हिंदी संस्करण

क्या खोया क्या पाया !!

person access_timeFeb 23, 2020 chat_bubble_outline0

सन्यासी जीवन में पदार्पण के कुछ वर्षो उपरांत एक वैवाहिक कार्यक्रम में उपस्थित होने के बाध्यात्मक समीकरण से स्वयं को पृथक न रख सका। बस कैसे समय गुजरे और मै शोर शराबे से मुक्त हो सकूँ, इसी उधेड़बुन में सिगरेट पे सिगरेट उड़ाए जा रहा था। अचानक एक सूटेड बूटेड युवक समीप आ बोल पड़ा - सर नमस्ते।


मेरे लिए उसका यह अभिवादन अनेको स्मृतियों को झकझोर देने वाला शब्द बम जैसा प्रतीत हुआ। जबसे गैरिक वस्त्र में काया ढकने का उपक्रम प्रारम्भ हुआ है अभिवादन के शब्द और शैलियाँ बदल चुकी है। छोटे अंतराल में ही मै ॐ नमो नारायण, हरी ॐ, शिवोहम, जय महाकालेश्वर, जय बद्रीविशाल, आदेश, जय सीताराम, राधे-राधे, जय श्री कृष्ण जैसे अभिवादन सम्बोधनों से ओतप्रोत एवं इन्ही का अभ्यस्त हो चुका था। सर नमस्ते की ध्वनि ने ढेरो पुरानी स्मृतियाँ झंकृत कर दी।


स्मरण नहीं रहा मैंने युवक को प्रत्युत्तर में क्या कहा। मै उसे पहचान नहीं पाया। वस्तुस्थित भाँप युवक बोल पड़ा - लगता है आपने मुझे पहचाना नहीं? मै सुनील हूँ। आज मै जो कुछ भी हूँ उसकी वजह आप ही है, इतना कहकर उसने कुछ दूर खडी महिलाओ को पास बुला लिया। मै अभी भी उसे पहचानने में असमर्थ था। युवक एक एक कर पास आयी महिलाओ से परिचय कराने लगा। यह मेरी पत्नी, यह बहन और यह मेरी माताजी। सभी बारी बारी मुझे नमस्कार किए जा रही थी, मजबूरन मुझे भी दोनों हथेलियाँ उठाकर संयुक्त करने का श्रम करना पड़ रहा था। सभी महिलाओ को मेरे बारे में युवक बताने लगा - यही वह महापुरुष है जिनकी कृपा से मेरा जीवन सफल हुआ। इनका साथ और अनुकम्पा नहीं मिलती तो शायद निराशा और बेरोजगारी के चलते पता नहीं मेरा क्या होता?


उस माँ की आँखे श्रद्धाजल से छलकने लगी। मेरे लिए स्थिति बड़ी असहज बन चुकी थी किसी भांति इस प्रकरण से भाग निकलने की युक्ति सोच रहा था। लगता है आपने अभी तक मुझे पहचाना नहीं? युवक की आवाज़ ने मेरे मनस में चल रहे 'युक्ति मंथन' पर पुनः बज्रपात कर दिया। सच तो यही है मैंने नहीं पहचाना और यह भी तो सच हो सकता है तुम्हे कोई ग़लतफ़हमी हो रही हो ।


आपको पहचानने में अगर ग़लतफ़हमी हो गयी तो फिर तो मेरा जीवन ही बेकार हो जाएगा। आप जिस भी रूप में मेरे सामने होंगें, मैं पहचानने में यदि क्षण भर भी विलम्ब करूँ तो स्वयं को कृतघ्न मानूंगा। एक बार याद कीजिये तो, बिराटनगर बरगाछी स्थित मुनाल पथवाले पेट्रोल पम्प के कबीरपंथी अशोकजी और 'हुलास वायर इंडस्ट्री' । 'हुलास वायर इंडस्ट्री' में आपने ही मुझे 18 रूपये दैनिक के वेतनमान पर प्रवेश कराया था।


