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नफ़रत बोती हुई सोशल मीडिया

person access_timeMar 07, 2020 chat_bubble_outline0

इंसानी रिश्तों का आधार उनके बीच का संवाद होता है, लेकिन बदलते दौर के साथ ज़िंदगी भाग दौड़ वाली हो गयी, जीविका के लिए पलायन होने लगा और इसी के साथ अपनों से दूरियाँ भी बढ़ गई। साथ ही साथ दूर-दराज़ के लोगों से सम्पर्क करने की समस्या भी होने लगी।


ऐसे में समाज ने अपना काम आसान करने के लिए और अपनों से जुड़े रहने के लिए नए-नए उपाय करने शुरू कर दिए, जिससे आज का "सोशल मीडिया" अस्तित्व में आया।


सबसे पहले  1988 में IRCs (Internet Relay chats) का प्रादुर्भाव हुआ जो पहला सोशल नेटवर्किंग साइट था। उसके बाद 1997 में Six Degrees, 21वीं सदी की शुरुवात में MySpace, LinkedIn, Photobucket और Flickr आदि प्रचलन में आये। इन नवीनतम विधाओं ने फ़ोटो शेयर करने की भी सुविधा उपलब्ध कराई।

सोशल मीडिया के क्षेत्र में एक नव क्रांति लेकर 2004 में फेसबुक का आरम्भ हुआ जो शुरुवात में तो विश्वविद्यालयी विद्यार्थियों के लिए ही था, लेकिन इसकी लोकप्रियता और कमाई को देखते हुए इसे 2006 में इसे सार्वजनिक कर दिया गया। इसके साथ ही Twitter भी सार्वजनिक हो गया। आज हजारों की संख्या में सोशल साइट मौजूद हैं, जिनका प्रयोग आज लगभग हर कोई कर रहा है।



इनकी शुरुवात भौगोलिक दूरी को कम करने और सूचनाओं को सभी तक आसानी से मुहैया कराने के लिए हुई थी। लेकिन तब शायद किसी को अंदाज़ा भी ना रहा होगा कि इंसानी रिश्तों को दुरुस्त करने और उसे सोशल बनाने के लिए जिन सोशल साइट्स का अविष्कार किया जा रहा है, वही आगे चल कर इंसान को असामाजिक बना देंगे। उसे इतना स्व केंद्रित बना देंगे कि वो दूसरे इंसानों के दुःख- दर्द, उनकी समस्याओं के प्रति ऐसा उदासीन हो जायेगा कि मानों वह इस समाज का हिस्सा ही नहीं है।


आज यही सोशल साइट्स अफ़वाहों को फैलाने के सर्वसुलभ साधन हो गए हैं। यहाँ फैलाई जाने वाली खबरों की सत्यता का जब तक पता चलता है तब तक काफी देर हो चुकी होती है।


सोशल साइट्स आज कुछ लोगों के लिए ऐसा हथियार बन गया है कि इसके द्वारा हर किस्म के मामले को चाहे कोई राजनैतिक मसला हो या धार्मिक प्रज्ज्वलित किया जाता है। लोगों के द्वारा सोशल मीडिया को डिटर्जेंट की तरह इस्तेमाल करके सर्व साधारण लोगों के मन मस्तिष्क कि एक प्रकार से धुलाई की जाती है और तब उस पर अपनी मनचाही पर्त आसानी से चढ़ाई जाती है।


इसके जरिए जनता में नफ़रत का बीज बोने और उसे सींचने का काम किया जाता है। आज के दौर में लोगों ने इसी सोशल मीडिया को हमारा मेंटॉर बना लिया है ये लोगों के मन मस्तिष्क पर हाबी होकर हमारे मस्तिष्क का नेतृत्व करने लगा है। हर रोज लाखों की तादात में झूठ - सच का तोड़ा-मरोड़ा रूप जो किसी न किसी विचारधारा का बीमार होता है, हम तक पहुँचाया जाता हैं। जिसकी हमारे द्वारा किसी किस्म से कोई छान-बिन भी नहीं की जाती, क्योंकि एक तो हमारे पास वक़्त की कमी है और दूसरे हम एक तरफा दलील, या झूठी खबर को सच समझने के आदि से हो गए हैं ;अतः उसे ही सच मानकर उसी दिशा में हम अपनी समझ को विकसित करने लगते हैं। कई बार नेताओं और वक्ताओं के बयान को काट-छांट कर हमारे सामने परोस दिया जाता है। ये अफवाहें इतनी तगड़ी और आकर्षक बनाई जाती हैं कि हर कोई इनकी तरफ खिंचता चला जाता है, और मानसिक रूप से बीमार होने लगता है। धीरे-धीरे हम एक विचार-विशेष के ग़ुलाम बन जाते हैं, ग़ुलामी इस कदर हावी हो जाती है कि हम अपने दिमाग, समझ और अपनी संवेदनशीलता को घर की किसी तिज़ोरी में, सात तालों के अंदर बंद कर देते हैं, जिससे कि उसकी कोई चीख-पुकार हम तक न पहुँचे।


मीडिया की अंधभक्ति में हम अपने विवेक, ज्ञान, योग्यता और संवेदनशीलता का रिमोट उन लोगों को थमा देते हैं। मानों उनका आह्वान करते हुए हम खुद कह रहे हों, “आओ मेरे आका, जैसी तुम्हारी इच्छा हमें इस्तेमाल करो!’’

