हिंदी संस्करण

बुढ़ापे का जीवन

हास्यव्यंग्य

person access_timeJun 09, 2020 chat_bubble_outline0

जब मेरे मित्रजन किसी मीटिंग में मेरी ओर संकेत करते हुए ‘यह बूढ़ा’ या ‘बुढवा’ कहते हैं तो बहुत बुरा लगता है। लगता है कि उनके बाल नोच लूँ या बत्तीसी निकाल दूँ। पर अहिंसात्मक शैली में उनसे प्रतिवाद करते हुए कहता हूँ- ‘अगर मेरे सफेद बालों के कारण मुझे इस उपाधि से विभूषित कर रहे हो तो यह भी जानो कि मेरे चलने की गति न तो आप लोगों से कम है और न ही मुझे लाठी के सहारे की जरूरत है। अब भी मैं लाठी के बिना लंबे-लंबे डग भरकर चलता हूँ। दौड़कर बसों पर चढ़ जाता हूँ। खड़े खड़े यात्रा कर लेता हूँ।’ इस पर वे ठहाके मारकर कहते हैं- ‘लो बुढ़वा खिसिया गया।’ और उनकी खिलखिलाहट पर मैं भी हँस पड़ता हूँ। (कोई चारा भी तो नही है, क्योंकि मैं अल्पमत में होता हूँ। प्रजातंत्र का जमाना है। (नही, यहाँ पर तो लोकतंत्र का जमाना है।)

घर लौटते हुए बस की यात्रा आवश्यक हो जाती है। तो जनाब, बस में घुसते ही जब कोई नवयौवना या बढ़ती उम्र की महिला अपने आसन से उठकर मुझे सीट देते हुए कहती हैं- ‘सर बैठिये।’ तो उसकी मधुर वाणी और विनयशीलता से दिल खिल उठता है। पर मैं भी अपनी सहृदयता दिखाते हुए (कभी उनके कधे पर हाथ रखते हुए) कहता हूँ- ‘नही बैठी रहिये। मैं खड़ा रह सकता हूँ।’ पर जब वह कह उठती हैं- ‘नही सर, आप बैठिये, आप तो मेरे पिताजी या दादा जी की उम्र के बराबर हैं’ तो जीभ का वह स्वाद फीका सा हो जाता है जो उनकी मधुर वाणी के कारण उत्पन्न हुआ था। फिर भी उनकी भावना की कद्र करते हुए बैठ जाता हूँ और सोचने लगता हूँ- ‘यह उनके द्वारा प्रदर्शित सद्भाव है या मेरे बुढ़ापे का मजाक या व्यंग्य?’

इधर घर लौटने पर जब पत्नी भी बोल पड़ती है कि इस उम्र में कहाँ दिन भर घूम रहे थे? मोटर साइकिल के दबोच में आ गये तो.....तब बेटे लोग भी उनकी आवाज में आवाज मिलाते हुए (मानो कोई सामूहिक गीत गा रहे हों) कहने लगते हैं- ‘हाँ, पिताजी, देखो इतना मत घूमा करो? मीटिंग आदि तो चलती रहती और चलती रहेगी, आप जायें या न जायें। एक आपके न जाने से पार्टी को कोई फरक नही पड़ने वाला। अब बूढ़े हो गये हो, रिटायर हो चुके हो, सरकार ने भी सेवा से छुट्टी दे दी है। इसलिए घर पर बैठो, अखवार आदि पढ़ो, टी.वी. देखो। अगर इन सब बातों से जी भर जाय तो बगीचे में जाकर घास आदि छिला करो। देखो कितना बढ़ गया है। इसी बहाने एक्सरसाइज भी हो जायगी। अब बताइए एक्सरसाइज करने के लिए भी कोई बहाना चाहिये?’ एक ओर उलाहने के शब्द तो दूसरी ओर सहानुभूति या व्यंग्य के। समझ में नही आता प्रकृति के द्वारा दी गयी इस अमूल्य वरदान को लोग क्यों इस रूप में लेते हैं?

