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अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस और योगासन

person access_timeJun 21, 2020 chat_bubble_outline0

प्राचीन काल में ऋषि–मुनियों के द्वारा अपने को स्वस्थ रखने और आत्मा को परमात्मा के साथ जोड़ने हेतु योगाभ्यासों का सहारा लिया करते थे। भगवान शंकर योग के प्रवर्तक और योगीश्वर माने जाते हैं तो भगवान श्रीकृष्ण, जिन्होंने योग क्री व्याख्या विभिन्न रूप में की है, योगेश्वर कहलाते हैं। प्राचीन काल की यह संस्कृति आज के युग में पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव के कारण योगा के रूप में जाने लगा है। वर्तमान युग में इसे घर-घर में तो यह ‘रामदेव’ के नाम से भी जाने जाना लगा है, क्योंकि इसे घर-घर में पहँचाने का श्रेय योगाचार्य बाबा रामदेव को ही जाता है। यह आज की आवश्यकता बन पड़ी है बच्चे, यवक, युवती, गृहिणी और वृद्ध जन सभी के लिए। क्योंकि सभी स्वस्थ और निरोगी जीवन बिताना चाहते हैं।

आज समस्त विश्व योग दिवस का पालन कर रहा है। अतः प्रश्न उठता है- हमें योग की आवश्यकता क्यों पड़ी? हम क्या स्वयं को स्वस्थ रखने या रोगग्रस्त शरीर को जर्जर होने से बचाने के लिए ही योग का सहारा ले रहे हैं? इन  प्रश्नों का उत्तर जानने हेतु योग केंद्रो में जाने से पहले हमें यह निर्धारण करना होगा कि हम योगासनों का अभ्यास स्वास्थ्य की रक्षा हेतु करने जा रहे है या रोगों से निदान पाने के लिए इसका सहारा ले रहे हैं? यदि हाँ तो इसके लिए क्या-क्या आवश्यक है? तो इस संबंध में गीता में भगवान् श्रीकृष्ण के द्वारा दिए गये इस संदेश को याद करना आवश्यक होगा। वह कहते हैं-

युक्ताहार विहारस्य युक्त चेष्टस्य कर्मसु। युक्त स्वप्नाव बोध्रस्य, योगो भवति दुःखहा।।

अर्थात यथोचित आहार-विहार करने वाला, अपने कर्मों के प्रति यथायोग्य प्रयत्न करते रहने वाला और न अधिक सोने या न अधिक जागने वाला ही योग में सिद्धि प्राप्त कर रोग का निवारण कर सकता है।

योग एक ऐसी शारीरिक क्रिया है जिसे विभिन्न आसनों पर बैठकर, कमर या पेट के सहारे लेटकर या खड़े होकर संपन्न किया जा सकता है। शरीर को तनाव मुक्त किया जा सकता है। शरीर को रोगों के दुष्प्रभाव से बचाया जा सकता है। पर यदि रोगग्रस्त हैं तो चिकित्सक की सहायता तो लेनी ही पड़ेगी। भागदौड़ से भरी आजकल की जिन्दगी और प्रतिस्पर्धापूर्ण आधुनिक जीवन शैली के कारण उत्पन्न तनाव, प्रदूषित वातावरण, कुबेला का भोजन एवं असंतुलित आहार आदि के कारण लोग उदर रोग, श्वास संबंधी रोग, उच्च रक्तचाप, सर्वाइकल स्पोन्डिलाइटिस, हृदय रोग के अलावा कई रोगों से ग्रस्त होते जा रहे हैं। शरीर को इन रोगों के द्वारा क्षति पहुँचाने से पहले ही हमें कुछ ऐसा उयाय अपनाने की आवश्यकता होती है जिसमें शरीर को अधिक दबाव का सामना करना न पड़े। फलस्वरूप आजकल यह एक ऐसी आवश्यकता बन गई है जिसे विभिन्न वर्ग के लोग अपने स्वास्थ्य की रक्षा हेतु अपनाने लगे और यत्र तत्र योगासन केंद्रों की स्थापना और इसमे दिखाई पड़ने वाली उपस्थिति इस बात का प्रमाण है। क्योंकि योगासन ही एक ऐसी प्रक्रिया है जिसे सहजता और सरलता के साथ किया जा सकता है और जिसमें लोगों को विभिन्न रोगों से निदान दिला सकने की क्षमता है।

अब प्रश्न उठता है कि कौन-कौन से योगासन उपयुक्त रहेंगे?

