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'नेपाल में चीन और भारत के काम करने में फर्क'

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रातोपाटी संवाददाता, ३० फाल्गुन २०७६

भारत के रक्षा मंत्रालय में कार्यरत जयप्रकाश राव ने सं २०१४ में अवकाश प्राप्त किया था। पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलामके सचिवालय में समन्वय अधिकारी के रूप में कार्य करनेवाले जयप्रकाश राव के द्वारा रक्षा मंत्रालय के विकास तथा अनुसन्धान विभाग में भी काम किया गया था। ६७ वर्षीय राव पब्लिक रिलेशन काउंसिल ऑफ़ इंडिया के प्रादेशिक अध्यक्ष भी हैं। रक्षा के विभिन्न अनुसंधानों में सक्रिय काम करने वाले राव से भारत की सुरक्षा अवस्था तथा अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्ध के बारे में बंगलौर में रातोपाटी के द्वारा की गई बातचीत का सम्पादित अंश :

 

भारत के रक्षा मंत्रालय में अपने लम्बे समय तक काम तो किया ही है साथ ही आप ने इस बारे में काफी शोध कार्य भी किया है। समय - समय पर भारत द्वारा स्वयं को असुरक्षित महसूस करने का कारण क्या है?

 

भारत एक शांति प्रिय राष्ट्र है, इसके द्वारा अपने पड़ोसियों के साथ मधुर संबंध बनाकर रखे गए हैं परन्तु पाकिस्तान और चीन से हम सशंकित रहते हैं। किसी भी समय युद्ध हो सकने की अवस्था है। विगत के कारणों से चीन और पाकिस्तान के साथ भारत के सम्बन्ध उतने मधुर नहीं है।इसी कारण भारत अपनी सुरक्षा के प्रति सचेत है।भारत पाकिस्तान सीमा पर हमेशा ही एक किस्म का तनाव बना रहता है। भूमि के साथ ही हिन्दू -मुस्लिम मुद्दों पर दोनों देशों के बीच तनाव दिखाई देता है। भारत का अपनी सुरक्षा के प्रति चिंतित रहने का मतलव ये कदापि नहीं है कि भारत किसी के विरुद्ध जायेगा। भारत अपनी सुरक्षा के प्रति पूर्ण सजग है। हथियारों से लेकर हर किस्म की युद्ध सामग्री के क्षेत्र में भारत आत्मनिर्भर होना चाहता है जिसके लिए कितने ही अनुसन्धान किये जा रहे हैं।एक ही युद्ध टैंक खरीदने के लिए करोड़ों रुपयों का भुगतान विदेशों को करना होता है परन्तु फिर भी सुरक्षा के तहत हमें ये आयात करना ही पड़ता है। इसका एक और मुद्दा है कि जब हम कोई चीज बाहर से खरीदते हैं तो बिलकुल वैसी ही चीज दूसरों के पास भी मौजूद होने के करण सुरक्षा की चुनौती और भी अधिक बढ़ जाती है। ऐसी सुरक्षा चुनौतियों के बढ़ने के कारण भारत का लक्ष्य है कि जहाँ तक संभव हो हम अपने ही अनुसंधानों और सोधो के द्वारा अपनी ही युद्ध सामग्री तैयार करें।

 

चीन के साथ युद्ध का कितना खतरा भारत महसूस करता है?

 

चीन के साथ युद्ध होने की संभावना बहुत कम है। भारत किसी भी देश के साथ युद्ध करने की तैयारी में नहीं है परन्तु ये अपनी सुरक्षा के सम्बन्ध में अवश्य ही चिंतित है। अपनी राष्ट्रीयता के लिए रक्षा विभाग द्वारा सजग होना तथा आवश्यक तैयारी करके रखना स्वाभाविक प्रक्रिया है, चूँकि चीन के साथ एक बार युद्ध हो चुका है इसलिए एक प्रकार का भय बना रहता है परन्तु फिर भी युद्ध की संभावना बहुत कम है।

 

भारत और पाकिस्तान के बीच लम्बे समय से तनाव की स्थिति है और बाद के समय में चीन के साथ भी तनाव देखा जा रहा है। कुछ समय पहले तो युद्ध की ही संभावना की गई थी इस पर आपका क्या विचार है?

