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फिल्मों में महिला किरदारों का क्रांतिकारी कदम

person access_timeMar 07, 2020 chat_bubble_outline0

हिंदी सिनेमा जिसको आज हम बॉलीवुड के नाम से जानते हैं इसको यहां तक पहुंचाने में महिलाओं का योगदान अतुलनीय है। यदि महिलाएं उस दौर में समाज की बंदिशें नहीं तोड़ती तो आज का बॉलीवुड और इसका खुलापन हमारे सामने नहीं आता। आजादी के बाद जब भारत में फिल्‍मों का निर्माण शुरू हुआ तो महिलाओं का घर से बाहर निकलना भी गलत माना जाता था। आपको ये जानकर हैरत हो सकती है कि शुरुआती दौर की फिल्‍मों में महिलाओं का किरदार भी पुरुष ही निभाते थे। ऐसे में महिलाओं के लिए थियेटर और फिल्‍मों से जुड़ना वास्‍तव में क्रांतिकारी फैसला था। आज हम ऐसी ही कुछ अदाकाराओं के बारे में बता रहे हैं जिन्‍होंने भविष्‍य के सिनेमा में महिलाओं की सफलता की नींव रखी थी।
 


देविका रानी


देविका रानी को भारतीय सिनेमा की पहली नायिका कहा जाता है। विख्यात कवि श्री रवीन्द्रनाथ टैगोर विशाखापत्तनम में पैदा होने वाली देविका के चचेरे परदादा थे। उनके पिता कर्नल एमएन चौधरी मद्रास के पहले 'सर्जन जनरल' थे। देविका क्‍योंकि एक पढ़े लिखे और काफी संभ्रांत परिवार से ताल्‍लुक रखती थीं इसलिए उन्‍हें परिवार की बंदिशों का तो सामना नहीं करना पड़ा लेकिन समाज की शुरुआती सोच उनके प्रति ठीक नहीं थी। उन्‍होंने लंदन से थियेटर की शिक्षा ली थी। इसी दौरान उनकी मुलाकात हिमांशु राय से हुई। हिमांशु राय ने देविका रानी को लाइट ऑफ एशिया नामक अपने पहले प्रोडक्शन के लिये सेट डिजाइनर बनाया। सन् 1929 में उन दोनों ने विवाह कर लिया। भारत आकर हिमांशु राय ने फिल्में बनाना शुरू किया और इनमें देविका बतौर नायिका बनीं। वर्ष 1933 में उनकी फिल्म कर्मा प्रदर्शित हुई और इतनी लोकप्रिय हुई कि लोग देविका रानी को कलाकार के स्थान पर स्टार सितारा कहने लगे थे। इस तरह देविका रानी भारतीय सिनेमा की पहली महिला फिल्म स्टार बनीं।


राजकुमारी दूबे



1936 में आई देवदास और इसमें चंद्रमुखी का किरदार निभाने वाली राजकुमारी दूबे ने समाज की बंदिशों को तोड़ते हुए गायन फिर थियेटर और फिर फिल्‍मों का रुख किया था। जिस वक्‍त उन्‍होंने इस फिल्‍म में काम किया था उस वक्‍त वह महज 15 वर्ष की थीं। महज दस वर्ष की उम्र में उन्‍होंने स्‍टेज पर गाना शुरू किया था। उनकी आवाज का जादू कई फिल्‍मी गीतों में भी दिखाई दिया और लोगों के सिर चढ़कर बोला। 'सुन बैरी बलम सच बोल रे इब क्‍या होगा' ऐसा ही एक गीत है। इसके अलावा उन्‍होंने महल, और पाकीजा समेत करीब 100 फिल्‍मी गीतों को भी अपनी आवाज से नवाजा था। इसके अलावा उन्‍होंने गुजराती और पंजाबी गीतों को भी अपनी आवाज दी थी। महज 11 वर्ष की उम्र में उन्‍होंने पहली बार बतौर चाइल्‍ड एक्‍टर फिल्‍म 'राधेश्‍याम और जुल्‍मी हंस में काम किया था। वर्ष 2000 में उनका मुंबई में निधन हुआ था।