योग के अंतर्गत कई आसन हैं, जो स्वस्थ व्यक्ति के लिए उपयुक्त रहता है तो कई आसन ऐसे हैं जो असामान्य स्वास्थ्य के लोगो के लिए ही गुणकारी और उपयुक्त माने गए हैं। मैं अपने पड़ोस में आयोजित योग शिविर में सहभागी होने के लिए तब तक समय नही निकाल पाया जब तक मैं कोष्ठवद्घता, एसिडिटी, उच्च रक्तचाप, सर्वाईकल स्पोन्डिलिाइटिस जैसे समस्याओं से आक्रांत नही हुआ। विभिन्न औषध उपचार से जब थक गया तब मैं लोनावला योग केंद्र द्वारा आयोजित योग शिविर में एक रोगी के रुप में सहभागी हुआ और योगाचार्यो के द्वारा बताए गए आसनों के नियमित अभ्यासों ने अभूतपूर्व चमत्कार दिखाए और उसका लाभ आज तक उठा रहा हूँ। मेरी शारीरिक अवस्था के कारण कपालभाति और शीर्षासन मेरे लिए उपयुक्त नही बताया गया पर जिन आसनों का मैं नियमित अभ्यास करता रहा उसने मेरे जीवन को एक नई दिशा दी। अतः मेरी यह राय है कि विभिन्न रोगों से आक्रांत होने से पहले ही योगासनों का अभ्यास शुरु कर दें, जिससे कि स्वास्थ्य की रक्षा हो और शरीर जर्जर होने से बचे। यदि किसी रोग से निदान पाने की दृष्टि से योगाभ्यास करना चाहते हैं तो सबसे पहले अपने योगाचार्य को अपनी स्वास्थ्य समस्या से अवगत कराएँ और उनके मार्गदर्शन में ही यौगिक आसनों का नियमित अभ्यास करते हुए इसे अपनी दिनचर्या बनाएँ।

इसके बाद प्रश्न उठता है कि इन आसनों पर कितनी देर बैठा जाय? प्रारंभ में तो योगाचार्य के द्वारा बताए गए समयतालिका का ही अनुकरण करना उपयुक्त होगा। पर कभी समय का अभाव अनुभव हो तो एक आसन पर 4 से 5 मिनट बैठ सकते है। शरीर सक्षम है तो 10 मिनट का समय उपयुक्त रहता है। अन्यथा जितने भी आसन करने हों उसके लिए 15 मिनट से आधे घंटे का समय उपयुक्त होगा। यदि ऑफिस जाने या बाहर निकलने की जल्दबाजी नही हो तो एक से दो घंटे तक भी विभिन्न आसनों पर बैठकर उनसे चमत्कारिक लाभ उठाया जा सकता है। पर शरीर पर अनावश्यक रूप से जोर नही डालना है। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें शरीर पर तनाउ उत्पन्न नही करनी है। कई लोग टेलिविजन या पुस्तक के माध्यम से भी योगाभ्यास किया करते हैं। यह भी उपयुक्त नही है क्योंकि इस प्रक्रिया में ऐसी कई त्रुटियाँ होती हैं जो योगाभ्यास करता हुआ व्यक्ति स्वयं अनुभव नही कर पाता और वे त्रुटियाँ शरीर को हानि पहुँचाने से नहीं चुकतीं। अतः प्रारंभ में योगाचार्य के मार्गदर्शन की उसी प्रकार आवश्यकता होती है जिस प्रकार शिक्षारंभ के लिए किसी शिक्षक की आवश्यकता होती है।

