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चिंतन

बातें संख्या की

person access_timeJul 25, 2020 chat_bubble_outline0

हर समय का अपना अंदाज होता है। उस समय की घटनाएँ भी अपने ही किस्म के होते हैं, जिसके लिए वह काल हमेशा याद किया जाता है। विश्व के इतिहास के पन्ने ऐसी कालजयी घटनाओं से भरे मिलते हैं। जिनमें कई दुःखदायी और त्रासदीपूर्ण हैं तो कई सुखदायी भी। विस्तार में न जाकर एक-दो राष्ट्रीय घटना की चर्चा ही पर्याप्त होनी चाहिए। नेपाल और नेपाली जनता के लिए वि.सं.2007 साल और 2015 साल के समान ही 2046 और 2064 साल राजनीतिक और प्रजातांत्रिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रहे हैं।

लेकिन समय चक्र की गति जिस प्रकार घूमती जाती है उसी प्रकार कैलेण्डर के पन्ने बदलते जाते हैं और इसके साथ-साथ नये-नये वर्ष का आगमन होता जाता है। राजनीति का मैदान हो या खेल का, आर्थिक हो या सामाजिक या औद्योगिक, हर मोर्चे पर इन वर्षों पर नई-नई बातें सुनने और घटनाओं को देखने के अवसर मिलते हैं। क्रिकेट के मैदान में 20-20 का मैच देखते-देखते और इसके तात्कालिक परिणाम से रोमांचित होते हुए सन् 2020 के वर्ष (वि.सं. 2077) का आगमन हुआ। लगा 2020 का वर्ष भी 20-20 के मैच की तरह ही जरूर कोई रोमांचकारी अनुभव कराएगा। पर हुआ विपरीत। इस वर्ष के दो महीने बिते भी नही थे कि विश्व का एक कोना त्रासदी के जिस दौर से गुजरने लगा उसके चपेट में विश्व भर के छोटे-बड़े देश आते गये। और आज जब यह लेख लिखी जा रही है, विश्व के लाखों लोग कोविड- 19 नामक इस संक्रामक जीवाणु के कारण काल के ग्रास बन गये हैं। संक्रमण की संख्या बढ़ते जाने के कारण हर ओर त्रास और हाहाकार की स्थिति बनी हुई है। कल-कारखाने बंद हुए। हवाई उड़ानें बंद हुईं। लोगों का घूमना-फिरना मात्र बंद नही हुआ खेल के मैदान भी सूने होने लगे। 2020 की काली छाया से 20-20 का मैच भी बच नही पाया और क्रिकेट प्रेमीजन, इस रोमांचकारी मैच को टेलिविजन के पर्दे पर देखने और रोमांचित होने के अवसर से वंचित होते रहे।

इस बिमारी की रोकथाम के लिए औषधि उपलब्ध न होने के कारण इसके आविष्कार में वैज्ञानिक लोग दिन-रात एक करते हुए जुटे हुए हैं। आशा की किरणें दिखायी देने लगी हैं, पर जब तक औषधि प्रयोग के लिए उपयुक्त नही पाई जाती और सामान्य जन के लिए सुलभ नही होती तब तक के लिए लोगों में चेतना जगाने के लिए वे उपाय बताये जा रहे है, जिससे रोग के प्रसार को रोका जा सके, लोगों को इसके संक्रमण से बचाया जा सके। 

इससे बचने के संबंध में पहला प्रभावशाली उपाय तो यह बताया गया और अब भी बताया जा रहा है कि आप घर के अंदर ही सीमित रहें। अनावश्यक रूप से बाहर न निकलें। मटरगश्ती के ख्याल को तो छोड़ ही दें। अन्य उपायों के संबंध में पत्र-पत्रिका हों या रेडियो या टेलिविजन, यहाँ तक कि टेलिफोन और मोबाइल के माध्यम से भी लोगों को यह सूचित किया जाने लगा है कि इस अवसर पर सफाई और सामाजिक दू्री बनाये रखने के संबंध में जारी किए गये नियमों का पालन भी उतना ही आवश्यक है। अतः साबुन-पानी से 20 सेकेण्ड या 20 की गिनती तक हाथों को मलते रहो, दूसरों के तौलियों का प्रयोग न करो, छींकना हो तो रूमाल से नाक ढको या कुहने की ओर नाक को ले जाकर छीँको, नाक और मुँह को ढकने के लिए मास्क लगाया करो। और तो सब ठीक ही है। पर मुझ अज्ञानी को यह समझ नही आया कि 20 की गिनती या 20 सेकेण्ड तक ही क्यों हाथ को साबुन पानी से मलते रहा जाय? 15 या 25 की गिनती या सेकेण्ड तक क्यों नहीं? क्या इस गिनती का संबंध 2020 के अंक के साथ तो नहीँ?

