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होली : हिन्दुओं का पवित्र त्यौहार

person access_timeMar 10, 2020 chat_bubble_outline0

परमात्मा की इस अनंत सृष्टि में मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जिसके पास ज्ञान, विवेक, बुद्धि-विचार जिज्ञासा और कौतूहल जैसे गुण प्रकृति ने उसे वरदान स्वरुप प्रदान किये हैं। यही वह वरदान है जिसके चलते परमात्मा की सृष्टि में मानव अन्य प्राणियों से श्रेष्ठ हो सका है। अपने विवेक और जिज्ञासा, कौतूहल और बुद्धि के बल पर उसने अपने आप को एक नवीन आयाम भी प्रदान किया है। विवेक और ज्ञान के चलते वह अपने प्राप्य से कभी भी संतुष्ट नहीं जो पाता अतः और अधिक प्राप्ति के लिए निरंतर संघर्षरत रहता है। ये संघर्ष उसे कई बार थकित करता है, उसके जीवन को मानों बोझिल सा भी कर देता है। ऐसे में वह फिर एक नव यात्रा की ओर अग्रसर होता है और प्रयास करता है कि वह ऐसा कुछ भी करे जिससे उसका जीवन उल्लास, अनुराग, आनंद और खुशियों से भर जाये। इसी अनुसार हमारे पूर्वजों द्वारा समय-समय पर अनेक प्रकार के त्योहारों का आयोजन किया गया।


होने को हरेक त्यौहार के पीछे कोई न कोई सामाजिक, धार्मिक, आध्यात्मिक कहानी जुडी होती है जो किसी न किसी प्रकार से मानव के सम्मुख कोई न कोई शिक्षा कोई न कोई आदर्श प्रस्तुत करती है। वैसे तो हिन्दू समाज अनेक अनेक त्योहारों और पर्वों से भरा हुआ है परन्तु फिर भी मुख्य त्योहारों के रूप में हिन्दुओं के चार पर्वों को रखा जाता है जिनमें से रंगों का त्यौहार होली भी एक विशेष पर्व है।
 

छह ऋतुओं से सजे हिमालय की तराई में बसे भारतीय उपमहाद्वीप में शिशिर के कठोर जाड़े के समापन और मनमोहिनी वसंत ऋतु के आँगन में कितने ही त्यौहार मनाये जाते हैं जिनमें वसंत पंचमी, शिवरात्रि और होली प्रमुख हैं ; इनमे भी होली अत्यंत धूमधाम से मनाया जाने वाला त्यौहार है। ये त्यौहार तब होता है जब प्रकृति अपने गदराये यौवन पर इठलाती है - शिशिर के मानों कमजोर पड़ गए सूर्य देवता के पुनः अपने प्रचंड रूप में लौटने की तैयारी, खेतो में पीली फूली सरसों, बागों में शिशिर की सर्दी से नगें हुए वृक्षों पर नव कोपलों के प्रस्फुटन का मनोहारी दृश्य, आम्र वृक्षों का बौर से लद जाना और उसकी मादक मीठी सुगन्धि में कोयलिया का कुहू कुहू गाना, बसंती वयार का मतवाली होकर गाना 'हवा हूँ हवा मैं वासंती हवा हूँ, जिधर चाहती हूँ उधर घूमती हूँ।'
 

जैसा कि सब जानते हैं कि समाज में जो भी तीज त्यौहार मनाये जाते हैं उनके पीछे कोई न कोई धार्मिक आध्यात्मिक कथा जुडी होती है, इसी तरह होली के साथ भी परापूर्व काल की ऐसी ही एक घटना के जुड़े होने की मान्यता है - अति प्राचीन काल में हिरण्यकश्यपु नाम के एक राक्षसराज थे जिन्होंने शक्ति प्राप्ति के उद्देश्य से घोर तपस्या कर ब्रह्मा को प्रसन्न कर अमर होने का वरदान माँगा चूँकि ये प्रकृति का नियम है कि जो बना है उसे मिटाना ही होगा सो ब्रह्मा ने अमरता का वरदान देने में असमर्थता जताते हुए कहा कि तुम कोई और वरदान मांगों तब उस दैत्यराज ने कहा ठीक है, तो आप मुझे ये वरदान दें कि मुझे न तो कोई मनुष्य मार सके न कोई जानवर, न दिन में मार सके न रात्रि में न घर के अंदर मार सके न बाहर, न भूमि पर मार सके न आकाश में। चूँकि वरदान बहुत ही योजनाबद्ध तरीके से माँगा गया था, बड़ा जटिल था पर व्रह्मा भी वचनबद्ध थे सो उन्हें तथास्तु कह वरदान देना ही पड़ा
कहते हैं न अति सर्वत्र वर्ज्यते -- अब क्या था वह दैत्यराज इतना अहंकारी हो गया कि उसने स्वयं को ही ईश्वर घोषित कर दिया। अब उसके राज्य में किसी भी प्रकार के धार्मिक कर्म बंद करा दिए गए, ईश्वर की पूजा आराधना के स्थान पर उसकी ही पूजा की परंपरा डाली गई।

 

