र धरातल से टकराकर पृथ्वी तक आने वाली सूर्य किरणों को ही हम चंद्र किरण कहते है । सूर्य के अतिरिक्त सौर्यमंडल के किसी भी खगोलीय पिंड में प्रकाश की अपनी व्यवस्था नहीं है सभी सूर्य पर निर्भर है । हाँ ,इस मामले में हम मानवो ने अपने पुरुषार्थ से पृथ्वी पर प्रकाश की वैकल्पिक व्यवस्था की है पृथ्वी पर सूर्य से भी ज्यादा ताप मनुष्य बना चुका है ।

सौर्यमंडल के आदि यावत पिंडो के व्यवस्थापन ,उनकी अक्षीय गति,आकार एवं अपने मातृ तारा की परिभ्रमण अवधि तथा अन्य बहुतेरे कारणों के चलते किसी भी खगोलीय पिंड (ग्रह -उपग्रह आदि ) में सूर्य का प्रकाश हमेशा एक सा नहीं पड़ता है ।

पृथ्वी की ही बात करे ,इसके जिस भाग में सूर्य का प्रकाश पड़ता है वहां दिन और जहाँ प्रकाश नहीं पड़ता वहां रात्रि होती है ।पृथ्वी और चन्द्रमा की दूरी  (तीन लाख चौरासी हज़ार किमी ) के कारण चंद्र धरातल से परावर्तित होकर पृथ्वी तक आने वाली प्रकाश किरणों की त्वरा  में मधुरता आ जाती है ।चन्द्रमा के आकार का कोई पिंड अथवा चन्द्रमा स्वयं डेढ़ दो लाख किमी नजदीक होता तो हमारी राते भी दिन के सदृश्य उजियारी होती ,और यह उजियारा सूर्य सा प्रचंड भी न होता ।

इस लेख का मूल विषय निकट भविष्य में चीन के द्वारा बनाये जाने वाले कृत्रिम चन्द्रमा विषयक है । चीन २०२२ तक चिनिया शहर चेंगदू के आकाश में कृत्रिम चन्द्रमा बनाने जा रहा है ।' तियान फु न्यू एरिया साइन्स सोसाइटी' के प्रमुख वू चुन्फेन्ग का कहना है - हमारे द्वारा निर्मित किये जाने वाले कृत्रिम चन्द्रमा की रोशनी प्राकृतिक चन्द्रमा (पूर्णिमा - कृत्रिम चन्द्रमा सदैव पूर्णिमा की भांति रहेगा ) से ८ गुना ज्यादा होंगी ।

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चीन २०२२ तक चिनिया शहर चेंगदू के आकाश में कृत्रिम चन्द्रमा बनाने जा रहा है ।' तियान फु न्यू एरिया साइन्स सोसाइटी' के प्रमुख वू चुन्फेन्ग का कहना है - हमारे द्वारा निर्मित किये जाने वाले कृत्रिम चन्द्रमा की रोशनी प्राकृतिक चन्द्रमा (पूर्णिमा - कृत्रिम चन्द्रमा सदैव पूर्णिमा की भांति रहेगा ) से ८ गुना ज्यादा होंगी ।


किसी भी शहर के ऊपर कृत्रिम चन्द्रमा स्थापित करना आज के विज्ञान के सामने कोई बहुत बड़ी चुनौती नहीं है । असली चुनौती इस तरह बनाये गए किसी भी कृत्रिम चन्द्रमा को शहर के आकाश के ऊपर फोकस करके रखने में है । पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के कारण अंतरिक्ष में भेजी गई कोई भी वस्तु पृथ्वी की ओर गिरने के साथ पृथ्वी की परिक्रमा करती है । आपको मालूम होना चाहिए ,केवल पृथ्वी ही अपने अक्ष में नहीं घूमती है वरन पृथ्वी के ऊपर का वायुमंडल भी उचाई अनुसार अलग अलग गति से घूमता है । अगर सिर्फ पृथ्वी ही अक्ष पर घूमती ,वायुमंडल न घूमता तब तो एक बैलून में हवा भरकर कुछ किमी ऊपर जाकर इंतज़ार करते, कब नीचे न्यूयॉर्क आ जाये ओर हम ''लैंड'' कर दे,इस तरह कुछेक किमी की यात्रा में ही हम सम्पूर्ण पृथ्वी बगैर वीसा के घूम लेते । पर ऐसा होता नहीं है ।

