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अन्तरवार्ता

जिस महालीला ने ये संसार रचा है वो एक दिन इसे नष्ट भी कर देगी - सुशोभित सिंह सक्तावत

person access_timeJan 18, 2021 chat_bubble_outline0

भारत के मध्य प्रदेश राज्य के झाबुआ जिले में जन्मे सशक्त युवा हस्ताक्षर है इनकी लेखनी का सम्मोहन कुछ ऐसा है गर एक बार किसीने इनके कुछ लिखे को पढ़ना शुरू किया तो अंत तक पढ़े बिना छोड़ना सम्भव ही नहीं बन पाता है। मैंने सुशोभित के कई लेखो को नेपाली भाषा में रूपांतरित कर प्रकाशित किया है।  तकरीबन फेसबुक में  सुशोभित के द्वारा लिखा सब कुछ पढता हूँ चाहे गांधी होवें या गुलजार। कुछ दिन पहले नेपाल की एक अग्रणी ऑनलाइन पत्रिका रातोपाटी से जुड़ा।  अचानक ख्याल आया क्यों न सुशोभित का एक इंटरभ्यू लिया जाए।  'जहाँ चाह वहां राह', प्रस्तुत है  रातोपाटी के लिए ज्ञानमित्रद्वारा सुशोभितसे हुयी वार्ता का सम्पादित अंश। 

सुशोभित, छोटे अन्तराल में एक के बाद एक दे- दनादन इतनी सारी पुस्तकों का प्रकाशन विस्मित करता है। मेरा मतलब लेखन से लेकर प्रकाशन तक बेहद जटिल एवम् पेचीदी प्रक्रिया होती है। कैसे सम्भव हुआ यह सब ?

बीते कोई दो सालों में नौ किताबें छपी ज़रूर हैं, लेकिन ये सभी दो साल में नहीं लिखी  गई हैं। यह भी देखिये कि पहली पुस्तक प्रकाशित करवाने के पीछे छह-सात सालों की जद्दोजहद रही। इन सालों में निरंतर लेखन चलता रहा और अनेक विषयों पर लिखने के कारण सामग्रियां अलग-अलग श्रेणियों में संयोजित होती रहीं। ये ही एक जिल्द में समाकर पहले पाण्डुलिपि और फिर पाण्डुलिपि से पुस्तक बनीं। उचित तो यही होता कि पुस्तकें समय रहते छप जातीं तो साल में एक-दो जिल्दें आती रहतीं, अभी सब एक साथ आ रही हैं। अभी चार और पाण्डुलिपियां प्रकाशकों के पास हैं और बहुत सम्भव है साल 2021 में वो सभी आ जाएं। यह सच है कि पुस्तक का छपना जटिल, पेचीदा और धीमी प्रक्रिया है और इसके सम्भव होने में बहुत सारे कारक काम करते हैं। मैं स्वयं को भाग्यशाली समझता हूँ कि मुझको छापा जा रहा है और पढ़ा जा रहा है।


भी चार और पाण्डुलिपियां प्रकाशकों के पास हैं और बहुत सम्भव है साल 2021 में वो सभी आ जाएं। यह सच है कि पुस्तक का छपना जटिल, पेचीदा और धीमी प्रक्रिया है और इसके सम्भव होने में बहुत सारे कारक काम करते हैं। मैं स्वयं को भाग्यशाली समझता हूँ कि मुझको छापा जा रहा है और पढ़ा जा रहा है।


क्या सरस्वती की साधना एवम् सिद्धि से लक्ष्मी भी प्रसन्न हुयी है ? इस सिद्धि से क्या लक्ष्मीजी भी बिराजी हैं जीवन में ?

