हिंदी संस्करण

सत्य की खोज में भटकता नायक

person access_timeMar 15, 2020 chat_bubble_outline0

सत्य की खोज में निकले इस आख्यान के नायक ने न थकने और न रुकने की प्रतिज्ञा ली थी। कहाँ कहाँ नहीं पहुंचा वह, पहाड़ी गुफाओ में, वन जंगल के दुर्गम प्रांतो में ! नदी के किनारे हज़ारो कि मी लम्बी यात्राएं भी की उसने की।
पर सभी स्थानों में उसे ‘अपनी तरह के’ और ‘अपनी अपनी तरह से’ जीवनयापन कर रहे लोग ही मिलें।

नायक का नाम ! अरे भइ क्यों चाहिए आपको नायक का नाम?

वह नायक यही लेखक हो सकता है। इस लेख को पढ़ रहा कोई भी पात्र हो सकता है। अथवा जीवन में एक भी लेख ,रचना अथवा किताब न पढ़ा हुआ लेह की किसी सुदूर दुर्गम पहाड़ी परिवेश के किसी सामान्य व्यक्ति में भी तो ‘इस नायक’ में होने वाले सारे गुण और प्रवृतियां विद्यमान हो सकती है।

तो इस आख्यान का नायक वर्षो के अनवरत प्रयास के उपरान्त इसी पृथ्वी के किसी कोने में स्थित एक आश्रम पहुँचता है। उसका यहाँ तक पहुंचना सत्य की खोज में उठे पहले कदम से अब तक किये गए सारे संघर्षो तथा खोज की उत्कट अभिलाषा का ही परिणाम था।

क्या आप विश्वास कर सकेंगे? उसने अपनी इस यात्रा में जो श्रंखलाबद्ध अभियान जारी रखा गर उसमे थोड़ा भी परिवर्तन हुआ होता तो वह इस आश्रम में नहीं पहुँच पाता।

जीवन सिर्फ संयोग नहीं है वरन यह तो महासंयोगो की निष्पत्ति है। नायक के जीवन में घटित अनंत संयोगो के प्रारूप में यदि थोडी  भी उलटफेर हुई  होती तो उसके जीवन में आमूल परिवर्तन घटित होने की संभावना से गुरेज नहीं किया जा सकता। आप मान सकते है किसी एक भी परिवर्तन के कारण वह (नायक ) इस आश्रम में न पहुँच किसी अन्य जगह पहुँच सकता था।

खैर नायक हठी था, अपने साथ हुए सभी संयोगो को सहज स्वीकार कर वह इस आश्रम में आ पहुंचा था। आश्रम के गुरु समक्ष उपस्थित हो उन्हें यथोचित सम्मान व्यक्त कर वह अपनी जिज्ञासा प्रस्तुत करता है।

‘आप कौन है’?

प्रश्न का लघु उत्तर मिलता है – ‘अहम् ब्रहास्मि’। पुत्र मै ब्रह्म हूँ।

नायक पुनः प्रणाम कर निवेदन करता है, ‘मै कौन हूँ’?

उत्तर फिर संक्षिप्त – ‘तत्तवं असि’। तुम भी ब्रह्म हो।

इस उत्तर से नायक के मन में शंका उत्पन्न होती है, बुड्ढा कही पगलेट तो नहीं है? अपने आप को ब्रह्म कह रहे हैं। चलो माना इनके विषय में मुझे क्या मालूम ! यह ब्रह्म हो भी सकते है!! पर मुझे भी ब्रह्म कह रहे हैं कहीं यह महाशय ब्रह्मघोटा तो नहीं लगाए हुए हैं ? 15 वर्षो से भटक रहे मुझ नामुराद को भी ब्रह्म बतला रहे हैं,लगता हैं मै गलत जगह आ गया हूँ। यहाँ से कुछ नहीं मिलने वाला।

अन्यमनस्क भाव में अपनी  सारी सामर्थ्य और साहस जुटाकर नायक एक बार फिर पूछता हैं ,’ चारो ओर विस्तृत यह जगत ,वो गाये, वो पेंड, वो पत्थर, वो सूर्य आदि दृष्टिगोचर होने वाले सारे पदार्थ क्या हैं?