"इल्युमिनेशन सैटेलाइट " नामक इस परियोजना के प्रमुख वू चुन्फेन्ग के समक्ष निर्माणाधीन चन्द्रमा को चेंगदू शहर के आकाश में केंद्रित रखने एवं पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण प्रभाव से बचाये रखने जैसी प्रमुख चुनौतियां है । इस कार्य हेतु उनके कृत्रिम चन्द्रमा के इंजन को प्रतिपल चलाये रखना होगा । आप जो अन्य सैटेलाइट के बारे में पढ़ते सुनते है उनके सन्दर्भ में ऐसी बाध्यता नहीं होती क्योकि उन्हें किसी एक ही शहर के ऊपर फोकस करके रखना नहीं होता ।'' इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन'' ( आईएसएस ) की ही बात करे यह पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण प्रभाव से गति करता है । यह पृथ्वी की एक परिक्रमा ९० मिनट में पूरी कर लेता  है 'स्पेस स्टेशन' को गति करने के लिए अपनी ऊर्जा खर्च करने की जरुरत नहीं पड़ती। 'स्पेस स्टेशन' के अंदर रहने वाले यात्री एक दिन में १६ बार सूर्योदय ओर सूर्यास्त का मंजर देखते है । देखिये तो सूर्योदय ओर सूर्यास्त भी सापेक्ष बाते है सापेक्ष बाबा आइंस्टीन की जय हो । प्रकृति में सापेक्षता हर जगह वजूद रखती है ।

चीनिया  चन्द्रमा ''स्पेस स्टेशन'' के थोड़ा नीचे स्थापित करने की योजना है ।यह आकार में ''स्पेस स्टेशन'' से भी बड़ा होगा । ''स्पेस स्टेशन'' का आकार फुटबॉल के मैदान जितना है ,और इसे अंतरिक्ष में तीन टुकड़ो में विभाजित करके भेजा गया था। अंतरिक्ष में तीनो टुकड़े जोड़कर वैज्ञानिको ने इसे मौजूदा आकार प्रदान किया था । चीन अपने कृत्रिम चाँद रूपी ''सैटेलाइट'' को कितने टुकड़ो में प्रक्षेपित करेगा इसकी अभी तक कोई जानकारी नहीं दी गयी है । वैसे रूस ,अमेरिका और चीन के पास विभिन्न टुकड़ो में कोई भी वस्तु प्रक्षेपित कर उन्हें अंतरिक्ष में जोड़ने की प्रविधि सम्पन्नता मौजूद है । चीन का यह चन्द्रमा ( आप इसे सैटेलाइट कह सकते है जो भी वस्तु अंतरिक्ष में रहकर पृथ्वी का चक्कर लगाए वह सैटेलाइट , चन्द्रमा है) ८० वर्ग किमी क्षेत्रफल के अन्धकार को गुलजार करेगा ।

संसार भर के वैज्ञानिको के लिए चीन की तरह चन्द्रमा बनाना कोई मुश्किल कार्य नहीं है । पर प्राथमिक दिक्कत वही आन पड़ती है । इस तरह बनाये गए चन्द्रमा को किसी एक ही शहर के ऊपर फोकस करके कैसे रखा जाए ? चीन जिस 'स्पेस आर्बिट' में चन्द्रमा स्थापित करने जा रहा है वह लगभग ९२ से ९७ मिनट की'आर्बिट' होगी। इसका सीधा अर्थ यह है कि चीन का यह चाँद ९२ से ९७ मिनट के अंदर पृथ्वी का एक चक्कर लगाएगा ,मतलब चीन का चन्द्रमा चेंगदू शहर के ऊपर फोकस नहीं रह पायेगा । इसको चेंगदू शहर के आकाश में ही फोकस करके रखने के लिए लगभग ७ किमी प्रति सेकेण्ड अर्थात २७४०० किमी प्रति घंटे की गति से वेगवान रखना पड़ेगा । इस प्रकार इस चन्द्रमा को प्रतिपल वेगवान रखने के लिए निरंतर पृथ्वी से ईंधन आपूर्ति करनी पड़ेगी । यह अपने आप में बड़ा महगा सौदा होगा ।

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वैसे तो ''स्पेस स्टेशन'' पृथ्वी की परिक्रमा अपने इंजन को प्रज्वलित किये बगैर करता है, पृथ्वी की परिक्रमा करने के लिए उसे अपना बल नहीं लगाना पड़ता । अब चूँकि पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के कारण वह शनैः शनैः अपनी ''आर्बिट'' से नीचे आ जाता है उसे पुनः'' फिक्स आर्बिट'' में स्थापित करने के लिए उसके इंजन को दागा जाता है ।


