हिंदी संस्करण

नरेन्द्र मोदी को पशुपतिनाथ का एक पत्र

person access_timeMay 29, 2020 chat_bubble_outline0

अनु. सहयोगी- शोभा काफ्ले खतिवडा तथा गूगल

 
सम्माननीय प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी जी !

आराध्य देव पशुपतिनाथ की ओर से ढेर सारी शुभकामनाएँ !!! 

मैं पशुपतिनाथ ! आप मेरे अनन्य और प्रिय भक्त ! जो बार-बार नेपाल आते वक्त मेरा दर्शन किये बिना नहीं लौटते ! एक भक्त के लिए कोई भी महान भगवान हो सकता है, लेकिन भगवान के लिए एक अच्छे भक्त से बड़ा कुछ नहीं है। इसलिए आज मैं यह पत्र अपने प्रिय भक्त और अपने पुजारी नरेंद्र दामोदरदास मोदी को भेज रहा हूँ ! मुझे आशा के साथ ही विश्वास भी है कि मेरा भक्त इस पत्र को पढ़कर अवश्य ही गंभीर होगा।  

ओह नरेंद्र ! लोग कहते हैं आपने 14 साल की छोटी उम्र में शादी कर ली ! आप अपनी इच्छा के विरुद्ध या अपने स्वभाव के विरुद्ध पारिवारिक बंधन में नहीं रहना चाहते थे ! पत्नी को छोड़कर भौतिक सुखों से वंचित आप आध्यात्मिक और आंतरिक खुशी की तलाश में एक अन्वेषक बन गए। पूरे भारत के परिभ्रमण के साथ ही पशुपतिनाथ, नेपाल के मुक्तिक्षेत्र और दामोदर कुण्ड की भी यात्रा की आपने। बहुत सालों बाद वापस लौटकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में शामिल हो गए। अपने इष्टदेव के आशीर्वाद और अपनी निस्वार्थ और चमत्कारी छवि के साथ राजनीति में कदम रखा ! आज आपके नेतृत्व के दौरान मेरे (पशुपति-भोलेनाथ) द्वारा पालित तुम्हारे बच्चे, तुम्हारे ही शासन के दौरान ही नेपाल की (मेरी) पवित्र भूमि पर कब्जा करने के विचार के साथ कैसे प्रस्तुत हुए ? मेरा (पशुपतिनाथ) का अनुमान है कि आपकी छवि को धूमिल करने और विफल बनाने के लिए आपकी नौकरशाही ने आपको गलत तरीके से प्रस्तुत किया होगा !

वैसे आप काशी विश्वनाथ बाबा के पवित्र निवास स्थान वाराणसी से लोकसभा के निर्वाचित प्रतिनिधि भी हैं। विश्वनाथ के साथ समय-समय पर हमारा संपर्क होता रहता है और अक्सर मेरी उनसे बातचीत भी होती रहती है। बातचीत के दौरान अक्सर आपका जिक्र भी होता है ! विश्वनाथ जी आपकी प्रशंसा करते हैं और कहते हैं, नरेंद्र जैसे भक्त का होना हर भगवान के लिए सौभाग्य की बात है !

लेकिन, आज मुझे अपने प्रिय भक्त नरेंद्र के खिलाफ एक गंभीर शिकायत है ! नेपाल के इस ग्लेशियर के कालापानी, लिपुलेक और लिम्पियाधुरा क्षेत्र, मैंने अपने संरक्षण में आरक्षित रखा है, आपके प्रधानमंत्री बनने से 55 साल पहले भारत चीन युद्ध के दौरान आपके देश की सेनाओं द्वारा हमसे आश्रय माँगा गया था तब हमने अपने ये क्षेत्र बड़ी उदारता के साथ तुम्हारे देश की तत्कालीन आवश्यकता को देखते हुए कुछ समय के लिए सहयोगार्थ दिया था। दुःख के समय में किसी के लिए अपनी छाती को दशतरखाना बना देना,  'अतिथिदेवो भव' के सिद्धांत का अनुशरण करना हिंदू धर्म का मूल सिद्धांत है।



