हिंदी संस्करण

"अभीप्सा की दलदल"

person access_timeAug 09, 2020 chat_bubble_outline0

पृथ्वी पर परमात्मा की

एक ही तो श्रेष्ठ, सुन्दरतम

उर्ध्वमुखी, विकासमुखी, जिज्ञासु

राग-अनुराग से ओतप्रोत रचना है

मानव- श्रेष्ठ मानव

व्याप्त हैं जिसमें अनंत अनन्त संभावनाएं

सृष्टि रुपी बगीचे की ऐसी कली

जो जब आ जाती है

 

अपनी सकारात्मक, सृजनात्मक

जिज्ञासाओं की पराकाष्ठा पर

तो युग पुरुष बनकर

सुरभित कर देती है चमन का चप्पा चप्पा

और फिर अनंत काल तक

बहती रहती है वह सुरभि

सुवासित वायु रूप में

देती रहती है स्नेहिल, कोमल

किन्तु प्रखर ऊर्जा

नवागंतुक अनादि- अनंत कलियों को

और हाँ…

सृष्टि के इसी बगीचे की कोई कली

जब आ जाती है

 

अपनी नकारात्मक, विध्वंशकारी

करतबों की पराकाष्ठा पर

अपनी उचित अनुचित अभीप्साओं की

दलदल को

जब देने लगती है बिस्तार

तो भी परिणाम कुछ विशेष ही होते हैं

और तब…

फ़ैलने लगता है सृष्टि के बगीचें में

कुटिल कराल विषाक्त धूम्र

विषाक्त होने लगती है प्राण वायु

मिटने लगते है धरा धाम से "लास्य"

और मुखरित होने लगता है सर्वत्र

" तांडव, तांडव, तांडव"

 

अभीप्साओं की दलदल का मुख

सुरसा के मुख से भी प्रचंड हो

निगलने लगता है…

अमन-चैन-शांति और सद्भाव

खुशियां-उल्लास और संभाव

मचा देता है सर्वत्र हाहाकार

उसे नहीं होती चिंता

मनुष्यता की-

शैशव, बचपन, तरुणाई या बुढ़ापे की

राष्ट्रीयता की…

एकता-संबद्धता-गौरव-राष्ट्र प्रेम की

 

उसके शब्दकोष में

नहीं होते ऐसे शब्द

शब्दों का क्या

शायद नहीं होता उसके पास कोई शब्दकोष

उसके पास तो होती है

एक "ला...ठी"

जिसका हर पोर होता है

कर्कश-कर्कश और मात्र कर्कश

और....

उसकी कर्कश लाठी

 

जानती है सिर्फ एक भाषा...

दमन-शोषण-अवहेलना-तिरस्कार

स्वार्थपूर्ति स्वार्थपूर्ति और मात्र स्वार्थपूर्ति

और तब वह कर डालता है

सबका बिखंडन...

मनुष्य का बिखंडन

भावनाओं का बिखंडन

नैतिकताओं का बिखंडन

मर्यादाओं का बिखंडन

और राष्ट्र का बिखंडन

और बिखँडित राष्ट्र के

राज सिंहासन पर बैठ

विध्वंश का नजारा देखने पर

संतुष्टि पाती है उसकी अभीप्सा

और तब सम्पूर्ण होती है

उसकी "अभीप्सा की दलदल"

 

और क्या हो रहा है अभी

यही तो चल रहा है

संसार के इस छोटे से भूखंड पर।।।

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