हमें तो यह भी नहीं पता चलता कि सोशल मीडिया के जरिये एक ही व्यक्ति, हमारे साथ कई तरफ से खेल रहा होता है, जो व्यक्ति अभी ख़ान साहब बन के कोई हिन्दू विरोधी कमेंट या पोस्ट करता है, वही व्यक्ति 10 मिनट बाद पंडित जी या कोई बाबू साहब बन के मुस्लिम विरोधी कमेंट और पोस्ट कर देता है।

इतना ही नहीं आज हम सोशल मीडिया, ख़ासकर फ़ेसबुक और व्हाट्सऐप पर इस कदर आश्रित हो चुके हैं कि वह जो भी दिखा दे, जो भी हमारे तक पहुँचा दिया जाए उसे ही परमसत्य मान बैठते हैं। उसमें कोई सच्चाई है भी या नहीं, इसकी भी जाँच करनी जरूरी नहीं समझते और ना ही कभी न्यूज़पेपर या न्यूज़ चैनलों पर इसकी पुष्टी करने की भी कोशिश ही करते हैं।


किसी भी प्रकार का झूठ सोशल मीडिया पर कोई डाले, और हम उसे सच मान लेते हैं। कुछ समय पहले पंडित नेहरू और उनकी भांजी की एक फ़ोटो सोशल मीडिया पर धड़ा-धड़ शेयर की जा रही थी, और पंडित नेहरु को चरित्रहीन बताया जा रहा था। सोशल मीडिया पर बापू को लेकर भी तरह-तरह की भ्रांतियों को खूब ज़ोर-शोर से फैलाया गया। जरा ठहरिए और सोचिये सोशल मीडिया आपके गौरव-पूर्ण अतीत को किस कदर आपके ही जरिये शर्मसार कर रहा हैI


सोशल मीडिया आपका नेतृत्वकर्ता बन चुका है, आप अपना नेता भी चुनते हैं, तो भी उसका आधार सोशल मीडिया होता है। जिसकी कोई प्रमाणिकता नहीं, हम उसे ही प्रमाण मान कर अपनी ज़िंदगी के आने वाले 5 साल किसी भी नेता को सौंप देते हैं। कई बार हम किसी विशेष राजनैतिक विचारधारा का अनुसरण करते हुए उस पार्टी से ताल्लुक रखने वाले नेता को चुन लेते हैं, हमें इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि वह प्रत्याशी समाज कल्याण में कितनी दिलचस्पी रखता है, उसका चरित्र क्या है, उसकी शिक्षा-स्तर और काबिलियत कितनी है?


Hate speech का इस्तेमाल करके समाज में किसी विशेष जाति, धर्म और समुदाय के प्रति लोगों के दिलोदिमाग में नफ़रत भरने का काम किया जा रहा, जिसे बड़ी ही तेज़ी से सोशल मीडिया पर शेयर किया जाता है और कुछ ही देर में लाखों की संख्या में जनता इसका शिकार हो जाती है। इसके साथ Deep Fake का भी इस्तेमाल बड़ी ही तेज़ी से किया जा रहा, जिसके जरिये किसी विडियो या फ़ोटो में किसी भी चेहरे पर दूसरे का चेहरा लगा दिया जाता है, यहाँ तक कि किसी भी व्यक्ति विशेष को बदनाम करने के लिए उसकी आवाज़ की भी नकल बना दी जाती है, और हम-आप मान लेते हैं कि ऐसा ही हुआ है। जब तक इसकी पड़ताल की जाती है, तब तक यह लाखों लोगों तक पहुँच चुका होता है।

 

हाल ही में हुए दिल्ली के दंगों में बहुत हद तक इसी का सहारा लिया गया, हिन्दू-मुस्लिम को एक-दूसरे के धर्म के प्रति भड़काया गया जिससे कुछ लोग उनके शिकार भी हो गए, अच्छी बात सिर्फ यह रही कि स्थानीय लोगों में इंसानियत जीवित थी और उन्होंने मज़हबी बँटवारे को अस्वीकार करते हुए अपने लोगों का साथ दिया। दिल्ली के जिंदल सिंह सिद्धू ने ज़ियाउद्दीन की जान, दंगाइयों से बचाई और अपनी पगड़ी उसे बांध कर, रात के अंधेरे में ज़ियाउद्दीन को उसके घर पहुँचाया। वहीं मंदिर वाली गली में मुसलमानों ने मंदिर और पुजारी के परिवार को बचाया और दूसरी गली जहाँ हिंदुओं ने मस्ज़िद और मुसलमानों को सुरक्षा दी।
 

लेकिन सोचने वाली बात यह है कि जब स्थानीय लोगों ने दंगा नहीं किया, तो फिर ये दंगाई आए कहाँ से और इतनी हिम्मत और सामर्थ्य कहाँ से आयी?

कई बार मुख्य मुद्दे से हमारा ध्यान हटाने के लिए इन्हीं सोशल मीडिया के जरिए हमें नए मुद्दों में उलझा दिया जाता है, हम इन झूठे मुद्दों में लटके रह जाते हैं और दूसरी तरफ लोग अपना उल्लू सीधा करने में लगे रहते हैं।

शिक्षा का मूल उद्देश्य हमें सही-ग़लत, नैतिक-अनैतिक में तर्कपूर्ण तरीके से उचित चयन में मार्गदर्शन करना है, लेकिन सोशल मीडिया के आने से हम लोगों ने दिमाग़ी मेहनत करना कम कर दिया और कई मामलों में तो करते ही नहीं हैं। सोशल मीडिया ने हमारी सोचने-समझने की क्षमता को क्षीण कर दिया है और ये दीमक की तरह हमारे विवेक को खोखला करती जा रही है।


सोशल मीडिया, पढ़े-लिखे होने के बावजूद भी हमें अन-पढ़ बना रहा है। जरा सोचिये हम कब अपनी ही बनाई हुई सुविधा के ही शिकार हो गए और हमें इसका पता भी न चला।

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