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बिहार चुनाव परिणाम मेरी दृष्टि में, हारे तो सिर्फ नीतीश और सोनिया है

person access_timeNov 13, 2020 chat_bubble_outline0

लगभग सभी राजनीतिक विश्लेषकों, पंडितो, महाघाघ पंडितो, 'प्री पोल' और 'पोस्ट पोल' के हवा हवाई वैज्ञानिकों एवं मोदी विरोध के लिए ही जीवित रह रहे स्वनामधन्य महानुभावो के अनुमान, भविष्वाणी तथा मनगढंत सारे कयासों पर अस्वीकृति का ठप्पा लगते हुए बिहार की जनता ने हाल में सम्पन्न हुए बिहार विधान सभा के चुनावों में एनडीए गठबंधन (मोदी-नीतिश) को ही निरंतरता देने का जनादेश दिया।

7 नोभेम्बर को तीसरे चरण का मतदान होने के साथ ही 'इडियट बॉक्स' में प्रसारित सभी चुनावी सर्वेक्षणों में बिहार में लालटेन युग आने की पुरजोर दलीले दी गयी थी।

अधिकांश चुनावी सर्वेक्षणों और हवाई दलीलों में इस बार सत्ता की चाबी महागठबंधन (लालू सुपुत्र एवं इनके सहयोगी दल) के पास होने की पुष्टि की गयी। पटना में तेजस्वी यादव के राज्यारोहण की भविष्वाणी ही नहीं वरन 'वर्चुअल' बिसात ही बिछा दी गयी।

एक-दो अथवा तीन-चार ही नहीं अपितु सभी मीडिया हाउस और सारे सर्वेक्षण (पोस्ट पोल) महागठबंधन को स्पष्ट बहुमत मिलने की ढींगे हाँक रहे थे। 243 सदस्यीय बिहार विधान सभा में बहुमत की लक्ष्मण रेखा छूने के लिए आवश्यक संख्या 122 ही पर्याप्त थी या कहिये है लेकिन कुछेक 'पोस्ट पोल' तो महागठबंधन को 180 स्थानों में जीत मिलने की संभावना व्यक्त कर रहे थे।

दस नोवेम्बर को मत गणना प्रारम्भ होती है। प्रारंभिक काउंटिंग में महागठबंधन लीड करता है 'पोस्ट पोल' वालो की पता नहीं क्या फूलकर क्या हो जाती है ! फिर 2-3 घंटो में तस्वीर बदल जाती है। एनडीए 'लीड' करने लगता है लेकिन शाम होते होते भी स्थिति स्पष्ट नहीं हो पाती है। एनडीए 123-125 में चल रहा होता है तो महागठबंधन 108-110 की ताकत से पीछा कर रहा होता है।

शाम 7 बजे तक यही रसाकस्सी चलती है। ऐसी परिस्थिति में कुछ भी अनुमान लगाना आसान नहीं था। ऊंट किसी भी करवट बैठ सकता था। अब ऊंट किस करवट बैठेगा कौन कहे ?

असमंजस और अन्यौलताका प्रमुख कारण मतगणना हो रही 26 सीट बनी हुयी थी। इन सीटों पर अग्र स्थान में चल रहे प्रत्याशी अपने निकटतम प्रतिस्पर्धी से हज़ार से भी कम वोटो से ही आगे चल रहे थे। फासला अधिक नहीं था, यह 26 सीट किसी भी गठबंधन के पार्टी कार्यालय में चल रही तैयारियों में ग्रहण लगाने के लिए पर्याप्त थी।

टेलीविजन में बैठे नाना विश्लेषक और 'ऐंकर' बारबार दोहरा रहे थे 'पिक्चर अभी बांकी है मेरे दोस्त' !

हाँ, यह सही भी था। क्योकि हज़ार से भी कम मत अंतर से मत गणना हो रही इन 26 सीटों के अंतिम परिणाम से ही स्पष्ट होना था कि नीतिश का तीर लक्ष्य भेदन करेगा या कि वर्षो से किसी कोने में पडी लालटेन फिर रौशन हो उठेगी। दोनों ही संभावनाओं के द्वार चरमराए नहीं थे।

देर रात गए ही पिक्चर पूरी हो पायी। सभी परिणाम घोषित हुए। बिहार की जनता ने नीतिश की अगुवाई वाले एनडीए को स्पष्ट बहुमत का आंकड़ा पार कराते हुए 125 स्थानों में विजय का अनिवर्चनीय स्वाद चखने का अवसर दिया था। उसी जनता ने लालू सुपुत्र का कद बढ़ाते हुए उनके द्वारा नेतृत्व किये गए गठबंधन को 110 सीट प्रदान करते हुए विपक्ष में बैठने की जनाज्ञा दी।

एक बार फिर चुनाव के दौरान करोडो खर्च कर किये जाने वाले चुनावी सर्वेक्षण के औचित्य पर प्रश्न लगा, आखिर इनकी उपयोगिता क्या है? क्यों यह हवाई किले खड़े किये जाते है?