 

विगत में चीन के साथ सीमा विवाद था जिसके लिए युद्ध भी हुआ था। अभी भी अक्सर आशंकाएं जन्मती रहती हैं। चीन और पाकिस्तान आपस में मिले है। चीन द्वारा पाकिस्तान की मदद किये जाने के कारण भी भारत चीन के प्रति सशंकित रहता है। भारत और चीन को लेकर पत्र -पत्रिकाओं में भी विभिन्न समाचार छपते रहते हैं। सुरक्षा एजेंसी को भी चीन से सावधान रहते देखा जाता है तथापि भारत के चीन के साथ अच्छे सम्बन्ध हैं।

 

 भारत के नेपाल के साथ के सम्बन्ध के बारे में आपकी राय क्या है?

 

नेपाल और भारत के बीच के सम्बन्ध की किसी अन्य देश के सम्बन्ध के साथ तुलना ही नहीं की जा सकती। अन्य किसी भी देश की अपेक्षा भारत के नेपाल से अलग किस्म के सम्बन्ध हैं। खुली सीमाओं के कारण भारत और नेपाल मुझे एक घर जैसा ही लगता है। नेपाल और भारत के बीच मात्र कूटनीतिक सम्बन्ध न होकर इनके बीच पारिवारिक और सामाजिक संबंध भी हैं। भारत की सुरक्षा में नेपालियों का भी योगदान है। आप भारत के किसी भी कोने में जाएँ आपकी नेपाली से मुलाकात हो जाएगी। नेपाली भारत की राष्ट्रीयता से जुड़े हैं। नेपालियों के द्वारा भारत को अपना ही समझते हुए इसके लिए बलिदान दिए गए हैं रक्त बहाया गया है। ऐसा सम्बन्ध अन्य किसी भी देश के साथ होना संभव नहीं। नेपालियों को भारत में वीर गोरखा,बहादुर सिपाही के रूप में सम्मान प्राप्त है|

 

परन्तु भारत नेपाल को चीन और पाकिस्तान को देखी जानेवाली आँखों से ही देखता है। भारत का सोचना है कि नेपाल के माध्यम से पाकिस्तान और चीन की गतिविधियां होती हैं;इसमें आपकी क्या धारणा है?

 

भारत के द्वारा इस प्रकार की बात का कहा जाना मैंने न कहीं सुना है और न ही इसे मैंने समझा है। आधिकारिक रूप में ऐसी बातों का कहीं आना मैंने नहीं देखा है। हाँ पर एक बात सही है कि अभी चीन नेपाल के अंदर अत्यधिक सक्रिय हो रहा है। नेपाल के विभिन्न प्रोजेक्ट में चीन द्वारा सहयोग किया जा रहा है। उसके द्वारा ऐसा क्यों किया जा रहा है? किसी भी देश के द्वारा यदि किसी दूसरे देश को सहयोग किया जाता है तो सहयोगकर्ता का कोई न कोई निजी स्वार्थ उसके पीछे छिपा रहता है। चीन अभी जिस प्रकार नेपाल में सक्रिय होकर सहयोग कर रहा है इससे भारत कहीं न कहीं सशंकित हो सकता है पर इसके कारण से कोई गंभीर समस्या होगी ऐसी अवस्था नहीं है। भारत काफी पहले से नेपाल की सहायता करता आया है परन्तु चीन ने जिस किस्म की सक्रियता को बढ़ाया है ऐसा भारत ने नहीं किया है।

 

नेपाल को यदि भारत द्वारा मदद की जा सकती है तो चीन द्वारा क्यों नहीं?

 

चीन के द्वारा नेपाल की मदद किये जाने पर भारत को कोई भी आपत्ति नहीं है परन्तु एक छोटे से देश में चीन जैसे बड़े देश के द्वारा जिस किस्म की सक्रियता बढाई जा रही है उसके प्रति हम सशंकित मात्र हैं। चीन द्वारा नेपाल को सहयोग करना और भारत द्वारा सहयोग करना अलग- अलग बातें हैं। नेपाल -भारत के बीच सदियों पुराना सम्बन्ध है। दोनों के बीच भाषा ,संस्कृति, रहन-सहन बहुत सी बातें सामान हैं। एक के द्वारा दूसरे को किसी प्रकार की मदद करने पर अपने ही अपने ही परिवार की मदद जैसी अनुभूति होती है।उसमें किसी भी प्रकार का निजी स्वार्थ नहीं होता। चीन के साथ नेपाल की कोई भी ऐसी बात में समानता नहीं है फिर चीन क्यों इतनी अधिक सहायता करने को तत्पर है इसका कारण क्या है? भारत सब चीजें दे ही रहा था, 'हर किस्म का सहयोग भारत से हो ही रहा था।

चीन द्वारा नेपाल की जो मदद की जा रही है उसके परिणाम अभी नहीं थोड़ा बाद में दिखेंगे।

 

चीन द्वारा नेपाल का सहयोग किये जाने पर भारत को परेशानी क्यों ?