नौ में से दो ही पुस्तकों की रॉयल्टी अभी तक मिली है। अलबत्ता शेष पुस्तकों के प्रकाशकों ने वादा किया है कि वित्त वर्ष के समापन तक भुगतान करेंगे। यह अवश्य मैं पाता हूँ कि पुस्तक की कुल कितनी प्रतियाँ छपीं और कितनी बिकीं, इसका ठीक-ठीक आंकड़ा देने में प्रकाशकगण संकोच करते हैं और पूछने पर प्रश्न को टाल जाते हैं। इस बारे में ज़्यादा कहना उचित नहीं। तो मैं तो नहीं कहूँगा कि लेखन से लक्ष्मीजी बिराजी हैं। लक्ष्मीजी की प्राप्ति के लिए यह सारा उद्यम है भी नहीं। मेरा भाग्य है कि उलटे पैसा देकर किताब छपवाने की नौबत नहीं आई है।

यहाँ तक पहुंचने में सबसे बड़ा योगदान किसका समझते हैं ?

शायद भाग्य, या कह लें नियति का। और जीवन की पेचीदा गुत्थियाँ, निजी वृत्तियाँ, यात्रापथ की चेतनाएँ : एक-एक कर चीज़ें होती रहीं, रास्ता तय होता रहा। पता नहीं यह पहले से नियत होता है  या यह अहैतुक ही होता है। कदाचित् पूर्वजनमों का कोई संचित संस्कार भीतर रहा होगा, जो वांग्मय की दिशा में आया। मैं अनीश्वरवादी हूँ, नहीं तो कहता कि ईश्वर ने यह सब कराया। किंतु इतना अहंवादी भी नहीं हूँ, जो कहूँ कि यह सब मेरा ही पुरुषार्थ है। निमित्त-भाव से होता रहा है। आप ही सोचिए, इतनी व्यापक महासृष्टि में जहाँ जीवन सबसे असम्भव चीज़ थी, वहाँ धरती पर जीवन के इतने रूप फूटे और मनुष्य में चेतना का परिष्कार हुआ : ये सब निष्प्रयोज्य हुआ हो, ये ठीक नहीं जान पड़ता। इस महालीला में एक स्वर मेरा भी है, वो किस प्रयोजन से है वो तो महास्रष्टा ही जान सकता है। अलबत्ता यह महास्रष्टा शब्द सुनकर हमारे भीतर एक अपौरुषेय और निर्गुण भाव ही जगना चाहिए।

मैं अनीश्वरवादी हूँ भी कहते हैं और व्यापक महासृष्टि में जीवन का इतने रूपों में विकसित होना निष्प्रयोजन हुआ हो, ऐसा भी नहीं मानते। महालीला में मेरा भी स्वर है, किस प्रयोजन से है वह तो महास्रष्टा ही जान सकता है? निर्गुण हो या सगुण भाव ! क्या दोनों का परिलक्षित संदेश एक ही नहीं है ?

अगर ब्रह्माण्ड को देखें तो लगता है एक महाविस्फोट के बाद वो व्याप रहा है, उसमें ऊर्जा का आदिम विस्तार है। एक तरह का बीहड़ है ! किंतु पृथ्वी बड़े मनोयोगपूर्वक बनाई गई है। ज्ञात ब्रह्माण्ड का कोई हिस्सा इस जैसा नहीं। हवा, पानी, प्रकाश ने मिलकर यहाँ जीवन रचा है।  एककोशिकीय जीवन की उत्पत्ति भी ब्रह्माण्ड के इतिहास का सबसे बड़ा चमत्कार थी, उसकी अन्यत्र खोज में मनुष्य मारा-मारा फिरता है, किंतु पृथ्वी पर तो जैव-विविधता का समारोह है! मनुष्य की चेतना इसकी शिखा है। ब्रह्माण्ड द्रव्यों और पदार्थों से बना है, किंतु पृथ्वी पर प्राण, चेतना, बुद्धि, प्रज्ञा है - ये सब कहाँ से आई कोई जानता नहीं।