हाँ, आपके आचरण से तो ऐसा लगता है कि आप स्वयं भी कट्टर हिंदू पुरुष हैं, आप इसके विशिष्ट अनुयाई भी हैं। कुछ समय के लिए, समय कि मांग के अनुसार भारत रुपी अतिथि को नेपाल जैसे छोटे से मेजमान के यहाँ शरण लेनी पड़ी होगी। देखों नियमानुसार तो इस मेहमान को अपनी समस्या के समाधान पश्चात् छोटे से मुल्क पर अधिक भार न बनकर वह जगह छोडकर अपने देश वापस चले जाना चाहिए था ! लेकिन वह अतिथि बैठा रहा, बैठा रहा, बैठा रहा और दीर्घावधि में वो शायद ये भूल ही गया कि वह यहाँ मेहमान है, उसने इसे अपना ही मानकर अपना ही करार दे दिया और वह यहाँ से गया ही नहीं, इस ग्लेशियर में मेरे द्वारा पोषित बच्चों का स्वभाव ही कुछ ऐसा था कि वो अतिथि को उठकर जाने के लिए भी नहीं बोल सका था।

ओह, नरेंद्र ! क्या एक व्यक्ति जो दो या चार दिनों के लिए किसी के घर पे रहने के लिए आया है क्या कुछ समय के वहां के निवास के बाद वह उस स्थान पर कब्जा कर सकता है ? क्या मेहमान के रूप में आकर,  मकान मालिक को धोखा देकर, उस घर को अपना बताते हुए मकान मालिक को खदेडना कहाँ का न्याय है ? इस तरह का पापपूर्ण काम करने का विचार आपके मन में क्यों और कैसे आया ? मेरे अलग-अलग रूप और आपके आराध्य देव बाबा विश्वनाथ और सोमनाथ आपके इस तुच्छ कार्य को देखकर मन ही मन क्या सोच रहे होंगे ?

एक दिन आप लोगों की सेना द्वारा मेरी उस पवित्र भूमि को छोड़ने की मेरी उम्मीद थी, लेकिन वैसा नहीं हुआ। आपने तो नेपाल की भूमि को अपना ही बनाकर आपने देश का नया नक्शा सार्वजनिक कर दिया। हमारे छोटे से देश नेपाल में उसका विरोध हुआ, पर आप जैसे बड़े शक्तिशाली राष्ट्र पर उसका कोई प्रभाव न पड़ा इतने से ही आपका मन न भरा आपने तो हमारे रहते ही हमारी जमीन हो हथियाकर वहां सड़क ही बना दी, उसका उद्घाटन भी कर दिया। कहीं ऐसा तो नहीं कि सदियों तक ब्रिटिश कि हुकूमत में रहते रहते उसके ही पद चिह्नों का अनुशरण करने लगे, व्यापार के लिए भारत आई इष्ट इण्डिया कंपनी ने देखते ही देखते वहां आपने झंडे गाड़ दिए थे। अच्छा अब आगे बात करें जब आपने हमारे देश को छोटा मुल्क सोचकर, उसकी कोई परवाह किये बिना मेरी ही जमीन को हथियाकर नक्शा बना लिया तो मेरे छोटे छोटे बच्चों ने भी, मेरे ही बलबूते पर अपनी भूमि को अपने ही देश ने नव निर्मित नक़्शे में समेटा, अपने देश के मानचित्र में उस जमीन को रखा जो हमारी ही है। अब, आपकी पालतू मीडिया, नेपाल के इस मानचित्र के पीछे चीन की साजिश कहकर भौकने लगे हैं और इधर मेरे नेपाली सरल और उदारमना नेपाली बच्चे अपनी उस भूमि के वचाव में शोरगुल करने लगे है। याद रखें,  इस देश के कई नेताओं को आपकी शरण में आने और मदद मांगने की आदत है, इसलिए आपके लिए यह सोचना असामान्य नहीं है कि वे आपके यहाँ नहीं आने के बाद अवश्य ही चीन की शरण में गए होंगे। पर आप यह मत भूलो कि आप और चीन दोनों ने ही मिलकर एक समझौता किया था और इस भूमि लिम्पियाधुरा से व्यापारिक रास्ता बनाने का सम्झौता किया था, तो इस मामले मे भला चीन हमारे पक्ष में क्यों होगा ? हमारी कोई मदद क्यों करेगा ?
 