नीतिश के राजभोग के तीन कार्यकाल से उत्पन्न 'एंटी इंकम्बेंसी फैक्टर' ,नीतिश का राजनीतिक अस्थिरताजन्य चरित्र, चुनाव के आसन्न पास आ एनडीए गठबंधन के प्रमुख घटक लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी-चिराग पासवान) का विद्रोह कर अकेले चुनाव लड़ने की घोषणा, चुनाव के दौरान चिराग का बीजेपी का विरोध न कर मात्र नीतिश का पुरजोर विरोध करने की रणनीति, चिराग की अराजक और

शंकास्पद गतिविधियों के प्रति मोदी-शाह-नड्डा की मौनता, कोभीड़- 19 के कारण तमाम किस्म की विपत्ति -दुःख-कष्ट झेली बिहार की लाखों जनता के आक्रोश के अतिरिक्त बेरोजगारी एवं विभिन्न स्थानीय स्तर की विविध समस्याओं का निराकरण न कर पाने की सत्ता पक्षीय अकर्मण्डयता आदि कुछ ऐसे पक्ष थे जिनसे एक बार तो आशंका हुयी कही 'पोस्ट पोल' के ख़याली पुलाव परिणाम में न बदल जाए।

चुनाव प्रचार के कालखंड में मुखर वोटर, युवा वोटर की सक्रियता भी महागठबंधन के पक्ष में ही खुलकर दिखी थी। यह तो 'साइलेंट वोटर' कहे जाने वाले महिला मतदाताओ का ही 'करिश्मा' हुआ जिससे सिंहासन की बागडोर एक बार फिर से एनडीए के हात लगी।

सत्ता तो गणित का खेल है। जिसने गणित पूरा किया उसके हात राजभोग...

पिछले कई वर्षो से बिहार में तीन प्रमुख राजनीतिक दल रहे है। इन तीनो में जो दो दल जुड़ जाते है सत्ता की सेविका उनकी बांट जोहती है।

सत्ता गणित के अलावा अगर बिहार के चुनाव में जय-पराजय की चर्चा की जाए तो बिहार में ही क्या? (लेखक नेपाल में है) इतना तो कही का भी आमजन समझ सकता है कि 2020 के विधान सभा निर्वाचन में सुशासन बाबू के छवि ख़राब हुयी है। जनता ने उन्हें पूरी तरह से नकार दिया है उनके अतिरिक्त बिहार की जनता ने सौ वर्ष पुरानी कांग्रेस को भी 'अब न हम मिलेंगे दुबारा' बोल दिया।

कल की ही तो बात है 2015 के चुनाव में 71 तीर लक्ष्य भेदन में सफल हुए थे नीतीश बाबू। पिछली विधान सभा में नीतिश का संख्या बल 71 हुआ करता था। लेकिन इस बार उन्हें / उनके दल को 28 सीटों का नुक्सान हुआ। विधान सभा में उनकी सदस्य संख्या सिर्फ 43 रह गयी। दल गत आधार के अनुसार जेडीयु विधान सभा का तीसरे नंबर के दल में खिसक गया। अब यह दूसरी बात है कि गठबंधन राजनीति के चलते भले ही जनता द्वारा अवमानित नीतिश फिर मुख्यमंत्री बन जाए।

इसी प्रकार सोनिया-राहुल के नेतृत्व वाली कांग्रेस के पास पिछली विधान सभा में 27 सीट हुआ करती थी। इस बार के चुनाव में माँ-बेटे का दल 27 में से 8 गवां 19 में सिमट गया। वास्तव में बिहार के नए जनादेश ने नीतिश और सोनिया को पराजय का दर्पण दिखाया है।

रही बात इस चुनाव में जीत किसकी हुयी ? मेरे तमाम प्रगतिशील, धर्म निरपेक्ष, वामपंथी, हिन्दू विरोधी, धर्म धुंधकारी, मौका परास्त, बुद्धिहीन, अविवेकी एवं सभी प्रकार की निम्न मानसिकता, कुंठा एवं क्षुद्रताग्रस्त मित्रवर्गों की कुशल क्षेम चाहते हुए स्पष्ट करना चाहता हूँ कि मित्रो इस बार बिहार की जनता ने आपके साथ छल करते हुए आपके 'परमानेंट' रिपु मोदी के गले में 74 कमल पुष्पों की माला डाल दी। हरजाई जनता ने पिछली बार के 53 कमल पुष्पों में देखिये तो 'आपकी विचारधारा के प्रतिकूल सनातन परम्परा अपनाते हुए' 21 शुभ संख्या की वृद्धि कर नवीन कमल पुष्प खिला दिए। मैं आपका दर्द समझ सकता हूँ अरे सीट बढ़ानी थी तो 22 बढ़ाते 19 बढ़ाते, किसी अन्य संख्या में बढ़ाते 21 ही क्यों बढाई?

