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कानून, समाज और बच्चे

person access_timeFeb 28, 2020 chat_bubble_outline0

हम मानते है बच्चे राष्ट्र के भविष्य के स्तम्भ और निर्माता हैं, और वे राष्ट्रीय व्यवहार प्रणाली के प्रतीकात्मक प्रतिनिधि भी हैं। भविष्य का प्रतिनिधित्व करने वाले समग्र राष्ट्र के उत्तराधिकारी हैं। उनके विकास का राष्ट्र के भविष्य से सीधा संबंध हैं। बच्चे राष्ट्र की महत्वपूर्ण संपत्ति हैं उनके विकास के लिए महत्त्वपूर्ण है कि उन्हें किस किस्म का पालन पोषण और शिक्षा दीक्षा मिलती है।

 

समाज ने अनेक क्षेत्रों में अनेक मापदंड स्थापित कियें है जिनके पालन के लिए बच्चों को अनेक किस्म से अनुप्राणित किया जाता हैं। समाज के द्वारा सामाजिक मूल्यों की स्थापना की गई है और बच्चो को उन नियमों का अनुसार आचरण करने के लिए प्रेरित किया जाता हैं। समाज के द्वारा कानूनों को बनाया जाता है और बच्चों को उनका पालन करना पडता हैं। समाज अनुभव प्राप्त लोगों के द्वारा एक साँचे में ढाला गया है बच्चों द्वारा नहीं। कई बार बच्चे इस समाज के नियमों से हैरान हो जाते है, वे वयस्कों जैसे मूल्यों और कानूनों का पालन करने में सक्षम नही होते क्योंकि वे दुनियां को समझने के लिए पर्याप्त परिपक्व नहीं हैं। वे उन तर्कों को नहीं समझ सक्ते जिन पर मूल्य और कानून निर्धारित किये गये हैं।

 

बचपन वह समय है जिसमें बच्चे अपने आपको नियंत्रित नहीं कर पाते। इस अवधि के दौरान होनेवाले उनके शारीरिक और मानसिक विकास के कारण वे अपने कर्मो और कार्यों को नियंत्रित नहीं कर पाते। वे स्वभाव से ही जिज्ञासु, अस्थिर और कुछ स्थितियों में जिद्दी भी होते हैं। वे अपने मन में अंकुरित जिज्ञासाओं को संतृप्त होने की प्रतीक्षा नहीं करते। उनकी अस्थिरता अपने आसपास के वातावरण को जानने के बारे होती है। उनकी जिज्ञासा को शीघ्रता से संतुष्ट किया जाना चाहिए, यदि वे संतुष्ट नही होते तो वे खुद विभिन्न कर्मो और कार्यों का प्रयोग करके खुद को संतुष्ट करने की कोशिस करते है। कई बार वे गलत कदम भी उठा लेते है जो उनके लिए घातक बन जाती है। ऐसे अंजाम बच्चों की सामाजिक, आर्थिक और साँस्कृतिक पृष्ठभूमि के अनुसार कम या अधिक हो सकते हैं।

 

हम चाहते हैं कि बच्चे हमारे सपने को साकार करें और जो इच्छाएं हम अपने जिन्दगी मे पूरी नही कर सकें वे इच्छाएं हमारे बच्चे पूरा करें। अजिब सा हमारा सोच है, कभी हम, उन्हे देवी–देवताओं का अवतार मानते हैं तो कभी उन्हें बकवास अनुभवहीन के रुप में मानते हैं। फिर भी हम चाहते हैं कि वे हमारे नाम और कुल का नाम रोशन करें। हम कभी भी अपनी इच्छाओं को उन पर थोपना नही रोकते।

 

बच्चों के द्वारा बडों के निर्देशों का पालन नहीं करते है, तो उन्हें बुरे बच्चों की संज्ञा दी जाती हैं। बच्चें परिवारिक वातावरण में परिवार के सदस्यों के व्यवहार का अनुकरण करते हैं, आहिस्ता–आहिस्ता, जब वे बचपन में सीखे हुए व्यवहारों में अभ्यस्त हो जाते हैं तो उनके व्यवहार भी अपने बडों के जैसे होने लगते है। बिडंवना तब लगती है जब बच्चे के व्यवहार से तो परिवार संतुष्ट नही होता परंतु वे ये भूल जाते कि ये व्यवहार बच्चों ने अपने अग्रजों से ही सीखा है।

 