भूल ये होती है कि हम इस स्रष्टा को ईश्वर कह बैठते हैं, मनुष्य के रूप में उसकी कल्पना कर लेते हैं, और वह हमारे हित में शुभकारी है यह ख़ुशफ़हमी पाल लेते हैं, क्योंकि हम सृष्टि को हमारे अपने  परिप्रेक्ष्य से देखते हैं।


कोई भी देख सकता है कि ये पृथ्वी और उसमें प्रज्ञावान मनुष्य की रचना एक अद्वितीय घटना है। इसके पीछे एक 'इंटेलीजेंट डिज़ाइन' दिखती है, एक सधे हुए हाथ का काम नज़र आता है। हमें उसके विस्मय में ही जीना चाहिए। भूल ये होती है कि हम इस स्रष्टा को ईश्वर कह बैठते हैं, मनुष्य के रूप में उसकी कल्पना कर लेते हैं, और वह हमारे हित में शुभकारी है यह ख़ुशफ़हमी पाल लेते हैं, क्योंकि हम सृष्टि को हमारे अपने  परिप्रेक्ष्य से देखते हैं। अवतारवाद मूलतः मनुष्य के ही ईश्वरत्व का उद्घोष है ! इसमें फिर पीछे धर्म, आडम्बर, कर्मकांड चले आते हैं। मनुष्य को आश्वासन और आलम्बन चाहिए, भले कपोल काल्पनिक ही  हों। सृष्टि रची गई है, यह तो दीखता है, किंतु रचने वाला ईश्वर है और वह भी हमारे धर्म द्वारा वर्णित ईश्वर ! इस निष्कर्ष पर पहुंचने का कोई आधार नहीं है।

आपके कथन ने शिवसूत्र के 'विस्मयो योगभूमिकाः' का स्मरण करा दिया। यदि आपने शिवसूत्र पढ़ा हो तो, 'अविवेको माया सौषुप्तम', 'स्वप्नो विकल्पः,' 'ज्ञान जाग्रतः,' 'उधमो भैरवः,'  'चैतन्यमात्मा' और फिर 'ज्ञानं बन्धः' : कैसे प्रतिबिम्बित होता है आपकी चेतना में ?

उसमें ये भी कहा है कि 'स्वपदम्शक्ति', 'वितर्क आत्मज्ञानम्,' 'लोकानन्द: समाधिसुखम्।' यानि  विस्मय योग की भूमिका तो है ही, साथ ही स्वयं में स्थिति ही शक्ति है, वितर्क ही आत्मज्ञान का साधन है, अस्तित्व का आनंद ही समाधि है। सोचने की यह रीति मुझको भाती है, इसमें ब्रह्माण्ड का विस्मय अक्षुण्ण है। हमारे यहाँ आजीवक और चार्वाक हुए, बौद्ध और जैन हुए, ये श्रमण परम्परा के दर्शन हैं और ईश्वर को नहीं मानते। न्याय-वैशेषिक भी अपने सामने उपासना के लिए एक विग्रह नहीं रखते। सांख्य दर्शन प्रकृति-पुरुष की ही बात करता है और योगदर्शन में भी पुरुष-विशेष अवश्य कहा  गया है, किंतु ईश्वर के स्वरूप का वर्णन नहीं है। ऋग्वेद के नासदीय सूक्त में सृष्टि के निर्माण का विस्मय है, किंतु सगुण ईश्वर के विग्रह की प्रतिष्ठा वहाँ भी नहीं की गई है। 'अथातो ध्वनि' के सभी पद हमारे यहाँ जिज्ञासा पर समाप्त होते हैं। तब मैं कहता हूँ कि अगर विस्मय ही योग की भूमिका है, तो इसी विस्मय की हठयोग-साधना मनुज को करनी चाहिए।


ऋग्वेद के नासदीय सूक्त में सृष्टि के निर्माण का विस्मय है, किंतु सगुण ईश्वर के विग्रह की प्रतिष्ठा वहाँ भी नहीं की गई है। 'अथातो ध्वनि' के सभी पद हमारे यहाँ जिज्ञासा पर समाप्त होते हैं। तब मैं कहता हूँ कि अगर विस्मय ही योग की भूमिका है, तो इसी विस्मय की हठयोग-साधना मनुज को करनी चाहिए।


