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नेपाल-भारत संबंध : मनभेद और मतभेद को भूल कर आगे बढ़े

person access_timeAug 15, 2020 chat_bubble_outline0

15 अगस्त 2020 को भारत अपनी स्वतंत्रता की 74 वीं वर्षगांठ मना रहा है। भारत के ऐतिहासिक पन्नों पर यह वर्ष आत्मनिर्भर भारत को समर्पित है, यद्यपि प्रारंभ से ही भारत अपने आत्मनिर्भर अभियान को योजनापूर्वक आगे बढ़ा रहा है। किंतु इस वर्ष वैश्विक महामारी कोविड-19 कोरोना के चलते संपूर्ण विश्व की भांति भारत को भी आर्थिक अवरोधों और आत्मनिर्भर भारत अभियान में बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है।

अनेक कठिनाई के बावजूद भारत दृढ़ता के साथ आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर हो रहा है। देश की अर्थव्यवस्था सुधारने के लिए वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ढेरों आर्थिक पैकेजों की घोषणा भी की है।

भारत को विदेश नीति के ढांचे में सकारात्मक फेरबदल कर अपने सभी पड़ोसी देशों से संबंध सुधारकर मैत्रीपूर्ण वातावरण बनाने की आवश्यकता है और इसकी मांग भी प्रबल रूप से की जा रही है।

आज हम अपने सबसे निकटस्थ-  धर्म, संस्कृति, परंपरा और जन-जन के मध्य मित्रतावाले अभिन्न मित्र राष्ट्र नेपाल तथा भारत के संबंधों की चर्चा कर रहे हैं। भारत का संबंध पड़ोसी देश पाकिस्तान को छोड़कर सभी पड़ोसी मित्र राष्ट्रों से सामान्य है। परंतु सबसे घनिष्ठ और अनन्य संबंध एक ही देश से है,  वह है नेपाल।

नेपाल और भारत की सनातन परंपरा- हिंदू धर्म-संस्कृति, मठ-मंदिर और पूजा पद्धति एक समान है।

भारत से हर वर्ष लाखों की संख्या में भारतीय नेपाल में तीर्थाटन करने के लिए आते रहे हैं। भारतीय मुख्य रूप से पशुपतिनाथ, मुक्तिनाथ के साथ-साथ भगवान गौतम बुद्ध की जन्मस्थली लुंबिनी की यात्रा के लिए सदैव लालायित रहते हैं। इसी तरह नेपाल के नागरिक भी जीवन में एक बार भारत के प्रमुख तीर्थस्थलों यथा- काशी, गया के साथ दक्षिण भारत के मठ और मंदिर गंगासागर और जगन्नाथ जी तथा मेट्रो शहर दिल्ली, मुंबई की यात्रा के लिए आतुर रहते हैं।

दोनों ही देश एकदम करीबी पड़ोसी होने से तथा खुली सीमा, खुले दिल-दिमाग तथा मन से खुली सोच खुला व्यवहारवाले लोगों के बीच रिश्तेदारी, सांस्कृतिक घनिष्ठता के कारण इन दोनों देशों का सम्बन्ध विश्व स्तर पर एक अनूठे संबंध का उदाहरण भी है।

नेपाल-भारत के मध्य पासपोर्ट और वीजा की अनिवार्यता नहीं है। भारत के 5 राज्यों सिक्किम, पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की लगभग 1850 किलोमीटर लंबी सीमा नेपाल से लगी हुई है, जहां लोगों को स्वतंत्रतापूर्वक आवागमन की छूट है।

भारत में अभी राजनीतिक रूप से पूर्ण बहुमत प्राप्त नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली स्थिर सरकार है।

नेपाल में भी एक तिहाई जनता का बहुमत प्राप्त केपी शर्मा ओली की सरकार है, यहाँ ये बताना जरुरी लग रहा है कि दोनों देशों की सरकारों के बीच अभी थोड़ा सा राजनीतिक मतभेद चल रहा है।

देशों के बीच अक्सर इस किस्म की घटनाएं होती रहती है आवश्यक्ता है तो इस बात की कि मतभेद सम्बन्धी इन बातों को, राजनीतिक समस्याओं का दोनों देशों को वार्ता से हल खोजने का प्रयास करते हुए आपसी संबंधों में सुधार करने के समय में विलम्ब नहीं करना चाहिए।
अभी नेपाल-भारत दोनों देशों द्वारा अपने अपने देशों के नए राजनीतिक नक्शों के प्रकाशित करने के बाद कुछ मतभेद उत्पन्न हुआ है।

मतभेद सम्बन्धी इन बातों को लेकर दोनों देशों के परराष्ट्र मंत्रालयों के बीच पत्राचार भी चल रहा है, किंतु अब पत्राचार की अपेक्षा दोनों देशों के सम्बंधित प्रतिनिधियों को साथसाथ बैकठकर साथ-साथ वार्ता की टेबल पर बैठकर समस्या का समाधान ढूंढने का प्रयास करें।

पिछले महीने नेपाल द्वारा नवीन नक्शा प्रकाशित करने के बाद भारत के निजी टेलीविजन चैनलों द्वारा नेपाल के खिलाफ जबरदस्त निंदा अभियान का कैंपेन ही चला रखा है। काला पानी, लिपुलेख, लिम्पियाधुरा जमीन के विषय पर नेपाल-भारत ने अपना-अपना दावा पेश किया है।

यह बात सीमा समस्या की है अतः संचार माध्यम से विवाद का समाधान नहीं होगा।

इसके लिए दोनों देशों के बीच संधि समझौते से संबंधित सीमाविज्ञ मिलकर तत्काल इस समस्या का समाधान करने का प्रयत्न करें।