मुझे तो नेपाली संस्कार और शब्द बहुत ही प्यारे लगते हैं जहाँ बूढों को सम्मान के साथ ‘हजुर’ आदि कहते हुए बातें की जाती है (भले ही दण्डवत की परंपरा समाप्त हो चुकी हो) पर कहावत तो आज तक कायम है न- ‘कुरा सुन्नु बुढाको, आगो ताप्नु मुढाको।’ अर्थात बातें सुननी हो तो बूढ़ों की सुनो और आग तापनी हो तो कुंदे की। अब यह बात अलग है कि आजकल बच्चों के पास बूढ़े लोगों के पास बैठने का समय नही होता। उन्हें या तो फेसबुक पसंद है या गर्लफ्रेंड या ब्वायफ्रेंड के साथ मोबाइल पर चैट करना।

पर बूढ़ो की सुनने और उनकी बातों की कद्र करनेवाले अब भी हैं इस जमाने में। आजकल लॉकडाउन चल रहा है। बूढ़े लोगों को घर से बाहर न निकलने की हिदायतें हैं। अतः घर के अंदर ही सिमटकर बैठना पड़ रहा है। इन हालातों में मैं आज भी बूढ़ों की विवशता को समझने वालों को पाता हूँ,  जिसके पीछे उनकी सहायता, सद्भाव और सम्मान की भावना होती है। उस दिन मैने अपने फर्मासिस्ट से फोन पर बातें की। (अपना तो क्या होता? आजकल तो अपने भी पराये की तरह पेश आते हैं। मतलब निकल जाने पर पहचानते तक नही) पर वह फर्मासिस्ट कद्र करता है। मैने कहा- ‘बेटा, देखो, हम लोग तो अब हाइ डेंजर रिस्क पर हैं। लॉकडाउन चल रहा है। दुकान पर आ नही सकते। इसलिए एक तकलीफ दे रहा हूँ। मुझे कुछ दवाईयाँ चाहिये। भिजवा सकते हो।’ ‘क्यो नही बाबूजी। बोलिए क्या-क्या चाहिये, कितनी चाहिये?’ तो उसे दवाईयों के नाम लिखबा दिए उसने महीने भर की दवाईयाँ भिजवा दी।

घर पर हैं तो बोलना पड़ता है। कुछ बोलो तो पत्नी की सुनो- ‘क्या चिकचिक करते रहते हो। चुप होकर टी.वी. देखो।’ पत्नी भले ही डाँट दे पर उसने आज तक मुझे बूढ़ा कहते हुए संबोधन नही किया। उसकी यही बात मुझे बहुत पसंद है। जबकि उसे भी औरों की तरह पता है कि मैं अब जवान नही रहा। बूढ़ा हो चला हूँ। डाँट-फटकार को छोड़ दें तो जब भी वह ‘जरा सुनिए तो’ के उच्चारण के साथ बातें करती है तब मुझे उसके द्वारा की जाने वाली बातों के कारण उसकी डाँट भी बड़ी प्यारी लगती है। और उसके निकट पहुंचता हूँ तो बोल पड़ती है-‘अब तो सँभलो। बच्चे समझदार हो गये हैं।’

तो जनाब ये हालात है मेरे जैसे लोगों (बूढ़ा नही कहुंगा) की। शुकर है घर में कद्र है, (थोड़ी बहुत ही सही)। भले ही कभी पोती-पोतें को गोद में लेना हो (ताकि बहू सब्जी छौंक सके, रोटी सेक सके और बीबी पूजा में बैठ सके, बेटा अखबार पढ़ सके) या टी.वी. देखते हुए समय गुजारना हो या घास छिलने के लिए बगीचे में जाना पड़े (एक्सरसाइज के बहाने ही सही)।

कमेन्ट

Loading comments...