हालाँकि 20 तक की गिनती के साथ मुझे खाश लगाव है। यह गिनती करते हुए मुझे छात्रावस्था के वे दिन भी याद आते है जब मैं 1 से लेकर 20 तक का पहाड़ा रटा करता था या होमवर्क न कर पाने के कारण कान पकड़कर 20 बार उठा-बैठी करनी पड़ती थी।

पर अब यह सुखद समाचार सुनने को मिला है कि सरकार ने लॉकडाउन समाप्त करने की घोषणा कर दी है। चूँकि खतरा पूरी तरह टला नही है अतः सफाई और सामाजिक दूरी बनाये रखने के संबंध में जारी किए गये नियमों का मैं अब भी आँखें मूँदकर शिरोपर कर रहा हूँ। 20 की गिनती तक तो क्या कम से कम 25-30 बार हाथ साबुन पानी से मल लेता हूँ। (वैसे साबुन पानी के बिना तो कई बार ‘हाथ मलने’ के अनुभव हो चुके हैं)। त्रासदी के इस वातावरण में स्वास्थ्यकर्मियों और पुलिसकर्मियों को अपने जान को जोखिम में रखते हुए अपने-अपनें मैदान में रात-दिन डटे और कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन करते हुए देखकर (टेलिविजन के पर्दे पर ही सही) उनके प्रति शिर नतमस्तक होता रहता है। उनकी समस्या और न बढे इस नियत से घर के अंदर अब भी सिमटकर बैठा रहता हूँ। बाहर निकलने की साहस नही जुटा पाता। क्योंकि अपनी सुरक्षा का ख्याल खुद ही करना पड़ता है। सरकार तो निर्देश मात्र दे सकती है।

पर त्रासदीपूर्ण वातावरण के इस दौर में समय की चलायमान गति के आधार पर नागपंचमी, रक्षाबंधन, श्राद्ध आदि पर्व भी आने लग गए हैं। दशहरा, दीवाली आदि के दूर होने पर भी परंपरा के निर्वाह के चक्कर में कई समस्याएँ खडीं दिख रही है। पहली समस्या है पण्डितों को (वायरस के संक्रमण के भय के कारण) घर में प्रवेश कराया जाय या नही? इससे भी बड़ी दूसरी समस्या है कितनी दक्षिणा दी जाय। 20 की गिनती का फॉर्मूला यहाँ लागू करने पर यदि वह भड़क गये तो? एक बार भड़क गये तो दूसरी बार दर्शन से वंचित होना पड़ेगा। घर के अंदर सिमटकर रहने या 20 की गिनती तक साबुन और पानी से हाथ धोने जैसी सरल समस्या है नही यह। देखने में मामला मामूली है पर है जटिल। 20 वाला फॉर्मूला लागू करने पर एक ओर कंजूस ही नही मक्खीचूस भी कहलाने का भय तो दूसरी ओर पंडितों के हाथ से फिसल जाने का डर (तेल या साबुन लगाये बिना)। लॉकडाउन के कारण कमाई-धमाई तो हुई नही। पर वे लोग तो इस बात को समझेंगे नही, क्योंकि उन सबके लिए यही तो कमाने के दिन होते हैं।

संख्या का यही प्रश्न असमंजस में डाले हुए है। कितना दें? यह सोच समस्या खडी किए हुए है। पर समय की नजाकत को ध्यान में रखने पर अंदर से आवाज भी आती है- ‘बेटा, यहाँ 20 का फॉर्मूला लागू करना पैर पर कुल्हाडी चलाना जैसा होगा। पंडितों को उदारतापूर्वक दान करो। लॉकडाउन खुल जाने के कारण अब तुम्हारी भी तो कमाई शुरु हो जायगी? सोच में मत पड़ा करो।’

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