दबंगई से या रोटी-बेटी संबंध की दुहाई देने से समस्या सुलझानेवाली तो नहीं ही है हाँ इसके दूरगामी परिणाम और भी दिल को दहलानेवाले हो सकते हैं।  
अपने-अपने नक्शे लेकर बातचीत की टेबल पर दोनों पक्षों को बैठना चाहिए। लेकिन भारत सरकार की ओर से बातचीत में विलंब किया जा रहा है।

भारत के विदेश मंत्रालय ने एक वक्तव्य के जरिए यह जानकारी दी कि कोविड-19 का संकट खत्म होने के बाद वह औपचारिक बातचीत के लिए तैयार है। काठमांडू में नेपाल के परराष्ट्र सचिव शंकर दास बैरागी और भारतीय राजदूत विनय मोहन क्वात्रा के मध्य बुधवार को बातचीत की तिथि तय हुई है।

दोनों देशों के बीच संबंध जन-जन में है यद्यपि देश अलग-अलग है। कूटनीतिक पंचशील के सिद्धांत के आधार पर चलते हुए एक दूसरे की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता का पारस्परिक सम्मान करते हुए एक दूसरे के आंतरिक मामलों में अहस्तक्षेप,  पारस्परिक संबंध, क्षमता और आपसी लाभ तथा शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के सिद्धांत पर आगे बढ़ना दोनों देशों के हित में होगा।

शांति और मित्रता दोनों देशों के बीच की आधारशिला है। यदि समस्त भारत में ही नेपालियों का निवास है तो नेपाल में भी भारत के लोग कितनी संख्या में है ये बात महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण ये है की दोनों देशों के बीच, देशों की जनता के बीच अनन्योन्याश्रित सम्बन्ध हैं, दोनों देशों के नागरिकों का दोनों देशों में निर्बाध रूप से आना जाना होता रहा है, हो रहा है।  
प्रधानमंत्री मोदी ने सन 2014 में दो बार नेपाल का दौरा किया। प्रधानमंत्री होने के बाद पहले श्रावण मास में मोदी द्वारा भगवान पशुपतिनाथ के दर्शन के लिए आना, भारतीयों के मन में तो पशुपतिनाथ के प्रति पहले से ही अटूट शृद्धा और विश्वास था ही परन्तु प्रधानमंत्री की इस धार्मिक निजी यात्रा ने इस भाव में और वृद्धि की ऐसा हमारा मानना है।

नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने सन 2016 फरवरी माह में भारत की राजकीय यात्रा की, भारत के पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने सन 2016 नवंबर महीने में नेपाल की राजकीय यात्रा की। इससे पहले नेपाल भारत दोनों देशों के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति की यात्रा बंद थी 18 वर्षों के अंतराल में भारत के किसी राष्ट्रपति ने नेपाल की यात्रा की थी।



नेपाल के वीर-बहादुर गोरखा भारतीय सेना के गोरखा रेजीमेंट में सेवा दे रहे हैं। वर्तमान में नेपाल के लगभग 32000 गोरखा सैनिक भारतीय सेना में सेवारत हैं।

दोनों देशों के जन-जन में नेपाल-भारत संबंध व्यापक रूप से व्याप्त है। नेपाल के हजारों छात्र- छात्रा दक्षिण भारत के बेंगलुरु, चेन्नई और राजधानी दिल्ली आदि शहर में पढ़ रहे हैं। भारत सरकार द्वारा नेपाली विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति प्रदान करने की भी योजनाएं हैं।
भारत से भी हर साल पशुपतिनाथ और मुक्तिनाथ दर्शन के लिए और कैलाश मानसरोवर की यात्रा के लिए अनेक भारतीय काठमांडू आते रहते हैं।

नेपाल में सन 2015 में महा भूकंप के बाद भारत सरकार द्वारा पुनर्निर्माण में मदद की है। नेपाल का भारत सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। काठमांडू और वाराणसी के बीच बंधु और भगिनी के संबंध है, जनकपुर अयोध्या लुंबिनी और बोधगया के बीच सड़क मार्ग की शुरुवात की गई है।

नेपाल के पशुपतिनाथ भगवान के प्रधान अर्चय दक्षिण भारत के भट्ट ब्राह्मण है। अभी पांच ब्राह्मण पशुपतिनाथ जी की सेवा कर रहे हैं। भारत के काशी विश्वनाथ मंदिर में नेपाल के बाग्लुंग जिला के वेदाचार्य पंडित टेक नारायण पौडेल सेवा कर रहे हैं। राजनीतिक खींचातानी से अछूते नेपाल और भारत के बीच सांस्कृतिक और धार्मिक प्रगाढ़ सम्बन्ध है।

इसलिए राजनीतिक मतभेद पर तत्काल वार्ता कर जन मानस के संबंध को मजबूत बनाने के लिए दोनों देशों को सीमा विवाद और सामान्य विवाद को यूँ ही ढीलमढ़ील न छोड़कर इसका तत्काल समाधान किया जाजा चाहिए।  

कोविड- 19 महामारी के बाद तत्काल दोनों देशों के नागरिक यात्रा पर निकलेंगे, इसलिए अर्थव्यवस्था सुधार का कार्य और धार्मिक सद्भाव एवम् जन जन की एकता मजबूत करने के लिए तथा आगे का मार्ग सुगम बनाने के लिए नेपाल और भारत के अधिकारियों का वार्ता में अधिक विलंब करना जन मानस के हित में नहीं है।
(आचार्य राजेंद्र शर्मा के सहयोग से)

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