पहले की भांति ही इस बार भी संक्षिप्त उत्तर सुनायी देता हैं, ‘सर्वमिदम खलु ब्रह्म‘। यह सारा विश्व ब्रह्माण्ड ब्रह्म हैं ब्रह्म का ही विस्तार हैं।

उत्तर सुनते ही नायक के मन में असीम क्रोध एवं वेदना का संचार होने लगता हैं। यहाँ आने के चक्कर में मेरा समय और सामर्थ्य दोनों बर्बाद गए। बुड्ढा पगलेट ही नहीं महापगलेट हैं। जो भी पूछो इनके पास सिर्फ एक ही जबाब हैं, ‘ब्रह्म’। लगता हैं महाशय पूरे ही ‘ब्रह्मफोबिया’ से ग्रस्त हैं।

‘किस चिंतन में खो गए वत्स ! कुछ और पूछना हो तो पूछो ,अगर मेरे संज्ञान में हुआ तो जबाब दूंगा’।

‘आपके पास जिस किसी भी प्रश्न का एक ही जबाब हैं – ब्रह्म ! ,ब्रह्म !! ,ब्रह्म!!! आपसे कोई भी प्रश्न पूछकर क्या फायदा ? जबाब तो ब्रह्म ही मिलेगा’ नायक आक्रोशित स्वर में बोला।

‘तुमने ठीक कहा वत्स ! मैंने बहुत सारे विषय पढ़ने पर भी अपनी जिज्ञासा का समाधान न पा अंत में ब्रह्म विधा पढ़ी। और इस विधा के अध्ययन उपरांत मैंने कुछ और नहीं पढ़ा, न देखा, न जाना। तुम तो एक युवा अन्वेषक हो, तुम्हें तो बहुत सारा ज्ञान होगा’ ! वृद्ध गुरु ने सौम्यतापूर्वक कहा।

‘मैंने जीवन में जो कुछ भी जाना और पढ़ा उससे मेरी जिज्ञासा शांत नहीं हुई , इसीलिए विगत १५ वर्षो से मैं  ज्ञान और शांति की तलाश में भटक रहा हूँ ‘ नायक ने खिन्नता के साथ कहा।

‘तब तो समस्या हो गई, तुम अपने जाने और पढ़ेको मुझे बतलाने की कोई उपयोगिता नहीं समझते ! और मेरे जाने हुए को तुम समझना नहीं चाहते’।

अगर मै आपकी बाते समझना नहीं चाहता तो भला यहाँ तक क्यों आता? आपका आश्रम सुगम स्थान में तो नहीं हैं ?? देखिये मै मान सकता हूँ कि आप ब्रह्म हैं, सारा संसार ब्रह्म का ही विस्तार हैं। आप और सारा संसार ब्रह्म मानने के वावजूद मै ‘स्वयं को ब्रह्म अनुभव’ नहीं कर सकता ! क्या आप मुझे ‘मै ब्रह्म हूँ’ इसका अनुभव करा सकते हैं?

‘क्यों नहीं ? तुम अगर ब्रह्म से पृथक होते तो समझाना मुश्किल होता ,जब तुम भी वही हो तो समझाना क्या मुश्किल!’

‘तो ठीक हैं मुझे समझाइये कि मै भी ब्रह्म हूँ’ नायक ने जल्दबाज़ी करते हुए कहा।

मै तुम्हे किसी भी प्रकार से समझा सकता हूँ। तुम्हारे मोबाइल से, मोबाइल में रहे ‘गेम प्रोग्रामिंग’ से, तुम्हारे कपड़ो में लगे धूल कणो से ,किसी भी प्रकार से समझाया जा सकता हैं। लेकिन मुझे यह ज्ञात नहीं हैं तुम कौन सी भाषा और विम्ब द्वारा समझ सकोगे?

‘आप जिस भी भाषा और विम्ब से कहें मै समझ लूंगा’ नायक ने गर्व के साथ कहा।

तुम्हारी इस गर्वोक्ति पर मुझे हँसना आता हैं। तुम्हे खुद नहीं मालुम तुम क्या कह रहे हो? मुझे नहीं लगता तुम्हे छंद, व्याकरण, संगीत, नाद, गणित, रसायन, ’क्वांटम फील्ड थ्योरी’, ’स्टैण्डर्ड मॉडल ऑफ़ पार्टिकल फिजिक्स’, ’फंडामेंटल फ़ोर्स’ आदि के बारे में प्रारंभिक ज्ञान अथवा इनकी ‘टर्मिनोलोजी’ भी आती हैं।