इतनी विविधता कैसे लाते हैं लेखन में ? गंगा से काश्मीर तक, वृन्दावन से नास्तिकता तक, गांधी से स्टीफ़न हॉकिंग तक, फ़िल्मी गीतों से ग्राम्य जीवन तक, उज्जैन की गलियों से काठगोदाम की सड़कों तक, रसगुल्ले से लेकर आम तक, ध्रुव तारे से लेकर आर्द्रा की मृत्यु तक ? कहाँ कहाँ नहीं पहुँची है आपकी क़लम ? इस सम्बन्ध में कुछ अनुभव साझा करें ?

कौतूहल ही इतनी जगहों पर ले जाता है। अचम्भा घना है। मैं अकसर कहता हूँ कि ज्ञान मुझमें इतना नहीं है जितना कि विस्मय है। विस्मय मुझको जानने की दिशा में ले जाता है, फिर जो जानता हूँ उसको औरों को बतलाता भी हूँ। कथन में नाटकीयता और वृत्तांत की शैली होने से सामान्य पाठक को वह बात रुच जाती है। किंतु वह मुझे भी उतनी ही रुचती है, मैं भी उसके आस्वाद में सम्मिलित रहता हूँ- यों पृथक से खड़ा होकर विराट-रूप नहीं दिखला रहा होता। जितनी दिशाओं में गया, अपने अज्ञान की व्याप्ति ही पाई और उस अज्ञान को पाटने के लिए व्याकुल हुआ हूँ । एक खोज निरंतर चलती रहती है। डगर में बहुत सारे दृश्य उपस्थित होते रहे हैं। वो मेरा चमत्कार नहीं है, कह लें कि वो मेरी वृत्ति है जो इतनी दिशाओं में जाता रहता हूँ, किंतु मैं भी उनसे उतना ही चकित हूँ, जितना कि मेरा पाठक।

पढ़ा था किसी समय आप शिप्रा तट के किसी मंदिर में बैठ ध्यान का उपक्रम करते थे, कोई बिहारी ब्राह्मण भी था उस कथानक में। कहाँ पंहुचा है स्वयं से रूबरू होने का यह उपक्रम?

वो कथा है- नदी किनारे ध्यान लगाने के वृत्तांत। यह 'बायस्कोप' में छपी है। उज्जैन में शिप्रा नदी पर नृसिंह घाट है, जहाँ एक पेड़ के नीचे ध्यान लगाने का वह वृत्तांत है, और कथानक में उत्तरप्रदेश के एक सरयूपारीण ब्राह्मण की भी आवाजाही है। स्वयं से रूबरू होने का उपक्रम कहाँ तक पहुँचा ? क्या पता ! पहले जैसे अब ध्यान तो नहीं करता, किंतु आत्मचेतना पहले से कहीं अधिक है। किंतु शायद यह चेतना अभी मनोगत अर्थ में ही है, मति में उभरा हुआ नक्षत्र है, आत्मिक प्रतीति नहीं है उन अर्थों में जिनमें चेतना एक व्यतिक्रम में ऊर्ध्वगामी होती चली जाती है। कुण्डलिनी अभी कहाँ सोई पड़ी है, यह तो कोई गुरु ही कपाल पर करतल रखकर बतला सकेगा।

जीवन अपनी उदासीन और धीमी गति से ही चलता है। मैं आरम्भ से ही किताबों पर अतिशय अनुरक्त रहा हूँ। मैं पुस्तकों को ऐसे देखता था जैसे इनमें कुछ पारलौकिक-तत्व है, जो मुझको पदार्थ और पार्थिव से मुक्त कर देगा। पुस्तकों को निकट से निहारने के लिए ही एक बार मैंने एक दुकान में नौकरी कर ली थी। तब कोई बतलाता कि मेरी भी कोई पुस्तक आगे चलकर छपेगी तो मैं अविश्वास से आँखें मूंद लेता।


उज्जैन की गलियों का वह नन्हा हॉकर पेपर-एजेंसी का मालिक होते हुए अपना खु़द का लिखा हुआ बिकते हुए देखकर कैसा अनुभव करता है?

