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माहवारी : दैविक वरदान, लेकिन सामाजिक घृणा

person access_timeFeb 25, 2020 chat_bubble_outline0

हम इंसान दोहरा मानक रखते हैं, एक तरफ तो कहते हैं कि हम इंसानियत का सम्मान करते हैं, ऊपर वाला कण-कण में विराजमान हैं, वहीं दूसरी तरफ उस ऊपर वाले के कई घर बना लेते हैं। जब वो परमात्मा कण-कण में हैं तो इनकी क्या आवश्यकता है? 

चलिए मान लेते हैं कि हम इंसान कमजोर हैं और हमें अपने परमात्मा की आराधना करने के लिए एक टेक की आवश्यकता होती है इसलिए इनकी जरूरत है। एक तरफ हम कहते हैं कि पूरी सृष्टि उसी की कृति है, तो फिर कैसे उसकी बनायी हुई कुछ चीज़ें शुभ और पवित्र हो गईं और कुछ अशुभ व अपवित्र ? यदि उसकी कृति, अशुभ-अपवित्र हुई तो उसके शुभ-पवित्र होने की बात कैसे कर सकते हैं ? हम कहते हैं कि हम सभी उसी परमात्मा से जन्में हैं, फिर कैसे उसने अपने ही जनों को शुभ-अशुभ, पवित्र-अपवित्र में बांट दिया ? क्या कोई माता-पिता अपनी ही सन्तानों के लिए दो भिन्न दृष्टि रख सकते हैं ?  और यदि कोई ऐसा करता है तो वो आदर्श कैसे हो सकता है ? 

परमात्मा ने हम सभी को जन्माया फिर हम में से आधे को अपने पास आने और स्वयं को छूने के अधिकार से वंचित कैसे कर दिया ?? हम स्त्रियों की माहवारी एक प्राकृतिक क्रिया है, ठीक उसी प्रकार से जिस प्रकार आप, अपनी सभी नित्य-क्रियाएँ करते हैं। यह हमारी इच्छा पर बिल्कुल भी निर्भर नहीं है। नारी शरीर की संरचना ही ऐसी है। इसमें हमारा कोई ज़ोर नहीं होता तो फिर हमें ऐसी मानसिक पीड़ा क्यों दी जाती है जिसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं ?  यह, वही प्राकृतिक क्रिया है जिसके होने से इस संसार का अस्तित्व है, नहीं तो इसका भी अस्तित्व नहीं होता। जिसे आप सभी अपवित्र और गन्दा कहते हैं ना, उसी गन्दगी ने हम सभी का निर्माण किया है।

इससे भी बड़ी विडम्बना तो यह है कि हम शक्ति-पूजा करते हैं फिर भी उसी शक्ति-स्वरूपा का अपमान करते हैं। कई धार्मिक स्थलों पर हम नारी जाति का प्रवेश सिर्फ इसलिए निषेध है, क्योंकि हम अपनी माहवाहरी की उम्र में होते हैं, और जब इसका तर्क मांग जाता है तो कहते हैं 'वह' (स्थापित भगवान) ब्रह्मचारी हैं, उन पर उस स्त्री की छाया नहीं पड़नी चाहिए जो अपनी माहवारी उम्र में हो। पहले तो आपने कहा कि वो परमात्मा भी मातृ प्रेम के लोभ में धरती पर जन्में फिर कहते हैं उस पर स्त्री-छाया न पड़े। जब मातृ प्रेम के लिए अवतरित हुए तो नारी से परहेज़ क्यों ? क्या नारी को उसकी भक्ति प्रकट करने का अधिकार नहीं है ? क्या उसकी भक्ति पवित्र नहीं है ? या परमात्मा इतना कमजोर है कि किसी के छाया और स्पर्श मात्र से अपवित्र हो जाएगा ???