ओह, पिछले साल ही तो आप हमारे स्थान पर आये और हमारे मंदिर बड़ी ही धूमधाम से पूजा की ! हमारे चारो दरवाजों को बंद करके महारुद्री भी कराई और एक करोड रुपये का चंदा भी चढाया ! अपने भक्त की उस भक्ति को देखकर मैं भी बड़ा खुश और गदगद हुआ। मेरी प्रसन्नता का लाभ उठाकर तुमने जो माँगा मैंने तथास्तु कह दिया अब मैं ठहरा औघड़दानी, मैं ठहरा आशुतोष, जलदी खुश हुआ। सब कुछ दे दिया ! लेकिन भला उस समय कहाँ विदित था कि मैंने जो भी कुछ तुम्हारे लिए वरदान बनाया तुम उसके बड़े मेरे ही छोटे से टुकड़े के निवासियों पर अपने आक्रांत हथकंडे अपनाओगें, मुझे कहाँ मालूम था कि तुम्हारी पूजा के पीछे भी ऐसी भयानक चाल है, होने को तो गलती मेरी ही है मुझे तुम्हरी प्रवृत्ति को समझ जाना चाहिए था। ये तियम्हि तो थे जब मेरे छोटे छोटे सरल, कोलम हृदय के बच्चे भूकपं की मार से हाल बेहाल थे तब तुमने इस टुकड़े के लोगों के लिए आवागमन के रास्ते बंद कर दिए थे, नाके बंद कर दिए थे।  

प्रिय भक्त नरेंद्र !

हालाँकि, आपने पशुपतिनाथ के जन्मस्थान, निजी निवास और मूल निवास कैलाश का मार्ग बनाया है, पर क्या किसी और की जमीन को मिलाकर सड़क बनाना उपयुक्त है ? और क्या यह पराई जमीन को अपना नाम पर पारित करके जमीन हड़पना ठीक है ? मैं, महादेव, विभिन्न स्थानों पर विभिन्न नाथों पशुपतिनाथ, विश्वनाथ, केदारनाथ, सोमनाथ के रूप में रह रहा हूँ ताकि मेरे भक्तों के लिए मेरे दर्शन करना आसान हो।

 हाँ, मुझे यह पता है, इन सभी स्थानों में से, पशुपतिनाथ मेरा पसंदीदा क्षेत्र है क्योंकि यह एक ऐसा देश है जो मेरी (महादेव की) यह भूमि कभी परनिर्भर नहीं रही। फिर उस स्थान को कैलाश कहा जाता है, जिसमें मेरे परिवार के साथ मेरी पत्नी पार्वती, पुत्र गणेश और कुमार भी शामिल हैं। कैलाश मे मुझे बहुत शोर गुल पसंद नहीं है।



पशुपतिनाथ इस बात से पूरी तरह से वाकिफ है कि लिपुलेक और लिम्पियाधुरा की वे ज़मीनें जो अब जबरन तुम्हारे कब्ज़े में हैं, नेपाल की हैं ! जब आपके देश की स्वतंत्रता को अंग्रेजों द्वारा पैरों तले रौंदा जा रहा था तब मैंने पशुपतिनाथ की शक्ति और धर्म की शक्ति हासिल करके इस देश को बचाया है। और कभी किसी का गुलाम नहीं होने दिया। इसी लिए तो मुझे "पशुपतिनाथ पसंद आया" !

मेरे भक्त नरेंद्र !!!

8 मार्च, 1816 की सुगौली संधि, उसी वर्ष की 16 दिसंबर की सुगौली अनुपूरक संधि, 1857 में भारत द्वारा नेपाल का नक्शा जारी, बांके, बरदिया, कैलाली और कंचनपुर को नेपाल वापस करने का समझौता, 1 नवंबर, 1860 को, 7 जनवरी, 1875 को दांग के डुडुवा क्षेत्र के सीमांकन की मैपिंग, 1995 में लिम्पियाधुरा क्षेत्र के नागरिकों द्वारा भुगतान का प्रमाण, 2015 के आम चुनाव की मतदाता सूची और 2018 की जनगणना से पुष्टि होती है कि लिम्पियाधुरा नेपाल की भूमि है ! मैंने इस देश के प्रतिनिधि से बातचीत के दौरान इन सभी सबूतों को लेने और मोदी को दिखाने के लिए कहा है।