व्यक्तिगत रूप से देखा जाए तो बिहार के इस चुनाव ने लालू के सुपुत्र तेजस्वी यादव को परिपक्व राजनीतिज्ञ बना दिया। तेजस्वी बिहार के राजनैतिक पटल में सशक्त रूप से स्थापित हो गए। तेजस्वी के नेतृत्व में महागठबंधन के सबसे बड़े दल राजद ने 75 स्थानों में लालटेन जला दी।

वैसे तो इस संख्या में पहले की अपेक्षा ५ सीटों की कमी हुयी है। लेकिन याद रखना होगा 2015 के चुनाव में तेजस्वी यादव नीतीश के नेतृत्व में महागठबंधन का हिस्सा थे। इस बार तेजस्वी ने अपने ही बलबूते 75 सीट जीत राजद को बिहार का सबसे बड़ा दल बना दिया। आने वाले वर्षो में तेजस्वी बिहार की राजनीति के महत्वपूर्ण और मजबूत केंद्र बनेगे इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता।

इस चुनाव की सबसे रोचक बात तो यह रही कि सत्तापक्षीय गठबंधन और प्रमुख प्रतिपक्षीय गठबंधन की विधान सभा में उपस्थिति ज्यो की त्यों रही। चुनाव पूर्व भी सत्ताधारी के पास विधान सभा में 125 का संख्या बल था और विपक्ष के पास 110 का। नए जनादेश ने भी यही मंजर बनाया। नयी विधान सभा में भी दोनों की उपस्थिति इतने ही नम्बरो के साथ होगी।

अब आप इसे सहज पचाये या पचाने के लिए कोई बाहरी सहायता ले, बात तो 'क्लियर' है बिहार चुनाव में मोदी का जादू चला है अन्यथा तेजस्वी के आगे नीतीश का तरकश खाली हो चुका था। इसमें कोई शक अथवा किन्तु, परन्तु की गुंजाईश नहीं कि नीतीश बाबू को बिहार की जनता ने बोल दिया- हाथ कंगन को आरसी क्या, नीतीश बाबू पढ़े लिखे को फारसी क्या? ( आरसी को यहाँ आइना के सन्दर्भ में ले)।

अभी से समझ ले तो बेहतर होगा नीतीश बाबू ! अब आपका राजनीतिक भविष्य बिहार की प्रांतीय राजनीति में समाप्ति की ओर कूच कर चुका है। अपना राजनीतिक भविष्य अब पटना छोड़ दिल्ली में तलाशना ही एक मात्र विकल्प बचा है आपके पास।

इतना तो तय है शिव सेना और अकाली दल के जाने के बाद भाजपा नीतीश के साथ किसी प्रकार की गुस्ताखी अथवा बेदिली दिखाने का साहस नहीं करेगी। भाजपा नीतीश को उनका मन चाहा पद देने के लिए बाध्य है और रहेगी। नीतीश चाहे बिहार का सिंहासन मांगे भाजपा देगी, अथवा वह पटना छोड़ दिल्ली का रुख करे तो भी उन्हें उच्च सम्मान सहित बड़ी जिम्मेदारी मिल जाएगी।

नोवेम्बर महीने में बिहार विधान सभा के साथ ही भारत के अन्य कई राज्यों में रिक्त हुयी विधान सभा के लिए भी चुनाव हुए। सभी के परिणाम आ चुके है। इन परिणामो ने निसंदेह भाजपा समर्थको में दिवाली धूमधाम से मनाने की हौसला अफजाई की है। 'मोदी है तो मुमकिन है' एक बार फिर प्रमाणित हुआ है।

छत्तीसगढ़, गुजरात, हरियाणा, झारखण्ड, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, मणिपुर, नागालैंड, उड़ीसा, तेलांगाना और उत्तर प्रदेश की 59 सीटों के लिए हुए चुनाव में भाजपा ने 40 स्थानों पर अपना परचम फहराया है। भाजपा ने उत्तर प्रदेश की 7 में से 6 सीटे, तेलंगाना की 1 में 1, मणिपुर की 5 में 4, मध्य प्रदेश की 28 में 19, कर्नाटक की 2 में 2 और गुजरात की 8 में आठौ सीटों पर जीत हासिल की है।

बिहार ही नहीं इन राज्यों के चुनाव परिणाम ने भारतीय जनमानस में मोदी का 'मैजिक' यथावत रहने की पुष्टि की है।

अरबो जनसंख्या वाले विशाल भारत देश में कोरोना कहर के चलते करोडो लोंगो ने जीवन में कभी न देखे, न सुने, न भोगे असहनीय पीड़ा, दुःख, संताप, अभाव के साथ सभी किस्म की तकलीफे और बाधा व्यवधान झेले।

अमेरिका में कोरोना के चलते राजनीतिक दृश्यावली बदल गयी। भारत में हाल में संपन्न हुए चुनाव के परिणामों ने कोरोना कहर के दौरान मोदी सरकार के द्वारा किया गया आपदा प्रबंधन और राहत कार्यो को जनता ने हृदय से स्वीकार किया ऐसा समझना क्या गलत होगा?

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