 
अभी कुछ दिन ही बीते हैं किसी ने कहा था, "अगर आप किसी ऐसी औरत के हाथ का बना खाना खाते हैं जिसकी माहवारी चल रही हो, तो आप अगले जन्म में बैल बनेंगे। यदि कोई महिला माहवारी के दौरान खाना बनाती है तो अगले जन्म में कुतिया बनेगी। आपको जैसा लगता है, लगे लेकिन नियम शास्त्रों में लिखें हैं।................ सन्तों ने कहा है धर्म की गुप्त बातों के बारे में नहीं बोलना चाहिए। पर मैं बोलूंगा नहीं, तो समझोगे कैसे ?"

 पहले तो ये प्रकांड ज्ञानी महापुरुष ये बात दें कि क्या वे किसी स्त्री से ही जन्में हैं या फिर किसी दैवीय शक्ति से अवतरित हुए हैं ? हमारे तो भगवान भी स्त्रियों के गर्भ से ही अवतरित हुए, किसी दैवीय शक्ति से नहीं। और अगर किसी स्त्री-गर्भ से एक प्राकृतिक प्रक्रिया से जन्में हैं, तो नारी का ऐसा अपमान कर, अपनी जननी का अपमान क्यों ? ये तो वही जाने, क्योंकि शास्रों ने कभी जननी का अपमान करना या उसे अपशब्द कहने की शिक्षा तो नहीं ही दी होगी। और ये महाशय इस प्रश्न का भी उत्तर दें कि जो उन्होंने कहा उसका प्रमाण क्या है? और शास्त्र की किस विधा के किस भाग में ऐसा लिखा है ? हम तो अज्ञानी हैं, ज्ञान की इच्छा रखते हैं।

आप जानते भी हैं माहवारी कितनी पीड़ादायक होती है ? सिर्फ तन ही नहीं मन भी पीड़ित हो जाता है। तन की पीड़ा का तो कोई इलाज नहीं लेकिन मन की पीड़ा तो हम इंसान ही देते हैं उसे। 
आइए, मैं आपको माहवारी की पीड़ा बताती हूँ:

 नौ साल की बच्ची जिसे अभी आपने तन की सुध ही नहीं है उसे एक दिन उस गहरे लाल द्रव्य के दर्शन हो जाते हैं, वो बच्ची डर जाती है कि कहीं उसे कोई बीमारी तो नहीं ?, या उसने खेलते समय कोई गहरी चोट खा ली है ? या फिर किसी ने कोई जादू-टोंना कर दिया है ? इन्हीं सवालों से जूझती हुई वो अपनी माँ के पास पहुँचती है। किसी तरह से हिम्मत जुटा के वह सब कुछ बताती है, और कहती है, 'माँ, ये सब क्या हुआ ? मैं मरना नहीं चाहती'।

माँ, जो खुद समाज के दोहरे मानक वाली विचारधारा की शिकार हैं, किसी तरह से अपनी मासूम बच्ची को संभालती हैं और उसे बताती हैं कि ये सभी लड़कियों को होता है। बच्ची जो अभी अपने उसी डर और सवालों से घिरी हुई है, माँ उसे माहवारी के दौरान पालन करने के नियमों को भी बता देती हैं, यहाँ मत जाना, इसे मत छूना और साथ में ये भी कह देती हैं कि देख किसी और को पता ना चले कि तेरी माहवारी चल रही है।

 एक तो दर्द, दूजे इतने सवाल और उस पर किसी से कुछ ना कह पाना, जरा सोचिए न कि आपकी उंगली में छोटी सी चोट लग जाती है, भले ही आपकी गलती और असावधानी से, लेकिन तब भी आप दस लोगों को अपना दुःख सुनाते हैं, लेकिन वो बच्ची किसी से कह भी नहीं सकती कि वो दर्द में है।

  माँ का आदेश, किसी को पता न चले तो किसी से कहा भी नहीं जा सकता, एक कोने में पड़े रहना और खुद के शारीरिक पीड़ा से ज्यादा मन की पीड़ा रुलाती है। हज़ारों सवाल आते हैं:  ऐसी क्या गलती की है जो ये सजा सुनाई माँ ने मुझे ? ऐसा क्या पाप किया तो कुदरत ने ऐसा दर्द दिया मुझे ? क्या सच में मैंने कोई घोर पाप किया है ???? 
ऐसे ही तमाम सवाल आते रहते हैं।