ओह! यह क्या,   'गंगा  गौमुख से पथरीले पथ पर बलखाती लहराती दो सौ पचास किमी लम्बी यात्रा  न करके सीधे ही लक्ष्मण झूला में आ गिरी। 4200 मीटर हिमालय की ऊंचाई से एकबारगी सीधे हिमालय की तलहटी ऋषिकेश के मैदानी क्षेत्र तीन सौ बहत्तर मीटर के समतल प्रदेश में।' पता नहीं मस्तिष्क में कितने मेगावाट अथवा टेरावाट ऊर्जा का संचरण हुआ, सब यादें दुरुस्त हो उठी। अच्छा तो तुम बरगाछी चांदनी चौक वाले हो, मेरे मुख से अनायास निकल पड़ा।


शुक्रिया! आपने मुझे पहचाना। इतना कहकर युवक अपनी पत्नी से बोला, 'आज मैं जो चालीस हज़ार की पगार पाता हूँ इन्ही की देन है।' जानती हो अगर आज यह कंपनी में काम कर रहे होते तो इन्हे लाख के आसपास वेतन मिल रहा होता।


पता नहीं पत्नी को यह कहकर युवक मेरे फक्कड़पन का सम्मान कर रहा था अथवा उपहास?


वैसे गणित अपना अपना! युवक ने जिसे लाख के आसपास का वेतनमान कहा था, 1987-1988 के उस दौर में वह बारह सौ रूपये हुआ करता था। मेरी अपनी समझ! मेरे हिसाब से मैंने बारह सौ की नौकरी को अलविदा कह बिराटनगर से काठमांडू प्रस्थान किया था। और यह कोई त्याग नहीं था, उस दौर में काठमांडू आना मेरे लिए बेहतर विकल्प था, जो काठमांडू आने के बाद साबित भी हुआ। मुझे अपनी असली पहचान काठमांडू आने के बाद ही मिली। उसके कहे अनुसार यदि मैंने हुलास वायर इंडस्ट्री नहीं छोड़ी होती तो शायद वेतन भी उसके कहे अनुसार बढ़ा होता। लेकिन मेरी निजता का क्या होता? मेरी पहचान एक 'केमिस्ट' अथवा ज्यादा से ज्यादा 'प्लांट मैनेजर'  के अलावा कुछ नहीं होती। सच कहूं तो 'प्लांट मैनेजर' की मेरी हैसियत (छद्म हैसियत) उसी समय थी। मेरे मद्रासी बॉस गणेशन ने तीन महीने में ही मुझे 'गैल्वनाइज़िंग वायर' ( लोहे के तार में ज़िंक की पोलिश) सम्बन्ध में सब कुछ सीखा दिया था। चार पांच महीने के लिए गणेशन ने जब 'हुलास वायर' को छोड़ दिया था 'प्रोडक्शन' का सारा काम मैंने ही सँभाला था।

 

एक दूसरा प्रसंग। 2004 या 2005 का समय था। काठमांडू से 20-25 किमी दूर स्थित छोटे से गांव फर्फिंग की एक बुद्ध मोनास्ट्री में जर्मन महिला मित्र हालीना के साथ 'लॉन्ग रिट्रीट' कर रहा था। एक मित्र के निमंत्रण पर किसी दूसरे गांव जाना था। काठमांडू की रिंग रोड के एकांतकुना चौक में मैं और हालीना एक अन्य मित्र की प्रतीक्षा कर रहे थे। उस समय तक रिंग रोड के इस इलाके में कुछेक घरो के अलावा बाजार विकसित नहीं हुआ था। हालीना को अचानक 'बाथरूम' जाने की आवश्यकता महसूस हुई। आसपास कोई होटल वा सार्वजनिक शौचालय उपलब्ध नहीं था। चौक से लगभग सौ मीटर की दूरी पर मेरे पुराने मित्र रमेश अमात्य का घर था। किसी ज़माने में रमेश मेरा सबसे घनिष्ठ मित्र हुआ करता था। लेकिन पिछले दस वर्षो से उससे मुलाकात नहीं थी। दोनों के कार्यक्षेत्र और प्राथमिकताएं बदल गयी थी। मैंने हालीना को मित्र के घर के बारे में बताया। हालीना ने रमेश के घर जाने की स्वीकृति दी। घर के द्वार पर पहुँच कर मैंने आवाज़ दी, रमेश घर पर ही था, बिना किसी औपचारिकता के मैंने उससे हालीना को 'बाथरूम' दिखाने को कहा ।