उस समय कोई बतलाता तो अविश्वसनीय कहकर टाल जाता, किंतु आज के परिप्रेक्ष्य से सोचने पर कोई वैसा उल्लास नहीं होता है, जो भीतर तक मथ दे। कदाचित् एक निरा संतोष भर ही कि वैसा हुआ। कारण यह है कि तब में और आज में कोई बीस बरसों का फ़ासला है।  एक लम्बी यात्रा में चीज़ें जिस गति से होती हैं, उसी गति से यह हुआ है। कहानी सुनने पर हमें लगता है कि यह बहुत नाटकीय तरीक़े से हुआ होगा, किंतु वैसा नहीं है। जीवन अपनी उदासीन और धीमी गति से ही चलता है। मैं आरम्भ से ही किताबों पर अतिशय अनुरक्त रहा हूँ। मैं पुस्तकों को ऐसे देखता था जैसे इनमें कुछ पारलौकिक-तत्व है, जो मुझको पदार्थ और पार्थिव से मुक्त कर देगा। पुस्तकों को निकट से निहारने के लिए ही एक बार मैंने एक दुकान में नौकरी कर ली थी। तब कोई बतलाता कि मेरी भी कोई पुस्तक आगे चलकर छपेगी तो मैं अविश्वास से आँखें मूंद लेता। किंतु यह तब का परिप्रेक्ष्य है। आज के परिप्रेक्ष्य में तो अब यह लगता है कि जितने पाठकों को अभी मुझे पढ़ना है, उससे कम ही के हाथों में मेरी पुस्तकें पहुँच सकी हैं, और आशा ही करता हूँ कि आगे पाठक-वर्ग और व्यापकतर होगा।

मैंने अपने कई मित्रों को सुशोभित को पढ़ो बोलकर फे़सबुक में आपसे जुड़ने का परामर्श दिया। मेरे बहुत से नेपाली और भारतीय मित्र आपसे जुड़े। अमेरिका से मेरे एक मित्र मानवेन्द्र कुमार वर्मा ने आपको पढ़ने के बाद मुझसे पूछा, 'स्वामीजी मै समझ नहीं पा रहा हूँ सुशोभित की विचारधारा क्या है? मैंने मित्र से कहा, अगर आप विचारधारा की ऐनक से सुशोभित को बांधना / बंधा हुआ देखना चाहते हैं तो कृपया उन्हें पढ़ना छोड़ दें। क्योंकि सारी विचारधाराएं जहाँ आकर दम तोड़ दे, लेखक को उसी जगह खड़ा हो अपना मार्ग वा लक्ष्य निर्धारित करने को ही मै चेतना की उपयोगिता समझता हूँ और मुझे सुशोभित इसीलिए प्रिय हैं कि आप उन्हें किसी खूंटे से बंधा नहीं देख सकेगे। कुछ कहना चाहेंगे आप इस बारे में?