आपको मालूम होना चाहिए ,''इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन'' के लिए ईंधन एवं वहां रहने वाले यात्रियों के लिए दैनिक उपभोग की वस्तुए निरंतर पृथ्वी से भेजी जाती है ।पृथ्वी से अंतरिक्ष तक की माल ढुवानी का खर्चा लगभग १५ हज़ार डॉलर प्रति किलोग्राम लगता है । वैसे तो ''स्पेस स्टेशन'' पृथ्वी की परिक्रमा अपने इंजन को प्रज्वलित किये बगैर करता है, पृथ्वी की परिक्रमा करने के लिए उसे अपना बल नहीं लगाना पड़ता । अब चूँकि पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के कारण वह शनैः शनैः अपनी ''आर्बिट'' से नीचे आ जाता है उसे पुनः'' फिक्स आर्बिट'' में स्थापित करने के लिए उसके इंजन को दागा जाता है ।इस प्रकार 'स्पेस स्टेशन' को 'आर्बिट' में पुनः पुनः स्थापित करने के लिए वार्षिक रूप में लगभग १५ हज़ार लीटर "फ्यूल"( Unsymmetrical Dimethylhydrazine ) और 'आक्सीडाइजर' के रूप में 'नाइट्रोजन टेट्रोआक्साइड' की आवश्यकता पड़ती है। यह १५ हज़ार लीटर ईंधन रखरखाव के लिए पृथ्वी से 'स्पेस स्टेशन' को भेजना पड़ता है।

''स्पेस स्टेशन'' की तुलना में चीनिया  चन्द्रमा को चेंगदू शहर के ऊपर फोकस करके रखने के लिए अत्यधिक ईंधन की आवश्यकता आन पड़ेगी। इतनी बड़ी मात्रा में अंतरिक्ष तक ईंधन ढुवानी करना ,यानि चन्द्रमा बड़ा महगा पड़ेगा । लेकिन एक बात निश्चित है चीन देश जो है वह अधिक खर्च और कम प्रतिफल का धंधा करने वालो में शुमार नहीं है । चीन के पास अपने ''इल्युमिनेशन सैटेलाइट'' अर्थात कृत्रिम चाँद को चेंगदू शहर के ऊपर ही फोकस कर रखने की कोई नयी प्रविधि हाथ लगी होनी चाहिए । वैसे अगर चीन का यह चाँद ३६ हज़ार किलोमीटर ऊँची 'आर्बिट' में रखना होता तो कोई बड़ी दिक्कत नहीं आती । इस ऊंचाई पर रही कोई भी वस्तु पृथ्वी के साथ ही घूमती है यानि उसे एक बार जहाँ प्रक्षेपित कर रखा जाता है वह वस्तु उसी स्थान अथवा उसी शहर के ऊपर स्थिर रहती है ( वस्तु तो घूमती है अब चूँकि उसकी गति पृथ्वी के साथ समरूप होती है अतएव पृथ्वी के ऊपर एक ही स्थान पर रहती है )। यहाँ पर रही वस्तु के लिए ''आर्बिट मेंटेन'' का खर्च भी बहुत कम आएगा ।लेकिन इस ऊंचाई पर रहकर पृथ्वी की राते रोशन करने वाले चन्द्रमा का आकार बहुत बड़ा होना पड़ेगा ।यह वर्तमान के अंतरिक्ष विज्ञान के सामर्थ्य में संभव नहीं है ।

चीनिया  चन्द्रमा लगभग ४०० किमी ऊपर अंतरिक्ष में स्थापित करने की योजना है इस उचाई पर चीन जैसा चन्द्रमा बनाना तो नहीं लेकिन किसी एक ही शहर के ऊपर केंद्रित कर रखना रूस और अमेरिका के लिए भी '' यूरेनियम के चने चबाने'' जैसा है ।

चीन का यह प्रोजेक्ट गर सफल होता है तो यह मानवता की बहुत बड़ी छलांग साबित होंगी । इस सफलता उपरांत निर्विवाद रूप से चीन का चेंगदू शहर विश्व पर्यटन का केंद्र बन जाएगा । एक बार कौन नहीं मानव निर्मित चाँद देखना चाहेगा ! मानवता का नया मक्का ,काशी और जेरुशलम बनेगा मानव निर्मित चन्द्रमा का शहर चेंगदू । चाहे चीन के शुभचिंतक हो या विरोधी ,सभी को चीन के इस प्रोजेक्ट के बारे गहरी कौतुहलता है ।

Title Photo: https://images.khaleejtimes.com

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