रमेश मेरा उस समय का मित्र था जब मै काठमांडू में 'मार्केटिंग सेक्टर' में कार्यरत हुआ करता था। रमेश उस समय अर्ध बेरोज़गार हुआ करता था। मेरी संगत के चलते उसे 'मार्केटिंग सेक्टर' के बारे में ज्ञात हुआ। कुछ समय बाद उसने भी एक 'फार्मास्युटिकल कंपनी' में नौकरी कर ली। मुझे भली भांति याद है पोखरा के पहले पहले 'टूर' में जाते समय रमेश मुझे लेकर ही पोखरा गया था। 'ओह नो' यह वही दिन था जिस दिन राजीव गाँधी चेन्नई में दुर्घटनाग्रस्त हुए थे।


रमेश काम करते हुए किसी कंपनी का 'कंट्री मैनेजर' बन चुका था। मुझसे कह रहा था, जिंदगी ठीक चल रही है सब मिलाकर डेढ़ लाख जितना मिल जाता है तू तो मुझसे भी 'सीनियर' और अच्छी 'मल्टीनेशनल कंपनी' में था। अपने हठ से 'मार्केटिंग लाइन' छोड़ सरकारी नौकरी में चला गया और आज इस हाल में मिल रहा है। 'मार्केटिंग लाइन' न छोड़ी होती तो आज लाखो में खेल रहा होता।


सच कहूं तो मुझे वह दृश्य अभी भी याद है उसके लाखो में खेल रहा होता कहने पर मेरी हंसी निकल गयी थी। रमेश के अंदर लेखन की अपार संभावना थी। 1990 के दशक में ही उसका लिखा नाटक (नाम तो याद नहीं) चर्चित रहा था। कई बार इसका मंचन भी हुआ था। राज विक्रम शाह की फिल्म (प्रख्यात अभिनेत्री मनीषा कोइराला को पहली बार सेल्युलाइड फिल्म में लाने वाले डाइरेक्टर) की स्क्रिप्ट भी रमेश ने ही लिखी थी। पहले तो सोचा पूंछ लूँ लेखन का क्या हुआ? लाखो तो कमा रहा है लेकिन तेरी पहचान क्या है? जो पहचान मुफलिसी के दौर में भी थी अब कहाँ है? पर न जाने उस समय क्या सोचकर मैंने उससे कुछ भी नहीं पूंछा।


रमेश मुझे मेरा विगत याद दिला रहा था। वह विगत जिसे मैंने पुरे होशोहवाश में  ठोकर मारी थी। मै उसके अथवा अपने विगत से वर्तमान की तुलना क्यों करता? मैंने 1995-1996 के आसपास 'मार्केटिंग लाइन' छोड़ी थी 29-30 की वय में। रमेश तो बाद में 'कंट्री मैनेजर' बना, मै तो उसी समय 'कंट्री मैनेजर' था। कुल मिलाकर बीस हज़ार के आसपास मासिक आय हुआ करती थी। 7-8 वर्ष की नौकरी से (एक ही प्रकार के काम से) उकताकर मै सरकारी नौकरी में चला गया था। 'मार्केटिंग लाइन' छोड़ते समय भी मैंने लाखो नहीं कुछेक हज़ार की नौकरी को अलविदा कहा था ।

 

सरकारी नौकरी में भी बमुश्किल दो ढाई साल ही टिक पाया। लेखन और पत्रकारिता के आकर्षण ने जो खीच लिया। राजधानी दैनिक में उप संपादक बन यह हसरत भी पूरी करने के बाद 2002 में यायावर बन भटकने की नियति को तहे दिल से अपना लिया।


सोचता हूँ मैंने कब क्या छोड़ा? फल पकने के बाद भी अगर वृक्ष से नाता न तोड़े तो उसकी नियति सड़ने के सिवा कुछ और हो सकती है क्या?