जब बच्चें स्कूल जाते हैं, तो उन्हे स्कूल के नियमों का पालन करना पडता हैं। वे स्कूल के नियमों को घर की अपेक्षा फरक पातें है। तब वे दुविधा में पड जाते हैं कि वे कौन से नियम पालन करें, स्कूल के नियम या पारिवारिक नियम। जब वे स्कूल के नियमों का पालन करने में विफल होते हैं, तो उन्हें अनुशासनहीन छात्रों का नाम दिया जाता हैं। कई बार उनपर विद्यालय के द्वारा कुछ विशेष प्रतिबंध लगिए जाते है जो उनमे मानसिक तनाव उत्पन्न करके उनमे नकारात्मक मनोवैज्ञानिकता उत्पन्न करते हैं। अब, उनके अपने स्कूल के साथी उन्हें उपनाम देने शुरु करते हैं। वे स्कूल प्रशासन और शिक्षक–शिक्षका से सामुहिक सजा के शिकार बन जाते हैं, जिसके लिए वे अक्सर जिम्मेदार नही होते हैं। उन्हें अतिरिक्त कक्षा कार्य और गृहकार्य दिया जाता हैं। इस से अधिक, उनके विचलित व्यवहार उनके अभिभावकों के लिए समस्या बन जाते है। कई बार ये उनके लिए अपमानजनक भी होता है। कई बार बच्चे जटिल सामाजिक प्रणालियों को अपने व्यवहार में नहीं उतार पाते।

 

राज्य हमेशा अपना कानूनी प्रणाली को अंतर्राष्ट्रिय स्तरका बनाना चाहता है। इसलिए बाल अधिकार की अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था और कानूनी उपकरण का अपनी कानूनी प्रणाली में स्वागत करता हैं। इसके अलावा, राज्य अंतर्राष्ट्रीय समुदायों में अपनी एक्यबद्धता दिखाने के लिए भी अपने स्वयं के बाल अधिकार सम्बन्धी साधनों मे अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था और कानूनी उपकरण को शामिल करता हैं। वर्तमान के इन कानूनी प्रावधानों को अमल में लाने के लिए संसाधानो की उपलब्धता और राज्य के संदर्भ में शायद ही कभी इसका अध्ययन किया जाता हैं।

 

प्रत्येक बच्चा व्यक्तिगत रुप मे अलग होता हैं। उनकी रुचियां और क्षमताएं एक–दूसरे से भिन्न होती हैं। एक परिस्थिति के बच्चों की जरुरतें अन्य परिस्थिति के बच्चों के लिए जरुरी हों ऐसा जरूरी नही। बझाङ्ग जिला सायपाल गाउँपालिका के बच्चों की जरुरतें स्पष्ट रुप से ताप्लेजुङ्ग जिला के फक्ताङ्गलुङ्ग गाउँपालिका के बच्चो से अलग होगीं। विधायिकी निकाय अक्सर सामान्य परिस्थितियों के आधार पर कानून और नीतियां बनाते हैं। विशिष्ट परिस्थितियों को ध्यान में नही रखा जाता। विभिन्न सामाजिक–आर्थिक स्थितियों में रहने वाले बच्चों की विशिष्ट आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अनुसंधान नहीं किया जाता है। कानून बनाने के बक्त घरेलू संदर्भ, और जरुरतो को अनदेखा किया जाता है। राज्य अंतर्राष्ट्रीय बाल अधिकार उपकरणों को अपनी कानूनी प्रणाली मे शामिल करता रहता है। अंतर्राष्ट्रीय बाल अधिकार उपकरण का अपनी कानूनी प्रणाली में समावेश करना भैंसे के सींग मे बकरे के सीङ का प्रत्यारोपण करने का प्रयास प्रतीत होता हैं।

 

परिवार, स्कूल, समाज और राज्य बच्चों की भावनात्मक, मनोवैज्ञानिक, शारीरिक और मानसिक स्थितियों पर उचित रुप से विचार नही करते हैं। वर्तमान में, प्रादेशिक और स्थानीय सरकारों के पास अपने बच्चो के सर्वोत्तम हितों और आवश्यकताओं की सेवा करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय बाल अधिकार उपकरणों और संघीय कानूनों, नीतियों और योजनाओं को उनके स्थानीय सामाजिक–आर्थिक और सांस्कृतिक संदर्भों में सामञ्जस्य बनाने और संशोधित करने का अवसर है।

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