‘मै इन विषयो का ज्ञान लेने के लिए सन्यासी नहीं बना।विधार्थी जीवन में मैंने साइंस पढ़ी थी,थोड़ा बहुत ज्ञान हैं मुझे साइंस का। लेकिन अब मुझे इसकी आवश्यकता नहीं। मै सत्य की खोज में उन्मुख हुआ हूँ’।

तुम्हारी बौद्धिक दरिद्रता देख मेरे भीतर करुणा जगती हैं। सामान्य शिक्षित होने एवं आजीविका कमाने के लिए संग्रह की गई अल्प जानकारी को तुम ज्ञान कहते हो ? वास्तव में ऐसा कहकर तुम ‘प्रज्ञानम ब्रह्म’ का अपमान कर रहे हो।

‘अब आपने ज्ञान को भी ब्रह्म बना दिया‘!

‘मै बनाने वाला कौन होता हूँ ? ब्रह्म के सिवा किसीका अस्तित्व ही नहीं हैं वत्स’।

‘मुझे यह बोध कैसे होगा’?

‘ज्ञान से वत्स। अपनी सामान्य जानकारी का शोधन विश्लेषण करते जाओ। किसी भी वस्तु की, किसी भी विषय की अंतिम परिणति ब्रह्म की सत्ता में जा समाहित होती हैं। शेष – अशेष सब ब्रह्म ही हैं’।

‘क्या साइंस अध्ययन से यह संभव हैं’?

निसंदेह, विज्ञान तो तंत्र की भांति द्रुतगामी हैं। एक फूल का अध्ययन विश्लेषण करते जाओ, एक क्षुद्र कण का ही विश्लेषण करते जाओ। पर याद रखना तुम्हारा अध्ययन विश्लेषण फूलविज्ञ अथवा कणविज्ञ होने के लिए न होकर अस्तित्व के अंतिम बिंदु अथवा प्रारंभिक बिंदु तक समझने वाली त्वरा को विकसित करने के लिए होना चाहिए।
‘तो मुझे क्या करना चाहिए’?
अभी तुम अपनी पुरानी दुनिया में वापस जाओ। अध्ययन को चिंतन ,चिंतन को मनन और मनन को प्रज्ञा में रूपांतरित करने की क्षमता विकसित करो। इसी क्रम में तुम्हारा खुद का रूपांतरण हो जाएगा। अभी तुम दूसरों के द्वारा खोजे गए सत्य और शांति पाने की
लालसा में भटक रहे हो । मेरी बात गाँठ बाध लो दूसरे का सत्य भी तुम्हारे लिए पदार्थ के अतिरिक्त कुछ और नहीं हो सकता।

क्या ‘पार्टिकल फिजिक्स’ के अध्ययन से भी यह संभव हो पायेगा?

‘साधू ! साधू !! ‘पार्टिकल फिजिक्स’ तो आधुनिक विज्ञान भैरव तंत्र हैं ,महाकाल तंत्र हैं ,महाकाली तंत्र हैं। कणाद ,कपिल ,विश्वामित्र सदृश्य ऋषियों द्वारा की गई साधना पद्धति हैं।निसंदेह ‘पार्टिकल फिजिक्स’ अध्ययन से तुम्हे अपना अभीष्ट प्राप्त होगा। जाओ वत्स जाओ ,’डार्क मैटर’ एवं ‘डार्क एनर्जी ‘ रूपी ”शिवशक्ति” तुम्हारे स्वागत के लिए विकल हैं’।

नायक अपनी जगह से उठ गुरु के चरणों में सर रखकर अवरुद्ध गले से कह उठता हैं – आपने मुझे मेरे जीवन की राह दिखा दी ,मै आपके इस ऋण से कभी मुक्त नहीं हो पाऊंगा। हकीकत तो यह हैं मै आपके ऋण से कभी मुक्त होना भी नहीं चाहूंगा।

गुरु नायक का सिर पकड़ उठाते हुए कहते हैं – यशस्वी भव वत्स ! तुम्हारे जैसा जिज्ञासु एवं मुमुक्षु अभिलाषी का मार्गदर्शन कर मेरा भी जीवन धन्य हुआ। मैं  तुम्हें अभी ही समस्त ऋणों से मुक्त करता हूँ। बस मेरी एक बात का सदैव स्मरण रखना, ‘जीवन में अगर किसी को परामर्श देने का अवसर आया तो शास्त्रजनित नहीं व्यक्तिजनित परामर्श देना।

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