आह नरेंद्र !!! मेरे आशीर्वाद की शक्ति और ताकत के कारण, देश के लोगों की नसों में ईमानदारी, बहादुरी और बलिदान का खून बह रहा है जहां मैं रहता हूं ! इस देश के कितने बहादुर नागरिक गोरखा राइफल्स के रूप में आपके देश की सीमाओं पर गए हैं और सीमा रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दी है ! जो लोग आपकी मातृभूमि की रक्षा की अग्रिम पंक्तियों पर खून बहा रहे हैं, वे कई कारगिलों में अपने जीवन का बलिदान कर रहे हैं! आपकी सीमा पर तैनात उन बहादुर सैनिकों के हाथों की राइफलें क्या कहेँगी ? जब जबरन उधर उन बहादुर सैनिकों की अपनी भूमि अर्थात् उनकी मातृभूमि को लूट लिया जाता है ?

आह, भाई नरेंद्र !!!

एक बात और कहूं! अब मुझे पशुपतिनाथ के प्रधान मंत्री ओली और सोमनाथ के प्रधान मंत्री मोदी के बीच एक अनूठा संयोग दिखाई देता है ! ओली के यहाँ कोई संतान नहीं है और मोदी के कोई संतान नहीं है! यहां, ओली ने अपनी संपत्ति राष्ट्र के नाम पर समर्पण कर दी है, यानी मोदी लालची नहीं हैं। यहाँ ओलीजी ने राजनीतिक मुक्ति के लिए 14 साल जेल में बिताए और कितने वर्षों तक आपने आध्यात्मिक मुक्ति के लिए और एक शांतिपूर्ण धार्मिक जीवन व्यतीत करने के लिए घर छोड़ दिया ! दोनों ने अपने-अपने देशों में चमत्कारी नेतृत्व कौशल दिखाया और अपनी पार्टियों के लिए भारी बहुमत प्राप्त किया। दोनों अपने राष्ट्र के लिए लड़ रहे हैं और उनके देश के लोगों को दोनों पर अटूट विश्वास है। दोनों को पूर्वी सभ्यता और संस्कृति पर गर्व है।

अंतर केवल इतना है कि मोदी दूसरे की मातृभूमि के एक टुकड़े को निगलने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि ओली ने नैतिक हथियार "सत्यमेव जयते" का उपयोग करके अपनी जमीन वापस लेने का फैसला किया, जो उनके पूर्वजों ने अर्जित किया और उनके दिल का टुकड़ा था।

मेरे भक्त मोदीजी !!!

मर्यादा पुरुषोत्तम राम सीता को जंगल में ले गए थे और उन्हें सीता के किसी दोष के बिना, लोकापवाद को बहुत शक्तिशाली मानते हुए वही छोड़ दिया था।

वर्तमान युग के मानवतावाद के दृष्टिकोण से, यह कार्य उपयुक्त है या नही वह दूसरी बात है, लेकिन यह लोकापवाद का एक शक्तिशाली विम्ब तो है ही ! प्लीज मोदी जी ! लोकापवाद से भी बचें !

अतिरंजित, करामाती, कल्पनाशील, हवादार, काल्पनिक और अस्तित्वहीन समाचार बनाने वाले पालतू जानवर जैसे और कठपुतलियों जैसे आप के डिजिटल मीडिया को नियंत्रित किया जा सकता है तो कीजिए और अपनी छवि बचाइए !

और मोदी जी ! मैंने अपने द्वारा शासित देशों की सरकारों से बातचीत और कूटनीति के माध्यम से समस्या को हल करने के लिए कहा है ! मैने पर्याप्त सबूतों के साथ जाने के लिए कहा है ! सबूत और दस्तावेजों को देखें और जमीन वापस करें !

समस्या को जल्दी से हल करें, आज इतना ही ! आपका भला हो !
 

                                                                                                                                                                   आराध्य देव पशुपतिनाथ

                                                                                                                                                                            पाशुपतक्षेत्र

                                                                                                                                                                    सङ्घीय गणराज्य नेपाल

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