अब योगाभ्यास के लिए सबसे उपयुक्त समय की बात की जाय। इसके लिए सबसे उत्तम समय प्रातः का होता है। अपने नित्य कर्म से निवृत्त होकर, संभव हो तो नहाकर, योगाभ्यास के लिए तैयार हों। योगाभ्यास से पहले चाय का सेवन न करें। कई लोगों की मान्यता है कि चाय का प्याला लिए बिना शौच से निपट नही सकते हैं। ऐसी स्थिति में चाय पीने के आधे घंटे के बाद योगासन पर बैठना चाहिए। योगासन के लिए पहने जाने वाले कपड़े ढीले हों। योगाभ्यास पूरी होने के आधे घंटे के बाद ही कुछ खाएँ या पीएँ। यदि कमरे के अंदर योगाभ्यास किया जा रहा है तो दरवाजे ओर खिड़कियों को पूरी तरह खोल दें जिससे कि कमरे के अंदर स्वच्छ हवा का संचार हो सके। योगासनों मे सहजता और सरलता का अनुभव होना चाहिए अर्थात अंगों को खिंचने या उनको जोरजबर्दस्ती के साथ हिलाने का काम नही किया जाना चाहिए। मुख मुद्रा में भी तनावशैथिल्य का भाव उत्पन्न होना चाहिए। श्वासन की मुद्रा में लेटने पर श्वास का प्रसार शरीर के अंगों में कहाँ तक हो रहा है, इसका अनुभव भी करते रहें। हरेक आसन की अवधि को निर्धारित करने हेतु आप संख्या की गणना की सहायता ले सकते हैं। जैसे 5 से 10 तक की गिनती से हरेक योगासन का प्रारंभ करें। प्रतिदिन इस संख्या को धीरे-धीरे बढ़ाते हुए 100 से 150 तक ले जा सकते हैं। महिलाओं के संदर्भ में इतना ही कहा जा सकता है कि मासिक धर्म के दिनों में योगासनों का अभ्यास न करें। यदि करना ही है तो अनुलोम-विलोम और श्वासन का अभ्यास किया जा सकता है। इस मामले मे भी योगाचार्य का मार्गदर्शन उपयुक्त होगा।

इतना कहते हुए मैं अब कुछ ऐसे आसनों की चर्चा करना चाहुँगा जो सभी प्रकार के लोगों के लिए उपयुक्त होता है। शवासन, वज्रासन, पवन मुक्तासन, शलभासन, हलासन, अद्र्धमत्स्येन्द्रासन, धनुरासन, ताड़ासन, सिंहासन, मत्स्यासन, गोमुखासन, भ्रामरी, पद्मासन, सुखासन, अनुलोम-विलोम ऐसे आसन हैं जो हर उम्र के स्वस्थ एवं विभिन्न रोगों से ग्रस्त लोग कुशल योगाचार्य के मार्गदर्शन में प्रारंभ कर स्वास्थ्य लाभ के अतिरिक्त नवजीवन प्राप्त कर सकते हैं। उपर्युक्त आसनों के अतिरिक्त और भी कई आसन और योग के प्रकार हैं जो विभिन्न रोगों के निदान में सहायक माने गए हैं, जो योगाचार्यों के निर्देशन के अनुसार किया जाना चाहिए। इन आसनों में योगाभ्यास करने वाले लोग कुछ महीने बाद ही शरीर में एक स्फूर्ति, तनावशैथिल्य, आह्लाद और शांति का भाव अनुभव करने लगेंगे। वज्रासन और शवासन ही ऐसे आसन हैं जिन्हे भोजन के पश्चात भी किया जा सकता है।

स्वस्थ, तनावमुक्त और आह्लादमय जीवन के लिए योग के महत्व को जानते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ ने योग को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्रदान की, जिसका श्रेय भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदर दास मोदी को जाता है। उनके सत्प्रयासों के कारण संयुक्त राष्ट्र संघ ने 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मनाये जाने की घोषणा की, जिसे भारत और नेपाल के अतिरिक्त विश्व के सौ से भी अधिक देशों का समर्थन मिला। फलतः प्रत्येक वर्ष 21 जून के दिन विश्व के विभिन्न देश इसे अंतराष्ट्रीय दिवस के रूप में मनाते आ रहे हैं।          

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