सुरैया


हिंदी सिनेमा और समाज की बंदिशों को तोड़कर अपनी एक अलग पहचान बनाने में सुरैया भी आगे रही। 15 जून 1929 को पंजाब में एक मुस्लिम परिवार में पैदा हुई सुरैया की अदाकारी का हर कोई कायल था। देव आनंद से उनके इश्‍क के चर्चे भी काफी आम थे। यहां तक की देव आनंद ने उनसे शादी करने का फैसला भी कर लिया था। लेकिन उनका ये सपना कभी सच नहीं हो सका था। सुरैया आजीवन कुंवारी रही थीं। बहरहाल उनका फिल्‍मों से जुड़ना और आजीवन शादी न करने का फैसला अपने आप में काफी बड़ा था। उन्होंने 40 से 50 के दशक में हिन्दी सिनेमा में अपना योगदान दिया। उन्हें उनकी प्रतिभा के लिए उपमहाद्वीप की मलिका-ए-तरान्नुम से नवाजा गया। 31 जनवरी 2004 को सुरैया का निधन हो गया।

दुर्गा खोटे


हिंदी सिनेमा की तरफ रुख करने से पहले वह मराठी फिल्‍मों में भी काम कर चुकी थीं। शुरुआती फिल्मों में नायिका की भूमिकाओं में लोगों ने उन्‍हें काफी सराहा। वहीं बाद में चरित्र अभिनेत्री के तौर पर भी लोग उनकी अदाकारी के कायल थे। उनके बेमिसाल अभिनय को आज भी याद किया जाता है। उन्‍होंने उस दौर में सिर्फ फिल्‍मों की तरफ रुख करने का ही बड़ा फैसला नहीं किया था बल्कि उन्‍होंने अपनी मर्जी से अपनी पंसद के युवक से शादी की थी। हालांकि उनका शादीशुदा जीवन काफी खुशहाल नहीं रहा। मराठी में लिखी अपनी आत्मकथा 'मी दुर्गा खोटे' में उन्होंने अपने जीवन की कई झकझोड़ने वाली घटनाओं के बारे में जानकारी दी है। करीब 200 से अधिक फिल्‍मों में उन्‍होंने जीवंत अभिनय कर लोगों का दिल जीत लिया था। 14 जनवरी 1905 को पैदा हुई दुर्गा के पिता का नाम पांडुरंग शामराव था। उनका परिवार कांकणी बोलता था और गोवा से महाराष्‍ट्र आया था। दुर्गा खोटे ने सेंट जेवियर कॉलेज से बीए की डिग्री हासिल की थी। जहां तक उनके फिल्‍मी सफर की बात है तो उनका ये सफर 1931 में एक साइलेंट मूवी फरेबी जाल से शुरू हुआ था। उन्‍होंने उस दौर के बड़े नाम चंद्र मोहन, सोहराब मोदी और पृथ्‍वीराज कपूर के साथ काम किया था।


मीना कुमारी


मीना कुमारी या महजबीं बानो ने भी उस दौर में फिल्‍मों में काम करना शुरू किया था जब महिलाओं पर कई तरह के प्रतिबंध थे। उन्‍हें भारतीय सिनेमा की ट्रैजेडी क्वीन भी कहा जाता है। अभिनेत्री होने के साथ-साथ वो एक शायारा और पार्श्वगायिका भी थीं। वर्ष 1939 से 1972 तक मीना कुमारी ने अपने अभिनय से हिंदी सिनेमा को मजबूती दी थी। मीना कुमारी के पिता अली बक्श पारसी और नानी भी रंगमंच से जुड़े हुए थे। फिल्म शाही लुटेरे में उन्‍होंने संगीत भी दिया था। वहीं उनका मां एक मशहूर नृत्यांगना और अदाकारा थी। मीना कुमारी 1939 में पहली बार फिल्म लैदरफेस में बेबी महजबीं के रूप में नजर आईं थीं। 1940 में आई फिल्‍म एक ही भूल में उनका नाम बेबी मीना हो गया था। 1952 में आई फिल्म बैजू बावरा ने मीना कुमारी के फिल्मी सफ़र को नई उड़ान दी और उनकी प्रसिद्धि चार चांद लगा दिए। 1954 में उन्हें इसके लिए पहले फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के पुरस्कार से सम्मानित किया गया।- एजेंसी

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