अव्वल तो यह कि आपने मेरे नाम की अनुशंसा अपने मित्रों को की, इसके लिए मैं आपका आभारी हूँ। एक भी नया पाठक अगर मुझसे जुड़ता हो तो यह मेरे लिए मूल्यवान है। रही विचारधारा वाली बात तो इससे आशय हमारे यहाँ राजनीतिक विचारधारा से लगाया जाता है। जबकि लेखक में राजनीति की प्रतिष्ठा एक अवमूल्यन है और लेखक की प्राथमिक ज़िम्मेदारी मानवीय-प्रसंगों के सार्वभौमिक-संदर्भों में प्रकाशन की ही होती है। मैंने यदा-कदा राजनीति पर लिखा अवश्य है, किंतु वह हाशिये का लेखन है। मेरे लेखन का बड़ा हिस्सा, और पुस्तकों में प्रकाशित लेखन का तो लगभग सौ प्रतिशत हिस्सा ग़ैर-राजनीतिक है। महात्मा गाँधी पर पुस्तक भी मैंने मानवीय और रचनात्मक परिप्रेक्ष्यों में लिखी, उसमें भी राजनीति नहीं है। तो उस दृष्टि से मुझको देखना एक भूल ही होगी। ये सच है कि मैं दक्षिण की तरफ़ जाए बिना वाम-विचार का धुर विरोधी एक लम्बे समय से हूँ और आगे भी रहूँगा, क्योंकि वह एक निहायत पदार्थवादी, इकहरी, ध्वंसमूलक और द्वंद्वात्मक विश्वदृष्टि है, साथ ही उसे अपने पतित-पावन होने का अभिमान भी बहुत है। मैं उदारवाद के प्रति भी सहज नहीं हूँ, जो मनुष्य की लिप्सा को सृष्टि के केंद्र में देखता है और उसकी निर्बाध और पूर्ण स्वायत्तता का हामी है। आधुनिक मनुष्य के अनेक पापाचारों की जड़ में यही कुदृष्टि है।


ये सच है कि मैं दक्षिण की तरफ़ जाए बिना वाम-विचार का धुर विरोधी एक लम्बे समय से हूँ और आगे भी रहूँगा, क्योंकि वह एक निहायत पदार्थवादी, इकहरी, ध्वंसमूलक और द्वंद्वात्मक विश्वदृष्टि है, साथ ही उसे अपने पतित-पावन होने का अभिमान भी बहुत है। मैं उदारवाद के प्रति भी सहज नहीं हूँ, जो मनुष्य की लिप्सा को सृष्टि के केंद्र में देखता है और उसकी निर्बाध और पूर्ण स्वायत्तता का हामी है।


फे़सबुक में आपकी छवि ढेर सारे पाठकों को अक्खड़-सी लगती है। क्या उनका यह अनुभव ठीक है? वैसे दैनन्दिन जीवन में आपका स्वभाव कैसा है?

ढेर सारे पाठकों को अगर वैसा लगा है तो कदाचित् ठीक ही लगा होगा। ढेर सारे दूसरे अन्यों को इसके विपरीत भी सम्भवतया लगा हो। इन दोनों ही धारणाओं का महत्व नहीं है। लेखक के द्वारा प्रस्तुत वस्तु कितने मानवीय, वैश्विक और रचनात्मक महत्व की है, इसको ही देखा जाना चाहिए। व्यक्ति को आँख से ओझल कर देना चाहिए। मैं स्वयं की समीक्षा करूँ तो उसमें निकटता-दोष से वस्तुनिष्ठता नहीं आ सकेगी, अतैव यह गुरुभार भी औरों का ही हो। शायद मेरे स्वभाव में रूखापन है, निस्संगता भी बहुत है। वैसा क्यों है, अब इसका अनुसंधान करना मेरे लिए सुकृत होकर भी दूभर है। दैनन्दिन जीवन में कैसा स्वभाव है, इस बारे में भी बेहतर बयान तो वो ही दे सकेंगे, जो उसे देख पाते हों। अलबत्ता संसार में शायद ही कोई होगा जो यह दावा कर सकेगा कि वो मुझको निकट से जानता है। मैं सामान्यतया सबके लिए अलभ्य और अगम्य ही बना रहता हूँ।

जीवन के बारे में प्रश्न किया जाए तो आप जैसा लेखक ४०० -५००  पेज की किताब लिख सकता है। गर मैं आपसे इसके उलट कम से कम शब्दों में जीवन की परिभाषा एवम इसके औचित्य के ऊपर जानना चाहूँ तो सहसा क्या कहेगा आपका अवचेतन?