मेरे लिए उत्तर कभी महत्वपूर्ण  नहीं रहे। प्रश्न उठना नैसर्गिक रहा, और शनैः शनैः सारे प्रश्न खुद ब खुद झरते जाना (बिना किसी उत्तर के : मैंने पाया सारे प्रश्नो की जड़ ही उत्तर में  ही समाई रहती है) और उन प्रश्नो की समस्त सांदर्भिकतायें  बेसिर पैर की साबित होना ही मेरा स्वानुभव रहा।


2010 के हरिद्वार महाकुम्भ से कुछ महीने पहले काठमांडू स्थित मेडिकल कालेज के प्रमुख प्रो डॉ राम प्रसाद उप्रेती मेरे साथ वृन्दावन यात्रा में थे। 'इस्कॉन गेट' के पास स्थित अखंड चित्रकूट आश्रम में ठहरना हुआ। स्वामी दिव्यानंद जी महाराज ने चाबियों का गुच्छा डॉ राम की ओर फेकते हुए कहा - अपने मित्र से कहिए इस आश्रम की व्यवस्था सँभाले, मैं तो इन्हें समझाकर थक चुका हूँ।


डॉ राम हतप्रभ रह गए। 300 कमरों का विशाल आश्रम और उसके अधिपति ही जिम्मेदारी सौंप रहे है। बाद में राम ने पूछा, वृन्दावन जहाँ लोग रहने को तरसते है आपको पूरा बना बनाया आश्रम मिल रहा है किस वजह से स्वीकार नहीं कर रहे है? मैंने डॉ राम से सिर्फ एक बात पूछी, बताए मै सन्यासी क्यों बना? आप तो मेरा विगत भली भांति जानते है।


जबाब मुझे ही देना पड़ा- डॉ साहेब मै किसी आश्रम का मठाधीश बनाने के लिए सन्यासी नहीं बना। हाँ, यह सच है अगर मै दिव्यानंद जी महाराज का आग्रह स्वीकार कर लूँ तो सारी भौतिक सुविधाएं मुझे मुहैया हो जाँएगी। क्या जीवन का उद्देश्य धन और भौतिक सुविधाएं मात्र है? जीवन कुछ वर्षो की यात्रा ही तो है इसके उपरांत सभी का परिणाम एक जैसा ही है। अभावग्रस्त को मृत्यु नहीं आती ऐसा तो नहीं है फिर मै यायावर बन जीवन को क्यों न भोगूँ?


वैसे याद करूँ तो मुझे ऐसे 'प्रपोजल' तमाम गुरुओ द्वारा दिए गए। 2004 के उज्जैन महाकुम्भ में जिस दिन साध्वी ऋतम्भरा के गुरु श्री परमानन्द जी महामंडलेश्वर बने थे। उस शाम मै, ऋतम्भराजी, परमानंदजी एवं उनकी एक अन्य शिष्य गुरुदेव की कुटी में विराजमान था। मै परमानंदजी का 'इंटरव्यू' कर रहा था। 'इंटरव्यू' के उपरांत उन्होंने मुझे अपने ग्रुप में सम्मिलित होने का सहज आमंत्रण दिया। मुझे यह भी रास न आया। बाद में कई सन्यासी मित्रो ने उलाहना दिया- तुमने युगपुरुष परमानन्दजी के साथ रहने का अवसर भी न चुना!