  आप सोचिये वो नौ साल की मासूम बच्ची के मन पर कितना बुरा प्रभाव पड़ रहा है। जिस उम्र में बच्चे अपने सवालों के उत्तर तलाशने के लिए हर कोशिश करते हैं, उसी उम्र में हमारी बच्चियाँ खुद में ही सारे सवाल पूछती और जवाब ना मिलने पर रोती हैं। रोना भी ऐसा है कि आंसू पोछने वाला भी कोई नहीं होता। माँ भी अब सभी सवालों से तंग आकर कह जाती हैं, "मैं भगवान नहीं जो मेरे पास तेरे सभी जवाब हों", होंगे भी कैसे आखिर वो भी कभी ऐसे ही सवाल करती थीं और उन्हें भी कभी उनका जवाब नहीं मिला। 

माहवारी के दौरान पूरा शरीर दर्द से जूझ रहा होता है, कई बार स्थिति कितनी विकट होती है कि ना तो खड़ा हुआ जाता है, ना बैठा जाना सम्भव होता है और न ही सीधा लेटना। वो पेट को हाथों में समेट कर दबाती है कि दर्द कम हो लेकिन लाख कोशिशों के बाद भी आँखों से वो दर्द बाहर आने लगता है, वो दाँतों से अपने होठों को भींचती है कि उसकी कराहने की आवाज़ न निकल जाए लेकिन वो यहाँ भी नाकाम हो जाती है।

  जरा सोचिए जिसे इतना दर्द हो रहा हो उसे ये कहना कि किसी को पता नहीं चलना चाहिए कि माहवारी चल रही है, जैसे वो स्वेच्छा हो, जैसे कोई पाप किया हो, कहाँ की इंसानियत है ? ये कैसी इंसानियत है, जो किसी को तकलीफ में देख कर भी बे-बुनियाद नियमों को उसकी पीड़ा से ऊपर रखती है ? ये नियम उस परमात्मा के कैसे हो सकते हैं कि उनका एक जना पीड़ा में हो और दूसरा जना उसकी पीड़ा कम न करके, उसे बढ़ा रहा हो।

 
घर में और भी बच्चों (लड़के) के मन में ये सारे सवाल होते हैं कि अब तक उनके साथ हँसती-खेलती उनकी बहन को हर महीने ऐसा क्या हो जाता है ? वो क्यों अब उनके साथ नहीं खेलती ? क्यों अब वो उनसे दूर-दूर रहती है ? 
सिर्फ उस बच्ची पर ही नहीं उसके साथ पल रहे उसके भाइयों के मन में भी कई अनसुलझे सवाल चलते रहते हैं, क्योंकि उनकी बहन उन्हें बता नहीं सकती। भाइयों को तो उन सवालों का जवाब तो कुछ सालों बाद मिल ही जाते हैं, लेकिन बच्ची को पूरे जीवन उसका जवाब नहीं मिलता कि क्यों उसे बंदिशों में बांधा जाता है ? 
बच्ची अपने ही घर मे परायों सा महसूस करने लगती है, उसके अंदर कुंठाएँ आ जाती हैं, और होना भी लाज़मी है उसे कभी कोई तर्कपूर्ण जवाब नहीं मिलता है। 
 
माहवारी के दौरान स्त्री अनेक शारीरिक और मानसिक बदलाव व तनाव से गुजरती है। जब उसे नैतिक सहारे की जरूरत होती है, वहीं हम सब मिल कर उस पर नियमों का टोकरा लाद देते हैं। 
 
यह हम इंसानों का दोहरा मानक नहीं तो और क्या हैं? एक तरफ तो हम कामाख्या शक्ति पीठ की पूजा करते हैं और उनकी माहवारी को प्रसाद स्वरूप स्वीकार करते हैं और वहीं दूसरी ओर उसी प्रसाद का अपमान करते हैं।

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