बुद्ध से ये पूछें तो वो कहेंगे 'जीवन दु:ख है'। काफ़्का कहेगा 'पछतावा है'। जीज़ज़ कहेंगे 'पापमुक्ति का प्रयोजन है'। गाँधी कहेंगे 'परीक्षा है, तपश्चर्या है'। मुझसे पूछें तो मैं क्या कहूँगा ? अवचेतन से जो पहली आवाज़ गूँजेगी, वो एक अनुभूति की होगी- 'ऊष्मा!' या फिर 'आलोक'। फिर इसके पीछे-पीछे चली आएगी दिनारम्भ की लय, जैसे भाप के इंजिन के पीछे समूचा पसारा खिंचा चला आता है। जीवन में ऊष्मा है, रौशनी है, और जीवन में आरम्भ हैं। जिस दिन अनारम्भ होगा  उस दिन फिर जीवन नहीं है। मुझको लगता है रात को सोने जाना और सुबह जाग उठना सृष्टि के महान रहस्यों में से एक है। मुझको जीवन की छोटी-छोटी लौकिकताएं मुग्ध और चकित करती हैं। जीवन का औचित्य क्या है ये मुझको मालूम नहीं।  किंतु ऐसा अनुमान होता है कि कदाचित् विश्वचेतना ने अपने परिष्कार और परिमार्जन के लिए इस पृथ्वी पर मनुष्यों को रचा है और इसलिए शायद मनुष्यों का यह कर्तव्य है कि उस दिशा में परिश्रम करते रहें।


जिस दिन अनारम्भ होगा  उस दिन फिर जीवन नहीं है। मुझको लगता है रात को सोने जाना और सुबह जाग उठना सृष्टि के महान रहस्यों में से एक है। मुझको जीवन की छोटी-छोटी लौकिकताएं मुग्ध और चकित करती हैं। जीवन का औचित्य क्या है ये मुझको मालूम नहीं। 


बुद्ध को वेद एवं हिंदू शास्त्र विरोधी माना गया और शंकराचार्य को बुद्ध विरोधी। ओशो जैसी प्रतिभाएं इस दावे को ख़ारिज करती है और कह उठती हैं जीवन का गणित यूक्लिड से बहुत आगे क्वाण्टम स्तर तक रहस्यमय रूप से व्याप्त है। बुद्ध छिपे हुए वेदांती हैं और शंकराचार्य में अनदेखा बुद्ध बैठा है। प्रश्न आपसे है क्या इसी तरह स्वयं को अनीश्वरवादी कहने वाले सुशोभित के अन्तर की गुह्य गुफाओं में कहीं परम आस्तिकता भी विराजमान है?

जहाँ विस्मय है वहाँ तो प्रश्नाकुलता ही होगी। इसी के साथ, ऐसा भी नहीं है कि विनष्टकारी अनास्था का झंझावात मेरे भीतर घुमड़ता हो। मेरे भीतर आस्तिकता विराजित है या नहीं, इसका निर्णय भी इसी से होगा ना कि आस्तिकता से आप क्या समझते हैं ? किंतु कोई आलम्बन अवश्य ही मेरे भीतर नहीं है जिसकी तरफ़ दुर्बल क्षणों में झुक जाता होऊं, या संकट में जिससे प्रार्थना करता होऊं। जिस महालीला ने ये संसार रचा है वो एक दिन इसे नष्ट भी कर देगी। सम्भवतया प्रयोजन पूरा हो जाने पर ! किंतु क्या है प्रयोजन ? यही एक प्रश्न है। प्राण, जीवन और चेतना - जो ज्ञात ब्रह्माण्ड में अन्यत्र कहीं नहीं है - की रचना आख़िर किस प्रयोजन से की गई है और मनुष्य को किस हेतु से यहाँ भेजा गया है ? यही एक प्रश्न दिन-रात मुझको मथता रहता है!

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