पाइलेट बाबा ने बारम्बार 'किसी भी आश्रम में टिक जाओ बेटा' बोला। जब बाबा  सूरी से उत्तरकाशी,  भटवाड़ी का आश्रम खरीद रहे थे, वहां  की जिम्मेदारी के लिए बाबा सहित सबने मुझे चुना। मै दूसरे दिन भोर ही बाबा से बिना पूछे भाग लिया।


आनंदमूर्ति गुरु माँ (गन्नौर, हरियाणा) ने पहली ही भेट में आश्रम में रहने का प्रस्ताव दिया था। पहले तो मन हुआ यहाँ टिक जाउ। लेकिन उनके प्रस्ताव ने मुझे व्यर्थ का 'सेलेब्रेटी'  बना दिया। उन्होंने खुली सभा में हज़ारो भक्तो के सामने मुझे 'ऑफर' दिया था। उनके भक्तो ने जीना हराम कर दिया। आप कौन है, क्या साधना करते है? आपको गुरु माँ ने देखते ही आश्रम में रहने का निमंत्रण दे दिया, हम लोग सालो से आश्रम में रहकर सेवा करने की अनुमति मांग रहे है। आश्रम में हमारे अपने कमरे है, लाखो दान भी देते है पर गुरु माँ हमें अनुमति नही देती। आप में ऐसा क्या है जो गुरु माँ ने आपको आश्रम के लिए पहली नजर में चुन लिया ? अंततः तीसरे दिन गुरु माँ से मिले बगैर मैंने आश्रम छोड़ दिया। आरोदीपा अगर तुम तक यह लेख पहुंचे तो स्मरण करना तुम भी उस समय आश्रम में थी और वह तुम्हारी मां थी जिन्होंने मेरे आश्रम छोड़ने से पहले घोषणा कर दी थी कि मै गुरु माँ का प्रस्ताव स्वीकार कर आश्रम में नहीं रहूँगा। तुम्हारी माँ की बात सच साबित हुई।


लद्दाख के  दलाई लामा के 'समर पैलेस' में मिली फ्रेंच महिला मुझे अपने साथ अमेरिका ले जाना चाहती थी। मै किसी भी निमंत्रण के साथ नहीं गया। 2011 आते आते तो हालीना से भी एक प्रकार का समबन्ध विच्छेद हो गया। वह हालीना जिसने मुझे अध्यात्म मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी। सिर्फ प्रेरणा ही नहीं वरन 2002 से 2009 तक मेरा समस्त आर्थिक बोझ भी उठाया। मुझे यह स्वीकार करने में कोई लज्जाबोध नहीं, अगर हालीना से मेरा मिलन न हुआ होता तो मेरे सन्यास मार्ग की डगर अब्बल तो प्रारम्भ ही नहीं होती, होती भी तो दो चार पगडंडियों में सिमटकर दम तोड़ देती। हालीना से सम्बन्ध विच्छेद का कारण भी वही रहा - फल पकने के बाद वृक्ष से झड़ना ही चाहिए अन्यथा सड़ने के अतिरिक्त कुछ और नहीं हो सकता।


क्या कोई मुझे बता सकता है मैंने क्या छोड़ा, क्या खोया?


मैंने जब भी, जो कुछ भी छोड़ा उससे बेहतर पाने की आशा एवं विश्वास में छोड़ा। नहीं, मैंने कभी भी और कुछ भी नहीं छोड़ा, हमेशा कुछ और बेहतर पाने की आशा में एक डाली छोड़ दूसरी डाली झपटी। किसी नामचीन गुरु से नहीं जुड़ा इसका मतलब यह नहीं की मैंने बैठे बिठाये आए ऐश्वर्य पर भृगु पाद प्रहार किया। जो मेरा था ही नहीं उसे गर अस्वीकार किया तो मुझे इसमें कोई महानता नजर नहीं आती।


मेरे पास बचाने, छिपाने, दिखाने जैसा कुछ भी नहीं। जीवन चल ही रहा है आज गर इसी क्षण चलने से परहेज कर दे तो भी मंजूर। मंसूर की तरह गर हंस ना सका तो इतना तो निश्चित है आइंस्टीन की भांति सहज स्वीकार तो कर ही  लूंगा । मेरे स्व की अनगढ़ भाषा, दृष्टिकोण और मान्यता तो इतना भी जहमत उठाने को व्यर्थ मानती है कि कहे मैंने क्या पाया? कह दिया तो फिर कौमार्यता भंग हो जायेगी।

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