 

ये बातें मैंने आधिकारिक रूप में सरकार की तरफ से नहीं कही हैं। मैं आम जनता के दृटिकोण की बात कर रहा हूँ,अपने अनुभव के आधार पर कह रहा हूँ।

मैंने पहले ही कहा कि भारत का इससे कोई सरदर्द नहीं है। परन्तु नेपाल को लेकर ये जरा सशंकित जरूर है। किसी भी देश का विकास एक अच्छी बात है परन्तु विकास किस किस्म से हो रहा है ये जरूर ही चिंता का विषय है।

 

चीन का नेपाल की अपेक्षा भारत में अधिक कारोवार होता है भारत में भी उसकी व्यापार लगानी हो रही है। कितने ही व्यापारिक समझौते भी हुए। भारत के द्वारा चीन के साथ विभिन्न समझौता करना उचित और नेपाल के साथ गलत?

 

भारत में चीन की लगानी और परियोजनाएं बहुत कम हैं। चीन का व्यापार उतना अधिक नहीं। वहीं नेपाल के छोटा सा देश होने के कारण ये भारत की अपेक्षा यहाँ अधिक दिखाई देता होगा,ये अलग बात है परन्तु भारत में चीन की उतनी बड़ी लगानी नहीं है।

 

चीन के राष्ट्रपति सी चिनफिंग नेपाल से पहले भारत भ्रमण में गए,भारत से वापसी पर नेपाल आये ,क्या इससे स्पष्ट नहीं होता कि नेपाल से ज्यादा अच्छे रिश्ते चीन और भारत के हैं?

 

मैंने पहले भी कहा है कि चीन के साथ भारत के अच्छे सम्बन्ध हैं इसके कूटनीतिक सम्बन्ध भी अच्छे हैं परन्तु विगत की एक घटना आशंकित करती है। चीन के राष्ट्रपति पहले भारत की यात्रा करेंगे या नेपाल की ये उनकी स्वेच्छा का विषय है।

इस बात को लेकर दोनों देशों के बीच के सम्बन्ध का विश्लेषण नहीं किया जा सकता। भारत के कूटनीतिक क्षेत्र तथा रक्षा मंत्रालय से इस बारे में कोई भी आधिकारिक धारणा व्यक्त नहीं की गई है। अगर कोई बात बाहर आई भी है तो वह राजनीतिक विश्लेषण मात्र है। इस प्रकार के विश्लेषण सभी देशों में होते हैं। अमेरिका रूस जापान जैसे देशों में भी इस तरह के विश्लेषण होते रहते हैं। परन्तु भारत द्वारा नेपाल को चीन की दृष्टि से देखे जाने की जो बात बाहर आई है उसमें किसी भी प्रकार की कोई सत्यता नहीं है।

 

आपने भारत के पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम के साथ भी काम किया है। उस समय की भारत की सुरक्षा अवस्था और इस समय की भारत की सुरक्षा अवस्था में आप कितना फर्क पाते हैं?

 

पूर्व राष्ट्रपति कलाम ने कभी भी किसी अन्य देश के साथ युद्ध करना नहीं चाहा, वे अत्यंत  शांतिप्रिय व्यक्ति थे। राष्ट्र की भलाई के लिए वे हर वक्त चिंतित रहते थे। यद्यपि भारत में राष्ट्रपति कार्यकारी पद नहीं है। पूर्व राष्ट्रपति कलाम के द्वारा जिस पथ का अवलम्बन किया गया था वर्तमान में प्रधानमंत्री मोदी भी उसी रास्ते चलने लगे हैं। कलाम के द्वारा देखा गया सपना प्रधानमंत्री मोदी के द्वारा साकार किया जाने लगा है। अब रही बात शांति सुरक्षा की तो देश की स्थितियां सदैव एक सी नहीं रहती समयानुसार उनमें परिवर्तन होता रहता है। पहले भी चीन और पाकिस्तान के साथ भारत के संबंधों की चर्चा होती थी अभी भी हो रही है। उस समय भारत सरकार के द्वारा प्रतिक्रिया नहीं दी जाती थी पर अब दी जाने लगी है। पाकिस्तान के द्वारा भारत की सीमा पर किसी प्रकार की गतिविधि किये जाने पर तब भारत नजरअंदाज करता था, उसे उतनी तबज्जो नहीं देता था पर वर्तमान सरकार इस विषय पर अत्यधिक सक्रिय है।उसके द्वारा पाकिस्तान को जवाब दिए जाने लगे हैं, बस फर्क इतना ही है।

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