कहा ही गया है कि हर निर्मित चीज का अंत होता है सो उसके जीवन के अन्त्य के रूप में उसके ही घर में विष्णु भक्त प्रह्लादका जन्म हुआ जो हमेशा एक ही मन्त्र का उच्चारण करता रहता था 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय, ॐ नमो  भगवते वासुदेवाय। ये पिता हिरण्यकश्यपु के लिए असहनीय था सो उसने प्रह्लाद को समझाने की हर संभव कोशिस की पर विष्णु भक्त पर उसका कोई प्रभाव पड़ता न देख उसने उसे मारने के भर मुग्दर प्रयत्न किये परन्तु जब किसी भी उपाय से उसे दरकिनार न किया जा सका तो उसने अपनी वहन होलिका (जिसे ईश्वरीय वरदान प्राप्त था कि अग्नि उसे जला नहीं सकती) से प्रह्लाद को लेकर अग्नि में बैठने को कहा। निश्चित समय पर होलिका अपने छोटे से भतीजे को लेकर अग्नि में प्रविष्ट होती है परन्तु ये क्या वरदान प्राप्त होलिका तो अग्नि में भस्म हो जाती है पर विष्णु भक्त प्रह्लाद जस का तस अग्नि से बाहर आ जाता है। स्मरण रहे कि कोई भी कहानी मात्र प्रतीक होती है।

देखा गया है कि मानव उसके पीछे की सत्यता पर न जाकर उसकी शिक्षा पर अमल करता आया है ; तब से (उस सतयुग से) अब तक प्रह्लाद के अग्नि से बचने और होलिका के अग्नि में दहन होने के क्रम में होली जैसे रंगों से भरे त्यौहार की नीव पड़ी और इसे अब तक बड़े हर्ष उल्लास के साथ मनाया जाता है क्योंकि इसके पीछे की शिक्षा ये कहती है कि हर बुराई का अन्त्य अन्ततः होता ही है।
 

आज हिन्दुओं के चार बड़े पर्वों-रक्षा बंधन, दशहरा, दीवाली और होली जो क्रमशः जाति प्रथा के अनुसार विभक्त थे। रक्षाबंधन ब्राह्मणों के लिए, दशहरा क्षत्रियों के लिए, दीवाली वैश्यों के लिए तथा होली शूद्रों के लिए। पर कालांतर में इस वर्गीकरण का भी समापन होता गया और इस पर्व को ही नहीं सभी पर्वों को समाज के सभी लोगोंके द्वारा मिलजुलकर मनाया जाने लगा। भले ही ये भारतीय उपमहाद्वीप का मनमोहक त्यौहार है परन्तु आज ये त्यौहार वैसे ही संसार भर में जाने लगा है जैसे कि हिन्दू संसार भर में फैले हुए हैं।

 

हमारे देश नेपाल में ये त्यौहार दो दिन मनाया जाता है ; देश के पहाड़ी हिस्सों और राजधानी काठमाँडू में जहाँ ये त्यौहार फाल्गुन पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है वहीं देश के तराई क्षेत्र में इसे दूसरे दिन प्रतिपदा को मनाया जाता है। प्रातः शुभ मुहूर्त में होलिका दहन किया जाता है उसके पश्चात अबीर, गुलाल और रंगों से लोगों के द्वारा मिलजुलकर होली खेली जाती है। देश के पश्चिमी हिस्से (धनुषा, जनकपुर) की तरफ ये त्यौहार लगभग एक सप्ताह पूर्व ही शुरू हो जाता।
 

उत्तर भारत में तो इसकी धूम और भी पहले से शुरू हो जाती है। घरों में महिलाएं अनेक किस्म के व्यंजन महीनों पहले से बनाना शुरू कर देती हैं किस्म-किस्म के पापड़, चिप्स लोगों के आंगनों में और छतों पर सूखने लगते है, उस दिन के लिए भांति-भांति की मिठाइयां बनती है, पान के बीड़े सजाये जाते हैं। वह समय था जब होलिका दहन के लिए घरों में गोबर के उपले बनाये जाते थे, निश्चित स्थान पर ढेर सारी लकड़ियों का बड़ा सा ढेर बनाया जाता था। शुभ मुहूर्त में उस ढेर में आग लगाई जाती थी, अपने खेतों की गेहूं की बालें और आम्र बौर को अग्नि की प्रदक्षिणा करते हुए, होलिका माई की जय कहते हुए अग्नि को समर्पित किया जाता था। परिक्रमा के समापन के बाद लोग वहाँ की अग्नि को घर में लाकर उससे ही अपने घर में आग जलाते थे। और फिर शुरू होता था रंगों से खेलने का सिलसिला। दोपहर 12 बजे तक रंगों का खेल चलता है तत्पश्चात लोग नहा धोकर तैयार होकर अपने मित्रों-परिचितों के घर होली मिलने जाते हैं। वे एक दूसरे से गले मिलते हैं।


वास्तव में ये वह दिन है जब व्यक्ति हर किस्म के गिले शिकवे को भुलाकर आपसी मेलजोल को बढाकर सौहार्दपूर्ण वातावरण में एक दूसरे के साथ अपनी खुशियों को बांटते हैं। होली एक ऐसा त्यौहार है जो इस बात की शिक्षा देता है कि बुराई कितनी भी सघनभूत क्यों न हो पर उसका अन्त्य होता ही है सो ये त्यौहार बुराई पर अच्छाईकी विजय के रूप में मनाया जाता है।

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